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Wednesday, June 2, 2021

पके केले के पकोड़े


 आज वे खादी की दुकान में गये, मल्लेश्वर स्थित यह दुकान बहुत बड़ी थी और वस्त्रों के अलावा कई कलात्मक वस्तुएं भी वहाँ थीं। नन्हा और सोनू सवा दस बजे ही आ गये थे जब वह और जून पड़ोसी के यहाँ बीहू का विशेष जलपान करने गये थे। आर्ट ऑफ़ लिविंग के लिए उनका रिज्यूमे ठीक करने में सोनू ने सहायता की , फिर उसे भेज भी दिया। गुरुजी के लिए कुछ सेवा कार्य करने का उनका स्वप्न संभवतः निकट भविष्य में पूर्ण होगा। गुरु जी का लगाया प्रेम का बीज अब फूल बनने की ओर कदम रख रहा है। उन्हें इस कार्य को करके ख़ुशी होगी, परमात्मा की इस दुनिया में परमात्मा के कुछ काम आ सकें वह भी तो उसकी इच्छा से ही होना संभव है। कल दीदी का फ़ोन आया, वह विटामिन डी तथा कैल्शियम लेने के कारण अब काफ़ी ठीक हैं। जून को सर्दी लग गयी है, पिछले दो-तीन दिनों से ठंड बढ़ गयी है। उन्हें गले में हल्का दर्द है। कल हो सका तो वे धूप निकलने के बाद ही टहलने जाएँगे। नन्हे ने एक बिजली से चलने वाला लाइटर भिजवाया है, जिससे मोमबत्ती या अगरबत्ती जला सकते हैं।  

आज सुबह पौने चार बजे ही उसकी नींद खुल गयी, चारो तरफ शांति थी। जून साढ़े पाँच बजे उठे, जब वे टहलने गये तो दिन अभी निकला नहीं था, मौसम ठंडा था।नाश्ते के बाद कुछ देर धूप में भी निकले। जून को बाल कटवाने थे सो पैदल ही सोसाइटी के मुख्य द्वार तक बढ़ते गये। सड़क के दोनों ओर बोगेनवेलिया के रंग-बिरंगे सुंदर फूल खिले थे, कई तस्वीरें उतारीं। असम में जून के ड्राइवर का काम कर चुके एक जन का फ़ोन आया, उसने बताया अगले हफ़्ते सीएए के ख़िलाफ़ कोर्ट में सुनवायी है, अब तक जो शांति बनी हुई है, वह उसके बाद बनी रहेगी, कहा नहीं जा सकता। कई दिनों बाद आज घर में सिविल का काम नहीं हुआ, ब्लॉग पर एक पोस्ट लिखी। शाम को वे निकट स्थित गाँव के मंदिर में गये। जो दक्षिण भारतीय वास्तुकला के अनुसार बना हुआ हनुमान जी का सुंदर मंदिर है। वापसी में यहाँ के एकमात्र छोटे से नए खुले रेस्तराँ में एक कप कॉफी के लिए रुके, पके हुए केले के पकोड़े पहली बार चखे।बुद्ध की पुस्तक समाप्त होने वाली है। बुद्ध अमर हैं, युगों बीत जाएँगे और लोग उनसे ज्ञान प्राप्त रहेंगे। बुद्धम शरणम गच्छामि ! संघम शरणम गच्छामि ! धम्मम शरणम गच्छामि !


आज वे लालबाग गये थे, जहां गणतंत्र दिवस पुष्प प्रदर्शनी चल रही थी।  कल से आरम्भ हुई है और छब्बीस जनवरी तक रहेगी। ग्लास हाउस में स्वामी विवेकानंद की स्मृति में सुंदर पुष्प सज्जा की गयी है। बड़े भाई, भतीजी, नन्हा, सोनू, उनके एक मित्र दम्पति तथा वे दोनों, सभी ने फूलों का आनंद लिया। उन्होंने फूलों के गमले लिए, पिटूनिया, पोइनसेटिया और गुलदाउदी के फूलों के गमले । लाल बाग का इतिहास बहुत पुराना है, हैदर अली ने इसकी नींव रखी थी। कई एकड़ में फैले इस बाग में दूर तक फैले लॉन हैं, हज़ारों क़िस्म के वृक्ष हैं, सुंदर बगीचे हैं, बंगलूरू की शान यह वनस्पति उद्यान साल भर किसी न किस प्रकार के फूलों से भरा रहता है। उससे पूर्व जून अपना सूट सिलने देने गये। बड़ी ननद का फ़ोन आया था, छोटी बिटिया का विवाह तय हो गया है। दो माह के बाद होगा।  


आज सुबह वे आश्रम गये, ‘अतिरुद्र होम’ चल रहा था। हजारों की भीड़ थी। शाम को नन्हा आया था, उसे बुखार हो गया है। लालबाग में उस दिन फूलों को ताजा रखने के लिए अथवा किसी कारण से पानी की फुहार छोड़ी जा रही थी, शायद वह ज्यादा भीग गया। बाग में पुस्तकों की एक प्रदर्शनी भी लगी हुई थी, उसने पड़ोस में रहने वाले बच्चों के लिए बाल पुस्तकें ख़रीदीं थीं आज उन्हें दीं। आज शाम को योग कक्षा में आने वाली एक साधिका उनके घर आयी थीं, अब से वह नियमित यहाँ आकर उसके साथ ही शाम को एक घंटा योग साधना करेंगी। इस माह के अंतिम सप्ताह में गुरुजी भगवत गीता के अठारहवें अध्याय पर प्रवचन देंगे। जिसमें अर्जुन कृष्ण से पूछते हैं, सन्यास क्या है? और त्याग क्या है? सन्यास और त्याग दोनों का ही अर्थ कुछ छोड़ना है , पर उनमें अंतर क्या है और उनका मर्म क्या है । 


आज सुबह देर से उठे, ठंड कुछ ज्यादा थी, अब जैकेट पहननी पड़ती है सुबह के वक्त। ‘ओल्ड पाथ वाइट क्लाउड्ज़’ आज पूरी पढ़ ली, बुद्ध ने अपनी मृत्यु की घोषणा पहले ही कर दी थी । मशरूम की सब्ज़ी खाने के बाद उनका स्वास्थ्य बिगड़ा और वह उनका अंतिम भोजन था। जैसे उनका जीवन भव्य था वैसे ही उनकी मृत्यु भी ! साल के वृक्षों ने उन पर फूल बरसाए और कुशीनारा के जन-जन ने उनके लिए अश्रु बहाए। आज भी ब्लॉग पर लिखा, लिखने का क्रम कुछ आरम्भ हुआ है। 


आज वे पुनः आश्रम गये, वहाँ बहुत भीड़ थी , हजारों की भीड़ । कल से संयम कोर्स शुरू हुआ है, शायद उसी में भाग लेने पूरे भारत से साधक यहाँ आए हैं। सदा की तरह गुरुजी ने सरल ढंग से हर प्रश्न का उत्तर दिया। बुद्ध पुरुषों से ही इस धरा की शोभा है। जून आज दोपहर को नन्हे के लिए आयुर्वेदिक दवा देकर आए, सितोप्लादि नाम है दवा का, सर्दी जुकाम में काम करती है। औषधि यदि समय पर ले ली जाए तो रोग जड़ नहीं पकड़ पाता। ‘ऐन विद एन ई’ का अंतिम भाग भी देख लिया, अंत भला तो सब भला ! आज माँ-पापा का स्मरण हो रहा है, उनके कारण ही उसका इस जगत में अस्तित्व है अर्थात इस देह व मन का, जिसके माध्यम से वह व्यक्त हो रही है। उसकी असली पहचान तो अब मिली है, एक शांत, अनंत प्रेम, जो चेतन है, जो मन और बुद्धि  के माध्यम से व्यक्त हो सकता है। जो इस देह के माध्यम से सत्कर्म  कर सकता है। जो इस जगत में अच्छाई का संदेश दे सकता है। जो किसी का निर्णायक नहीं है। जो प्रेम बदले में कुछ नहीं चाहता क्योंकि अनंत में कुछ भी मिलाओ अनंत ही रहेगा। अनंत से कुछ भी निकलो अनंत ही रहेगा। ऐसा प्रेम नित नूतन है।