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Thursday, January 25, 2018

गुरुद्वारे में कड़ाह प्रसाद


आज लेह में उनका अंतिम दिन है. कल रात भी स्वप्न में कितने ही दृश्य दिखे, लद्दाख में देखे स्थानों के भी और अन्य भी. स्वप्न अलग थे पर जगते हुए इन दृश्यों को देखना एक अलग अनुभव है. चेतना जैसे ज्यादा मुखर हो गयी है. प्रकाश भी बहुत तीव्र है यहाँ. तेज धूप निकलती है जो ग्लेशियर्स को पिघला रही है. नहरों-नालों में जल का तेज बहाव शुरू हो गया है, जो खेतों को सींचने में काम आयेगा. यहाँ मुख्यतः वर्ष के तीन-चार महीने ही खेती की जाती है. कल शाम वे लेह पैलेस तथा शांति स्तूप देखने गये. लेह महल बहुत पुराना है, यह नौ मंजिला इमारत सत्रहवीं शतब्दी में राजा सेंग्गे नामग्याल द्वारा बनवायी गयी थी, अब इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया गया है. इसे बनाने में मुख्यतः लकड़ी का प्रयोग हुआ है. 
शांति स्तूप जापान के सहयोग से एक पहाड़ी पर बना एक अनोखा स्मारक है जिसमें नीचे बुद्ध मन्दिर है तथा ऊपर भगवान बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति, तथा निर्वाण के दृश्यों को मूर्तिकला के माध्यम से दर्शाया गया है. यह १९८५ में पूरा हुआ और दलाई लामा के हाथों इसका उद्घाटन हुआ.
आज की यात्रा का मुख्य आकर्षण था मेगनेटिक हिललिकिर  अलची के गोम्पा तथा पत्थर साहेब गुरुद्वारे में दोपहर का लंगर. सुबह नौ बजे नाश्ता करके वे दोरजी की इनोवा में निकले तथा सिंधु व झंस्कर नदी के संगम स्थल पर पहुंचे. दोनों नदियों के जल का रंग भिन्न था यह स्पष्ट दीख रहा था. गर्मी के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और पर्वतों की ढलानों से मिट्टी के साथ पानी तेज गति से बह रहा है, सो मटमैला होने के बावजूद दो रंगों का था. वहाँ रिवर-राफ्टिंग के लिए भी साजो-सामान रखा था. 
मैग्नेटिक हिल पहुंचने पर कार अपने आप ऊंचाई पर चढ़ने लगी, ऐसा प्रतीत हुआ. लिकिर गोम्पा में भावी बुद्ध की विशाल स्वर्ण प्रतिमा है जिसे जापान की सहायता से बनाया गया है. मन्दिर में अद्भुत चित्रकला के माध्यम से भगवान बुद्ध के जीवन के मुख्य पड़ावों जन्म, ज्ञान प्राप्ति, दानवों पर विजय तथा निर्वाण को दर्शाया गया है. उन दस अर्हतों के भी चित्र वहाँ थे जिन्होंने बुद्द्ध की शिक्षाओं को संकलित किया था. 
लेह के पश्चिम में ७० किमी दूर स्थित अल्ची एक हजार वर्ष पुरानी मॉनेस्ट्री है, जहाँ मुख्य द्वार तक पहुंचने का मार्ग घुमावदार, शांत व शीतल है, संकरे मार्ग में दोनों और दुकाने लगी थीं. कई विदेशी यात्री वहाँ दिखे जो इतिहास में काफी रूचि दिखा रहे थे. 
पत्थर साहब गुरुद्वारा भी बहुत भव्य है जो सेना द्वारा संचालित किया जाता है. इसका महत्व इस बात से बढ़ जाता है कि गुरु नानक देव अपनी तिब्बत यात्रा के दौरान यहाँ ठहरे थे. कहा जाता है कि एक दानव के उनके ध्यान को भंग करने के लिए एक चट्टान उनकी तरफ फेंकी पर उन्हें कोई नुकसान पहुंचाए बिना पत्थर की वह चट्टान वहाँ रुक गयी, जिसे आज तक पूजा जाता है. वहाँ उन्होंने कड़ाह प्रसाद तथा भोजन का प्रसाद ग्रहण किया. लेह शहर में स्थित एक स्थल दातुन साहब के बारे में भी एक पुस्तक में पढ़ा था, जहाँ गुरु नानक ने सोलहवीं शताब्दी में एक वृक्ष लगाया था.

इस समय संध्या होने में अभी कुछ समय है. तेज हवा के कारण पेड़ों की टहनियाँ आपस में व टिन के शेड से टकरा रही हैं, जिसके कारण आवाज पैदा हो रही है. धूप सात बजे तक कम होगी तब वे सांध्य भ्रमण के लिए जायेंगे तथा बाद में आज उतारे फोटो देखेंगे. सामान की पैकिंग लगभग हो चुकी है. कल सुबह आठ बजे की उड़ान से उन्हें दिल्ली जाना है और परसों इस वक्त असम में अपने घर में होंगे.                                                                  

Thursday, May 19, 2016

गुरुद्वारे में अरदास


आज रामनवमी है, सभी को शुभकामनायें भेजीं. टीवी पर ‘गुरुवाणी एजुकेशन’ कार्यक्रम आ रहा है. एक रात स्वप्न में स्वयं को गुरुद्वारे में अरदास सुनते हुए पाया, पिछले किसी जन्म में जरूर वह सिख धर्म से जुड़ी रही होगी. गुरुवाणी दिल की गहराई में किसी तार को झंकृत करती है. पिछले दिनों एक सिख गुरु को सुनने का अवसर भी मिला. कल शाम सत्संग में ध्यान कराया, एक साधक को अच्छा लगा. परमात्मा जो चाहता है वैसा वह कर सके, अहंकार न रहे, यही तो सद्गुरु की शिक्षा है. आज रामदेवजी ने अपनी दीक्षा के पन्द्रहवें साल के उपलक्ष्य में अद्भुत उपहार व संदेश देश को दिया. वेदों की ऋचाएं आस्था भजन के माध्यम से प्रतिदिन सुनने को मिलेंगी तथा भजन भी जब कोई चाहे सुन सकता है.

‘मानस नवमी’ को केंद्र बनाकर मुरारी बापू भीलवाड़ा में कथा कर रहे हैं. ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’ परमात्मा और सद्गुरु में पुष्प सुरभि जैसा नाता है. सुरति रूप में जो गुरू है वही प्रकाश रूप में, ज्ञान रूप में परमात्मा है. जब राम वनवास में गये तो भील-किरात आदि को लगा कि उनके घर में नौ प्रकार की निधियाँ आ गयी हैं. नील, शंख, मुकुंद, नंद, खर्व, पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप आदि नौ निधियां तो पुरानी हैं पर उनके घर नई निधियां आई हैं. व्यक्ति के विवेक के प्रकाश को नवीन अर्थ दे वह सद्गुरु है ! विवेक के प्रकाश को अपने जीवन में ढाल ले वही संत है ! विवेक के प्रकाश को नवीन लिपि में ढाल दे वही सद्साहित्य है. सौन्दर्य भी एक निधि है, भावना, निष्ठा, मर्यादा तथा शील में भी एक सौन्दर्य है. शक्ति, आत्मबल, मनोबल, बुद्धिबल जो सेतु बनाये, विभाजित न कर सके, वह भी एक निधि है. करुणा भी एक निधि है, किसी के भीतर प्रेम हो तो मानना चाहिए कि उसके पास एक खजाना है.

उसकी फुफेरी बहन जो कई वर्षों से अस्वस्थ थी, देह के बंधन से मुक्त हो गयी. नूना के मन में स्मृतियों का एक सैलाब उमड़ आया. मन को उनसे मुक्त करने के लिए तथा मृतात्मा के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप उसने बहन की तरफ से एक आलेख लिखना शुरू किया.

अस्पताल के इस कमरे की दीवारें, छत तथा पर्दे उसकी सूनी दृष्टि से भली-भांति परिचित हैं, जब डाक्टर या नर्स आती है तो उसकी मुस्कान उन्हें चकित कर जाती है. देह का रंग काला हो गया हो पर मन में अब भी उमंग का अनुभव करती है. पिछले पांच वर्षों से भीषण व्यथा सहने के बावजूद भी जीने की इच्छा खत्म नहीं हुई है. फिर मृत्यु क्या माँगने से आती है, जन्म व मृत्यु एक ऐसा रहस्य है जो बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी भी नहीं जान सके. देह तो ढांचा मात्र है, भीतर जो आत्मा है वह तो कभी रुग्ण नहीं होती. कभी जर्जर नहीं होती. लोग केवल बाहरी शरीर देखते हैं, नहीं देखते वह भीतर की चेतना जो सदा एक सी रहती है. मन में दुःख होता है जब शरीर में सूइयाँ चुभोई जा रही हों. जब हफ्ते में दो बार रक्त बदला जा रहा हो, उस समय भी कोई है जो इस घटना को देखता रहता है साक्षी भाव से. जो शक्ति प्रदान किये जाता है.