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Friday, July 3, 2020

भीगी काली सड़कें



आज सुबह भी वर्षा हो रही थी, वे छाता लेकर टहलने गए और घर के आसपास ही रहे. वर्षा और अँधेरे के कारण सड़क एकदम चमकदार व काली दिख रही थी. पांच बजे ही खम्भों पर लगी बत्तियां बुझा दी जाती हैं. सुबह का भ्रमण दिन को एक सुंदर आभा से भर जाता है. एक परिचित का फोन आया, वह मृणाल ज्योति के बच्चों के लिए एक गीत लिख रही है, अगले सप्ताह सिखाएगी. आज दोपहर वह गयी थी वहाँ, आते आते शाम हो गयी; पहले हिंदी कक्षा, फिर मीटिंग और अंत में वहाँ भी प्रेसीडेंट व उनके पतिदेव की विदाई का कार्यक्रम. सभी कुछ ठीकठाक हो गया. वापस आकर रात के लिए भोजन बनाया और फिर क्लब में मीटिंग थी, वर्किंग प्रेजिडेंट को कार्यभार सौंपा गया. वापस आयी तो जून ने कहा, कल तो कहीं नहीं जाना है ? पिछले तीन दिन से शाम को कुछ न कुछ कार्यक्रम था. कल शाम भी एक पार्टी है थैंक्सगिविंग पार्टी पर वह नहीं जाएगी. 

अभी-अभी स्कूल से आयी है, बोलने व सुनने में असमर्थ इन बच्चों को भाषा ज्ञान देना अपने आप में एक नवीन अनुभव है. उन्हें अक्षर ज्ञान हो गया है पर शब्दों का निर्माण कैसे होता है और उनका अर्थ क्या है , यही समझाना है. जब वे एक शब्द गढ़ लेते हैं तो बहुत खुश होते हैं. आज सुबह ब्लॉग पर लिखने बैठी तो स्वयं ही भीतर से विचार आते गए, परमात्मा की कृपा असीम है, वह अनंत है और उसका सान्निध्य भी अनंत है, वे ही हैं जो उससे पीठ कर लेते हैं. 

समय हो गया है, जून अभी तक लंच के लिए नहीं आये हैं, फ्राइडे मीटिंग में अक्सर देर हो जाती है. आज भी बदली छायी है, फरवरी में एक बार फिर ठंड लौट आयी है. कल रात देर तक नींद नहीं आयी, आयी भी तो कोई स्वप्न चल रहा था. सुबह उठकर भगवान को प्रणाम करने गयी तो मुख पर सहज प्रसन्नता नहीं थी, दोनों हाथों ने चेहरे को ढक लिया, यह सब जैसे घट रहा था और कोई इसे देख रहा था. पानी पीते समय बाबा रामदेव का एक वाक्य सुना और सहजता लौट आयी, वह अपने शुद्ध स्वरूप में टिकने की बात कह रहे थे. आज महीनों बाद कॉन्ट्रैक्टर उस कागज पर हस्ताक्षर करवाने आया जिस पर लिखा था घर में रंग-रोगन हुआ था. इतने दिनों तक क्या उसका पेमेंट नहीं हुआ होगा, इसीलिए ये लोग भी मजदूरों को दिहाड़ी देने में देर करते हैं. आज ध्यान में उसकी चेतना ने गुरूजी की आवाज में संदेश  दिया, जिसे अपने ही मन का खेल जानकर उसने हँसी में उड़ा दिया. मन की ताकत का अंदाज कोई नहीं लगा सकता. इस मन के पार जाकर टिके रहना वीरों का काम है. यदि चाहे तो एक दिन मन के पार जाकर उसमें टिके  रहना उसके लिए भी सहज होगा ... चाहे तो इसी क्षण भी !  

आज जून का लंच दफ्तर में है, एक कर्मचारी की विदाई पार्टी है. कुछ देर पूर्व मोदी जी को सुना. उनके बारे में पाकिस्तानी मीडिया पर भी कुछ बातें सुनीं. उनके आत्मविश्वास और देशप्रेम के जज्बे को सभी सलाम करते हैं, कभी उन्हें कट्टरवादी माना जाता था पर वे ‘सबका साथ-सबका विकास’ चाहते हैं उनका कोई और हेतु नहीं है. वह हृदय से भारत की सेवा करना चाहते हैं, क्योंकि उन्होंने जीवन का मर्म समझ लिया है. हर ज्ञानी अपने जीवन को लोकसंग्रह में लगाना चाहता है क्योंकि इसके सिवा वह कुछ और कर भी तो नहीं सकता. गुलाब खिलेगा तो सुगन्ध फैलाएगा, आत्मा जगेगी तो प्रेम फैलाएगी ! 

उस पुरानी डायरी में समय पर पत्र न आने पर उदासी भरा एक प्रलाप पढ़ा, और किसी कवि की कुछ पंक्तियाँ भी, आज उसे हँसी आ रही है, कितना ड्रामा करता रहा होगा  मन उन दिनों...हर पन्ने पर ऊपर एक सूक्ति छपी थी, उस दिन की सूक्ति थी - निष्क्रियता मनुष्य के लिए अभिशाप है - गाँधी जी. उसने लिखा  

निष्क्रिय तो उसकी कलम हो गयी है 
मन भी तो ! 
कुंद पड़ गयी मन की धार 
संवेदनाएं चूक गयीं हृदय की 
मृत हुए स्वप्न टूट गए मोती 
बिखरे पानी पानी आंसूं 
नियति यही कि मृत्यु बने अब 
जीवन अपना अपना जीवन ! 

हम भला बुरा सब भूल चुके, नतमस्तक हो मुँह मोड़ चले 
अभिशाप उठाकर होठों पर, वरदान दृगों से छोड़ चले 
अब अपना और पराया  क्या ? आबाद रहें रुकने वाले 
हम स्वयं बंधे थे और स्वयं हम अपने बन्धन छोड़ चले