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Thursday, May 17, 2012

बारिश में भुने भुट्टे


कल घर से पत्र आया है, वे लोग २२ मई को यहाँ पहुँच रहे हैं. जून उस दिन उन्हें लेने तिनसुकिया जायेगा. पिछले वर्ष भी इन्हीं दिनों वे यहाँ थे पर इस वर्ष उनके आने का कारण कुछ विशेष है. कल उसने रवीन्द्र नाथ टैगोर का उपन्यास ‘नौका दुर्घटना’ पढ़ना आरम्भ किया, इस उपन्यास पर अवश्य कोई फिल्म बनी होगी, कितने उतार-चढ़ाव हैं कहानी में. सुबह समाचारों में सुना कि बांग्लादेश में मतदान के दौरान हिंसा की कई घटनाएँ हुई. उसने सोचा कैसे होते होंगे वे लोग जो हिंसक हो जाते हैं.. पथराव, गोली, विस्फोट से उन्हें अपने मारे जाने का भी भय नहीं होता.
उस दिन रवीन्द्रनाथ टैगोर की सवा सौंवी जयंती थी, सारे कार्यालय बंद थे, सो जून दिन भर घर पर था. वे सुबह जल्दी उठकर सूर्योदय देखने गए, उसके बाद भी बहुत दूर तक चलते गए. शाम को बाजार गए, जून ने उसके जन्मदिन के लिये कुर्ते का कपड़ा खरीद कर दिया, अगले दिन में दोनों ने मिलकर सिला. एक अच्छी बात हुई कि टीवी ठीक हो गया कुछ मजदूर बुलाए और उनकी सहायता से एंटीना फिर से लगाया. उन्होंने बहुत दिनों बाद फिल्म देखी. कल जून सब्जी लेने गया तो भुट्टे भी लाया उसे नूना की पसंद का बहुत ख्याल है. बारिश में आग पर भुने भुट्टे कितनी स्मृतियाँ जगा देते हैं बचपन की, जब एक दूसरे के मुँह पर लगी कालिख देख कर वे हँसते थे, और उनकी सुगंध भी दूर तक फ़ैल जाती थी. मौसम आज भी गर्म है या कहें कि इस हफ्ते भी गर्म है पिछले हफ्ते की तरह. पता नहीं कब बरसेंगे बादल और भीगेंगे खेत, खलिहान, घर की छतें, सड़कों के किनारे के पेड़.