Showing posts with label अनामिका. Show all posts
Showing posts with label अनामिका. Show all posts

Wednesday, December 16, 2015

हाथ की अंगुलियाँ


आज गुरूजी ने बताया, हाथ की पाँचों अँगुलियों में सारे ग्रह हैं. अंगूठा मंगल ग्रह है, जो सेनापति है. तर्जनी गुरू है, मध्यमा शनि है, जो सेवक है, अनामिका सोम है, जो राजा है तथा कनिष्ठा बुध है, जो व्यापारी है. चारों वर्ण हाथ की अँगुलियों में दिखाए जा सकते हैं. इसी तरह कल वह आँखों तथा होठों के द्वारा भी भावों को व्यक्त करके दिखा रहे थे, उनके नित नये-नये रूप देखने को मिलते हैं. वह कभी गम्भीर तथा कभी इतने हँसमुख लगते हैं. पिछले दो दिन कुछ नहीं लिख सकी. जून कल शाम लौटे, कल उन्हें फिर जाना है, इस बार एक हफ्ते के लिए. उन सबको नवम्बर में बनारस जाना है और दोनों को दिसम्बर में दुबई, तथा मस्कट. अगले वर्ष मार्च-अप्रैल में वे नार्वे तथा यूरोप की यात्रा पर भी जा सकते हैं. जून के दिमाग में सारा कार्यक्रम स्पष्ट है. उनमें पिछले कुछ समय से सकारात्मक परिवर्तन हो रहे हैं. प्राणायाम व ऊर्जा ध्यान का प्रभाव हो सकता है, वह ज्यादा  उत्साहित हैं तथ अपने लक्ष्यों के प्रति पूरे सजग तथा स्पष्ट भी, इतनी यात्रायें करने के बावजूद भी थकान का कोई निशान नहीं. परमात्मा उनके साथ है और सद्गुरू का वरद् हस्त भी. वह पहले से ज्यादा उदार भी हो गये हैं. जीवन इतना सुंदर है कि उसका मन कृतज्ञता से भर जाता है. कभी-कभी भीतर इतनी ख़ुशी एकाएक महसूस होती है कि....

बहुत दिनों से मन में इच्छा जग रही थी कि सभी से बात करे. फुफेरे, चचेरे भाई-बहनों, बुआ, चाचीजी, पिताजी सभी से आज बात की. जून ने उस दिन बड़ी भांजी से उसके काम के बारे में बात की थी, उसने सोचा बड़ी ननद से पूछे, पर उससे बात नहीं हो पायी. टीवी पर ओशो का प्रवचन आने वाला है. उनकी बातों में एक अनोखा आकर्षण है, आत्मा को छूकर आते हैं उनके बोल !

एक और दिन बीत गया, परमात्मा अब भी दूर ही है, ऐसे न जाने कितने दिन, हफ्ते और बरस बीत चुके हैं. परमात्मा पास होकर भी दूर ही लगता है. सम्भवतः इस यात्रा की कोई मंजिल नहीं. सुबह उठी, अलार्म सुनने के बाद कुछ देर आँखें बंद किये आत्मा को अनुभव करने का प्रयास किया, बल्कि आत्मा में टिकी. क्रिया की, इतने वर्ष हो गये क्रिया करते हुए अब भी विचार आ जाते हैं. ध्यान किया और बच्चों को पढ़ाते वक्त थोड़ा क्रोध भी किया, पर भीतर जागृति रही. ध्यान तभी टिकता है जब मन नहीं रहता और मन तब नहीं रहता जब कोई सचेत रहता है. शाम को टहलते समय भी मन में व्यर्थ का चिन्तन चला, पर झट याद आया मन तो एक प्रवाह है, निरंतर चल ही रहा है, वे साक्षी हैं, अबदल हैं जो जानते हैं और देखते हैं ! लाइब्रेरी से पुस्तकें लायी है, पर किसी में भी मन नहीं लगा, अब संसार की कोई बात रुचती ही नहीं, भीतर एक ही लगन लगी है, भीतर ही रहने का मन होता है, यह कितना अच्छा है कि कोई उसके इस एकांत में बाधा डालने वाला नहीं है. आज नैनी ने खिड़कियाँ साफ कीं, वह उसके सामने कितनी शांत रहती है पर अपनी बेटी के साथ बड़ी रोब भरी आवाज में बात करती है. वे कितने मुखौटे लगाये रहते हैं, उसके सारे मुखौटे उतर जाएँ सद्गुरू से यही प्रार्थना है.

पिछले कई दिनों से कुछ नहीं लिखा. मन जो एकाग्र हुआ था पुनः बिखर गया है ऐसा लगता है, किंतु जो मन ही मिथ्या है उसका बिखरना या एकाग्र होना भी तो मिथ्या ही है, जो स्वप्नवत् है उसकी क्या फ़िक्र, जो शाश्वत है, सदा है और जो ध्यान देने योग्य है वह तो सदा ही है, उसमें कोई विकार आ ही नहीं सकता, वह आज समय से कुछ पहले ही ध्यान करने बैठ गयी, उसी समय माली आकर चला गया, इतना गहरा ध्यान घटा कि कोई आवाज ही नहीं आयी.