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Thursday, June 23, 2016

पीतल का दीपदान


चार दिनों का अन्तराल ! सुबह एक सखी का फोन आया, वह अब फेसबुक पर नहीं दिखेगी. उसे इस बात का अंदेशा तो था ही. वह हँसते हुए कह रही थी लेकिन उस हँसी के पीछे जरूर थोड़ा सा तो दुःख होगा, चाहे कुछ पलों के लिए ही सही. नये वर्ष पर उसे संदेश भेजने में भी संकोच होगा. वे जीवन को व्यर्थ ही बोझिल बनाये जाते हैं, जबकि जीवन इतना प्रेम, आनंद और सौंदर्य छिपाए है. वह बिखरा है चारों ओर, वे नजर उठाकर देखते भी नहीं ! आज एक और सखी ने कहा उन्हें world space radio लेना चाहिए, गुरूजी की आवाज में रोज सत्संग सुनने को मिलेगा, उसे पता ही नहीं है गुरूजी और वह एक हो गये हैं. अब उनको सुनने के लिए उसे बाहर कुछ भी नहीं करना है. भीतर वही तो बोल रहे हैं. आज सुबह एक फोन आया, पर उठा नहीं पायी, तब वह ध्यान कर रही थी. यूँ भी व्यर्थ की बातचीत से क्या मिलने वाला है. माँ का डर व घबराहट आजकल बढ़ती जा रही है. पिताजी को कुछ देर भी नहीं देखती हैं तो ढूँढने लगती हैं. कल नन्हे से बात की, परसों वह भीग गया था, गला खराब हो गया है.

वर्ष बीतने में मात्र एक दिन रह गया है. पीछे मुड़कर देखे तो सभी कुछ अच्छा रहा, ध्यान में टिकना हुआ, मन विकारों से मुक्त हुआ. आज सभी को नये वर्ष की कविता भेजी. कल फेसबुक पर भी सबको शुभकामना देनी है. मृणाल ज्योति की प्रिंसिपल से बात की, स्कूल के लिए उन्हें दो विशेष कुर्सियां बनवानी हैं, वे विवाह की वर्षगांठ के उपलक्ष में उसके लिए आवश्यक राशि देगें. पीछे वाले  आंगन का हरे बार्डर वाला नया बनवाया सलेटी फर्श बहुत सुंदर लग रहा है. गमले रखने के लिए एक स्टैंड भी वहाँ रखा, सर्दियों भर तो आँगन को साफ-सुथरा रखा जा सकता है. बाहर बैठने के लिए चार बेंत के मूढ़े उन्हें लेने होंगे.

साल का अंतिम दिन ! पिछले कुछ दिनों से एक परिचिता भी उसके साथ योग करने आ रही है, आज भी आई थी. योग सिखाने की उसकी कामना को सफल करने. कल शाम को वे एक मित्र के यहाँ गये, लौटने में देर हुई, कुछ ज्यादा नहीं पर उसका असर अभी तक है. शाम को एक परिचित को जो रिटायर होकर यहाँ से जा रहे हैं, बनारस से लाया पीतल का दीपस्तम्भ, नये वर्ष की कविता तथा कार्ड दिए. उन्होंने कहा, गुरूजी अरुणाचल प्रदेश में आ रहे हैं, यदि वे यानि ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के लोग उन्हें लाने के लिए कम्पनी द्वारा हेलीकॉप्टर का प्रबंध कर दें तो वे कुछ घंटों के लिए यहाँ भी आ सकते हैं. विचार तो बहुत अच्छा है कि गुरूजी दुलियाजान आयें पर उनके स्वागत के लिए सभी को कई आवश्यक प्रबंध करने होंगे. उसे तो वे हर वक्त निकट ही प्रतीत होते हैं. वह कहते हैं ‘जो मैं हूँ सो तुम हो’ ! इस अभिन्नता को जो महसूस कर ले वह तृप्त हो जाता है !