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Thursday, April 24, 2014

सरसों का तेल - कितना असली


आज भी मौसम गर्म है. अभी सुबह के साढ़े आठ ही हुए हैं और चेहरा पसीने से भीग रहा है, पर यह धूप कितनों के लिए राहत का साधन भी तो बनी होगी. जून ने आज सुबह पूसी को याद किया, उसे भी वह कई बार याद आती है. आज ही के दिन एक हफ्ता पहले उनका ड्राइवर उसे छोड़ आया था पर यह उनका सीक्रेट है और उन तीनों ने इसे किसी को भी न बताने का फैसला किया है. एक सखी ने उस दिन पूछा था, कल दूसरी ने पूछा फिर भी वे चुप रहे. इसका अर्थ हुआ वे बात को छुपाने में कामयाब हो ही जायेंगे. धीरे-धीरे उनकी तरह लोगों को भी उसकी याद नहीं आयेगी. जहां भी होगी वह ठीक होगी, ईश्वर सबका मालिक है. उसे भी सहारा देगा ही, यूँ भी वह हफ्ता-हफ्ता भर उनके यहाँ से गायब रही थी, अपना गुजरा स्वयं करती रही होगी, इसी तरह आगे भी कर लेगी. कल गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया, आज फिर जाना होगा जून को, उसने अपने लिए कपड़ा लाने को कहा था, पर समझ नहीं पा रही, उसे कैसा कपड़ा चाहिए, जून को कंफ्यूज्ड कर दिया. जब वे मशीन लेने जायेंगे तब स्वयं ही खरीदेगी. घर जाकर भी कटपीस की दुकान से कुछ और, जो धीरे-धीरे सिले जायेंगे. भविष्य की कल्पनाएँ मोहक हैं, वर्तमान भी शांत व सुखद है. आज मंगल है पर खत लिखने का मंगल अगले हफ्ते होगा. आज BAB का दिन है, रिया का दुःख कब कम होगा ? होगा भी या नहीं ?

कल रात जून के सिर में दर्द था, कल सुबह उन्हें फिर तिनसुकिया जाना पड़ा, धूप बहुत तेज थी और घर के कुछ सामान खरीदने के लिए तेज गर्मी में उन्हें एक घंटा घूमना पड़ा. शाम को काफी थके हुए थे फिर भी उसे बाजार ले गये और नन्हे को कम्प्यूटर क्लास में छोड़ने गये फिर लेने भी. सुबह जब उठे थे तो हल्के बादल थे पर अब फिर धूप उतनी ही तेज हो गयी है. नन्हा सुबह  समय से उठकर स्कूल गया, उसके टेस्ट भी ठीक हो रहे हैं. नूना की तबियत भी ठीक है, सिवाय कुछ दिनों की असुविधा के, यूँ आजकल पहले का सा दर्द नहीं होता, कुछ वर्षों बाद शायद अगले छह-सात वर्षों में उसमें कई परिवर्तन आयेंगे पर उसके लिए अभी से परेशान होने या सोचने की आवश्यकता वह नहीं समझती. समय के साथ-साथ सब कुछ अपने आप बदलेगा जैसे सितम्बर आते ही शेफाली के पेड़ों से खुशबू आने लगती है. पेड़ों को भी बदलते मौसम का अहसास हो जाता है. पूसी की याद आज फिर आई एक बार तो जून को फोन भी किया पर वह मिले नहीं, मन को कठोर कर उसे भूल जाना ही बेहतर है. शामों को जून से होने वाली बहसें, हर समय दरवाजा बंद रखने की फ़िक्र और भी कई छोटी-छोटी बातें !

आज नन्हे का स्कूल बंद था, ‘माधव देव’ की जयंती के उपलक्ष में. शंकर देव के बारे में वह थोड़ा  बहुत जानती है पर ‘माधव देव’ का बस नाम ही सुना है. नाश्ते में ‘दूध-चिवड़ा’ बनाया, खाने में साम्भर, आजकल सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं. आलू-प्याज तो बाजार से गायब ही हो गये हैं. ऐसा लगता है, BJP सरकार इस विषय में कुछ भी नहीं कर रही है. सरसों के तेल में मिलावट के केस बढ़ते ही जा रहे हैं. जून ने आज उनके दफ्तर में होने वाली विश्वकर्मा पूजा के लिए स्वीकृति रूप में पैसे दे दिए पर वे शायद ही जाएँ. सुबह-सुबह एक और ऐसी घटना हुई जिसका उल्लेख करना उचित होगा, उनकी नैनी का बेटा घर में स्वयं को बंद करके तोड़-फोड़ करने लगा, घर के शीशे के गिलास और कप तोड़ दिए उसे पूजा के लिए जींस पैंट चाहिए और उसका टीवी ठीक होना चाहिए यह दो मांगें थीं जिनके कारण उसे डांट पड़ी और उसने इस तरह उसका बदला लिया. उसे वर्षों पहले अपनी चूडियाँ तोड़ना और भाई का ट्रांजिस्टर तोडना याद आ गया, नासमझी में लोग अपना ही नुकसान कर जाते हैं और साथ ही गुस्सा करके अपने शरीर और मन को तो यन्त्रणा दे ही रहे होते हैं. नन्हा आज सुबह से ही व्यस्त है, पढ़ाई, टीवी, कम्प्यूटर और थोड़ी देर व्यायाम, अपने समय को बाँट लिया है उसने. उसके सामने भी अख़बार, पत्रिकाएँ और हारमोनियम हैं.