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Thursday, May 24, 2012

स्वप्न की नदी


कल रात भी रिमझिम पानी बरसता रहा, इतवार की सुबह भीगी-भीगी थी, वे उठकर घूमने गए, मोतिया का एक पौधा दिखा, फूल खिले थे, एक टहनी उससे पूछकर ली, अपने घर के बगीचे में लगाने के लिये. जून सब्जी लाने माँ को लेकर बाजार जाने वाला है, यहाँ का बाजार उनके लिये नया सा होगा कुछ सब्जियां भी नयी होंगी, स्क्वैश, भात करेला आदि वहाँ नहीं मिलते. कल बड़ी बहन का जन्मदिन है, नूना ने सोचा, बहुत दिनों से उनका खत नहीं आया.

कल रात स्वप्न में दौड़ती भागती एक नदी को देखा जो खेतों के बीच से जा रही थी. दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे कगार तथा जिस ओर वह खड़ी थी अपनी पड़ोसिन उड़िया मित्र के साथ, पुराने मकानों के अवशेष थे. फिर देखा कि उनका तबादला हो गया है, सामान की पैकिंग कर रहे हैं वे, ये स्वप्न उन्हें जगाने के लिये ही आते हैं, नींद खुल गयी, उठकर पानी पिया, फिर देर तक नींद नहीं आ रही थी. भीतर की हलचल अब कितनी स्पष्ट महसूस होती है, जिस ओर करवट ले उसी ओर, बस अब एक माह की प्रतीक्षा और है. बाबूजी भी आज वापस जा रहे हैं.
अभी कुछ देर पूर्व भगवद्गीता का तेरहवां अध्याय पढ़ते हुए उसे कल रात्रि को जून के साथ हुई बातें याद आ गयीं, नित्य पढ़ती है पर उसका मन अभी भी दुर्बल है, जून की कितनी अधिक आश्रित है है वह उसके स्नेह की उसके दुलार की. धीरे-धीरे पढ़ते-पढ़ते सबल होगा मन, अवश्य.. एक दिन. वह कल दोपहर जल्दी आ गया, उसे दिगबोई जाना था, फिर देर शाम को लौटा.