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Tuesday, February 20, 2018

सेलम से यरकाड



दोपहर के तीन बजे हैं, आज कई दिनों के बाद इस वक्त डायरी खोली है. सुबह नींद खुलते ही योग निद्रा का जो अभ्यास कल शाम को किया था उसे दोहराया. मन जो संकल्प करता वही मूर्त होकर दिखने लगता ! काफी दिनों बाद आज ब्लॉग पर लिखा. कुछ प्रसिद्ध लेखकों की तस्वीरें भी प्रकाशित कीं फेसबुक पर. क्लब में सम्भावित कार्यक्रमों की एक सूची भी बनाई, अगली मीटिंग में पढ़ेगी. कुछ संबंधियों और सखियों से फोन पर वार्तालाप हुआ. शाम को क्लब की एक सदस्य के घर जाना है. नैनी अभी तक काम करने नहीं आयी है, वह गर्भवती है पर सामान्य व्यवहार करती है, किसी भी तरह का विशेष ध्यान नहीं रखती.

कल शाम जून आ गये. उन्होंने मिलकर लड्डू बनाये और आज सुबह उसने चिवड़ा-मूंगफली भी बनाया, जो वे नन्हे के लिए ले जा रहे हैं. परसों दस दिनों की यात्रा पर निकलना है. इस बार की यात्रा भिन्न होगी पहले से. एक दो दिन की गर्मी के बाद आज मौसम में बदलाव नजर आ रहा है, शायद शाम तक वर्षा होगी. कल स्कूल में शिक्षक दिवस पर उसे अच्छा सा उपहार मिला, फूलों वाला मगसेट तथा विद्यार्थियों की ओर से एकम बड़ा सा मग.

नैनी के घर में फिर झगड़ा हो रहा है. नर्क में रहना शायद इसी को कहते हैं. अज्ञान में डूबे ये लोग आपस में प्रेम से रहना ही नहीं जानते. काहिली, प्रमाद तथा नशा, तामसिक भोजन सभी मिलकर कैसा माहौल पैदा करेंगे इसकी कल्पना ही की जा सकती है. क्या वह इनके जीवन में सुधार लाने के लिए कुछ कर सकती है ? उसे स्वयं के भीतर व्यर्थ का चिन्तन रोकना होगा, उन्हें मानसिक शुभकामनायें देनी हैं, उन्हें सन्मार्ग पर जाने का उपदेश नहीं देना, उन्हें प्रेम से समझाना है. आज सुबह अलार्म बज ने से पहले किसी ने कहा( वह उसके सिवा कौन हो सकता है ? ) अब मरे हुए लोग जगेंगे. सारी सुबह इसी भाव में बीत गयी, नींद मृत्यु की निशानी है, सोया हुआ व्यक्ति मृतक के समान ही होता है. परमात्मा किस तरह हर समय उनके साथ ही रहते हैं. उनके मन की गहराई में और इससे पार अनंत तक विस्तारित भी...

परसों दिन भर वे सफर में रहे, रात्रि ग्यारह बजे नन्हे के घर पहुँचे. कल दोपहर ही पुनः एक छोटी सी यात्रा के लिए निकल पड़े. इस समय सुबह के ग्यारह बजने वाले हैं. बंदरों की उछल-कूद की आवाजें कमरे के भीतर तक आ रही हैं. बच्चों को पेट से चिपकाये मादा बन्दर इधर से उधर छलांगे लगा रही हैं और बड़े-बड़े नर बन्दर झुण्ड की अगुवाई करते हैं. कल वे यहाँ पहुंचे तभी होटल के स्वागत अधिकारी ने बताया, कमरे का दरवाजा तथा खिड़की बंद रखें नहीं तो भीतर बन्दर आ जायेंगे. सुबह जरा सी खिड़की हवा के लिए खोली, अब बंद कमरे में तो व्यायाम नहीं किया जा सकता तो एक महाशय भीतर आ गये, नजर पड़ गयी वरना सब सामान खुला पड़ा था, पता नहीं किस पर उसकी नजर पड़ जाती. एकदम नजदीक से उनकी तस्वीरें लीं पर उन्हें शायद इसकी आदत हो गयी है, कोई हील-हुज्जत नहीं की, आराम से फोटो खिंचवाते रहे. पंछियों और झींगुरों की आवाजें भी लगातार आ रही हैं, कल शाम को वे यहाँ सेलम से पहुंचे, तभी से. यह रिजार्ट एक पहाड़ी पर बना है. ऊपर-नीचे सीढ़ियों से आते-जाते सुंदर बगीचे व मीलों दूर तक फैली हरी-भरी घाटी के मनोहारी दृश्य दिखाई पड़ते हैं. तमिलनाडू का एक दर्शनीय पहाड़ी स्थल है यरकाड, ऊटी और कडाईकोनाल का नाम तो प्रसिद्ध है पर इसका नाम यहीं पहली बार सुना है. किन्तु यह भी प्राकृतिक सुन्दरता का धनी है. कल शाम से आज सुबह तक वे यहाँ के कई स्थान देख चुके हैं तथा ट्रैकिंग आदि का आनन्द भी ले चुके हैं. रात्रि को भोजन से पूर्व छह खिलाडियों द्वारा खेलने योग्य कैरम बोर्ड पर एक बंगाली दम्पत्ति भी उन चार जनों के साथ शामिल हो गये. भोजन के बाद जब वे कमरे में आये तो बालकनी से सेलम का जगमगाता रूप देखकर मन्त्र मुग्ध रह गये. दिन में जो घाटी हरियाली से मन मोह रही थी अब रंग-बिरंगी रोशनियों से भरी एक स्वप्नलोक का निर्माण कर रही थी. आकाश पर बादल थे, चाँद-तारों का दूर-दूर तक निशान नहीं था. घाटी में रंगीन बत्तियां ऐसे झिलमिला रही थीं जैसे आकाश धरा पर उतर आया था. याद आया कि एक अंग्रेज महिला इसी घाटी में सूर्यास्त देखने के लिए जिस स्थान पर बैठती थी उसे लेडीज सीट का नाम दे दिया गया. यरकाड को तस्वीरों में कैद कर लिया है, अब यह उनके मनों में जीवित रहेगा.

Friday, April 8, 2016

फूलों की घाटी


आज उसने अपने तीन ढीले-ढाले किन्तु सुंदर लिबास एक परिचिता दर्जिनी को दिए, वर्षों से उन्हें ऐसे ही पहनती आ रही थी, उसने कहा है, उन्हें उसके नाप का बना देगी. मौसम आज भी भीगा-भीगा है, एक बादलों भरा दिन ! कल अवकाश था, शाम को वे क्लब गये एक हास्य फिल्म दिखाई गयी. एक जगह साधना सत्र में ‘क्रिया’ करायी जानी थी, पर उसने जाने की जिद नहीं की, अब कोई आग्रह नहीं रह गया है, जून जाना नहीं चाहते सो वे दोनों वही करेंगे जो दोनों को पसंद है, ताकि अमन बना रहे. ‘क्रिया’ का अंतिम उद्देश्य भी तो अमन ही है न. फिर प्रेम करने का दम भरने वाले जिसे प्रेम करते हैं उसके लिए अपनी इच्छाओं का त्याग ही करना जानते हैं. ‘क्रिया’ से कुछ पाना भी शेष नहीं रहा, अपनी आत्मा व परमात्मा को जिसने एक बार एक जान लिया अब उसके लिए जगत में पाने योग्य कुछ शेष नहीं रहता, जिसे अमृत मिल गया अब वह और क्या चाहेगा. अगले महीने जून को दस दिनों के लिए बाहर जाना है, तब सम्भव हुआ तो कहीं भी जा सकती है, आर्ट ऑफ़ लिविंग, मृणाल ज्योति तथा अन्य किसी सेवा कार्य के लिए ! कल आचार्य राम की गोमुख यात्रा का विवरण पढ़ा, बहुत अच्छा लगा. वे भी कभी जायेंगे पहाड़ी यात्रा पर, फूलों की घाटी, बद्रीनाथ, केदारनाथ और धौला ! यह इच्छा भी वह अनंत को समर्पित करती है, वह चाहेगा तो फलीभूत होगी. ईश्वर हर क्षण उसका सहायक है, वह उसका मित्र है !

सत्संग एक साधक के लिए अमृत के समान है. आचार्य श्री का संग किया तो उसे भी कोई देवदूत मिल गया है. ध्यान में कितना अभूतपूर्व अनुभव घटा, जैसे कोई प्रेम से भिगो गया हो. एक मूर्ति क्षण भर में कितना-कितना स्नेह लुटा गयी, वह कोई दिव्य आत्मा थी शायद. सुबह प्राणायाम के बाद भी आज्ञा चक्र पर एक सुंदर विग्रह के दर्शन हुए. सूर्यदेव की कोई भव्य मूर्ति या कृष्ण..कोई उससे कुछ कहना चाहता है, वही परमात्मा है, वही इस जगत का नियंता है !


आज समय मिला है कि बैठकर अपने तथाकथित अधूरे रह गये कार्यों की एक सूची बनाये, ऐसे तो मानव के सारे कार्य कभी पूर्ण नहीं हो सकते, मृत्यु की घड़ी आ गयी हो फिर भी लगता है कुछ छूट गया है. सबसे पहले बात पत्रों की, दो पाठकों के पत्र आये थे, जिनका जवाब देना है. एक पत्र गुरु माँ को भी लिखना है भावांजलि भेजते हुए. कविताएँ टाइप करनी हैं, किताबों की आलमारी साफ करनी है नये कमरे की. लाइब्रेरी की किताब बदलनी है, कविगोष्ठी के आयोजन के बार में विचार करना है. आज कविताएँ पढ़ीं दिनकर की और भी कुछ कवियों की, अज्ञेय की भी. सभी के शब्दों के पीछे एक सवाल छिपा है, सभी को परम सत्य की तलाश है, उस परम सत्य की जो उन्हें झलक दिखाकर छिप गया है, जैसे कोई लुभाकर कुछ छिपा ले. कवि होना ही एक खोज होना है, भीतर एक हीरा होने का पता तो जिसे चल जाये पर वह हाथ नहीं आये. कवि न समाज का अंग रह पाता है जैसे और लोग रहते हैं, मात्र यांत्रिक जीवन जीने वाले और न ही वह संत की सी तृप्ति का अनुभव कर पाता है, वह इन दोनों के मध्य में रहता है, एक मधुर प्यास लिए, वह आनन्द के चरम को भी अनुभव करता है तो पीड़ा के गह्वर में भी उतरता है.