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Saturday, November 15, 2014

गॉल ब्लैडर में स्टोन



मन की वृत्ति ऐसी हो कि इस जग को रैन बसेरा ही समझे, जिस तरह पंछी आते हैं, एक-एक तिनका चुनकर लाते हैं और नीड़ बनाते हैं, फिर कुछ दिन रहकर निर्मोही होकर उड़ जाते हैं. वे संग्रह पर विश्वास नहीं करते, अपने कर्मों के भरोसे रहते हैं, पर इन्सान के पास जोड़ने का, संग्रह का व्यसन है. जबकि उसे पता नहीं कि जिन वस्तुओं को वह संभाल कर रख रहा है वे उसकी हैं ही नहीं ! उसकी तो यह देह भी नहीं, पंचतत्वों से बनी यह देह तो प्रकृति की है. साधन रूप में मिली है”. बाबाजी ने आज ये वचन कहे थे सुबह. लेकिन जब तक देह है तब तक तो इसके प्रति कर्त्तव्य का पालन करना होगा. सुबह छोटी बहन का मेल पढ़ा, जून ने जवाब भी दे दिया है. कल दोपहर उसने ‘वनिता’ के लिए दो कविताएँ भेजीं. कल दोपहर लिखने का प्रयास किया पर बात बनी नहीं, कई दिनों से नया कुछ लिखा नहीं, जैसे स्रोत के इर्दगिर्द खरपतवार उग आये हैं अथवा काई जम गयी है. पहले उसे साफ करना होगा, तभी धारा फूटेगी. मन को ऊंचे केन्द्रों में ले जाना होगा, निस्वार्थता का पालन करना होगा. वाणी पर संयम और हृदय में प्रेम, अपने आप में आना होगा जो हम वास्तव में हैं. निर्मुक्त, शुद्ध, समर्थ, पूर्ण आत्मा..जिसे कुछ पाने की चाह शेष नहीं, जो झूठे अहम् का शिकार नहीं, जो परहित के लिए ही जीता है क्योंकि उसका हित इसी में है, जो बांटना चाहता है.

एक सखी की बेटी का बुखार अभी तक ठीक नहीं हुआ है, आज पूरे बाईस दिन हो गये  हैं, उससे बात की, वह फोन पर ही रुआंसी हो गयी. उसने तय किया, कल दोपहर या हो सके तो आज ही वह उससे मिलने जाएगी. शाम को क्लब की मीटिंग है, जाना है, कहीं दबी-छिपी यह इच्छा भी है कि कोई नाटक में उसके अभिनय की तारीफ करेगा. अभी तक कई लोग कह चुके हैं, शायद इसी के पीछे नेता और अभिनेता भागते हैं, खैर, वैसे भी उसे जाना था, क्लब की सदस्यता ली है तो सभा में जाना भी एक कर्त्तव्य है. आज बाबाजी को नहीं सुन पायी, मंझली भाभी को फोन किया, वह भी भाई के गॉल ब्लैडर में स्टोन के आपरेशन को लेकर थोड़ी परेशान थी. कल रात को भाई ने बताया था और रात भर वह डरावने सपने देखती रही, अचेतन मन कैसे भयभीत हो जाता है. समाचारों में हिंदुस्तान, पाकिस्तान के अच्छे संबंधों के बारे में आशान्वित लोगों के विचार सुनकर अच्छा लगता है, भविष्य में वह भी कभी पाकिस्तान जा पायेगी अगर ऐसा हो गया तो !


मानव का जन्म आत्म वैभव का अनुभव करने के लिए हुआ है न कि निराश होकर जीवन की गाड़ी को घसीटते हुए किसी तरह दिन गुजारने के लिए ! जीवन का लक्ष्य ऊंचा होगा तो साधन अपने आप मिलते जायेंगे, आज बाबाजी ने एक सूत्र और बताया कि माह में दो दिन उपवास रखा तो तन-मन दोनों हल्के रहते हैं. कल उनकी मीटिंग अच्छी रही, कार्यक्रम तथा जलपान दोनों ही बहुत अच्छे थे. एक नई सदस्या ने सम्बोधित किया, धीरे-धीरे ही सही सभी अपने खोलों से बाहर आ रहे हैं. उसके नाटक की तारीफ़ भी दो लोगों ने की पर अब लगता है कितना ओछापन है यह उम्मीद पालना, नीचे गिरना ही है. यह छोटी-मोटी वाह-वाही विनम्र नहीं बनाती बल्कि एक झूठा नशा देती है. बड़े-बड़े कलाकार कितने मजबूत होते होंगे भीतर से कौन जानता है ? कल दोपहर वह उस सखी के यहाँ गयी, बेटी का इलाज ठीक चल रहा है, बस वक्त कुछ ज्यादा लग रहा है. कल रात भाई से बात की, आप्रेशन ठीक हो गया. दीदी को फिर से मेल भेजा है, महीने में दो बार उपवास रखने की बात पर अमल करना ठीक होगा !