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Tuesday, September 18, 2012

आपके अनुरोध पर..



आज सुबह घर में सत्यनारायण की कथा हुई थी, दिन भर उसकी सुगंध फैली रही. नन्हा भी आज जल्दी उठ गया था, शाम को उसे लेकर माँ के साथ गंगा घाट तक गयी, वह बेहद खुश था, नदी को देखते ही दूर से बोला, गंगा जी ..वापसी में जैसे ताकत भर गयी थी उसमें. इस समय रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं, ननद ने पेठे की मिठाई का एक टुकड़ा दिया, उसके मुख में दाहिने तरफ दांत में दर्द होने लगा है.
आज का दिन शायद उनके लिए कोई विशेष अर्थ रखता है, जून को भी याद होगा, यही तारीख तो थी कितना इंतजार किया होगा उसने उसके पत्र का तब..और आज भी उतना ही इंतजार रहता है. जब तक यह इंतजार बरकरार है, प्यार भी बरकरार है. आज सुबह नींद पौने छह बजे खुली. एक बार सुबह उठी थी, सोनू ने पानी माँगा था, तब चार बजे थे, सोचा इतनी शीघ्र उठके क्या करेगी, लेकिन उसके बाद नींद खुली तो..दिन काफी चढ़ आया था. शायद आजकल साढ़े पाँच बजे से भी पहले सूर्योदय हो जाता है. अप्रैल समाप्ति पर है. उसे याद आया आज इतवार है, जून भी सुबह की चाय पी रहे होंगे, उसने पूछा, बोलो क्या कार्यक्रम है आजका ?

सुबह के पाँच बजे हैं, ऊपर छत पर सोने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि सुबह नींद जल्दी खुल जाती है. वरना पिछले दो-तीन दिन पौने छह बजे से पूर्व उठ ही नहीं पाती थी. अभी सूर्योदय नहीं हुआ है, दिन और रात के मिलन का समय कितना भला होता है, आकाश हल्की कालिमा की चादर ओढ़ लेता है कि सब कुछ छिपा भी रहे और दिखाई भी दे. नन्हा सो रहा होगा. वह नीचे सीढ़ियों पर बैठी है, यहाँ हवा रुकी हुई सी है. बैठना तो ऊपर ही चाहती थी पर छत पर और भी लोग सो रहे हैं.

..पर अब वह ऊपर आ गयी है, ऊपर काफी रोशनी है ठंडक भी एक टेबिल फैन जो चल रहा है. आज जून का पत्र आना ही चाहिए, अन्यथा...अन्यथा क्या, कुछ भी तो नहीं, इंतजार करेंगे और क्या. कल शाम टीवी पर ‘अनुरोध’ फिल्म दिखाई गयी थी, वर्षों पूर्व माँ-पिता, भाई-बहनें सभी मिलकर गए थे यह फिल्म देखने, कहाँ पर, यह तो याद नहीं, शायद बनारस में ही, पर बहुत अच्छी लगी थी सभी को यह फिल्म, उसे लगा कि इसी तरह उन सभी को भी यह बात जरूर याद आयी होगी, यदि वे भी इतवार शाम की फिल्म देखते होंगे.

कल जून का एक पत्र मिला और एक बैंक ड्राफ्ट भी, समझ नहीं आता कि इससे उसे खुशी हुई है या परेशानी बढ़ी है. उसे कल रात पहली बार स्वप्न देखा, कितना दुबला-पतला, खोया-खोया सा लग रहा था, दाढ़ी बढ़ी हुई थी. किन्ही परिचित के यहाँ जाने की बात कह रहा था, कोई डिपार्टमेंटल समस्या थी. उसने मन ही मन उसे शुभ प्रभात कहा और स्नेह भेजा. इस समय सुबह के सवा छह बजे हैं, नन्हा सोया है और छत पर आए बंदरों के कारण आँगन में शोर मचा हुआ है. उसे नीचे जाकर पढ़ने की बात सोचनी चाहिए पर उस कमरे में कितनी घुटन होगी रात भर बंद रहने के कारण. रात फिर छत पर सोये थे, शाम से ही लाइट गायब थी. अँधेरे में और गर्मी में किचन में अकेले रहने का उसका कोई इरादा नहीं था, सो खाने में उसने सिर्फ नमकीन चावल बना दिए थे, जो पिताजी को पसंद नहीं आया, उनके अनुसार पूरा खाना बनना चाहिए था. कल उसने जून को पत्र लिखा. याद आया कि कितने दिन हो गए दीदी का पत्र नहीं आया. उसका मन शांत नहीं है, तनाव से जैसे मस्तिष्क तना है, वजह, चारों और से आती आवाजें, एकांत अब सम्भव नहीं है, सर्दियों की बात और थी, सुबह जल्दी उठकर एक घंटा स्वयं के साथ हो सकती थी.


 



Thursday, August 2, 2012

काबुली चने


नन्हा अब ठीक है, कुछ देर पहले उसने आँखें खोलीं फिर करवट बदल कर सो गया. आज उसके खुद के गले में हल्की खराश महसूस हो रही है, जून होते तो उसे नमक पानी का गरारा करने को कहते. उसने दही लगाकर बालों को धोया था, अब ठंड के डर से कोई कब तक बालों को न धोए...ईश्वर भली करेंगे. आज पहली अप्रैल है, अभी तक तो किसी को मूर्ख नहीं बनाया, उसने सोचा पीछे रहने वाली असमिया पड़ोसन को आज बुद्धू बनाएगी.

इतवार की सुबह, दोनों बाप-बेटा अभी सो रहे हैं वह बाहर घूमने गयी थी, सड़क किनारे एक पॉपी का सूखा पौधा दिखा जिसके कुछ बीज उसने ले लिये अगले मौसम में उन्हें उगाएगी तब ढेर सारे पॉपी के फूल खिलेंगे, और तब वह आज का दिन याद करेगी. कल रात उन्होंने एक चीनी फिल्म देखी, उदास करने वाली, रुलाने वाली एक कविता हो जैसे. उसकी आँखें एक क्षण को नहीं सूखीं, बहुत दिन पहले एक और अच्छी चीनी फिल्म देखी थी. कल शाम जून कुछ सोच रहे थे, उन्हें ऑफिस का कुछ काम भी करना है, तीन-चार घंटों का शायद इसी का तनाव हो.

आज सुबह जून बहुत खुश थे, उन्होंने विवाह के बाद के साल को याद किया. नन्हा जल्दी उठ गया था पर दूध पीकर फिर सो गया, अब खरगोश से खेल रहा है, सचमुच का नहीं, खिलौने से. आज वह ट्रंक आ ही जायेगा जिसका उन्हें इतना इंतजार है. कल उनकी पड़ोसिन ने इडली बनायी परसों उसने दोसा बनाया था और साथ में मूंगफली की चटनी, सबने मिलकर खायी. वह जो नन्हे का स्वेटर बना रही थी कल पूरा हो गया, गले के बार्डर में बहुत सफाई नहीं आयी है. उसने सोचा वह खोल कर फिर से बनाएगी.
रेलवे स्टेशन से वह ट्रंक ले आये जून, उसमें सभी कुछ था जो वे डाल कर आये थे, बस कूकम और डाला गया था. वह नन्हे को लेकर पार्क में गयी तो जून ने चने बना दिए, बहुत स्वादिष्ट, उसे बहुत अच्छा लगा, वह जैसे पहले साल में पहुँच गया था, वही भोलापन और प्यार छलकती आँखें. कल वे दोनों उसके काम के कारण ग्यारह बजे तक बैठे थे. वह अखबार पढ़ रही थी पर आँखें थीं कि नींद से बोझिल हो रही थीं.

Thursday, May 10, 2012

बेल्जियम फिश


अप्रैल की अंतिम सुबह कितनी ठंडी है. वर्षा बदस्तूर जारी है. रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण ‘सर्वोत्तम’ में उन्होंने साथ-साथ एक लेख पढ़ा, ‘बॉब ग्रीन’ का लिखा हुआ- मेरी बेटी का पहला साल, लेखक ने अपने अनुभवों का कितना मोहक व सजीव चित्रण किया है कि पढ़ते-पढ़ते वे भी अपने भविष्य के सपनों में खो गए. एक किताब ‘The Voyage out’ जो पिछले चार-पांच दिनों से वह पढ़ रही थी, समाप्त हो गई, नायिका rechel का दुखद अंत हुआ, शायद वह विवाह और बच्चों के लिये नहीं बनी थी, वह कुछ और ढूँढ रही थी. नायक के प्रति वह सहानुभूति नहीं जगा पायी. टीवी पर उन्होंने ‘सत्यजित रे’ द्वारा निर्देशित एक नाटक देखा सुखांत, जो बहुत अच्छा था
आज मई दिवस है. एक हफ्ते की वर्षा के बाद आज सूर्य भगवान ने दर्शन दिए हैं. सुबह आँखें खोलीं तो धूप जैसे उनमें भरती जा रही थी. पूरा कमरा रोशनी से खिला हुआ था. पर दो घंटे बाद ही कितना अँधेरा हो गया, बादल घिर आये, यहाँ का मौसम पल-पल मिजाज बदलता है. टीवी पहले से बेहतर हुआ लगता है, चित्र हार देखा और आशा भोंसले का साक्षात्कार भी, जो उन्हें बहुत अच्छा लगा. आज शाम क्लब में पेट्रोलियम मिनिस्टर का सम्बोधन है जून वहाँ जायेगा और नूना अपनी मित्र के पास, वह भी उसी की तरह पहली बार माँ बनने वाली है. उनके सुख और परेशानियाँ एक सी हैं. उसी ने कार्ड्स का एक नया खेल सिखाया था “बेल्जियम फिश”. 
अब वह सुबह जल्दी उठकर टहलती है या शाम को धुंधलका होने के बाद. दिन में बाहर निकलना उसे अच्छा नहीं लगता, कुछ लोग देखने लगते हैं. वजन बहुत बढ़ गया है, सभी कपड़े टाइट हो गए हैं. उन दोनों को दो महीने बाद की उस घटना का इंतजार है जो उनके जीने के ढंग को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है. उनके नन्हें मेहमान का आना.
उस दिन इतनी मेहनत से बूस्टर लगाया था, पर उसमें कुछ खराबी आ गयी है अब फिर घंटो की मेहनत और कुछ लोगों के सहयोग से उसे उतारना होगा. कल उन्होंने दोनों घरों पर पत्र लिखे जो पोस्ट करने के लिये जून को देना वह भूल गयी है. आजकल वह अकेले ही लाइब्रेरी जाता है उसके लिये एक साथ चार किताबें लाया है. इतवार होने के कारण कल दोपहर का खाना उसने ही बनाया सिंधी पुलाव व भरवां भिन्डी की सब्जी. शाम को जब वह घर पर नहीं था नूना ने उसका एक पुराना पत्र पढ़ा, कितनी यादें सजीव हो गयीं. वे एक दूसरे का पर्याय बन गए है, एक-दूसरे के बिना अस्तित्त्व की कल्पना करना भी असह्य है, वह चाहती है कि जून और आगे बढ़े, परिश्रमी, और हिम्मती बने, अपने कार्य में कुशलतम बने और पढ़े, सारी जिंदगी उसके सामने पड़ी है, और यही उम्र है जब कितना भी उड़ेंलते जाओ मन से उत्साह कम नहीं होता.

   

Monday, May 7, 2012

अप्रैल फूल


उस दिन अप्रैल की पहली सुबह थी. उन दोनों ने एक दूसरे को अप्रैल फूल बनाया और खूब हँसे. पिछली शाम आंधी आयी थी और हल्की बूंदाबांदी भी हुई, लेकिन सुबह वैसे ही गर्म थी. रात वह अजीब-अजीब स्वप्न देखती रही, बीच बीच में नींद टूट जाती थी, उमस भी थी कमरे में, उठकर जून ने पंखा चलाया पर उसके बाद भी असुविधा में थे तन-मन दोनों. संभव है दिन में सो लेने के कारण ऐसा हुआ हो, या जैसे-जैसे दिन नजदीक आ रहे हैं, दिक्कतें कुछ तो आयेंगी ही. वह पिछले कई दिनों से एक नॉवल पढ़ रही थी. कितनी सूक्ष्मता से दो जोड़ों के चरित्र का चित्रण लेखक ने किया है. कल शाम उन्होंने आपने विवाह की एल्बम देखी और एक पुराना खत पढ़ा, बहुत हँसे अपनी उन दिनों की दीवानगी पर. जून आजकल हर वक्त उसका ध्यान रखने का प्रयत्न करता है, वह खुश है और स्वस्थ भी. उसे घर का काम करने का भी शौक है, इतवार को कपड़े धोने में उसे मजा आता है. दोसे बनाने हों तो तैयारी में सिवाय दाल-चावल भिगोने के उसे और कुछ नहीं करना पड़ता. उसे पीसने के लिये व चटनी बनाने के लिये वे अपने दक्षिण भारतीय मित्र के यहाँ जाते हैं, व बनाने के लिये वह तैयार रहता है.