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Monday, February 25, 2019

नया नियम



मिजोरम के लोगों के रहन-सहन तथा रीतिरिवाजों के बारे में कई रोचक जानकारियां मिली हैं. ये लोग सुबह जल्दी उठते हैं, चार बजे से भी पहले तथा सुबह छह बजे ही दिन का भोजन कर लेते हैं. इसके बाद काम पर निकल जाते हैं तथा दोपहर को भोजन नहीं करते. शाम का भोजन छह बजे ही कर लेते हैं, इसलिए यहाँ बाजार जल्दी बंद हो जाते हैं. कुछ देर पहले हम बाजार गये लेकिन ज्यादातर दुकानें बंद हो चुकी थीं. यहाँ भोजन में ज्यादातर चावल, मांस तथा उबली हुई सब्जियां ही खायी जाती हैं. मसाले भी नहीं के बराबर. यहाँ बहुविवाह प्रथा प्रचलित है तथा स्त्री या पुरुष दोनों को इसका समान अधिकार है. महिलाएं यहाँ सभी प्रकार के काम करती हैं, बचपन से ही उनके साथ कोई भेद भाव नहीं किया जाता. उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का पूरा अवसर मिलता है. तलाक लेना यहाँ बहुत आसान है. किसी भी तरह का विवाद लोग आपसी बातचीत से सुलझा लेते हैं. पुलिस तथा अदालत तक मामला पहुंचने की नौबत नहीं आती. सडकों पर ड्राइवर एक दूसरे को रास्ता देते हैं तथा अपने वाहन को पीछे ले जाने में जरा भी नहीं हिचकते.

लुंगलेई में उनकी पहली सुबह है. पंछियों की आवाजों ने जगा दिया, कमरे की खिड़की से परदा हटाया तो सामने पर्वतमालाएं थीं और आकाश पर गुलाबी बादल. जैसे सामने कोई चित्रकार अदृश्य हाथों से अपनी कला का प्रदर्शन कर रहा हो. सामने वाले पहाड़ हरे वृक्षों से लदे थे, उसके पीछे काले पर्वत जिनके वृक्षों की आकृतियाँ खो गयी थीं पर आकार फिर भी नजर आ रहे थे. तीसरी श्रेणी, जहाँ ऊँची-नीची सी वृक्षों की चोटियाँ मात्र दिख रही थीं, और उसके पीछे स्वप्निल से पहाड़ जो धुंध और सलेटी कोहरे में लिपटे थे. एक के पीछे एक तीन-चार पर्वत श्रेणियां और ऊपर गहरा नीला आकाश और उस पर सुनहरे चमकते बादल, जो गगन के राजा के आने का संदेश दे रहे थे. तभी चर्च से घंटियों का स्वर आने लगा और पूरा वातावरण एक आध्यात्मिक रंग में सराबोर कर गया. कुछ देर बाद वे प्रातः भ्रमण के लिए निकले, हवा ठंडी थी, बाहर का तापमान आठ डिग्री था. निकट ही बादलों को पर्वतों की श्रंखलाओं पर सिमटते हुए देखा, एक अद्भुत दृश्य था.

अब शाम के पांच बजे हैं. वे आज बाजार से जल्दी जाकर लौट आये हैं. सुबह जून जब अपने काम के सिलसिले में चले गये तो उसने कुछ देर कमरे में रखी बाइबिल पढ़ी, नया नियम नाम से छोटी सी हिंदी में लिखी पुस्तक, जो कई स्थलों पर बहुत रोचक और उत्साहवर्धक लगी, परमात्मा का राज्य उनके भीतर है, वे इस बात को भुला देते हैं और व्यर्थ ही परेशान होते हैं. कल उन्हें वापस आइजोल जाना है और परसों कोलकाता, तथा उसके अगले दिन असम.

Friday, February 22, 2019

मिजोरम की चोटियाँ



दो दिनों का अन्तराल, जून गोहाटी गये हैं कल. उन्हें जून के पूर्व मुख्य अधिकारी को विदाई भोज के लिए घर पर बुलाना है. शनिवार को उन्हें निमंत्रित करने गये पर वे लोग शायद शहर से बाहर गये थे. दोपहर को उसने बगीचे से तोड़ी ब्रोकोली के चावल बनाये और शाम को कच्चे केले की सब्जी. इस वर्ष भी सर्दियों की सब्जियां इतनी हो रही हैं कि महीनों से वे आलू, प्याज, टमाटर, खीरा आदि के अतिरिक्त बाजार से कुछ नहीं खरीद रहे हैं. कल एक सखी के यहाँ से योगानन्द जी की एक पुस्तक मिली, गॉड टॉक्स विथ अर्जुन, अच्छी है. उनके भीतर निरंतर युद्ध चल रहा है. आत्मा और अहंकार के मध्य. अहंकार है देहभान तथा आत्मा है कृष्णभान. सारा दारोमदार इस बात पर है कि इस युद्ध में कौन जीतता है. सामने नीला आकाश है और उस पर श्वेत बादल, हवा बह रही है, जिसका स्पर्श सुखद है और सुखद है देह के भीतर तरंगों का स्पर्श भी !

सुबह से बादल बने हैं पर बरस नहीं रहे हैं. तीन दिन फिर किन्हीं व्यस्तताओं में गुजर गये. आज शाम को तीन परिवारों को रात्रि भोज पर बुलाया है. काफी काम हो गया है, थोड़ा शेष है. कुछ कार्य जून को करना है, कुछ नैनी को. आज सिलापत्थर  में एक बंगाली समूह ने असम के छात्र संघठन के दफ्तर पर हमला किया, उसी के विरोध में असम  बंद का एलान किया गया है. काफी दिनों से असमिया-बंगाली शांति से रह रहे थे, अचानक यह बदलाव कहाँ से आ रहा है. तीन दिन बाद होली है. उसने सोचा, वे आज ही होली भोज का आयोजन कर रहे हैं. अगले हफ्ते उन्हें मिजोरम की यात्रा पर निकलना है.

सुबह पौने छह बजे वे असम से रवाना हुए थे. सवा आठ बजे फ्लाईट डिब्रूगढ़ के मोहनबारी हवाईअड्डे से चली और पौने दस बजे कोलकाता पहुंची. जहाँ तीन घंटे प्रतीक्षा करने के बाद दोपहर एक बजे स्टारलाइंस-एयर इंडिया के विमान ने आइजोल के लिए उड़ान भरी. हवाईअड्डे पर कई मिजो लड़के-लडकियाँ थे, सभी काफी प्रसन्न, जरा उनसे नजरें मिलाओ तो मुस्कुराने को तैयार ! छोटी सी फ्लाईट थी लगभग पचास मिनट की, ऊपर से सैकड़ों मीलों तक फैली हरियाली से ढकी पर्वतों की श्रृंखलायें दिख रही थीं, एक के बाद एक पहाड़ों की चोटियाँ, घाटियाँ नहीं के बराबर. दोपहर दो बजे वे मिजोरम के लुंगपेई हवाईअड्डे पर पहुंचे, जहाँ कई सुंदर छोटे-छोटे बगीचे फूलों से भरे थे. बाहर निकले तो हर तरफ वृक्षों की कतारें. शहर से काफी दूर है हवाईअड्डा, लगभग सवा घंटा पहाड़ों के सान्निध्य में छोटी सी पतली सड़क पर यात्रा करने के बाद कम्पनी के गेस्ट हॉउस पहुंचे. यह हल्के हरे रंग से रंगी चार मंजिला इमारत है. रास्ते में बांसों के झुरमुट और फूल झाड़ू के पेड़ बहुतायत में दिखे. दो तीन जगह पिकनिक स्पॉट जाने के मार्ग बताते बोर्ड दिखे. स्वादिष्ट नाश्ता करके शहर घूमने निकले. पूरा शहर या कहें पूरा प्रदेश ही पहाड़ियों पर बसा है, सडकें ऊंची-नीची हैं, कहीं-कहीं तो खड़ी चढ़ाई है, लेकिन यहाँ के ड्राइवर इतने अभ्यस्त हैं कि ऐसी सड़कों पर आराम से वाहन चला लेते हैं. उसने एक पारंपरिक मिजो ड्रेस खरीदी. यहाँ के लोग कुत्तों से बहुत प्रेम करते है. एक महिला को देखा स्कूटर पर एक कुत्ते को शाल में लपेटे ले जा रही थी, जैसे कोई अपने बच्चे को ले जाता है. याद आया, एक मिजो लड़की यात्रा में उनके निकट बैठी थी, जो हैदराबाद में ब्यूटी पार्लर में काम करती है, अब छुट्टियों में घर जा रही थी. उसने बताया था, मिजोरम में कोई स्ट्रीट डॉग नहीं होता. सडकों पर महिलाएं और बच्चे ज्यादा नजर आ रहे थे, सभी प्रसन्न मुद्रा में.

Wednesday, January 24, 2018

पैंगोंग झील में चाँद


ठंड बिलकुल गायब हो चुकी है, जो एक घंटा पूर्व सुबह की लगभग चार किमी की सैर के दौरान महसूस हो रही थी. जाते समय चढ़ाई है कुछ प्रयास करना पड़ता है पर वापसी में सहजता से दूरी तय हो जाती है. यहाँ काफी स्वच्छता है तथा सडकें भी काफी अच्छी हालत में हैं.  आज तो लौटते समय गोएयर के जहाज की लैंडिंग की वीडियो फिल्म बनाई. वे हवाई अड्डे के थोड़ा पीछे ही रह रहे हैं. लगभग सारी फ्लाइट्स सुबह के वक्त ही आती हैं, क्योंकि धूप तेज होते ही यहाँ तेज हवा चलने लगती है. आज उन्हें पेंगौंग झील देखने जाना है, जो एशिया की सबसे बड़ी साल्ट वाटर की शांत झील है जो इतनी ऊंचाई पर स्थित है. १४००० फीट की ऊंचाई पर स्थित इस झील का दो तिहाई भाग तिब्बत में है. रात को वे वहीं रहने वाले हैं, कल शाम तक वापस लौटेंगे. टीवी पर जो समाचार आ रहे हैं, एक नई उम्मीद जगा रहे हैं. डिजिटल इंडिया के बाद स्किल इंडिया का अभियान भी सरकार द्वारा चलाया गया है. लद्दाख की उनकी अब तक की यात्रा सुचारू रूप से चल रही है. यहाँ के रास्ते भी उतने ही सीधे-सरल हैं जैसे यहाँ के लोग, कहीं भटकने की गुंजाइश नहीं है. कल रात्रि भी कुछ स्वप्न देखे जो भीतर मन की गहराई में चल रही उथल-पुथल को बाहर निकलने में सक्षम रहे. परसों रात भी स्वप्न देखा था और एक पुरानी समस्या का समाधान पाया. कल यात्रा में हुए अनुभव को फिर से महसूस किया. नींद गहरी नहीं आती यहाँ, कल दिन में भी सो गयी थी जो हवाई अड्डे पर दिए गये निर्देशों के अनूरूप नहीं था.
कल सुबह नौ बजे वे झील के लिए रवाना हुए. कारू होते हुए चांगला पहुंचे जो १७ ६८८ फीट की ऊंचाई पर है. बर्फ से ढकी पहाड़ियाँ भव्य लग रही थीं. मार्ग में याक, जंगली घोड़े, खच्चर तथा फे नामके जंगली पीले बड़े आकार के चूहे दिखे. हर जगह रुककर कुछ तस्वीरें लीं और आगे की यात्रा आरम्भ की. 

मार्ग में एक गाँव जिसका नाम सक्ति है साथ-साथ चल रहा था. हरे-भरे सरसों व जौ के खेत तथा सीधे पंक्ति बद्ध खड़े वृक्ष. पर्वतों के मध्य से जब पहली बार झील के दर्शन हुए तो वे मंत्रमुग्ध से देखते रह गये. पथरीले पर्वतों पर बनी सड़क पर बढ़ते हुए हम झील के निकट पहुंचे. आमिर खान की फिल्म ‘थ्री इडियट’ के नाम पर एक रेस्तरां भी वहाँ था. दोरजी ड्राइवर उस स्थान पर ले गया जहाँ फिल्म की शूटिंग की गयी थी. 

झील का नीला और हरा जल मीलों तक फैला हुआ था, एक तरफ पर्वत थे और दूसरी ओर यात्रियों के लिए कैंप व तम्बू लगाये गये थे. कई श्वेत व सलेटी पंखों वाले पक्षी जिनकी चोंच व पंजे लाल थे, पानी में किलोल कर रहे थे. धूप तेज थी पर हवा भी तेज थी. उन्हें ऊंचाई पर होने वाली समस्या का अनुभव होने लगा था. रात्रि निवास के लिए एक कैम्प में डेरा डाल लिया. कुछ देर वहाँ विश्राम के बाद साढ़े छह बजे पुनः झील पर गये. धूप अब दूर पर्वतों के शिखरों पर खिसक गयी थी, ठंड उसी अनुपात में बढ़ गयी थी. मफलर, स्कार्फ. दस्ताने आदि पहनकर संध्या का आनंद लिया. एक व्यक्ति पानी में पैर डाले हुए चिल्ला रहा था, ठंड के कारण उसकी जान निकल रही थी पर फोटो खिंचाने के लिये शायद पानी में उतर गया था. रात्रि भोजन के बाद आकाश में दिख रहे पूर्ण चन्द्रमा को तथा झील के जल में नृत्य कर रही उसकी चन्द्रिका को देखकर कैम्प के बाहर से ही उसकी तस्वीरें उतारीं. ऊपर आकाश में चमकते हुए सैंकड़ों तारे इतने निकट प्रतीत हो रहे थे जैसे उन्हें छुआ जा सकता है.
  
सुबह साढ़े पांच बजे थे जब हम टेंट से निकले, सूरज काफी ऊँचा चढ़ आया था. पानी में उसकी सफेद रौशनी पड़ रही थी. कई तस्वीरें लीं. रात को एक बजे सिर दर्द की कारण नींद खुल गयी थी, समझ में आया इसीलिए ज्यादातर लोग रात्रि को झील पर रुकते नहीं हैं. नहाने के लिए गर्म पानी दिया जो यहाँ भी सोलर पॉवर से गर्म किया गया था. स्नानघर का फर्श कच्चा था, कोई फ्लोरिंग नहीं डाली गयी थी और ठंड भी बहुत थी सो हाथ-मुंह धोकर ही वे तैयार हो गये.  नाश्ते में पोहा तथा नमक व अजवायन के तिकोनाकर सादे परांठे (अमूल मक्खन व जैम के साथ) और चाय लेकर सवा आठ बजे वापसी की यात्रा आरम्भ की. साढ़े बारह बजे वे पेगौंग झील से लौट आये. 


Tuesday, July 22, 2014

नेहरु माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट


आज उनकी गंगोत्री यात्रा का अंतिम दिन है, शाम तक वे घर पहुंच जायेंगे. इस समय प्रातः काल है, नन्हा अभी सोया है, जून तैयार हो रहे हैं. सामने के पर्वत शिखरों पर धूप पड़ने से चमक है, हवा में हल्की ठंडक है. उनका ड्राइवर जो रात को अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ चला गया था आ गया है, वह थोड़ा अक्खड़ जरुर है पर कुशल ड्राइवर है. आज वे NIM नेहरु माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट का संग्रहालय देखने जायेंगे, फिर ऋषिकेश होते हुए घर.

आज विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है. जून ने कल ‘टाइम्स ऑफ़ इण्डिया’ के संपादक को एक पत्र लिखा. जिसमें गंगोत्री यात्रा के दौरान हुए पर्यावरण प्रदूषण के अनुभव का जिक्र किया है. इस समय ग्यारह बजने वाले हैं, धूप काफी तेज है पर सुबह से बिजली नहीं गयी है सो पंखा व कूलर दोनों चल रहे हैं. कमरा काफी ठंडा है. कल शाम से माँ यहाँ आ गयी हैं. भाई के यहाँ उनकी अच्छी देखभाल हुई सो अब काफी ठीक हैं. कल वे अपने पैतृक घर में भी गये, मंझले चाचा के बिन माँ के बच्चे अपनी दुनिया में खुश हैं, पिता का होना भी न के बराबर है. छोटी चाची ने भी अपना सिलाई-कढ़ाई का काम काफी बढ़ा लिया है, उसे एक कढ़ाई वाला सूट का कपड़ा उन्होंने दिया, स्लेटी रंग पर लाल व हरे रंग की कश्मीरी कढ़ाई है. उससे पहले छोटी ननद की ससुराल भी गये जहाँ उसके छोटे देवर-देवरानी से मिलकर अच्छा लगा. जून उसके साथ हर जगह जाते हैं, यहाँ पर भी सभी से बहुत सहयोग व सत्कार की भावना से मिलते-जुलते हैं, कभी-कभी उनकी ओर देखकर लगता है उन्हें रुच नहीं रहा पर उसकी खातिर वह खुश रहते हैं, कल उसकी एक बात से थोड़ा सा नाराज हुए पर यह स्वाभाविक है.

आज सुबह से वर्षा हो रही है, हवा ठंडी है और पौधे ज्यादा हरे हो गये हैं. पौने नौ बजे हैं. सबका स्नान व नाश्ता हो चुका है. कौशल (यहाँ काम करने वाली औरत)  बर्तन धोते समय बहुत शोर कर रही है. माँ सो रही हैं और पिता छोटी बुआ और उनके बच्चों से बात कर रहे हैं जो कल दोपहर की ट्रेन से ही माँ से मिलने आयी हैं.

वर्षा की झड़ी आज भी सुबह से लगी है, ठंड भी बढ़ गयी है. परसों उन्हें जाना है. सुबह से फोन भी खराब है वरना दीदी से बात हो सकती थी. कल वह उनसे मिलने आ रही हैं. कल छोटी बहन का फोन आया था, हिमाचल में भी ठंड बढ़ गयी है, उसके घर के सामने के पहाड़ जब बादलों से ढक जाते हैं तब सब ओर सफेदी छा जाती है और हवा से जब बादल उड़ते हैं तो पहाड़ दिखने लगते हैं और दृश्य बहुत सुंदर लगता है. मंझला भाई परिवार के साथ देहरादून गया है. छोटी भाभी सदा किसी न किसी काम में व्यस्त रहती है.

कल सुबह साढ़े आठ बजे वे घर से चले थे, भाई अपने कार में स्टेशन लाया, दीदी भी साथ छोड़ने आयीं, नन्हे के लिए उन्होंने एक पत्रिका लेकर दी. घर से जब वे निकले  सभी घर से बाहर तक उन्हें छोड़ने आये, उसका हृदय इस स्नेह और प्रेम के आगे कृतज्ञता से भर जाता है. माँ अब ठीक हैं, पर प्रसन्न और संतुष्ट नहीं. पिता सदा की तरह थे, सबसे ज्यादा संतुष्ट व सक्रिय दीदी लगीं. अगले कुछ दिनों तक वे सब भी उन्हें याद करेंगे जैसे वे इस यात्रा को भुला नहीं पाएंगे. उनकी ट्रेन बरौनी स्टेशन पर पिछले आधे घंटे से खड़ी है. जून और नूना घूमने गये, लीची खरीदी, यह फल पहले उसे पसंद नहीं था, पर अब खाने लगी है. कल वे घर पहुंच जायेंगे ठीक चौबीस घंटे बाद. यदि ट्रेन समय पर चलती रही. घर जाकर बहुत से काम करने हैं. नये उत्साह और नये जोश के साथ, हर बार कुछ दिन घर से दूर रहने के बाद घर आना अच्छा लगता है. उस दिन जब यात्रा की शुरुआत की थी वर्षा हो रही थी, कल भी देहली स्टेशन पर उतरते ही वर्षा ने उनका स्वागत किया. असम का एक परिवार स्टेशन पर मिला, मित्र के पिता की मृत्यु हो गई है, सिर के बाल नदारद थे, अकेले ही वापस जा रहे हैं.




Tuesday, April 8, 2014

कौसानी के पर्वत


आज कृष्ण जन्माष्टमी भी है और जून का जन्मदिन भी, सुबह से वर्षा हो रही है, वे सुबह साथ-साथ उठे पर वह उसे तत्क्ष्ण शुभकामना देना भूल गयी. ब्रश करने के बाद कम्प्यूटर में कल बनाये कार्ड को दिखाकर उन्हें बधाई दी. तभी पिता का फोन भी आया, वे दशहरे पर ही यहाँ आना चाहते हैं, और जून के अनुसार इतने कम दिनों के दिनों के लिए उनका आना उचित नहीं है पर नूना को लगता है उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार निर्णय लेने की आजादी होनी चाहिए. कुछ देर पहले उस सखी का फोन आया जिसने स्कूल जाना शुरू किया है, आज स्कूल बंद है. अभी-अभी वह बातूनी सखी आई थी, आत्मविश्वास से भरी हुई, नीले रंग का सूट पहने लम्बे बालों को एक रबर बैंड से बांधे, लाल बिंदी माथे पर, उसे देखकर अच्छा लगा. कामकाजी महिलाओं के व्यक्त्तित्व में एक खास बात( जो सबमें नहीं भी आती) होती है, उसमें है. तीन दिन बाद  नन्हे का स्कूल खुल रहा है, उसका कुछ project कार्य अभी भी शेष है. आज उसने music India CD का रिव्यु पढ़ा, जिसमें सभी रागों का विवरण है साथ ही प्रख्यात शास्त्रीय गायकों की आवाज भी, उसने सोचा, भविष्य में कभी वे खरीदेंगे. कल पन्द्रह अगस्त है, जिसे कल शाम छोटी सी पार्टी रखकर वे मनाना चाहते हैं. जून का जन्मदिन अपने तौर पर, किन्तु  देश की आजादी की वर्षगाँठ वे सबके साथ मिलजुल कर मनाएंगे. आजकल यहाँ अल्फ़ा की गतिविधियाँ बढ़ गयी हैं, कुछ आत्मसमर्पण भी कर रहे हैं. कल ‘पूर्ण असम बंद’ है, कैसा विरोधाभास है.

पिछले दो दिन व्यस्तता में बीते, परसों वे सुबह से ही शाम के डिनर की तयारी में जुटे थे. नन्हे ने डाइनिंग टेबल सजाई, घर विशेषतौर पर ड्राइंग रूम अच्छा लग रहा था. दोपहर से ही खाने की तैयारी शुरू कर दी थी क्योंकि दोपहर बाद ‘विवेकानन्द’ फिल्म देखनी थी, फिल्म अच्छी थी, गीत भी सुमधुर थे, भक्तिरस में डूबे हुए भजन. नन्हा अब बड़ा हो रहा है उसे भी फिल्म अच्छी लगी. कल शाम उसने एक कार्यक्रम भी देखा self management पर, उसे समझ में आया कि स्वयं को कैसे मेंटली और इमोशनली  संयत करना है. गर्मी की छुट्टियों के बाद आज उसका स्कूल खुला है, नूना बहुत दिनों के बाद घर में अकेली है, उसका साथ बहुत अच्छा लगता था, उन दिनों जब जून भी नहीं थे, वह उससे घंटों बातें करता था. जून और नन्हा इन दोनों के साथ उसका मन इस कदर जुड़ा हुआ है कि...
आज सुबह नैनी की बेटी को लेकर वे अस्पताल गये, उसे टिटनेस का टीका लगवाना था, पिछले चार-पांच  दिनों से उसके पैर में चोट लगी थी, पर घाव सूखने के बजाय पैर ही सूज गया है. जून के आने का वक्त हो रहा है, उन्हें बाजार होते हुए आना है पर बरसात है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही है. परसों शाम उनकी पार्टी अच्छी रही पर कल सुबह सोकर उठी तो गले में खराश थी, कई बार गरारे किये काफी राहत मिली, आज संगीत कक्षा में भी जाना है.

असमिया सखी ने कुछ देर पूर्व बड़े अधिकार से अपनी बिटिया के लिए मोज़े बुनने को कहा, सुबह जून के जाने के बाद IGNOU के प्रसारण में शिशु गृह के नन्हे-मुन्नों को देखकर पहले ही उसका मन वात्सल्य भाव से परिपूर्ण था. छोटे-छोटे कदम उठते मासूम बच्चे अपनी गतिविधियों से सभी को मोहित कर लेते हैं. उसने सोचा आज ही वह बुनना शुरू कर देगी. कई दिनों के बाद उसकी दिनचर्या पहले की भांति नियमित हुई है. कल दिन भर वर्षा होती रही, इस वक्त भी आकाश में बदली तो है. नन्हा कल स्कूल से आकर खुश था, बहुत दिनों बाद उसके साथ कल ‘वाटर पेंट’ किया, बच्चों के साथ कितना कुछ दोहरा लेते हैं माता-पिता, जो बरसों पहले सीखा तो होता है पर मन के किसी कोने में जंग खा रहा होता है. कल वह लाइब्रेरी से तीन किताबें लायी है, उसने ध्यान दिया, किचन को छोड़कर उनके घर के हर कमरे में किताबें हैं.

आज सुबह से कामों का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह दोपहर जून के जाने के बाद फिर से जारी किया जो अब जाकर खत्म हुआ है, यानि दोपहर के काम शाम पर टल गये और दोपहर सुबह को समर्पित हो गयी. सुबह उसकी छात्रा आयी थी, सार-लेखन व संवाद लेखन के बारे में जानने, एक पुस्तक भी ले गयी है इसका अर्थ है बाद में भी कभी आएगी ही. उसे अच्छा लगा, सम्बन्ध एकदम से टूट जाएँ तो ज्यादा खलता है धीरे-धीरे रेखाएं धूमिल पड़ें तो सहना सरल होता है.

Live in today ! Because past is but a dream and future is just a vision, who learns to live moment to moment is free of worries ! they started their day at 5 in the morning. Yesterday she did an experiment, tried to make curd with the help of a silver coin but pusi the cat drank milk kept for setting curd. She might have come through a window which had remained opened by mistake.

नन्हे और जून के जाने के बाद उसने प्रतिदिन की तरह टीवी चलाया तो ignou के प्रसारण में ‘कौसानी-एक यात्रा वृतांत’ आ रहा था. अल्मोड़ा के आस-पास ही है कौसानी, बेरहमी से काटे जा रहे जंगलों के कारण ही भूस्खलन की घटनाएँ गढवाल में बढ़ गयी हैं. कल ही दो सौ लोगों के दबकर मरने की खबर पिथौरागढ़ से आई थी और आज रुद्रप्रयाग में भी ३७ लोग चट्टानों के नीचे दब गये, जो पहाड़ इतने सुंदर लगते हैं वे इतने निर्मम भी हो सकते हैं.