Showing posts with label वृक्ष. Show all posts
Showing posts with label वृक्ष. Show all posts

Wednesday, April 7, 2021

वृक्ष और हवा

 

आज से दो वर्ष पूर्व बड़ी भतीजी का ब्याह हुआ था, पर उसने उसे ‘प्रथम वर्षगांठ पर बधाई’ का संदेश लिख दिया। मन अपने आप में नहीं रहता है जब, तब ऐसी गलतियाँ होती हैं। जिस मन में कोई उलझन न हो, लोभ न हो, चाह न हो, वह मन  ही स्थिर रह सकता है। आज सुबह वे बारी-बारी से घूमने गए क्योंकि उठने में देर हुई. नैनी समय पर  आ गयी, कल उसने छुट्टी ली है, विधान सभा का उपचुनाव है, कह  रही थी बीजेपी को वोट देगी। देश आर्थिक संकट से जूझ रहा है, सरकार प्रयास कर रही है पर हालात सुधर नहीं रहे हैं। आजकल समाचार सुनने का ज्यादा समय नहीं मिलता। वे टीवी कम ही खोलते हैं। दोपहर को थोड़ी देर एक फिल्म देखी ‘जोया फैक्टर’ अच्छी लगी। जून ज्यादातर समय मोबाइल पर कुछ देखते हैं। शाम को योग सत्र में टीचर ने हास्य आसन कराया, गरुड़ व वृक्ष आसन भी। एक घंटे के अभ्यास के बाद शरीर काफी हल्का हो जाता  है, और लचीला भी हो रहा है. कभी कभी वे बेल्ट, लकड़ी की ईंट और बड़ी सी गेंद का उपयोग करके कठिन आसन भी करते हैं। आज एक पूर्व परिचिता से बात की, उसने बहुत कोशिश करके अपना तबादला अपने गृह शहर में करवाया है। कह रही थी जिम जाने लगी है, वर्तमान पीढ़ी को योग की बजाय जिम अधिक रास आता है। आज भी छत पर सोलर पैनल लगाने का काम आगे बढ़ा. पूरा होने में लगभग दो महीने लगेंगे। 

जगत से सुख और प्रेम की आशा करना पानी को मथकर मक्खन निकालने जैसा ही है। यहाँ हृदय की बात सुनने का किसी के पास न ही धैर्य है न ही समय। स्वकेंद्रित मानव अपनी इच्छाओं की पूर्ति चाहता है और यदि कोई उसमें बाधक बनता है तो वह उस पर क्रोधित होता है। क्रोध का प्रभाव खुद पर ही होने वाला है वह यह भूल ही जाता है। आज सुबह टहलते समय भीतर कविता फूट रही थी। सारा अस्तित्व जैसे उसके भीतर सिमट आया हो। फेफड़ों के भीतर ताजी हवा वही तो थी जो चारों ओर बह रही थी।  सिर के ऊपर विस्तीर्ण आकाश था, अभी आकाश में चाँद था और तारे भी, भीतर का आकाश उसके साथ एक हो गया था। सुबह का समय कितना पावन होता है, मन भी खाली स्लेट की तरह, जिस पर जो चाहे लिखा जा सकता है। उसका प्रिय द्वादश मंत्र सुबह-सुबह हर श्वास-प्रश्वास में  स्वत: ही चलता है।  छत पर चल रहे काम के कारण काफी शोर था दोपहर को, गुरुनानक की कथा सुनते-सुनते सोयी। एक विचित्र स्वप्न देखा, एक बड़ा सा आदमी छोटा हो जाता है, कीट जितना छोटा। छोटे भाई के विवाह की वर्षगांठ है आज, बधाई दी। ननद से बात हुई, बिटिया के विवाह की बात चल रही है, पर वे लोग शाकाहारी नहीं हैं, और चाहते हैं, विवाह से पूर्व लड़की सब कुछ खाना व बनाना सीख जाए। भांजी ‘हाँ’ कहने से डर रही है। एक ब्लॉगर  की पुस्तक आयी है, उसने जून से कहा है अमेजन से खरीदने के लिए। कई दिनों से दीदी से बात नहीं हुई है, उसने व्हाट्सएप पर संदेश भेजा और  भगवान से दुआ मांगी, एक न एक दिन सब पूर्ववत हो ही जाएगा। 


रात्रि के नौ बजने वाले हैं। सोने से पूर्व का उसका डायरी लेखन का कार्य अब नियमित होता जा रहा है। कुछ देर पहले वे टहल कर आए, रात की रानी के पौधों की खुशबू अभी नासिका में भरी ही हुई थी कि मोड़ पर एक मीठी सी जानी-पहचानी खुशबू आयी, चम्पा की सुवास, और वाकई वहाँ तीन-चार पेड़ थे। चम्पा के फूल अभी ज्यादा नहीं थे, पर एक खिला फूल तोड़ा जो शायद कल  झरने ही वाला था, उसके सामने पड़ा है, श्वेत पंखुड़ियों वाला सुंदर पुष्प ! शाम को मृणाल ज्योति के डायरेक्टर का फोन आया, जो स्कूल की तरक्की की बातें बता रहे थे, अच्छा लगा सुनकर। अगले हफ्ते वे महाराष्ट्र की एक छोटी सी यात्रा के लिए जाने वाले हैं, दोपहर को पैकिंग की. आज सुबह गांव की तरफ टहलने गए थे वे, मन्दिर के पास वाला इमली का पेड़ फलों से भरा हुआ है, पर उन्हें तोड़ना नहीं आता. एलोवेरा का एक स्वस्थ पौधा रास्ते के किनारे पड़ा था, शायद किसी ने गमले से निकाल कर उसी समय वहां रखा था, वे उसे उठाकर लाये और घर के पीछे वाली क्यारी में लगा दिया है. आज छोटे भाई ने बताया शायद वह क्रिसमस पर यहाँ आये. 


उस कालेज की डायरी में एक कविता उसे दिखी, शायद हवा के बारे में किसी अंग्रेजी कविता को पढ़कर लिखी थीं ये पंक्तियाँ -


क्यों चाहे वह मुझ संग होना 

मेरे संग मेरे कमरे में 

उसके लिये संसार उपस्थित 

कितनी गलियां कितने गाँव 

लेकिन वह फिर-फिर आ जाये 

खोल के मेरी खिड़की के पट 

संग ले आये कुछ बौछारें 

मेरा दरवाजा खटकाये

बंद देख एक पल चुप हो 

क्षण बीते न फिर आ जाये 

पट खड़काये

नंगे पैर फर्श है ठंडा 

मैं घबरा कर द्वार खोलती 

वह तेजी से अंदर आये 

इक पल ठहरे फिर मुड़ जाये 

खुश हो जब दीपक बुझ जाये !


‘एक वृक्ष -एक गवाही नाम से’ अगले पन्ने पर लिखा था 


मैं गवाह हूँ 

मैं गवाह…

उस क्षण से लेकर आज तक 

जब प्रथम बार मेरे पत्तों ने आँखें खोली थीं 

और फिर जब मेरी डालियाँ भर गयी थीं फूलों से 

हर वर्ष, वर्षा, तूफान, भीषण शीत को सहते 

मेरे तन पर कुल्हाड़ी की धार सहते क्षण का भी 

परन्तु हर बार बसन्त की प्रतीक्षा में 

मेरे अंदर का साहस मृत नहीं हुआ.. 


Friday, October 2, 2020

वृक्षारोपण

 

रात्रि के नौ बजने को हैं. जून होते तो कहते, अब दिन को विदा करो, लेट्स कॉल इट आ डे. वह पोर्ट ब्लेयर में हैं, रॉस आईलैंड देख लिया, सेलुलर जेल भी. कल कोलकाता आ जायेंगे और परसों घर. शाम को वह पुस्तकालय गयी और दो किताबें लायी, एक मध्यकालीन इतिहास पर और दूसरी जीन(डीएनए) पर. दोनों का कुछ अंश पढ़ा. वापसी में गुलाबी फूलों वाले पेड़ की तस्वीर खींची. जिसके यहाँ चम्पा का पेड़ है उस सखी के यहाँ भी गयी, उसने बताया, यहाँ जो सफाई करने आता है, उसे भूलने की बीमारी है, उसे अपना नाम भी याद नहीं है. चीजें रखकर भूल जाता है, एक ही काम को दोबारा करने लगता है, पर वे लोग उसकी शिकायत करने को तैयार नहीं हैं, करुणावश ही सम्भवतः। सखी ने बताया उसके ससुर जी को भी यही बीमारी थी और पिता को भी है. जीवन में कब क्या होगा, कौन जानता है ? सुबह मृणाल ज्योति के लिए कुछ सामान ख़रीदा और एक शिक्षिका को देने गयी, कई महीनों से जिसका गला खराब चल रहा था, आज कुछ ठीक था. उसकी बिटिया का जन्मदिन आने वाला है, उसकी तैयारी में व्यस्त थी, बेहद ऊर्जावान,  रचनात्मक कार्यों में लगी रहती है. घर लौटी तो नैनी अपने बेटे को डांट रही थी, पता चला उसके बेटे ने गेट पर लगाने वाला ताला गैरेज पाइप में डाल दिया है जिसे निकालने का कोई उपाय नहीं है.


जब वे अपने मन के अंधकार में भटकते हैं तो स्वयं की अनुभूति रूपी प्रकाश की किरण आते ही सारा अंधकार खो जाता है. आज सुबह टहलने गयी तो गुलमोहर, अमलतास और अज़ार के फूलों से लड़े वृक्ष पुनः देखे. हजारों फूल जाने कहाँ से आते हैं अपने मौसम में अपने आप ही, कोई अज्ञात ऊर्जा जैसे उनके रूप में प्रकट हो रही हो. दोपहर को बच्चे आये थे आज, पर्यावरण दिवस पर उन्होंने सुंदर चित्र भी बनाये. अंडमान की सुंदरता को निहार कर जून कोलकाता आ गए हैं. माली ने बगीचे में कई जगह फूलों की पौध लगाई, लॉन में मशीन से घास भी एक समान की. क्लब की वर्तमान प्रेसिडेंट से बात की उसने बताया भूतपूर्व प्रेसिडेंट अभी तक उसे फोन करके क्लब की बातों के बारे में पूछती रहती हैं. उसे लगा जीवन कल्पनाओं के जाल में व्यर्थ ही उलझ रहता है. जब तक उनका मन दर्पण तुल्य हो, वे कोई प्रतिक्रिया न करें , ऐसा मन यदि नहीं है तो वे व्यर्थ ही जगत में फंस जाते हैं. 


जून वापस आ गए हैं, विभाग में उनकी पदोन्नति हो गयी है. सभी की बधाइयाँ और फोन आ रहे हैं. शाम को वह क्लब की दो सदस्याओं के साथ वृक्ष लगाने के लिए उचित स्थान देखने गयी. एक जगह एक ऐसा पार्क मिला जिसे बनाना तो आरम्भ किया गया था पर बीच में ही छोड़ दिया गया. वहीं रहने वाले एक व्यक्ति ने बताया, ठेकेदार बीच में ही भाग गया था.  विश्व पर्यावरण दिवस पर क्लब की तरफ से वृक्षारोपण कार्यक्रम के अंतर्गत कल सुबह नौ बजे जाकर गड्ढे खुदवाने हैं और शाम को पेड़ लगाने हैं. दोपहर को मृणाल ज्योति के काम से एक बैंक जाना था, गर्मी बहुत थी और लोगों की भीड़ लगी थी. सुबह एक अनोखा अनुभव हुआ, एक कविता लिखी उसी भाव दशा में ! 


पर्यावरण दिवस पर सुबह से शाम तक वह व्यस्त रही. तीन माली लगाकर पार्क का गेट व सामने का थोड़ा सा भाग उन्होंने साफ करवाया. दस-पन्द्रह गड्ढे खुदवाये. जब तक यह काम चलता रहा क्लब की एक सदस्या के साथ विभिन्न विषयों पर सार्थक वार्तालाप हुआ वह समाज के लिए कुछ करना चाहती है. शाम को उसमें  फूलों और शरीफे के वृक्षों की पौध लगाई. पार्क के अंदर बोगेन्विलिया के  कुछ पौधे भी लगाए. उसके पूर्व वे बच्चों के स्कूल में भी वृक्षारोपण कर के आये थे, पीले व नारंगी रंग के गुड़हल के पौधे वहां लगाए. कुछ वर्षों में जब ये पौधे वृक्ष बन जायेंगे तो वातावरण को प्रफ्फुलित करेंगे. शाम को घर लौटी तो योग कक्षा चल रही थी, अब साधिकाएं इतनी सक्षम हो गयी हैं कि अपने आप ही सभी अभ्यास कर लेती हैं. जून ने रात के भोजन की तैयारी भी कर दी थी. 


वर्षों पूर्व डायरी में उस दिन के पन्ने पर ऊपर लिखी सूक्ति कन्फ्यूशियस की थी - ‘चिंतन के बिना अध्ययन मेहनत खोना है’. उसे लगा इसका अर्थ हुआ अब तक का उसका जो भी अध्ययन है वह व्यर्थ है, अर्थात उसका कालेज का अध्ययन यानि गणित, क्योंकि वह केवल परीक्षा देने के लिए पढ़ती है। उसके बाद कोई उपयोग उसके सम्मुख नहीं रह जाता कि उसका चिंतन भी करे. कैसा विरोधाभास है, यही विरोधाभास तो हर पल उसके जीवन में दिखाई पड़ता है और अब तो उसे इससे स्नेह भी हो गया है. यह भी एक तरह का विरोधाभास ही हुआ. एक पत्र पाकर उसे लगा जैसे कोई भार उतर गया हो. उसका खोया चैन उसे वापस मिल गया. जैसे अस्तित्त्व उसे एक नए रूप में मिला हो, पहले से ज्यादा प्रसन्न, ज्यादा उत्साह से भरा और उसके प्रति अनूठी भावनाएं लिए ! वह जो निष्क्रिय हो गयी थी फिर भर गयी हो प्राण से, स्पंदन से, जीवन से ! उसकी चिर ऋणी वह उसे ही चाहती है. उस अनन्त आभामय सुबह के स्वर्णिम काल का अभिनन्दन करते हुए  उसने कृतज्ञता पूर्वक प्रणाम किया.   


Wednesday, August 12, 2020

जामुन का वृक्ष



शाम के सवा चार बजे हैं. आज दोपहर उन्हें आगामी बंगलूरू यात्रा के लिए पैकिंग करनी थी पर नन्हे का फोन आया, अभी घर तैयार होने में दो हफ्ते लगेंगे. उसने कहा, फ़िलहाल वे अपनी यात्रा स्थगित करके आगे की टिकट ले लें. जून ने कॉल सेंटर में बात की, आधे पैसे कट जायेंगे जो हजारों में हैं, वे सोच रहे हैं कि जैसा कार्यक्रम है, वैसा ही रहने देते हैं. कुछ समय बैंगलोर आश्रम में बिताएंगे, गुरूजी भी वहीं हैं, सो भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय पर उनका प्रवचन भी सुन लेंगे और उनके जन्मदिन के उत्सव में भी भाग ले सकेंगे. आज सुबह गुलाबी पुष्पों के वृक्षों की तस्वीरें पुनः उतारीं। इस समय बाहर से कोकिल के कूकने की आवाज आ रही है. योग कक्षा में एक साधिका ने कहा, कल सुबह वह अपनी कालेज में पढ़ रही बेटी को लेकर आसन सीखने आएगी. अब उनका यहाँ से जाने का वक्त आ रहा है तो सीखने के लिए सभी के मन में योग के प्रति रूचि बढ़ रही है. दोपहर को बगीचे से तोड़े कटहल की सब्जी बनाई, अब जामुन के वृक्ष में भी फूल आ गए हैं, पूरा वृक्ष बौर से भर गया है. नैनी आज दाल के बने मीठे तले हुए पीठे लायी, उसका प्रेम ही है इसके पीछे, पर उन्होंने अब तले हुए पदार्थ खाना छोड़ दिया है. उन दोनों का वजन कुछ घटा है. 



जून ने अगले माह आश्रम में होने वाले कार्यक्रम में रजिस्ट्रेशन करा लिया है. हो सकता है उसे गुरूजी के जन्मदिन पर कविता पढ़ने का अवसर भी मिले. सुबह क्लब की एक सदस्य से मिलने गयी, बहुत भावुक है और संवेदनशील भी. दो बड़ी सर्जरी करा चुकी है. अच्छा लगा उसकी बातें सुनकर. कल तीसरे चरण का चुनाव है, अगले महीने आज के दिन तक सारे चरण पूरे हो चुके होंगे. राहुल गाँधी ने मोदी जी के खिलाफ जो अभद्र टिप्पणी की थी, उसके लिए खेद प्रकट किया है , उधर साध्वी प्रज्ञा ने भी एक अभद्र बयान दिया है. राजनीति में एक-दूसरे पर दोषारोपण चलता ही रहता है. कल श्रीलंका में सीरियल ब्लास्ट हुए जिसमें चर्च में ईस्टर प्रार्थना करने आये लोगों में दो सौ नब्बे  व्यक्ति मारे गए व पांच सौ घायल हो गए. धर्म के नाम पर हिंसा करने वाले आखिर कब समझेंगे कि दुनिया का कोई भी धर्म हिंसा करना नहीं सिखाता, पता नहीं धर्म के नाम पर अधर्म कब तक किया जाता रहेगा. 


आज सुबह गुरूजी का लन्दन में दिया एक प्रवचन सुना. कितने सुंदर व सरल शब्दों में उन्होंने पूरा बेसिक कोर्स ही जैसे करवा दिया. ऊर्जा के चार स्रोत, जीवन की सात परतें, ज्ञान की पाँच कुंजियाँ सभी कुछ ! आज दोपहर अक्षय कुमार द्वारा लिया गया प्रधानमंत्री का इंटरव्यू सुना, सबसे अचरज भरी बात लगी जब उन्होंने कहा कि ममता दीदी उन्हें साल में एक-दो कुर्ते भेजती हैं और मिठाई भी. राजनीतिज्ञ जब प्रचार करते हैं तो एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन लगते हैं. 


शाम के साढ़े सात बजे हैं. काशी की सड़कों पर प्रधानमंत्री की चुनावी यात्रा चल रही है. कुछ देर में ही वह दशाश्वमेधघाट पर पहुँच जायेंगे. वाराणसी की जनता उनके स्वागत में सड़कों पर उमड़ आयी है. आज सुबह गुरूजी से नारद भक्ति सूत्र सुना. सुबह-सवेरे गुरूजी के पावन वचन हृदय को सुंदर विचारों से भर देते हैं. दोपहर को घी बनाया, जून ने शाम को दफ्तर से आकर लड्डू बनवाये जो वे नन्हे व सोनू  के लिए ले जाने वाले हैं. कल रात स्वयं को विचार करते देखा, नींद में भी मन किस तरह उधेड़बुन में लगा रहता है, उसे देखकर आश्चर्य होता है, पता नहीं क्या चाहता है ? कोड़ी जी घाट पर पहुँच चुके हैं और आरती के साथ ताली बजाकर आनंद ले रहे हैं. 


और अब उन अतीत के पन्नों से - जितना खाओ उससे दुगना पानी पियो. जितना  पानी पियो उससे दुगना हँसो, जितना हँसो उससे दुगना टहलो. यही स्वास्थ्य का राज है. 

शायद उस दिन कुछ हुआ होगा, तभी लिखा- 


खिला चहकता घर ही भाये  

चुपचुप सा मन को चुभता है 

क्यों यह चुप्पी लगा गया है 

क्यों यह कुछ नहीं कहता है 

रहने वाले सब रहते हैं 

पर होंठ सभी के सिले हुए 

कोई बोले ना ही  चाले 

दिल क्यों नहीं हैं मिले हुए 

घर गूँजे खुशियों से गर तो 

तब ही तो घर कहलाता है 

सूना घर यह बे आवाजें 

यह कहाँ घर कहलाता है 

साथी आओ दीप जला दें 

बोल प्रेम के हम बिखरा दें 

चहक उठे यह घर दोबारा 

जैसे कोई बगिया चहके

मिल जाएँ सबके मन ऐसे 

फूलों में हो खुशबू जैसे  

 


Wednesday, June 14, 2017

झील में कमल


कर्तापन का दंश लगा है जीव को, साक्षी इसका इलाज है. वास्तव में आत्मा न करता है न भोक्ता. स्वयं का पता नहीं है सो कभी देह, कभी मन के साथ स्वयं को जोड़कर देखता है, वही मान लेता है खुद को और उनके द्वारा किये कर्मों को स्वयं द्वारा किया मानेगा ही. वे तो प्रारब्ध वश अथवा तो संस्कारों वश अपना काम करते हैं और आत्मा यदि अपने-आप में रहे तो मन, बुद्धि में कभी कुछ इधर-उधर हुआ भी तो वह स्वयं को उसका कर्ता नहीं मानेगा. आज बहुत दिनों के बाद सद्गुरू की वाणी सुनी, जैसे तन को रोज विश्राम और भोजन की आवश्यकता होती है, वैसे ही मन को भी नियमित विश्राम व भोजन चाहिए. मन का भोजन है सत्संग और मन का विश्राम है ध्यान, सो आज से पुनः ध्यान, योग और सत्संग आरम्भ किया है. जीवन को यदि सुंदर बनाना है तो ये सभी आवश्यक हैं. ‘पाठ’ भी नियमित करना होगा. पुरानी दिनचर्या को अपनाना होगा, जिसमें विविध रंग हैं.

बहुत दिनों पूर्व यह इच्छा मन में जगी थी कि बड़े घर के बगीचे में पेड़ के तने से सटकर बैठेगी और कुछ लिखेगी. आज जामुन के पेड़ के नीचे है.

मन की झील में आत्मा का कमल खिलाना है
संस्कारों की मिट्टी है जहाँ
वहीं से रंगो-खुशबू को बाहर लाना है
क्योंकि छिपा है एक स्रोत शुद्ध जल का
मिट्टी की गहराई में
माना चट्टानें भी होंगी मध्य में
कठिन होगी यात्रा
पर जीवन को यदि सचमुच पाना है
तो.. मन की झील में आत्मा का कमल खिलाना है


धूप तेज लग रही है सो लगता है छायादार वृक्ष खोजना होगा. यह सफेद फूलों वाला वृक्ष छाया में है पर यहाँ आस-पास एक अजीब सी गंध है. शायद बाहर से आ रही है या इस वृक्ष की ही गंध है. बिन पत्तों की इसकी शाखाएं कैसी कलाकृति का निर्माण कर रही हैं, एक डाली पर तीन फूल खिले हैं, जिनमें मध्य भाग पीत है. आज उन्हें तिनसुकिया भी जाना है, जीवन वैसे ही चलता रहता है, बाहर कुछ भी नहीं बदलता पर भीतर सब कुछ बदल जाता है. अब भीतर कोई ज्वर नहीं है, सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है. कब विकार जगा, कब कामना उठी, कब मन भूतकल में गया, कब भविष्य की कल्पना में. आत्मा शुद्ध चेतन है, जो प्रकाशक है, जो जानता है, जो देखता है. जब मन शांत होता है तब केवल शुद्ध चेतन ही शेष रहता है. उसे अब पढ़ते व लिखते समय चश्मा लगाना पड़ता है, आँखों की रोशनी कम हो रही है, उम्र बढने के साथ देह में ये परिवर्तन स्वाभाविक हैं. धरती पर बैठकर लिखना अच्छा लग रहा है, पर उसे फोन अपने साथ रखने चाहिए, शायद फोन की घंटी बज रही है. नैनी लैंड लाइन तो उठा सकती है पर मोबाइल उसे रिसीव करना नहीं आता. अब अंदर जाना चाहिये, उसने सोचा.

आज मृणाल ज्योति जाना हुआ, दो अन्य महिलाएं भी थीं. विश्व विकंलाग दिवस के लिए निमन्त्रण पत्र भी मिले, जो सभी के यहाँ भिजवाने हैं. आज दोपहर के भोजन में सलाद, सूप व फल लिए, काफी हल्का लग रहा है. शाम को वे जल्दी ही रात्रि भोजन करेंगे और बाद में टहलने जायेंगे. अभी कुछ देर पूर्व बच्चे पढ़कर गये हैं. उस दिन नैनी के ससुर की हालत पर तरस खाकर जो भाव मन में उठा था, वह सत्य होता नजर आ रहा है. कुदरत किस तरह उनकी हर बात सुनती है. मन का छोटे सा छोटा विचार भी उसकी नजर से बच नहीं सकता. परमात्मा की महिमा का जितना बखान करे, कम है. जो जीवन अपना ही अहित कर रहा हो, जिसके आगे बढने की कोई गुंजाईश ही नजर न आती हो, उसे बदलना होगा, ताकि एक नया कोरा जीवन पुनः आरम्भ हो. सम्भव है नये परिवेश में वह नये ढंग से जीये. एक मशीन की तरह जिए चले जाना अपने व औरों के दुःख का कारण बनना कहाँ तक उचित है ? ईश्वर ही उसका मार्गदर्शक है, वही प्रेरणा देता है, उसके सिवा और कुछ नहीं. यह देह जब तक रहे, स्वस्थ रहे, मन सजग रहे, बुद्धि भी जगी रहे ताकि न अपने लिए न औरों के लिए दुःख का कारण बने. अनंत सुख की राशि परमात्मा चरों और बिखरा हुआ है, उससे जुड़कर ही मानव के भीतर पड़ा वह बीज खिल सकता है, जिसे आत्मा कहते हैं.   



Tuesday, September 13, 2016

दर्पण में प्रतिबिम्ब


पिछले पांच दिनों से डायरी नहीं खोली. आजकल कितनी ही पंक्तियाँ सहज ही मन में आती हैं पर उस वक्त लिखने की सुविधा नहीं होती, बाद में भूल जाती हैं..पर उस क्षण तो वह स्वान्तः सुखाय कुछ रच ही लेती है ! परसों कुछ पंक्तियाँ मन में आ रही थीं-

जीवन एक मौका है
बीज से वृक्ष बनने का
बूंद से सागर और कली से पुष्प
होने का..
मिटना होगा बीज को इस प्रयास में
खोना ही होगा अपना आप बूंद और कली को भी
चूक जाते हैं हम इसी मोड़ पर
‘हमीं’ बनकर पाना चाहते हैं
आकाश की ऊँचाइया
बने रहकर पूर्ववत्
पा सकेंगे क्योंकर
वृक्ष सी विशालता, गहराई सागर सी
सौन्दर्य फूल का..स्वयं बने रहकर
छोड़ दें ‘हम’ होने का लोभ
हो जाएँ रिक्त अपने आप से
तो भीतर जो अनछुआ बीज है
वह पनपेगा..
बूंद बह चलेगी सरिता बनकर 
सागर की तलाश में
और सुप्त कलिका स्वप्न देखेगी प्रस्फुटन का..

पिछले तीन दिन फिर यूँ ही निकल गये और डायरी नहीं खोली. अभी दीदी का ब्लॉग देखा, उनका ब्लॉग पहली बार इतने लोगों ने पढ़ा, जीजाजी भी प्रसन्न होंगे, दीदी इतना अच्छा लिख रही हैं. पंजाबी दीदी का भी जवाब आया है, वह सदा ही तारीफ करती हैं उसकी कविता की. जून आज फिर पिताजी को अस्पताल ले गये, कुछ दिनों से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उन्हें कुछ दिन दवा लेनी होगी. माँ का हाल वही है, उन्हें आजकल दिन में लेटना जरा नहीं भाता, बैठे-बैठे थक जाती होंगी पर कहने पर भी लेटना नहीं चाहतीं. आज उनके पड़ोसी जो ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के टीचर भी हैं, मृणाल ज्योति गये हैं, वह अध्यापिकाओं को ध्यान, प्राणायाम आदि के बारे में कुछ बतायेंगे. सद्गुरु भी यही चाहते हैं. आज सुबह ध्यान में उनकी आवाज सुनी, जो उसकी स्मृति में सुरक्षित है, अर्थात यह मन का ही खेल है. लेकिन प्रकाश के वे स्तम्भ तो मन का खेल नहीं हो सकते, उनकी उपस्थिति को वह बिलकुल स्पष्ट अनुभव करती रही है. परमात्मा और गुरू में कोई भेद नहीं है, वह सर्वव्यापी चेतना एक ही है, वह सदा उनके साथ है. इस अनुभव के बाद अब लौटना नहीं होगा. कल शाम को कुछ पलों के लिए मन विचलित हुआ पर वह ऊर्जा का अपव्यय ही था जैसे दर्पण में कोई प्रतिबिम्ब ठहरता नहीं है वैसे ही आत्मा में कोई भाव टिकता नहीं है. वह जैसे पहले थी वैसे ही हो जाती है, केवल मन स्वयं को उसमें देख लेता है. मन ने देखा कि उसे निंदा नहीं भाती, स्तुति भाती है. उन्हें दोनों के पार जाना होगा, एक चाहिए तो दूसरा मिलेगा ही. उनका फोन खराब हो गया है, एक तरह से तो शांति है पर साथ ही अशांति भी है क्योंकि वे भी फोन नहीं कर पा रहे हैं, यहाँ सब कुछ जोड़े में मिलता है, मन का नाम ही द्वंद्व है. शुद्ध, निर्विकार, अचिन्त्य आत्मा सदा एकरस, आनंद से पूर्ण है, शक्तिसंपन्नदृष्टि आता है  दीदी को अवश्य उसकी बात समझ में आई होगी. कल नन्हे से बात नहीं हुई, वह व्यस्त है आजकल.



Saturday, June 25, 2016

वृक्ष की जड़


‘जब तक वे अपने भीतर ईश्वरीय प्रेम का अनुभव नहीं कर लेते तब तक जगत से प्रेम नहीं कर पाते, तब तक जगत से किया उनका प्रेम उन्हें दुःख ही दे जाता है क्योंकि उस प्रेम में बंधन है, पर जब एक बार उन्हें अपने भीतर प्रेम का अनुभव हो जाता है बाहर सहज ही वह मुक्त भाव से बिखरने लगता है, जैसे कोई फूल अपनी खुशबू बिखेर रहा हो या तो कोई भंवरा अपना संगीत अथवा तो कोई झरना अपनी शीतलता भरी फुहार ! वे तब स्वयं मुक्त होते हैं और किसी को बाँधना भी नहीं चाहते. तब जगत उनका प्रतिद्वन्द्वी नहीं रह जाता बल्कि उनका अपना अंश हो जाता है, वे इतने विशाल हो जाते हैं कि सारे लोग उनके अपने हो जाते हैं !’ कितने उच्च भाव हैं ये पर कितने सूक्ष्म भी, हाथ से फिसल-फिसल जाते हैं. इतने वायवीय हैं ये भाव, संसार की कठोरता से टकराकर ये कभी-कभी चूर-चूर हो जाते हैं. मन की इच्छा का, आत्मा के ज्ञान का और शरीर के कर्मों का जब मेल नहीं बैठता तो ये भाव भीतर एक कसक भी उत्पन्न कर देते हैं. उस कसक के प्रभाव में यदि वे अक्रिय होकर बैठ गये तब तो बनती हुई बात भी बिगड़ जाती है, नहीं तो सीखा हुआ ज्ञान व्यर्थ प्रतीत होने लगता है. मानव हर समय तो समाधि का अनुभव नहीं कर सकता, नीचे उतरना होता है और जीवन क्षेत्र में काम करना होता है. जो भावना के स्तर पर कितना सत्य प्रतीत होता था वह क्रिया के स्तर पर दूर जा छिटकता है. कबीर की सहज समाधि तब स्मरण हो आती है, जो कहती है जब जैसा तब तैसा रे...अर्थात जिस क्षण मन जिस भाव अवस्था में हो उसे प्रभु प्रसाद मानना चाहिए. तब यह कामना भी शेष नहीं रहती कि जो उन्होंने सोचा है वैसा ही घटे, जो तित भावे सो भली !  बस अपना दिल पाक रहे इसकी फ़िक्र करनी है, शेष भगवद इच्छा !  

नाम का सुमिरन यदि ऊपर के केंद्र में चलता रहे तो शरीर में लघुता बनी रहती है. पिछले कुछ हफ्तों से नियमित ध्यान नहीं हुआ. मौसम भी बेहद ठंडा है. शरीर पूर्णतया स्वस्थ नहीं है. मन पर भी इसका असर पड़ता है. मन इस समय सद्गुरू की वाणी सुनने के बाद शांत है, उत्साह से भरा है और परम के प्रति प्रेम का अनुभव हो रहा है ! नन्हा कल डिब्रूगढ़ चला गया, आज बैंगलोर जायेगा, उस दिन उसने कितना सही कहा कि बदले की भावना ही गलत है, यह भाव ही अपने आप में गलत है. इतना ज्ञान जो पुस्तकों में पढ़ा है, दीवार पर लिख कर टांगा है, व्यर्थ है, यदि वे अपने भीतर के नकारात्मक भावों को निकाल नहीं सकते. क्रोध, उपेक्षा, प्रतिशोध, ईर्ष्या ये सारे भाव भीतर हैं, जो कुछ देर के लिए विचलित कर जाते हैं. क्रोध अहंकार का परिणाम है. नन्हे को देखकर संतोष होता है कि वह उस ज्ञान को जी रहा है, जिसे वह केवल धारण करती है. सहज प्रेम व सेवा का भाव भी उसके भीतर है. तन पर प्रकट होने वाला रोग मन के रोग का परिणाम है, जैसे वृक्ष की जड़ धरती के भीतर है वैसे ही मनुष्य की जड़ उसके मन में है ! मन के विचार, भाव, कल्पनाएँ, सोच, चिन्तन, मनन जैसे होंगे, वैसा ही जीवन उनका होगा ! मन से परे है आत्मा, मन यदि शरीर के पीछे चलेगा  तो वह संसारी है और यदि आत्मा के पीछे चले तो सन्यासी है. जो सीढ़ियाँ ऊपर ले जाती हैं, वही नीचे भी लाती हैं. 

Saturday, April 5, 2014

गोद्ज़िला का सीडी


आज वर्षा नहीं हो रही है, वातावरण में उमस सी है. सुबह साढ़े चार बजे वे उठे, उसने पढ़ाया, जून बाहर से अमरूद तोड़ कर लाये, पता नहीं किसने लगाया होगा यह वृक्ष जिसके मीठे फल वे खा रहे हैं. वर्षों बाद उनका लगाये नींबू, संतरे व आड़ू के पेड़ भी किसी और को फल देंगे. ध्यान के लिए आजकल सुबह समय निकालना मुश्किल होता है, सो मन किसी न किसी बात पर पल भर के लिए ही सही झुंझला जाता है, स्वयं को समझाना कितना मुश्किल है !

कल सुबह एक मित्र परिवार आया था, उन्हें घर जाना था, जाने से पूर्व नाश्ता यहीं करवाया तथा साथ ले जाने के लिए कुछ बनाकर भी उसने दिया. दोपहर को KSKT देखी, अंत बहुत दर्दनाक है, लेकिन दोनों के परिवार वालों को यही सजा मिलनी चाहिए थी. उसके एक दांत में अमरूद का बीज फंस जाने से दर्द हो रहा था, आज एक्सरे कराने जाना है. पर उसे लगता है, एक दांत निकलवाने के बाद भी यह दर्द पूरी तरह से चला जायेगा ऐसा नहीं है, इसलिए उसे सही देखभाल और सफाई के द्वारा ही दांतों को ठीक रखना चाहिए. कल शाम वे क्लब गये, रेफरेंस बुक्स की प्रदर्शनी लगी थी, इतनी मोटी-मोटी किताबें और दाम सैकड़ों, हजारों में..वे सिर्फ देखकर आ गये. वैसे भी कम्प्यूटर आ जाने के बाद वैसी किताबों की आवश्यकता नहीं रह जाती. नन्हा कल शाम बेहद चुप-चुप था, बाद में गोद्ज़िला का CD देखते देखते ही सामान्य हो गया, उसका उदास चेहरा नूना से देखा नहीं जाता. शायद ऐसा ही जून को उन दिनों लगता होगा जब विवाह के बाद शुरू-शुरू में घर की याद आने से वह  चुप हो जाती थी और उन्हें उसकी चुप्पी नागवार गुजरती थी. जो प्रेम करते हैं वे प्रियपात्र की उदासी को सहन नहीं कर सकते. जून को इस माह के अंत तक एक पेपर लिखकर भेजना है. व्यस्तता उन्हें प्रसन्न रखती है.

उसे आश्चर्य हुआ कि तिथियों के मामले में इतनी लापरवाह कैसे हो गयी, उसने जून से कहा परसों पन्द्रह अगस्त है सो आज ही उन्हें मित्रों को उस दिन लंच के लिए निमंत्रित कर देना चाहिए. डायरी खोली तो पता चला अभी चार दिन हैं पन्द्रह अगस्त आने में. नन्हा अपना प्रिय कार्यक्रम ‘डिजनी आवर’ देख रहा है. उसने कुछ देर पूर्व लाला हरदयाल की पुस्तक में पढ़ा, धर्म के नाम पर हजारों लोग मारे गये, धर्म ने लाभ के बजाय हानि ही पहुंचाई है. मानव रहस्य दर्शी है, और भगवान से बड़ा रहस्य कौन है, इसलिए तो इतने सारे धर्मों का उदय हुआ. वह खुद भी तो प्रकृति की इस अनुपम सुन्दरता को देखकर इस विशाल ब्रह्मांड को बनाने वाले के प्रति श्रद्धा से भर जाती है. उसका भगवान इस संसार का नहीं है, वह तो ऊर्जा का अंतिम स्रोत है जिससे यह सब हुआ है.


आज उसकी छात्रा ने कहा, अब वह नहीं आयेगी, पिछले दो वर्षों से हिंदी पढ़ाने का क्रम अब टूट जायेगा. उसे वाकई अच्छा लगा, हिंदी व्याकरण का ज्ञान इसी कारण उसे भी हुआ. उसके मन में एक स्वप्न है हफ्ते में दो दिन ही सही छोटी-छोटी लडकियों को पढ़ाये, यह कार्य उसके मन का होगा और इससे समय के सदुपयोग के साथ आत्म संतोष भी मिलेगा. अगले हफ्ते से नन्हे का स्कूल भी खुल रहा है. उसे कम्प्यूटर कोर्स करने का भी मन है. काम करना और अर्थपूर्ण काम करना उसकी जरूरत है सही मायनों में जीवन कार्य का ही दूसरा नाम है.

Saturday, June 18, 2011

पहली होली


रात्रिभोज का आयोजन किया था उन्होंने, अच्छा रहा, कुछ नए लोगों से परिचय हुआ. कल वे गोल्फ फील्ड में एक छोटी सी पहाड़ी पर बैठे रहे, अँधेरा था, बायीं ओर बड़े-बड़े वृक्ष अर्धवृत्त बना रहे थे, स्पष्ट दिखाई दे रहे थे, ठंडी हवा बह रही थी, महीनों बाद नूना इस तरह के वातावरण में फिर से थी, अपने शहर में कल्पना में उसके साथ होती थी, पर कल वह सचमुच साथ था.
वही कल का समय है, वह ऑफिस में है, कल दोपहर को जब वह घर आया तो कितनी देर  दरवाजा खटखटाता रहा, पर नूना की नींद नहीं खुली, याद नहीं पड़ता पहले कभी ऐसा हुआ हो, इतनी गहरी नींद आयी हो कभी. उसने एक बार रसगुल्ले का नाम लिया तो ढेर सारे ले आया. वे क्लब से वापस आ रहे थे तो उसने मजाक में एक बात कही जो नूना को नागवार गुजरी, सुलह तो रास्ते में ही हो गयी पर घर आकर उसने उसके लिये चाकलेट ड्रिंक बनाया नूना ने चिवरा-मूंगफली तला, भीतर तक भरे-भरे वे दूर-दूर तक घूमने गए.

आज नूना को यहाँ आये पूरा एक महीना हो गया है. कितनी ठंड है आज, धूप भली लग रही है. कल उसने एक साड़ी को फाल लगाई, आज देखा तो पता चला सीधी ओर लगा दी है, फिर से खोल कर लगाई. उन दोनों को एक नामालूम सा डर लग रहा है, कल शाम को शायद उसी कारण से उसे कुछ बेचनी सी भी हो रही थी. रविवार होने के बावजूद आज वह घर पर अकेली थी, उसे ओसीएस जाना पड़ा है, यानि आयल कलेक्टिंग स्टेशन नूना को भी तेल उद्योग के बारे में काफी जानकारी हो गयी है, एक्सप्लोरेशन, ड्रिलिंग, प्रोडक्शन तथा ट्रांसपोटेशन सभी के बारे में उसने बताया, उसे एक परीक्षा भी देनी है लेकिन विशेष पढ़ाई नहीं कर पाया है.

अभी कुछ देर पूर्व वह आया, नूना स्नानघर में थी. कपड़े भी धोने थे, इतवार को धोने लगी तो उसने कहा यह सब काम तुम किसी और दिन भी तो कर सकती हो,  वे हर पल साथ होना चाहते हैं. कल शाम वे स्टेशन पर घूमने गए, छोटा सा स्टेशन, वे चलते ही चले गए, आकाश में रुई के फाहों की तरह बादल थे, चाँद आधा था, और शाम के धुंधलके में वृक्ष मनमोहक लग रहे थे, सुपारी के लम्बे-लम्बे वृक्ष यहाँ बहुतायत से मिलते हैं जो एक अलग ही माहौल बना देते हैं.
मार्च महीने का प्रथम दिन.. वसंत का महीना यानि फाल्गुन का महीना... नहीं.. होली का महीना !
उसके साथ पहली होली... वह अभी कुछ देर पूर्व आया था, शायद ही कोई दिन ऐसा होता हो जब वह एक बार बीच में न आता हो फील्ड जाते या आते समय. कल रात वे कितनी देर पुरानी कॉलेज की बातों में खोये रहे, उन दिनों की यादें कितनी मधुर हैं. उसने अपने कुर्ते का बटन का एक बटन टांकने को कई दिन पहले कहा था, नूना को याद ही नहीं रहा, पर उसने सोचा कि यह इतना आवश्यक कार्य है सो अभी करूंगी. उसके पास रुमाल होते हुए भी चेहरा हाथ से पोंछता है, उसे खुद समझना होगा यह अच्छी आदत नहीं है.. कभी यह बात वे दोनों तीसरे से कह रहे होंगे.

मार्च १९८५
दो-तीन वर्ष पूर्व जब नूना उत्तर प्रदेश में थी, वह उससे मिलने आया था और उसे करेले की सब्जी और मूँग की दाल खिलाई थी, आज उसी दिन को याद करते हुए वैसा ही खाना बनाया है. कल उसने पूछा  कि आज सुबह कोई विशेष कार्य तो नहीं है, क्योंकि उसे कुछ अपना काम करवाना है, जैसे उसके काम नूना के कार्यों से अलग हैं, पर इससे यह भी तो पता चलता है कि उसे मेरे कार्यों का कितना ख्याल है, उसने सोचा. कल वे टेबिल टेनिस नहीं खेल पाए क्योंकि क्लब में टीटी बाल नहीं थी. क्लब में ‘नदिया के पार’ वाली साधना सिंह की फिल्म थोड़ी देर देखी ‘ससुराल’, पर इसमें वह उतनी अच्छी नहीं लगी. घर से पत्र आये हैं हमें भी होली से पहले सभी को खत लिखने हैं.

कल का वह ना मालूम सा डर अभी तक दोनों के मन में है. आज सुबह बहुत जल्दी नींद खुल गयी और वे घूमने गए. कल शाम वे उसके बॉस के यहाँ गए थे जो कन्नड़ हैं, पहली बार गाजर का हलुआ बनाया जो उसके अनुसार अच्छा बना है, छोटे भाई का खत आया है उसकी नौकरी शुरू हो गयी है.  आज जीप में ओसीएस गए, उसका इम्तहान ज्यादा अच्छा नहीं हुआ, नूना ने सोचा कि अब मैं ध्यान रखूंगी, अध्ययन भी उतना ही जरूरी है जितना भोजन, यह भी तो मानसिक भोजन है.

कल वह नहीं लिख सकी. सुबह उठी तो स्वस्थ थी, उसके जाने के बाद उत्साहपूर्वक आसन किये, ‘स्वर संगम’ प्रभात देखते हुए ऐसा करना उसे बहुत भाता है, फिर कपड़े धोने के लिये सर्फ घोल रही थी कि  मालूम हुआ वह डर मिथ्या था, खुशी तो थी ही पर खाना बनाते समय घबराहट बढ़ने लगी और खड़ा होना मुश्किल हो गया, फिर उसके आने तक सिवा दर्द, बेचैनी के कुछ भी महसूस नहीं कर पा रही थी. कमजोरी पता नहीं कहाँ से एकाएक आ गयी थी. फिर उसकी हिदायतें याद आने लगीं वह कितनी बार कहता है कि कुछ खा लेना, चाय, काफ़ी या बिस्कुट ही सही. आने के बाद उसने बहुत अच्छी तरह देखभाल की, कभी हार्लिक्स वाला दूध, कभी बोर्नविटा वाला, फिर अंगूर और नारंगी ले आया, रात को इतना मना करने पर भी बासी रोटियाँ ही खा लीं, उसके लिये कार्नफ्लेक्स बनाया. तभी तो एक ही दिन में नूना पहले जैसी हो गयी है.



कल वह अस्पताल गयी, डॉक्टर ने देखते ही कहा I shall admit you पहले तो कुछ समझ ही नहीं पायी, दुबारा पूछा और पूरे २३ घंटे वहाँ रहने के बाद आज घर आयी है. अभी एक हफ्ता और आराम करने को कहा है डॉक्टर ने. वह चार-पांच बार मिलने आया, वह इतना ख्याल रखता है कि नूना को बरबस ही उसके प्यार पर प्यार आ जाता है. वह एक मित्र भी है और सरंक्षक भी. अभी समाचारों में सुना कि देश भर में होली का उत्सव मनाया जा रहा है, पर यहाँ तो होली की छुट्टी कल है, उसने क्या-क्या सोचा था इस दिन के बारे में, क्या वह सब पूरा होगा? वह साथ है तो अवश्य होगा, वे एक-दूसरे को रंगों से सराबोर कर देंगे.
आज होली है, या कहना चहिये कि होली थी क्योंकि इस वक्त रात के दस बजे हैं, सुबह वे बहुत जल्दी उठ गए थे. मौसम अच्छा था पर डॉक्टर ने घर से बाहर जाने को मना किया है, सात दिनों के लिये बेड रेस्ट, सो घूमने या लॉन में ही टहलने का सवाल ही नहीं था, फिर चाय पीकर उन्होंने गुझिया बनायी, अच्छा लग रहा था उसे गुझिया भरते हुए देखना, वह इतना मन लगा कर हर काम करता है कि उसके साथ काम करना बहुत आसान हो जाता है, फिर नाश्ता करके नूना आराम करने थोड़ी देर   लेट गयी और उसे सोता देख कर उसने ढेर सा रंग लगा दिया, फिर तो उनकी होली शुरू हो गयी, हमेशा याद रहेगी यह पहली होली. उसके साथी आये थे क्लब ले जाने के लिये पर वह उसके स्वास्थ्य की वजह से नहीं गया,  बड़ी मुश्किल से रंग छुड़ाया, फिर भोजन बनाया, सब उसने, नूना ने सिर्फ पूड़ी बेली. शाम को वे बाहर बरामदे में बैठे, आसमान बहुत सुंदर था. उसके असीम प्यार की तरह. उन्होंने पुरानी चिट्ठियाँ पढीं, एल्बम देखा और अब सोने का वक्त हो गया है.

नूना को उसकी प्रतीक्षा है, घड़ी बंद हो गयी है, समय का पता ही नहीं चल रहा, साढ़े दस तो बजने ही वाले होंगे. सुबह वह कह गया था कि आठ-साढ़े आठ बजे एक बार वह आयेगा, सिर्फ दो गुझिया खाकर चला गया था, सो भूख भी लगी होगी. संभव है वह आया हो, वह सो गयी थी दरवाजा बंद था, उसकी बात न मान कर सदा बाद में उसे दुःख होता है, वह दरवाजा खोल कर रखने को कह गया था. पर अब वह आने ही वाला है. मन होता है उसके लिये खाना बनाना शुरू करे पर उसे अच्छा नहीं लगेगा, उसने वादा लिया था कि उसके पीछे वह कोई भी काम नहीं करेगी. वैसे अब वह ठीक है, गला भी ठीक है और मन भी खुश है. जल्दी से फिर वे दिन आ जाएँ जब वह दस से ग्यारह के बीच उसकी प्रतीक्षा करते हुए भोजन बनाती थी. कितनी जल्दी बीत जाता था तब समय और अब काटे नहीं कटता. वही पक्षी फिर बोल रहा है वे दिन में कई बार उसकी आवाज सुनते हैं. कहीं से हारमोनियम पर गाने की आवाज भी आ रही है. मौसम अच्छा है आज, धूप निकली है. वह आने ही वाला होगा या और प्रतीक्षा कराएगा.

उसके आने का वक्त हो गया है. टालस्टाय भी क्या खूब लिखते हैं. सुबह से ही ‘अन्ना केरेनिना’ मन मस्तिष्क पर छायी है, पता नहीं आगे क्या होगा, क्या अन्ना और बोन्सकी विवाह कर लेंगे या उसी तरह रहते आएँगे जैसे अब तक रहते आये हैं, और कीटी से मिलने लेविन जायेगा ही, ऐसा लगता है. आज दोनों घर से खत आये हैं. लगातार काफ़ी देर तक पढ़ने से आँखें जलने लगी हैं अब नहीं पढ़ेगी. उसे अब आ जाना चाहिए, उसका साथ कितना अच्छा है, पर वे  सदा हल्की-फुलकी बातें ही करते हैं, ऐसी बातें जो सिर्फ उन्हें और निकट लाती हैं, जीवन की गम्भीर बातों की तरफ उनका ध्यान ही नहीं जाता.    
वही कल का समय है, उस पुस्तक का तीसरा भाग पढ़ रही है, इस सप्ताह के अंत तक अवश्य ही उसे पूरा पढ़ा जा सकता है. आज डॉक्टर ने और दवा लिख दी, उसके यह कहने पर कि साँस लेने में कठिनाई महसूस होती है. उसे वास्तव में समझ नहीं आता कि सचमुच कुछ हुआ भी है, कभी तो सब ठीक लगता है पर किसी वक्त एक घुटन सी महसूस होती है, पर यह कोई विशेष नहीं होती. आज शाम वे  कई दिनों के बाद लाइब्रेरी जायेंगे. जीवन अबाध गति से चल रहा है या कहें चल निकला है, पर इतना काफ़ी नहीं है, कुछ करना चाहिए, इतनी सुविधापूर्ण जिंदगी की कल्पना उसने नहीं की थी. मौसम अच्छा है आज. उसके कदमों की आवाज आ रही है, वह आते ही उसे देखना चाहेगा जैसे वह उसे.

कल का दिन कुछ जल्दी-जल्दी गुजर गया, डायरी नहीं लिख  पायी. जितना भी समय मिला वह अन्ना, लेविन और कीटी के साथ बिताया, इतनी अच्छी किताब है यह, अब तक नहीं पढ़ी थी आश्चर्य होता है. परसों वह पूरा एक घंटा देर से आया था, फिर हम क्लब गए, वहाँ धर्मयुग में एक मजेदार बात पढ़ी. आज छोटी बहन का पत्र आया है उसने सोवियत नारी में से ‘वह मेरे दिल की रानी’ की  बारहवीं किश्त भेजी है. उसने बीच की कुछ किश्तें नहीं पढीं. आज अन्ना की किताब भी पूरी पढ़ ली, उसका कितना दुखद अंत हुआ. अब रात के आठ बजे हैं, खाना बनाना है, उसे पसंद नहीं फिर भी पता नहीं क्यों उसने बैंगन कई सब्जी बनायी है, वह भी सोचता होगा.

भी सुबह के पौने आठ ही बजे हैं, नूना ने स्नान कर लिया है और ट्रांजिस्टर पर नूरजहाँ का यह सुंदर गीत सुन रही है, ‘’आवाज दे कहाँ है’..... आज सुबह वह जल्दी उठ गयी थी पर वह उठा अपने वही पुराने वक्त पर. कल शाम को वह उसे एक बात बता रही थी कि उसने चुप कराते हुए कहा, समझ गए...समझ गए... चाहे वह समझ ही क्यों न गया हो पहले वह पूरी बात सुनता था. और उससे पहले किसी मित्र के यहाँ से आते समय उसने दो-तीन बातों का विरोध किया, फिर तो उसने चुप रहना ही ठीक समझा. शायद यह उसका वहम हो और वह चाहती है कि यह वहम ही हो कि ...पर सुबह उनकी सुलह हो गयी वह कह गया है, उसके जाने के बाद वह उदास न रहे. नूना खुश तो है. आज सुबह सूरज कितना सुंदर था..उदय होता हुआ अरुणिम सूर्य...ठंडी हवा और सड़क पर एक सफेद बकरी खड़ी थी, दो कुत्ते आये तो वह डर कर गेट की ओर भाग आयी थी उसने गेट खोला तो वह अंदर आ गयी, अगर उस वक्त वह उसके साथ होता तो सुबह और भी सुंदर होती पर यह हो नहीं सकता.