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Wednesday, March 17, 2021

रामदाने की खीर

 

वे घर लौट आए हैं। दस-ग्यारह दिनों के इस सफर में कितने ही अनुभव हुए। कितने ही लोगों से मिले, नए व पुराने परिचितों, दोनों ही से। इस समय कितना सन्नाटा है, झींगुर की आवाज आ रही है। मौसम ठंडा नहीं कहा जा सकता, दिन में गरम था। रात्रि के नौ बजे भी वे पंखा चलाकर बैठे हैं जबकि दिल्ली में कल इसी समय स्वेटर व शाल ओढ़कर बैठी थी वह। भतीजी का विवाह हो गया, ईश्वर उसे नए जीवन में सभी खुशियां दे। उसका ससुराल काफी अच्छा जान पड़ता है, काफी सारे बाराती आए थे। रिश्तेदारों के साथ अच्छे संबंध हों तब ही पता चलता है कि परिवार में मेल है। भाई-भाभी ने बहुत अच्छी तरह सारी व्यवस्था की, बहुत ही शानदार प्रबंध था। पिताजी आए होते तो देखते पर हर कोई यहाँ अपनी ही दीवारों में कैद है।  छोटी बहन की सुंदर कंघी जो उसने उसके पर्स में रखवाई थी, साथ ही आ गई है, उसने संदेश भेज दिया है। अब उसकी बिटिया के विवाह में मिलेंगे। पिछले दिनों बाहर का खाना खाया, गरिष्ठ और तला हुआ, जरूर वजन बढ़ा होगा। पिछले दिनों न ही नियमित व्यायाम हुआ न योगासन। सृजन के नाम पर भी विशेष कुछ नहीं किया। उत्साह से भरा हल्का मन ही सृजन कर सकता है। ऐसा मन ही उदारवादी होता है और निर्भय भी। अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करके वह सहज ही ज्ञान में स्थित होता है और आनंदित भी ! जीवन में गुरू की उपस्थिति कितनी जरूरी है। कुछ लोग जीवन को संकुचित बना लेते हैं, उनके लिए जीवन असीम है, अनंत संभावनाओं से भरा। आज एक नए परिवार से मुलाकात हुई दुकान में, वह इलाहाबाद की हैं, कन्नड बोल रही थीं। 


आज सुबह उसे खुद पर आश्चर्य हुआ, यह भी याद  नहीं रहा कि आज कौन सा वार है, एक बार नहीं दो बार उसने गलत दिन बताया। हर कर्म का फल मिलता है इसका अनुभव कराती है यह बात, वर्षों पूर्व उसने सासु माँ की इस भूलने वाली बात पर उन्हें टोका था, यह कहकर कि इतनी सी बात उन्हें कैसे याद नहीं रहती।  आज से योग सेंटर में योग कक्षा में जाना आरंभ किया है। योग शिक्षिका मूलत: हिमाचल की है, पर उत्तराखंड में जन्मी है, ऋषिकेश से आई है। एक महीना पहले ही उसने यहाँ सिखाना शुरू किया है। अच्छा लगा पहला सत्र, सोमवार से वे नियमित जाएंगे। जून भी साथ गए, उन्हें भी शाम को नियमित योग करने का अवसर मिलेगा। लेखन का कार्य आज भी नहीं हुआ, समय जैसे भाग रहा है। दोपहर को भानु दीदी की पुस्तक का एक अंश पढ़ा, सुबह गुरूजी का एक बहुत ही ज्ञानवर्धक वीडियो देखा-सुना था, उनका ज्ञान अथाह है सागर जैसा ! छत पर सोलर पैनल लगाने का काम शुरू हो गया है। बालकनी व छत पर शेड का काम अभी शेष है। पिताजी से आज बात नहीं हुई, उनके मन में मोह-ममता नहीं है, वह संसार से निर्लिप्त हो गए हैं, ऐसा वह खुद ही कहते हैं। दीदी भी उसी राह पर हैं। जगत जैसे उनके लिए है ही नहीं। कौन जाने कौन सही है, जो खुश रहना जानता है वही सही है, जिसे न कोई शिकायत है न कोई अपेक्षा, वही सही है !  


आज शाम योग कक्षा में ‘वीरभद्रासन’ करते समय गायत्री ग्रुप का स्मरण हो आया उसे। वे लोग योग साधना ठीक से तो कर रहे होंगे। यहाँ की योग शिक्षिका बहुत अच्छी तरह सिखा रही है। जून आज सुबह साढ़े छह बजे ही डाक्टर के पास जाने के लिए निकले थे, त्वचा का इलाज हो गया है, एक सप्ताह तक धूप से बचना है। उसने गुरुजी की कठोपनिषद पर व्याख्या सुनी, वे तीन एषणाओं के बारे में बता रहे थे। पुत्र एषणा, वित्त एषणा तथा लोक एषणा के बारे में, जिनसे आत्मा पर आवरण आ जाता है। कोई जब तक स्वयं में टिका रहता है, सहज ही प्रसन्न रहता है, मन में इच्छा जगते ही कर्म का संसार शुरू हो जाता है। मन हर कामना के साथ डोलता रहता है। जगत का हल्का सा भी प्रभाव उसे कंपित कर देता है। मन सदा राग जगाता है अर्थात सुख चाहता है, दुख से बचना चाहता है पर स्वयं ही तुलना करके या किसी के शब्दों को सुनकर अथवा पुरानी स्मृति के कारण ही दुखी होता है। वह अपनी पहचान बनाना चाहता है पर अपूर्णता का दंश उसे चुभता रहता है। मन जब तक स्वयं को आत्मा में विलीन नहीं कर लेगा, दुख झेलता ही रहेगा। वह कौन है, जब तक यह नहीं जान लेगा तब तक दुख से मुक्ति नहीं है। मन अशान्ति का ही दूसरा नाम है। आत्मा शांति का सागर है। उसका ज्ञान ही मानव को वास्तविक प्रसन्नता का अनुभव कर सकता है। दोपहर को उसने नन्हे और सोनू के लिए एक कविता लिखी। कल वे उनके घर जाने वाले हैं, रामदाने की खीर बनाकर ले जाएंगे। यहाँ आने के बाद ब्लॉग पर कल पहली बार कुछ पोस्ट किया। 


उस पुरानी डायरी में पढ़े ये शब्द, किसी भी मनुष्य का सही मूल्यांकन करना हो तो उसकी त्रुटियों य कमजोरियों को उस समय अलग करके फेंक दो,, क्योंकि ये चीजें उसकी अपनी नहीं हैं। त्रुटियाँ तो मानव मात्र की सामान्य दुर्बलताएं हैं। महान सद्गुण ही मनुष्य की अपनी चीजें होती हैं। 


“दुनिया क्या कहेगी” ऐसा सोचना ही कमजोरी है, तुम्हें खुद को अच्छा जान पड़ता है, वही करो। जीवन का रहस्य यही है। 


हमारे अंदर का वह आध्यात्मिक जीव ही सत्य है, सक्षम है, अनंत है । चाहे हमारी वर्तमान स्थिति और वांछित स्थिति में कितना बड़ा अंतर हो, वह जीव यदि जागृत हो तो कुछ भी असंभव नहीं है। 


सत्य इसलिए बोलना चाहिए क्योंकि कठिन से कठिन स्थितियों में भी अपने पूर्वाथों  को सोचना नहीं पड़ता; लेकिन कभी एक झूठ भस्मासुर बनकर सारी सच्चाईयों को पी सकता है।