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Sunday, November 10, 2013

स्माल वंडर - एक मजेदार कार्यक्रम


कल जून ने उसे बैडमिंटन का अभ्यास कराया, थोड़ी ही देर में थक गये, उनके अनुसार कम से कम एक महीने के ऐसे अभ्यास के बाद ही उसे प्रतियोगिता में खेलने का विचार बनाना चाहिए, लेकिन आज दोपहर उसे जाना है, हार भी हुई तो क्या, कम से कम एक शाम कुछ अलग तरह से बीतेगी. आजकल वे रोज शाम को small wonder देखते हैं, उन्हें खूब हंसाता है यह सीरियल, सोमवार से शुक्रवार तक हर रोज. आज माली ने खीरे, करेले और भिन्डी के बीज लगा दिए. उसका ध्यान आवाज पर गया तो याद आया, कारपेंटर आया है, बेडरूम में मच्छरदानी के लिए दो और रॉड लगाने के लिए, नन्हे के अकेले सोने के कारण उन्हें एक सिंगल नेट भी खरीदनी पड़ेगी. वह बड़ा हो रहा है और उसे भी आजादी पसंद है, आजकल रात को खुद किताब पढकर सोता है. मगर उसे सुबह जगाना वैसा ही मशक्कत का काम है जैसा पहले था.

कल रात अचानक कहीं से बादल आ गये और हर वर्ष की तरह बीहू पर वर्षा हो ही गयी है, बादलों से भरा आकाश, नीलिमा को पूरा ढक लिया है जैसे, सूर्य देव को भी हफ्तों बाद अवकाश  मिला है. इस समय वे एक मित्र परिवार का भोजन पर इंतजार कर रहे हैं, जून और नन्हा उनकी अहमदाबाद की यात्रा की योजना बना रहे हैं, मार्च में होने वाली उनकी यात्रा की मानसिक तयारी अभी से शुरू हो गयी है. यात्रा मन, प्राण को नई शक्ति से भर देती है, एक नई उमंग और जोश से भी, वर्ष में एक बार तो सभी को यात्रा करनी चाहिए.  उस दिन शनिवार को उनका बैडमिंटन का गेम अच्छा रहा, सौभाग्य से उसकी पार्टनर अच्छी थी, उन्होंने छह गेम जीते और winner रहे, लौटने में काफी देर हो गयी थी. जून ने खीर बनाकर रखी थी और डिनर के लिए सब्जी भी बना दी थी, नन्हा और वह दोनों उसकी ख़ुशी में शामिल थे. कल इतवार था, दोपहर को अमोल पालेकर की एक फिल्म देखी, अगले दो दिन बीहू का अवकाश है. वे क्लब जायेंगे, जहाँ बीहू मनाया जायेगा.

कल वे तिनसुकिया गये थे, शाम को नन्हे ने नैनी के बेटे की सहायता से आग जलाई, उन्ही की लेन में रहने वाले एक नये पड़ोसी भी पहली बार आए, मिसेज बहुत बात करती हैं, पतिदेव बीच- बीच में कुछ कह देते हैं. आज सुबह वैक्यूम क्लीनर की सहायता से सारे घर की सफाई की. इस वक्त नन्हा tell me why पढ़ रहा है और जून इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि कब बत्ती बंद हो.

आज धूप आंख-मिचौली खेल रही है, कभी सूर्य बादलों के पीछे छिप जाता है और सुबह के वक्त ही शाम का अहसास होने लगता है, थोड़ी ही देर में झाँकने लगता है. ठंड भी बढ़ गयी है. बहुत दिनों से उसने कोई खत नहीं लिखा है. भाई-भाभी से फोन पर बात की, निहारिका की आवाज भी सुनी, अभी वह एक साल की हुई है और बोलने भी लगी है. कल शाम एक परिवार आया, वे एक दिश खरीद रहे हैं, और जून की सहायता चाहते हैं, आज सुबह नींद देर से खुली, देर होने पर जल्दी ही झुंझलाहट हो जाती है, ऐसी बातों पर भी जिन पर वैसे कभी ध्यान भी नहीं जाता है. उसने जून की मनपसन्द त्रिदाली बनाई है, पालक+बथुआ का साग भी. बहुत दिनों बाद पड़ोसिन से फूलों पर बात हुई, उसे लिली के बल्ब और अगले सीजन में गुलाबों की दो कटिंग्स चाहिए, अच्छा लगता है यह सोचकर कि उनके बगीचे में भी ऐसा कुछ है जो देने लायक है. माली आया और जल्दी ही चला गया, शायद उसे भी मौसम ने परेशान किया हो. कल घर स से दो पत्र आए और पिता के बनाय दो कार्ड भी मिले, इसके अलावा पुराने परिचितों के भी कार्ड्स मिले, नये साल पर वर्ष में एक बार ही सही, सब  कोई याद तो कर लेते हैं एक-दूसरे को और यह संदेश दे देते हैं कि हम भी हैं इसी धरती पर कहीं न कहीं. उसे ध्यान आया, जनवरी आधा बीत गया और उसने कुछ लिखा नहीं, परसों पिकनिक पर जाना है, शायद वहीं या रास्ते में ऐसा कुछ हो की कविता खुदबखुद फूट पड़े. आज दोपहर सूट की कटिंग करनी है, बहुत दिन हो गये हैं इस इंतजार में कि कहीं से कोई सहायता मिल जाएगी, पर ईश्वर भी उसकी सहायता करते हैं जो अपनी सहायता खुद करता है.