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Tuesday, June 9, 2015

पहली विदेश यात्रा


ध्यान उसे भाता है पर आजकल उसके लिए समय व स्थान निकाल पाना कठिन होता जा रहा है. आँख बंद करते ही कैसे प्रभु का प्रेम पूरे तन-मन को ढक लेता सा लगता है. सिर के ऊपरी बिंदु पर हलचल सी होती है नहीं तो सिहरन और लगता है कि कुछ रिस रहा है. धीरे-धीरे बढ़ रहा है भीतर...उतर रहा है उस प्रभु का नाम फिर पोर-पोर में भर जाता है, उसका ताप मोहक है, उसकी याद सांसों को भर लेती है. वह जैसे छा जाता है फिर बाहर की दुनिया का होश किसे रहता है. कल बहुत दिनों के बाद सत्संग में गयी, शायद उसी का परिणाम है अथवा तो दीपावली के आगमन का उल्लास. सुबह-सवेरे संगीत का अभ्यास भी मन-प्राण को प्रफ्फुलित कर देता है और सुबह प्राणायाम का अभ्यास भी किया था, बीच-बीच में ध्यान था अथवा तंद्रा जिसके कारण श्वास गहरी नहीं हो पा रही थी. आजकल मौसम भी सुहावना है, वर्षा के बाद का आकाश कितना निर्मल होता है. कल अमावस्या है, यह दीपकों का प्रकाश इसे पूर्णिमा में बदल देगा ! उनके भीतर भी दीपक जल रहे हैं, भीतर प्रकाश ही प्रकाश है. प्रकाश के इस सागर को उसने कितनी बार देखा है, उनके भीतर ही नगाड़े भी बज रहे हैं, कितनी बार जिसे सुना है, सोहम, हंसा का अंतर्नाद स्पष्ट सुना है जैसे कोई भीतर बैठकर जप कर रहा हो, उनकी आत्मा का संगीत है वह और आत्मा का प्रकाश. आत्मा तो परमात्मा का अंश है तो वह उसका ही प्रकाश हुआ. उन्हें रस पूर्ण करने वह परमात्मा ही धीरे से घट खोल देता है, अपने रस का घट जो पूर्ण है जो मधुमय है, जो सुखमय है, जो शक्ति देता है, ज्ञान देता है और स्फूर्ति देता है. जो सभी ऐश्वर्यों का दाता है !

आज दीपावली है, दीयों का त्योहार, उजाले का त्योहार, उनके भीतर का उजाला जगमगाने लगे तभी असली दीपावली है. जब तक भीतर अंधकार हो तो बाहर का प्रकाश उनकी मदद नहीं कर सकता. आज सुबह क्रिया के बाद उसे ज्योति के दर्शन हुए, कान्हा ने भी अपने नीलमणि रूप में दर्शन दिए. परमात्मा उन्हें उनकी सभी कमियों के साथ स्वीकारता है, वह उनसे प्रेम निभाता है, चाहे वे कितना ही बड़ा अपराध करें उसे प्रेम से पुकारें तो वह जवाब देता है. वे ही उसके प्रेम को भुला देते हैं, तब जीवन कांटों में उलझ जाता है, कैसा ताप जलाता है. उसका साथ हो तो सारा जगत अपना-आप ही लगता है. उनका मन आत्मा में स्थित रहे तो हर क्षण ही उत्सव का क्षण है ! उसने प्रार्थना की, ‘उनके तन का पोर-पोर मन का हर अणु परमात्मा के नाम से इस तरह ओत-प्रोत हो जाये कि जैसे पात्र पूरा भर जाने पर जल छलकने लगता है, वैसे ही उसके नाम का अमृत उनके अधरों व नेत्रों से स्वतः ही छलकने लगे’. चित्त जब तृप्त होगा उसके नाम से पूर्ण होगा तो भीतर के ताप अशुभ वासनाएं भी धुल जाएँगी. अपनी भूलों पर वेदना होती है तो सजगता बढ़ती है, दुःख सिखाता है, क्रोध, मोह, आलस्य ताप को बढ़ाते हैं. ज्ञान उन्हें मुक्त करने के लिए, यह ज्ञान कि वे साक्षी मात्र हैं, सुख-दुःख के भोगी नहीं हैं.

उन्हें यात्रा पर जाना है, पहली बार विदेश यात्रा पर साथ-साथ. जीवन का सफर उन्होंने साथ-साथ तय करने का निर्णय वर्षों पहले लिया था, और अब यह छोटा सा सफर अमेरिका, इंग्लैण्ड की यात्रा. जिन स्थानों को टीवी अथवा पत्रिकाओं में देखा था, उन स्थानों को स्वयं देखने का अनुभव यकीनन अच्छा होगा. वे अपने साथ बहुत कुछ ले जा रहे हैं लेकिन सबसे उत्तम जो उनके साथ जायेगा वह है, वह  सुमिरन जो कान्हा ने उसे दिया है. कभी भी खत्म न होने वाला एक ऐसा प्रिय कार्य है प्रभु का स्मरण कि वे संसार में कहीं भी रहें, वह उनके साथ रहेगा. सद्गुरु की सिखाई साधना की विधि, सद्शास्त्रों का ज्ञान तथा ध्यान भी उसके साथ जायेगा और यही उसकी यात्रा के सम्बल हैं. टिकट-पैसे आदि का सारा प्रबंध जून देखते ही हैं, उन्हें ही उसकी फिकर करनी है पर उसके लिए उस परम पिता ने यही कार्य सौंपा है. गुरु माँ कहती हैं मन प्यासा है, भूखा है, और कड़वा है, न जाने कितनी बार वे संतों के उपदेश सुनते हैं, शास्त्रों का पाठ करते हैं पर फिर भी मन का बर्तन भरता नहीं, मन सूक्ष्म है वह स्थूल से कैसे भर सकता है और जब तक वह कड़वा है तब तक सूक्ष्म का स्वाद भी कैसे पता चलेगा. उन्होंने मन में न जाने कितनी गाठें बांध ली हैं पहले उन्हें खोलना होगा तभी तो मन बहेगा उस अनंत यात्रा पर. उनका अज्ञान ही उसे दुखी बनाता है, अहम् मन को सूखा रख जाता है और मोह ही भूखा रख जाता है. मन वास्तव में कुछ है ही नहीं, कल्पनाओं का एक जाल है, जो उन्होंने बुन रखा है !