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Wednesday, July 17, 2019

पक्षी विहार



आज सुबह तेज गर्जन-तर्जन के साथ वर्षा हुई, लगा कि फरवरी में ही वर्षा का मौसम आ गया असम में, पर दोपहर होते-होते बादल छंट गये और मौसम सुहाना हो गया. इस समय शाम होने को है, जून अभी तक नहीं आये हैं. दोपहर को उन्होंने तिनसुकिया के पास स्थित डिब्रू सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान यानि पक्षी विहार जाने के लिए कार्यक्रम को रूप दिया. रिजार्ट के मालिक से बात करके इतवार सुबह आठ बजे पहुंचने का समय तय हो गया. एक और परिवार भी उनके साथ जायेगा, उनसे भी बात कर ली है. कल मृणाल ज्योति की 'क्षेत्रीय अभिभावक सभा' के लिए तैयारी भी कर ली है. नेट पर दिव्यंगो के लिए बनी राष्ट्रीय नीतियों के बारे में पढ़ा. सरकार ने कई संस्थाएं खोली हैं और कई नीतियाँ बनाई हैं ताकि दिव्यंगों को समाज और राष्ट्र में अपनी भूमिका निभाने का अवसर मिल सके. देश की जनसंख्या का तीन से पांच प्रतिशत हिस्सा इस श्रेणी में आता है, यानि ढाई करोड़ से भी ज्यादा दिव्यांग हैं देश में, जिन्हें यदि उचित अवसर मिले तो सक्षम बन सकते हैं. कोई भी समाज तभी विकसित कहा जा सकता है जब उसमें सभी के लिए समान अवसर हों. संवेदनशील समाज अपने कम सक्षम नागरिकों के लिए, उन लोगों के लिए जो किसी न किसी कारण से पीछे रह गये हैं, अपने द्वार खुले रखता है. उन्हें बाहरी रूप को देखकर किसी की क्षमता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाने हैं, भीतर की शक्ति को जगाना है ताकि एक सम्मानपूर्ण जीवन उनके हिस्से आ सके, उन्हें दया अथवा सहानुभूति की नजर से नहीं देखना है. उन्हें भी एक सामान्य नागरिक की तरह शिक्षा का अधिकार है तथा अपनी बात कहने का भी अधिकार है. हर जीवन को दिव्य मानकर उन्हें किसी के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होना है. उनके साथ काम करने वाले शिक्षक व अन्य लोग समझते हैं कि वे अपने को व्यक्त करना चाहते हैं और उन्हें इस बात का अवसर दिया जा चाहिए.

"जलता हुआ दीपक जिस समय बुझ जाता है, अंधकार छाने में पल भर भी नहीं लगता, वैसे ही एक क्षण का प्रमाद भी आत्मा के प्रकाश को ढक लेता है और भीतर अंधकार छा जाता है." महावीर स्वामी का यह वचन आज सुना, इसीलिए संत कहते हैं, प्रमाद मृत्यु है क्योंकि आत्मा अमृत है ! आत्मा का सूर्य भीतर प्रज्ज्वलित हो रहा है पर प्रमाद रूपी बादल उसे ढक लेता है और वे उसके प्रकाश से वंचित हो जाते हैं. मन जिस क्षण भी उद्ग्विन हो यही समझना चाहिए कि अज्ञान के बादल ने आत्मा को ढक लिया है. आज आत्मा कितनी मुखर है, सिर के ऊपरी भाग में हल्की सिहरन हो रही है, दाहिने कान में संगीत गूँज रहा है, मन बिलकुल खाली है. पिछले तीन-चार दिनों से न समाचार सुने न अखबार पढ़ा. ध्यान किया और सद्वचन सुने, जैसे कोई कोर्स घर बैठे कर लिया हो, ऐसा ही लग रहा है. ध्यान रखना होगा कि अध्यात्मिक यात्रा ऐसे ही चलती रहे. भोजन हल्का होना चाहिए और समय का सदुपयोग !

'पीस ऑफ़ माइंड' पर कितना सुंदर गीत आ रहा है, और नासिकाग्र पर कितनी दिव्य गंध आ रही है. आजकल कोई न कोई मदमाती गंध आसपास डोलती रहती है. परमात्मा की कृपा अनंत है, वह अकारण दयालु है और सच्चा सुहृद है, अनंत प्रेम करने वाला है. वह लिख ही रही थी कि जून भोजन ले आए, मेथी पुलाव, भिन्डी की सब्जी और पापड़, पूरा सिन्धी खाना.