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Monday, July 20, 2020

समंदर की लहरें



कल शाम वे गेस्टहाउस गए, उस सखी की बिटिया का जन्मदिन था, जो अपना घर देखने आयी थी . उसके पूर्व दो माह बाद एओल टीचर द्वारा करायी सुदर्शन क्रिया में भाग लिया. क्रिया के बाद कुछ ज्ञान चर्चा भी हुई. सार निकला, वे अपना समय तथा ऊर्जा उन लोगों के सामने स्वयं को कुछ सिद्ध करने में लगा देते हैं जिन्हें उनकी जरा भी परवाह नहीं होती. वे अपना प्रेम उन पर लुटाते हैं जिन्हें प्रेम के बारे में केवल अपने हानि-लाभ ही ज्ञात होते हैं.  सरल और सहज रहकर यदि वे अपने काम से काम रखें तो जीवन कितना सुंदर होगा. परमात्मा अपनी कृपा दोनों हाथों से नहीं बल्कि हजार हाथों से लुटा रहा है, उनकी झोली इतनी छोटी है और मोह, कामना के इतने छिद्र हैं उसमें कि वे उसको पहचानें इसके पहले ही वह झर जाती है. वे जो वास्तव में हैं वही जगत के सम्मुख आये, कोई भी दम्भ या दिखावा उन्हें छू न जाये. जून आयकर के सिलसिले मेंआज डिब्रूगढ़ गए हैं. आज सुबह उसे पीठ में जकड़न सी  हुई,  दवा लगाकर हीटिंग पैड से सेंक किया. सो आज सुबह की साधना नहीं हुई, बाद में ध्यान किया कोई जैसे भीतर से पढ़ा रहा था. जगत से लिया हर सुख दुःख के साथ मिला हुआ होता है, जैसे कड़वी दवा पर मीठी परत होती है कुछ ऐसे ही. उन्हें आत्मानुभव बढ़ाते जाना है. जीवन में जो भी परिस्थिति आए उससे कुछ सीखकर आगे बढ़ जाना है यदि असजग रहे तो पत्थर की तरह वह पैरों में बंध जाती है और जितनी गति से वे पहले चल रहे थे उससे भी कम गति रह जाती है. दिन में दो बार और पीठ पर सेंक किया, दोपहर को हल्का भोजन सो अब सब ठीक है. कल उन्हें मतदान करने जाना है, हायर सेकेंडरी स्कूल में सेंटर है. आज सुबह सुना स्वामी अनुभवानंद जी कह रहे थे, परमात्मा से मांगने योग्य वस्तु क्या है ? उन्हें ऐसा दिल मिले जिसमें किसी भी प्राणी के लिए स्वप्न में भी कोई द्वेष या कटुता न हो, ऐसे दिल में ही परमात्मा बसते हैं. 

शाम के चार बजने वाले हैं. टीवी पर चुनाव समाचार आ रहे हैं. पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा की खबरें आ रही हैं. आज सुबह वे वोट डालने गए. पिताजी से बात हुई, वे छोटी भाभी के साथ अठ्ठासी वर्ष की उम्र में भी पैदल चलकर मतदान करने गए.  उन्हें बहुत अच्छा लगी यह बात. आज बड़ी भाभी की चौथी पुण्यतिथि है, भाई ने बहुत सुंदर वीडियो उनकी स्मृति में बनाया है. उनकी बिटिया अगले हफ्ते आ रही है, अब वहीं रहकर जॉब करेगी. छोटे भाई से बात हुई, वह साधना में  अपने समय का सदुपयोग करता है. अब सिओल में पुरस्कार समारोह में मोदी जी का भाषण आ रहा है. इतने प्रभावशाली ढंग से वह भारत की बात कर रहे हैं. वह एक विश्व नेता हैं, सरे विश्व में उनकी बात सुनी जाती है. आज माली की पत्नी ने बताया उसकी बेटी को स्कूल में नृत्य में भाग लेना है, ड्रेस माला आदि खरीदने के लिए  पति ने पैसे नहीं दिये. उसे आवश्यक पैसे दिए और अपना अकाउंट खोलने को कहा, ताकि अपने लिए कुछ बचत कर सके.

पता नहीं वर्षों पूर्व उस दिन उस पन्ने पर क्यों लिखा होगा, 
‘समुन्दर ! तुम कितना बड़ा दर्द हो ! अपनी बाँहों, टांगों से सारा दर्द फेंकते किनारे को, लेकिन किनारा एक ही ठोकर से लौटा देता तुम्हारा दर्द तुम्हीं को !’ 
परीक्षाओं के कारण एक लाभ उसे अवश्य हुआ है कि पढ़ने के लिए एकांत मिल जाता है. न किसी के साथ किसी संबन्धी के घर जाना और न बाजार न फिल्म देखने. पर यह खुशफहमी जल्दी ही दूर हो गयी, भाभी की भाभी आयी और अगले ही दिन उनके साथ गयी ‘सत्ते पे सत्ता’ देखने, केवल उन्नीस दिन रह गए हैं परीक्षाओं को. कम से कम अब तो उसे पढ़ाई के प्रति गम्भीर हो जाना चाहिए. कुछ दिनों की पीड़ा जीवन भर के सुख का आधार बन जाएगी,  इसलिये सहो, जितना सम्भव हो सहो गणित के सवालों की तीखी धारों को अपने मस्तिष्क के तन्तुओं पर... उसे अब अचरज होता है क्या पढ़ाई पीड़ा लगती थी उसे. 


Monday, July 16, 2018

सुपर ब्रेन योगा



आज वह अपनी नई पड़ोसिन से मिलने गयी, जो एक मृदुभाषी, थोड़े भारी तन वाली आकर्षक सांवली महिला हैं. थोड़ी देर बाद ही वह चाय, मिठाई, काजू और नमकीन ले आयीं और खाने का आग्रह करने लगीं. उनका घर कलात्मक साजसज्जा से सुशोभित है. वे लोग ब्राह्मण हैं, पूजा घर भी सुंदरता से सजाया गया है. कह रही थीं, रोज पूरे नियम से पूजा करती हैं. अब तक के कार्यकाल में दस घर बदल चुके हैं वे लोग. चार वर्षों के लिए वह राजस्थान में थीं, वहाँ के महिला क्लब की सेक्रेटरी भी थीं, अपने कार्यकाल में उन्होंने एक पत्रिका भी प्रकाशित करवाई. उनकी दो पुत्रियाँ हैं, एक पढ़ रही है और दूसरी एम टेक करने के बाद जॉब में है, वह पीएचडी भी करना चाह रही थी, पर किसी कारण वश यह सम्भव नहीं हुआ. पुत्रियों के बारे में बताते समय उनका मुख गर्व से दमक रहा था. इसी तरह पहले लोग केवल पुत्रों के बारे में बात करते थे. कुछ वर्ष वे लोग उड़ीसा में भी रहे. उन्होंने गोहाटी और कोलकाता में रहने वाले अपने दो भाइयों के बारे में भी बताया, एक का पुत्र बंगलूरू में स्टार्टअप चला रहा है और दूसरे का आईआईटी में इंजीनियरिंग कर रहा है. उनके पति के चार भाई हैं, बड़े भाई जब हाईस्कूल में थे अचानक उनकी आँखें चली गयीं, पर पढ़ाई में बहुत अच्छे थे, डाक्टरेट करके प्रोफेसर भी बने. एक बहन थी पिछले वर्ष जिसकी मृत्यु हो चुकी है. बातें करते-करते जब घड़ी की ओर देखा तो जून के आने का समय हो गया था, उन्हें अपने घर आने का निमन्त्रण देकर वह लौट आई.
आज वे मतदान देने गये. सौ नंबर कमरे में उनका बूथ था, उस समय भीड़ जरा भी नहीं थी. पहले जून गये फिर वह. उनके आगे भी कोई नहीं था और पीछे भी कोई नहीं, जबकि अन्य कमरों के आगे लंबी लाइनें लगी थीं. वोट देने के बाद बाजार से फल खरीदे और जून के एक सहकर्मी के यहाँ गये, जिनकी माँ की पिछले हफ्ते मृत्यु हो गयी थी. यहाँ के रिवाज के अनुसार तेहरवीं से पहले जो भी जाता है, वह कुछ न कुछ लेकर जाता है. हर रिवाज के पीछे कोई न कोई कारण होता है, शायद दुःख को बांटने का एक तरीका है यह प्रथा. कल शाम एक पुराने मित्र परिवार को भोजन पर बुलाया था, पुरानी यादें ताजा करते समय मन कैसा बच्चों जैसा हो जाता है, बिना बात ही खुशी बना लेता है. कल रात  एक स्वप्न में देखा, वह एक बस में बैठी है, पर रास्ते में उतर जाती है, छोटा भाई आगे निकल जाता है. एक अन्य स्वप्न में किसी पुराने जन्म की स्मृति थी, जिसमें इस जन्म का एक संबंधी उस जन्म में भी होता है. उनके जो संस्कार गहरे होते हैं, अगले जन्म तक चलते चले जाते हैं. उसके भीतर जो लोभ की प्रवृत्ति है अथवा संदेह की, वह भी लगता है, पुरानी है, जिसके कारण कभी-कभी भीतर संदेह जगता है. उनकी आँखों पर जिस रंग का चश्मा लगा होता है, वे उसी से दुनिया को देखते हैं.
शाम के साढ़े पांच बजे हैं. वर्षा हो रही है बाहर, सो लगता है, दिन से सीधे ही रात हो गयी है. गुलजार की कुछ कविताएँ पढ़ीं आज, बहुत सुंदर हैं, सहज, सरल और दिल को छूने वाली कविताएँ ! सुबह मृणाल ज्योति गयी, ‘सुपर ब्रेन योग’ करवाया, कान पकड़ के उठक-बैठक को आजकल इसी नाम से पुकारा जाता है..अच्छा व्यायाम है, शाम को महिलाओं को भी करवाएगी. कल दोपहर भी जाना है, ‘बाल सुरक्षा समिति’ की पहली मीटिंग है जिसकी वह भी सदस्या है. जून के दफ्तर के एक उच्च अधिकारी की पत्नी को फोन किया, उनके लिए एक कविता लिखी है, वे लोग तीन दशक से अधिक कार्य करने के बाद यहाँ से जा रहे हैं. शनिवार को क्लब की एक अन्य सदस्या की भी विदाई है, एक परिवार तबादले पर जा रहा है. जीवन इसी आने-जाने का नाम ही तो है. उसका मोबाईल फोन ठीक से काम नहीं कर रहा, अच्छा ही है एक तरह से, भला हुआ मेरा चरखा टूटा..कबीर का पद है न जो आबिदा ने गाया है. फोन के कारण कितना समय व्यर्थ जाता है आजकल. नैनी कह रही है, इस बार पूजा में उसे साड़ी की जगह सूट चाहिए. अभी छह महीने शेष हैं पूजा आने में. मन तो कल्पनाएँ करता ही रहता है. अच्छ है कि उसका मन भी कल्पनाशील है.