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Wednesday, December 18, 2019

पीला अमलतास



जून आ गए हैं, दोपहर को योग अभ्यास करने के बाद बच्चे चित्र बना रहे थे, तभी वह आये. हमेशा की तरह फल व मेवे लाये हैं. कल शाम को जे कृष्णामूर्ति को सुना, उनके भीतर मन नाम की कोई स्थायी सत्ता नहीं है.  मन यानि सोचना, सोचना एक विचार है और सोचने वाला भी एक विचार है. वे शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मा हैं जिसे कुछ भी छू नहीं सकता. भीतर स्थिरता बढ़ गयी है. उन्होंने एक और बात भी कही. वे इमेज बनाते हैं अपनी भी और सामने वाले की भी. उस इमेज के कारण ही वे सुखी-दुखी होते रहे हैं. ध्यान से चीजों को जैसी वे हैं वैसी ही देखने की क्षमता भी उन्हें मिलती है. ध्यान के क्षण पूरे जीवन पर फ़ैल जाएँ तभी उसकी सार्थकता है. आज सुबह अमलतास के फोटो उतारे। ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ, फूलों से लदा पीला वृक्ष और सुंदर पक्षी दिखे, चलते हुए जीवन्त ! सेंटर में फॉलोअप है पर वह नहीं जा रही है, इतवार को एक सौ आठ बार सूर्य नमस्कार का आयोजन हो रहा है. उसे नहीं लगता उसमें वह भाग ले सकती है. कल शाम क्लब में बच्चों के हिंदी कविता पाठ में निर्णायक के रूप में उसे निमन्त्रित किया है, कल की शाम वहीं बीतेगी, नई कॉटन साड़ी पहनने का अवसर और बच्चों के मुख से हिंदी की कविताएं सुनने का ! बाहर कहने को कितना कम है, वैसे ही भीतर भी यदि कोई सजग रहे तो कितना कम है. कल रात स्वप्न में सासु माँ के पैर छुए और मस्तक से हाथ लगाया, दो बार किया यह और तत्क्षण यह स्मरण भी हो आया कि यह स्वप्न है, पुराने हिसाब-किताब को चुकतू करने के लिए. आज दोपहर एक साधु और उसका एक शिष्य आये, कहने लगे नादिया से आये हैं, मन्दिर के लिए धन एकत्र कर रहे थे. भजन गा गाकर लोगों को सुनाते हैं, उनका भजन सुना, अच्छा लगा, श्रद्धा पूर्वक दक्षिणा दी. आज से पूर्व कितने साधुओं को कुछ दिया, कभी नहीं दिया, उन सभी से क्षमा स्वरूप यह आज का कृत्य था, परमात्मा भीतर एक व्यवस्था को जन्म दे रहे हैं. 

कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह उठी तो गले में दर्द था, जीभ के अंत में दाहिनी तरफ एक उभार था. भ्रमण का पथ छोटा किया, नेति, गरारे आदि किये. स्कूल जाना था. वापसी में बंगाली सखी से मिलने गयी. उसने पिछले महीने हार्निया का ऑपरेशन करवाया है. पेट पर बेल्ट बाँधी हुई थी, तीन महीने इसी तरह रहना होगा. रोग इंसान को किस तरह विवश कर देता है. वहां से को ऑपरेटिव गयी, कुछ सामान बदलवाना था, उसके बाद अस्पताल जाना था, एक परिचिता की बेटी को देखने , जो बुखार के कारण वहाँ दो-तीन दिन से रह रही थी. शाम को क्लब में कविता प्रतियोगिता थी. आज नॉट आउट 102 है. दीदी से बात हुई, इस बार योग दिवस पर प्रधान मंत्री देहरादून जा रहे हैं. बिजली चली गयी तो वह बाहर बरामदे में आडवाणी जी की पुस्तक पढ़ने लगी, अटल जी का प्रसंग चल रहा है, आज सुना उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है. 

आज सुबह आचार्य प्रद्युम्न जी को सुना. विवेक चूड़ामणि सुनते-सुनते ही ध्यान लग गया. वे देह नहीं हैं, मन व बुद्धि भी नहीं हैं, भाव भी नहीं हैं, वे साक्षी चैतन्य हैं. जब यह अनुभव ध्रुव हो जाता है, यह स्मृति सदा ही बनी रहती है. जीवन में सुख-दुःख तो आने ही वाले हैं, क्योंकि देह की अपनी सीमा है, मन व् बुद्धि पूर्व संस्कारों के कारण अथवा पूर्व कर्मों के उदित होने पर सुख-दुःख का अनुभव करेंगे ही, किन्तु सदा ही जो ब्रह्मा भाव में रहता है, वह इनसे अछूता रह जाता है.  उनके भीतर अग्नि ही वाणी रूप से विद्यमान है. जून ने ड्राइविंग स्कूल में बात की है, आज दोपहर को जाना है. कल से सम्भवतः कक्षा होगी. पिछले वर्ष तैरना सीखा था, इस वर्ष ड्राइविंग सीखना अच्छा ही है. 

सुबह उठे तो वर्षा हो रही थी. साढ़े आठ बजे ड्राइविंग के पहले दिन के अभ्यास के लिए गयी, जरा भी डर नहीं लगा. धीरे-धीरे क्लच से पैर उठाते हुए गाड़ी बढ़ाना अच्छा लग रहा था. वे पांच किमी की गति से चल रहे थे. लगभग दो किमी तक होकर आये. ड्राइवर के पास भी गाड़ी का कंट्रोल है, एक अन्य छात्रा भी थी जो पीछे बैठ गयी थी. एक महीने के अभ्यास के बाद वह उनकी अपनी कार पर अभ्यास कर सकती है. कल सुबह साढ़े छह बजे जाना है, थ्योरी की पहली क्लास है. दोपहर को आर्ट ऑफ़ लिविंग के विश्व सांस्कृतिक उत्सव पर ब्लॉग पर एक पोस्ट प्रकाशित की. बड़े भाई ने उन दिनों बहुत ख्याल रखा था. इस समय शाम के पांच बजे हैं, जून अभी आये नहीं हैं, शाम को उनकी एक सहकर्मी कुछ चर्चा के लिए आ रही है, रात्रि भोजन  भी उनके साथ करेगी. भोजन लगभग बन गया है. कुछ देर पहले एक बुजुर्ग परिचिता से फोन पर बात की, उन्होंने रोजा रखा है. कल ईद है, नन्हा सोनू के साथ उसके घर गया है. उसने ईद पर लिखी एक पुरानी कविता भी फेसबुक पर पोस्ट की है.