Monday, January 12, 2015

ब्रोकोली की पौध


भक्ति मुक्ति की सीढ़ी है, भक्ति हृदय में उत्पन्न हो तो ईश्वर की सत्ता, प्रेम और माधुर्य स्वतः प्रकटते हैं. ईश्वर के लिए यदि भाव दृढ़ हो तो वह उससे अनभिज्ञ नहीं रह सकता. उसके सारे कार्य वही तो संवारता है, बचपन से आजतक ईश्वरीय कृपा का सदैव अनुभव किया है. सुमिरन का भाव अंतर को पवित्र करता है अन्यथा मन इतना वेगवान है कि कोई आश्रय न मिले तो तो व्यर्थ इधर-उधर भटकता फिरेगा. बाबाजी कहते हैं, श्वास रूपी खंभे पर ऊपर-नीचे उतरने का कार्य इस मन रूपी सेवक को सौंप दे तभी कोई मुक्त रह सकता है अन्यथा यह भरमाता है. चित्त की झील यदि शांत होगी तो ही परमात्मा का प्रतिबिम्ब उसमें झलकेगा. सतत् जागरूक रहकर ही इसे अनुभव किया जा सकता है. शास्त्र कहते हैं वह निकट से भी निकट है और दूर से भी दूर है. देखा जाये तो हर दिन मानव का एक नया जन्म होता है हर रात एक छोटी मृत्यु होती है, एक दिन एक रात ऐसी भी आएगी जिसकी सुबह परिचित माहौल में नहीं होगी, उस वक्त ज्ञान और ईश्वर ही साथ होंगे.

आज गुरुनानक जयंती है, पूर्णिमा का दिन , पिता का जन्मदिन भी, सुबह उनसे बात की. मौसम बेहद ठंडा है, धूप में जरा भी तेजी नहीं है. नींद कुछ देर से खुली, रात को ठंड की वजह से नीद में खलल पड़ा था, शायद यही कारण रहा हो, पर आजकल उसके स्वप्न बहुत सुखद हो गये हैं. आज ध्यान में मन्त्र अपने आप छूट गया और मन सिर्फ एक भाव में स्थित हो गया. अद्भुत अनुभव था. साढ़े दस बजे वह गुरुद्वारे भी गयी, वहाँ अखंड पाठ का भोग लग रहा था. गुरुनानक वाणी सुनी, ज्ञान की वह गंगा जो हिंदू धर्म ग्रन्थों में भी है. जून तब ब्रोकोली की पौध लेने गये थे, बाद में उसने स्वयं ही लगाई. कल मूली के बीज डाले थे, अगले तीन महीनों में इसकी फसल तैयार होगी. खतों के जवाब लिखने का आज अच्छा अवसर है. जून ने जो दो लेख लिखने को कहा था वह सम्भव नहीं हो पाया है, गद्य लिखना ज्यादा कठिन है, कठिन कार्य से वह घबराती नहीं है पर लिखने के लिए मौलिक विचार भी होने चाहियें, इधर-उधर से पढ़ी-सुनी बातों को नीरस भाषा में लिख देने से तो बेहतर न लिखना ही होगा ! कविता लिखना उसके लिए सहज है हालाँकि पिछले दो-तीन महीनों से वह भी नहीं लिखी है, जून ने कहा है किताब छप कर  आने वाली है.

उसने मन में उठने वाले विचारों को क्रम बद्ध किया..मानव का मूल तो वही है, वही उन्हें पोषता है. सारी कलाओं का स्रोत भी वही है. वह बेहद निकट है पर उन्होंने खुद पर न जाने कितने लेप चढ़ा रखे हैं. मन में हजार तरह के संकल्प-विकल्प उठते हैं. कल्पना की दुनिया में विचरने वाला मन खुद से तो दूर है ही, परमात्मा से भी दूर चला जाता है. पर एक क्षण में ही यदि वह यह मुल्लमा उतार फेंके तो वही क्षण मिलन का होगा. एक पुकार यदि दिल से उठे तो वह सारे पर्दे खोलकर अपनी झलक दिखाता है. वह हितैषी हर पल बाट जोहता है कि कब भूला भटका कोई घर लौट आये. घर लौटना मानो जीवन में उत्सव का प्रवेश होना है !




Friday, January 9, 2015

ईश्वर का विधान


विवेक रूपी बाण और वैराग्य रूपी धनुष सदा अपने साथ रखना है, जैसे ही कामना रूपी राक्षसी प्रकट हो तो उसका विनाश किया जा सके. ईश्वर की भक्ति का अर्थ है माया से युद्ध, मन की शक्ति का विकास ईश्वर भक्ति में ही होता है. कल उसने चौथी बार सुदर्शन क्रिया की. हर बार की तरह कल भी अतीन्द्रिय अनुभव हुआ. सुख की अनुभूति तो हुई ही फिर स्लेटी फूलों के मध्य नील रंग का कमल दिखा जो बेहद चमक लिए था, फिर कई रंगों के प्रकाश दीखते रहे. कल की क्रिया के दौरान एक बार भी भय का अनुभव नहीं हुआ और समय भी बहुत कम लगा. कुछ देर और क्रिया चलती तो ठीक था पर बुद्धि में अनाग्रह रहे तो ही उचित है. कल योग शिक्षक से उसने कहा कि उसे लग रहा है आज परमात्मा से उसका appointment है. और वह कल उस क्षण से उसके साथ है, बल्कि उसके पहले से ही, हर पल हर क्षण उसके साथ है, वह ख़ुशी बनकर उसके पोर-पोर में समा गया है. सुदर्शन क्रिया में सचमुच सु-दर्शन होते हैं, अद्भुत अनुभव होते हैं. श्री श्री के प्रति मन कृतज्ञता से भर जाता है और उनके योग शिक्षक के प्रति भी. जीवन में एक उजाला बनकर, आनंद का स्रोत बनकर वह उनके जीवन में आए हैं. जून का कहना है कि वे उन्हें एक बार फिर खाने पर बुलाएँ. इस समय साढ़े दस बजे हैं, सब कुछ कितना शांत लग रहा है. आज एक सखी के जन्मदिन की पार्टी में जाना है.

मन प्रशांत होगा तभी उत्तम सुख की प्राप्ति होगी. संशय, आलस्य, प्रमाद से विमुक्त मन ही शांत होगा. शांत मन ही प्रसन्न रहेगा और यही प्रसन्न मन ही ईश्वर को पा  सकता है. वह देह से स्वयं को पृथक जानता है. स्वयं को आत्मा के स्तर पर ले जाकर परमात्मा के सान्निध्य का सुख प्राप्त करता है. वह पूर्ण अमृत का स्वाद लेता है, उसके आनंद की निरंतर वृद्धि होती है. प्रसन्न रहना ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है. वह ईश्वर जीवन के टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलने की समझ देता है, पग-पग पर उनका हाथ थाम लेता है, वह नितांत अपने से भी अपना ईश्वर ही सच्चा मित्र है. उसका नाम ही अंतर्मन को वर्तमान की शांत जलधारा पर स्थिर रखता है. ऐसे प्रभु का सत्संग गुरू कृपा से आज शाम उन्हें प्राप्त होने वाला है.

अभी कुछ देर पूर्व योग शिक्षक से बात हुई, उनका जन्मदिन पहली जुलाई को है. अभी वह ऋषिकेश जायेंगे फिर डिब्रूगढ़ और फिर तेजपुर ‘साधना’ के लिए, और कुछ करने की आवश्यकता भी नहीं है. मन को पवित्र रखने तो सब कुछ अपने आप होता जाता है. ईश्वर हर जगह है उसको देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, सभी में ईश दर्शन करके सभी को अपने समान जानकर कोई ईश्वर की अनुभूति कर सकता है. कल शाम क्लब में योग शिक्षक को सुना, फिर एक सखी के यहाँ उनके भजन सुने. एक व्यक्ति इतना शांत, इतना पवित्र, इतना मधुर, समदर्शी और भक्तिभाव से पूर्ण हो सकता है, गुरू के सभी लक्षण उनमें हैं. मन श्रद्धा से भर जाता है. आज सुबह से ही वर्षा हो रही है, जीवन में भी प्रभु प्रेम की वर्षा हो रही है. लेकिन ईश्वर के प्रति वह तड़प, वह खिंचाव जो प्रथम क्रिया के बाद उसने अनुभव किया था वह शांत हो गया है. अब वह उससे एक पल को भी दूर नहीं है, उसके नाम का मानसिक जप वर्तमान में रहने की प्रेरणा देता है. वर्तमान में जीना व्याधियों से मुक्त रखता है. मन फूल की तरह नित नवीन बनकर खिला रहत है.

कल कोर्स का अंतिम दिन था, ध्यान किया फिर सामूहिक भोज व सत्संग, लौटते-लौटते उन्हें साढ़े दस हो गये. सुबह पांच बजे उठाने का वादा जून ने शिक्षक से किया था. उन्होंने उनकी देखभाल का उत्तरदायित्व पूरी तरह निभाया है. चार बजे ही उसकी नींद भी खुली पर उठने की चेष्टा नहीं की. पांच बजे उसे एक स्वप्न आया, कोई कह रहा है, 'पांच बज गये', 'पांच गये'. वह ईश्वर थे या उसकी चेतना.
उसके अंतर में न जाने कहाँ से एक कसक या कचोट ने प्रवेश पा लिया है. यह महीनों बाद हुआ हुआ है, सो यह अपरिचित, अनजाना मेहमान अप्रिय लग रहा है. कल दोपहर से इसका आरम्भ हुआ होगा, एक क्षण को भी सजग न रहो तो कामनाएं मन पर अधिकार जमा लेती हैं. अपने आत्मभाव से वे च्युत हो जाते हैं. ईश्वर का विधान बहुत कठोर है, जिस क्षण उसका पथ छोड़ा अथवा छोड़ने का भाव भी मन में आया तो उसका फल मिले बिना नहीं रहता. मन यदि सद् मार्ग पर चले तो आत्मसुख में रहता है. पूरा प्रभु आराधिया, पूरा जाका नाम. वह ईश्वर जब तक पूरा नहीं मिलता, ज्ञान पूर्ण नहीं होता तभी तक यह विचलन, विक्षेप मन पर छाने का साहस कर सकते हैं. उसका लक्ष्य तो उस पूरे को पाना ही है. वही इसका रास्ता बता सकते हैं. मन और देह में जब तक आसक्ति रहेगी तब तक वह नहीं मिलेगा. अपने अहं को तुष्टि देने का भाव, सुख-सुविधाओं का आकर्षण जब तक रहेगा वह अनवरत सुख इसी तरह बीच-बीच में लुप्त होगा. यही दुःख लेकिन उसी मार्ग पर स्थित करेगा, जब प्रार्थना और हृदय एक हो जाते हैं तभी उसका अभ्युदय होता है. ध्यान ही उसे पावन करेगा. उसकी कृपा अपार है, वे अकृतज्ञ होकर उससे और-और मांगते हैं. उलटी चल चलते दीवाने, दीदारे यार करते आँख बंद करके !







Wednesday, January 7, 2015

दीवाली का उजास


बाबाजी कहते हैं, साधक का परम लक्ष्य स्वयं के केंद्र तक पहुँचना है, बाहर के खेलों में उलझना नहीं, जितना-जितना वे ध्यानस्थ होते जाते हैं उतना-उतना ईश्वर के प्रेम के अधिकारी बनते जाते हैं. पंचभूतों से निर्मित देह धीरे-धीरे उन्हीं में विलीन होता जाता है पर जीवात्मा परमात्मा का अंश है, जो शाश्वत है, ज्ञान और प्रेम स्वरूप है. दीवाली हो या कोई अन्य त्योहार, सारे पर्व उसी शाश्वत स्वरूप की याद दिलाने आते हैं. एक रस जीवन जीते-जीते कभी-कभी उदासीनता का भाव आने लगता है, सत्, चित्, आनंद से उत्पन्न हुए वे त्याग के द्वारा पर्वों पर अपने आप से जुड़ते हैं. स्वच्छता, दीप जलाना, नई वस्तु लाना और सभी के साथ भोजन करने का अर्थ है अपने हृदय को स्वच्छ करना, ज्ञान का दीपक जलाना और प्रेम का प्रसाद बांटना ! मूल को पाने का संकल्प दिन-प्रतिदिन दृढ़ होता जाये यही प्रार्थना उत्सव पर करनी है ! छोटी ननद ने बताया उनके शहर में बाबाजी आये हैं. वे लोग गये थे, ननदोई जी ने चार दिन सेवा की. संत के दर्शन सदा हितकारी होते हैं. उस दिन गोहाटी में गुरूजी की वह प्रेमिल दृष्टि उसे कभी नहीं भूलेगी. उस दृष्टि में उनका आशीष था जो ईश्वर उसके अंतर में अपनी झलक दिखाते हैं ! कल ध्यान में एक नया अनुभव हुआ उसके सिर के ऊपरी भाग में अद्भुत शीतलता का अहसास हुआ, सिर में आवाजों का आना भी जारी है.

कल दीवाली का उत्सव सम्पन्न हो गया, उनके यहाँ बहुत लोग आये, भोजन साथ-साथ किया. तीनों सखियाँ कुछ बनाकर भी लायी थीं. आज मौसम खुशनुमा है. टीवी पर आत्मा आ रहा है, वाचक ईश्वर के अभय रहने के संदेश का वर्णन कर रहा है. आज म्यूजिक सर भी आयेंगे. उन्हें दिगबोई भी जाना है, नन्हे के अध्यापकों से मिलना है. उसकी पढ़ाई जिस जोश से चलनी चाहिए थी वह दीख नहीं रहा है. अभी कुछ देर पूर्व योग शिक्षक का फोन आया गेस्ट हॉउस से, वह तेजपुर की उन वृद्धा साधिका से बात करना चाहते थे. वे उन्हें माँ की तरह मानते हैं बल्कि माँ ही मानते हैं. आज वे उनके यहाँ आ रहे हैं दोपहर को. उसे चने की दाल, पालक पनीर, शिमला मिर्च, गोभी का परांठा और कुछ मीठा बनाना है.

बुद्धि का फल अनाग्रह है, कभी भी तर्क आदि के द्वारा अपनी बात को ऊपर करना स्वयं को साधना के पथ से विचलित करना है, यदि वह गलत है तो दूसरे का आभारी होना चाहिए और यदि वह सही भी है तो निंदा से दुखी नहीं होना होना चाहिए. कल दोपहर को योग शिक्षक उनके यहाँ आये, उन्हें भोजन पसंद भी आया, तारीफ़ करने में वह संकोच नहीं करते. कल शाम वे क्लब गये, योग का छोटा का कार्यक्रम था, उनकी बातें मन को छू लेती हैं. कल शाम से ही उसका मन भावातीत अवस्था में है. ईश्वर जैसे कहीं निकट ही हैं. अधर मुस्काते–मुस्काते थक गये हैं पर रुक नहीं रहे हैं, वैसे भी एक बार ईश्वर को मन में स्थान मिल जाये तो वह उसे छोड़ता नहीं है. वे ही इतर कार्यों में व्यस्त होकर उसे भूल जाते हैं. ईश्वर प्रेम, शांति और आनंद स्वरूप है, और इस वक्त प्रेम, शांति और आनंद की फुहार उसके अंतर में बरस रही है. ज्ञान से अभी दूर है लेकिन जब हृदय प्रेम से लबालब भरा हो तो और किसी के लिए स्थान कहाँ रह जाता है. बुद्धि यदि आत्मा से जुड़ी हो यानि धैर्ययुक्त हो तो मन अज्ञानी नहीं रह जाता. ‘नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात’ ! अभी-अभी एक सखी से बात की, उसके पति इस बात के खिलाफ हैं कि कोई उनके यहाँ कुछ बनाकर ले जाये, एक दूसरी सखी से उसकी इस बारे में बहस भी हो गयी. वे जीवन को कितना जटिल बना लेते हैं जबकि वह कितना सरल है. जीवन में ईश्वर का ज्ञान हो तो जीना आसान हो जाता है. अपने मन के विकारों को लम्बी छुट्टी पर भेजना होगा तब चित्त में कृष्ण होंगे, कृष्ण जो उनके नितांत अपने हैं !  




Monday, January 5, 2015

स्वामी योगानन्द की पुस्तक


कण-कण में ईश्वर व्याप्त है, उसके प्रति भक्ति सदा भीतर है. उस पर कामनाओं और वासनाओं का आवरण चढ़ा होता है. हर पल चेतन रहकर मन को शुद्ध करना है, जैसे-जैसे मन शुद्द होता जायेगा भक्ति अपने आप प्रकट होती जाएगी. कुछ करना नहीं होता अपने आप ही ईश्वर प्रेम प्रकट होता है जब अंतर उसके लायक होता है. अंतर में प्यार छलकता हो असीम शांति हो और परमानन्द का स्रोत मिल जाये तो ईश्वर की शक्ति दिनों-दिन प्रकट होती जाएगी. तब मन संशय मुक्त हो जाता है. सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी, मान-अपमान, अच्छा-बुरा के द्वैतों से प्रभावित होना छोड़ देता है. संशय विहीन मन ही श्रद्धावान होता है. श्रद्धा ही परम लक्ष्य तक ले जाती है. ऊंच-नीच, शत्रुता-मित्रता की भावना से रहित होकर यदि मन का एकमात्र लक्ष्य दूसरों की सुख-सुविधा का ध्यान रखते हुए सेवा करना है तो ईश्वर वहाँ प्रकट होता है. परनिंदा और असूया पतन की ओर ले जाने वाली है. यदि हृदय में प्रेम होगा तो वह सूर्य की भांति हर एक पर अपनी ऊष्मा बिखेरेगा. वह हरेक के लिए समान रूप से होगा. विशेष श्रद्धा का पात्र तो मात्र एक वही है और वह तो जड़-चेतन बन हर ओर व्यक्त हो रहा है. उसकी छवि हरेक में देखनी है और उसमें हरेक को देखना है तभी द्वैत भाव मिट जायेगा और उस एक के सिवाय कुछ नजर नहीं आएगा. अज सुबह ध्यान में उसे कुछ पलों के लिए दिव्य अनुभव हुआ, लेकिन वह टिकता नहीं, अभी बहुत दूर जाना है. गुरू उसके पथप्रदर्शक हैं, मंजिल एक न एक दिन मिलेगी !

उन्हें मुक्त होना है और शरण में जाते ही वे एक क्षण में मुक्त हो जाते हैं. जो भी विकार भीतर हैं वे बाह्य हैं, जिन्हें निकाल सकते हैं अथवा आने से रोक सकते हैं. कल शाम को अंततः लाइब्रेरी से वह पुस्तक Man's Eternal Quest जो स्वामी योगानन्द जी की लिखी हुई है मिल ही गयी. पहले दो अध्याय पढ़े और रात भर मन कृष्ण भाव में रहा. ईश्वर उसके अंतर्मन में प्रकट हुए हैं यह भाव ही कितना प्रिय है. आज सुबह खिड़की खोलने का अनुरोध जब जून ने नहीं माना तो थोड़ा सा क्रोध का भाव एकाध क्षण के लिए हफ्तों बाद आया पर सचेत थी. अष्टांग योग के बारे में आत्मा में बताया जा रहा है. कृष्ण ने भगवद गीता में एक श्लोक में ही बहिरंग योग का वर्णन किया है, जिसपर न जाने कितनी कितनी पुस्तकें लिखी गयी हैं. आज भी कल की तरह बदली है, गोभी और टमाटर के पौधे धूप से बच रहे हैं, ईश्वर हर वक्त उनके साथ है. इच्छा, मोह, भय, काम, लोभ को त्याग कर ही वे मुक्त हो सकते हैं. ईश वर्णन वह अमृत है जो मुक्ति के मार्ग पर ले जाता है. मन को शांत रखना योग में आरूढ़ होने के लिए आवश्यक है. आसक्ति के कारण किया गया कर्म बाँधता है, शुद्ध सात्विक कर्म ही मुक्त करते हैं. शांत मन ही शुद्ध कृष्ण प्रेम रूपी प्रकाश फैलाता है. पल-पल सजग रहकर ही अध्यात्म के पथ पर आगे जाया जा सकता है. तब मानसिक सुख व संतोष इतना प्रबल व स्वाभाविक हो जाता है कि साधक क्षण प्रतिक्षण परमात्म भाव में समाहित हो जाता है.

Sunday, January 4, 2015

पालक की सिन्धी भाजी


कल शाम पुनः उसे सिर में दूर से आती ढोल की ध्वनि जैसी ध्वनि सुनाई दी, फिर आज सुबह क्रिया के बाद काफी स्पष्ट थी. योग शिक्षक से पूछना ही उचित होगा अथवा इसे भी सामान्य घटना मानकर आगे चलती चले. अध्यात्म के मार्ग पर न जाने कितने-कितने मोड़ आएंगे जिनसे उन्हें गुजरना होगा. यह तो तलवार की धार पर चलने जैसा है. हर सुख की एक कीमत चुकानी होती है. हर सुख क्षणिक होता है लेकिन आत्मसुख का न कोई आदि है न ही अंत है. वह तो अनंत है, उसे सीमा में बद्ध नहीं किया जा सकता. इस समय उसके पोर-पोर से वही आनंद फूट रहा है, सारा शरीर कम्पायमान हो रहा है, ध्यान न करते हुए भी ध्यान की सी मनः स्थिति हो रही है, एकांत नहीं है सो अभी वह ध्यान नहीं कर सकती. आत्मा से टपकने वाले इस मधुर भाव को क्या नाम दे सकते हैं. सारा जग एक स्वप्न की भांति प्रतीत हो रहा है. सब कुछ जैसे थम गया है, दिशाएं खो गयी हैं, शून्य ही शून्य है, उसके इस आत्मबोध के अतिरिक्त कोई बोध शेष नहीं रहा है. कान में पड़ने वाली ध्वनियाँ भी अर्थहीन हो गयी हैं. सब कुछ यथावत होते हुए भी यथावत नहीं है. कुछ बदला-बदला सा है. कहीं यह उसका मतिभ्रम तो नहीं, लेकिन ऐसा पहले भी तो हुआ है और आनंद की तीव्रता उस समय अधिक थी, पर उसे संयत होना होगा. स्वयं को अभी और तीव्रतर अनुभवों के लिए परिपक्व करना होगा. सद्गुरु सदा उसके साथ हैं. कृष्ण भी हर क्षण उसके साथ परमज्योति के रूप में रहते हैं, जिसे वह आंख बंद करते ही देखती है. जैसे कमल पंक में रहकर भी उसमें लिप्त नहीं होता वैसे ही उन्हें संसार में रहकर भी इससे अलिप्त रहना है. वे ईश्वर के निमित्त मात्र हैं. उसने अनंत शक्तियाँ प्रदान की हैं. सूक्ष्म जगत और तात्विक जगत में प्रवेश करने की क्षमता दी है. अलौकिक आनंद प्राप्त करने के सामर्थ्य भी दिया है. शाश्वत सुख व शांति का भागी बनने की क्षमता दी है जो वे अपने आत्मस्वरूप में रहकर ही पा सकते हैं.

आज नन्हे का स्कूल ‘तिनसुकिया बंद’ के कारण बंद है. वे आधा घंटा देर से उठे,  क्रिया की जो उनके जीवन का अंग बन चुकी है और दिन का पहला कार्य. कल दो पत्र लिखे, सभी को भाईदूज का टीका भेज दिया है, दीवाली के लिए सफाई का कार्य भी नियमित चल रहा है. कल शाम एक मित्र परिवार आया, अच्छा लगा पर कुछ देर को शायद वह भावना में बह गयी थी. art of living की बात छिड़ते ही वह संयत नहीं रह पाती, पता नहीं क्यों ? उसके सिर में हल्की आवाजें आज सुबह भी महसूस हुईं, इसके पीछे जरूर कोई राज है. आज लम्बे समय के बाद ‘सिन्धी पालक’ बनाया है. सुबह ससुराल से फोन आया, वे लोग इसी माह बड़ी ननद के पास जा रहे हैं. अज गुरुमाँ ने कड़े शब्दों में फटकर लगाई, पर बिलकुल सही कहा कि ईश्वर का नाम तो जगाने के लिए है न कि सुलाने के लिए. गुरू युगों की नींद से जगाने आया है. कल ‘इंडिया टुडे’ के मुखपृष्ठ पर गुरूजी का फोटो देखकर अच्छा लगा. उनकी बातें ही निराली हैं. नन्हे बच्चे से निष्पाप और महान ऋषि से ज्ञानी. ईश्वर हर क्षण उनकी आँखों में, हँसी में, हाव-भाव में झलकता है. वह स्वयं ही ईश रूप  हो गये हैं. अब इतना वक्त नहीं है कि अभ्यास करे, सो उसने सोचा संगीत सुनना ही ठीक रहेगा.




Friday, January 2, 2015

मुक्त उड़ान

 

आज उस सखी के यहाँ सत्यनारायण भगवान की कथा का आयोजन किया गया है. उन्हें वहाँ नौ बजे के बाद पहुंचना है. कल शाम उस समस्याग्रस्त सखी का फोन आया, उसके घर में सुलह होने की शुरुआत तो हुई है. गुरूजी की वह कृतज्ञ है, उन्हीं की कृपा से यह चमत्कार ( उसी के शब्दों में ) हुआ है. उसकी भी सारी उलझनों को गुरू की स्मृति एक चुटकी में दूर कर देती है. भक्त के लिए भगवान सदैव तत्पर है, वह आने में एक क्षण भी नहीं लगाता. भगवान के लिए प्रेम ही परमधर्म है. अपने अंतर में छिपे प्रेम को प्रकट करना है. इस प्रेम को प्रकट करने में गुरू सहायक है. उसका अर्थ ही है जो अज्ञान को दूर करे, क्योंकि वह स्वयं मुक्त है, वही मुक्त कर सकता है. जो स्वयं बंधा हो वह क्या मुक्त करेगा. सद्गुरु को सुबह-शाम वह एक ज्योति के रूप में अपने साथ पाती है. शास्त्र माँ है और गुरू पिता है, उनकी शरण में आकर ही कोई द्विज होता है. दूसरा जन्म पाता है. ज्ञान का अभ्यास करने से और सेवा करने से ही कोई ज्ञान का अधिकारी बनता है. सतोगुण से ऊपर शुद्ध सतोगुण में स्थित होना है.

उसे लगता है सुख-दुःख मान्यता और कल्पना के आधार पर होता है. सुख-दुख को सच्चा मानना ईश्वर को सच्चा न मानना है. मन एक वृत्ति है, सागर की तरंग की तरह, वही सुख-दुःख का अनुभव करता है. है कुछ भी नहीं पर अनादि कल से वे इससे बंधे जा रहे हैं. अज्ञान का आधार तो मन ही है, मन की दीवारें गिर जाएँ तो यह अज्ञान उसी तरह लुप्त हो जायेगा जैसे अँधेरे कमरे की दीवारें गिर जाने पर वहाँ अंधेरा नहीं टिकता. या फिर मन एक चलते-फिरते रस्ते की तरह है जिस पर तरह-तरह के लोग हर समय चलते रहते हैं, यदि वह इनसे नाता न रखे और किसी भी वृत्ति का आग्रह न करे तो ही अविचलित रहेगी. आत्मा सभी को स्पर्श करते हुए भी किसी को स्पर्श नहीं करता, जैसे सूर्य की किरणें छूती हुई भी किसी को भी नहीं छूतीं. मन को भी आत्मा सा मुक्त होना सीखना होगा. निस्सीम गगन सा मुक्त, अनंत ब्रह्मांड सा मुक्त और पवन सा मुक्त..इसी मुक्ति को तो मोक्ष कहा गया है और यह मुक्ति पल भर को भी मिले तो भी अमूल्य है. जैसे बादल की सत्ता सूर्य से है पर बादल सूर्य को ढक लेते हैं वैसे ही आत्मा की सत्ता से से ही अज्ञान की सत्ता है. मृग-मरीचिका ही अज्ञान है, जो है ही नहीं उसके पीछे दौड़ते रहना ही तो अज्ञान है.

कल शाम उसे कुछ आवाजें जैसे दूर से बजते ढोल की आवाज सुनाई दे रही थी, कभी किसी वाद्य की आवाज, पर बाद में नींद आ गयी. कल शाम से ही जून कुछ चुप-चुप थे पर आज सुबह उन्होंने साथ-साथ क्रिया की और दफ्तर जाते वक्त वह सामान्य थे. दीदी को फोन किया वे लोग स्वयं भी नर्सिंग होम के मामले को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं. उसे याद आया, छोटी बुआ को पत्र लिखना है. टीवी पर आत्मा में जीवन की गुत्थियों को सुलझाने वाली भगवद गीता का पाठ आ रहा है. ईश्वर हर वक्त उसके निकट हैं. तीनों गुणों से परे अत्रि और सूया से परे अनसूया के पास वे बिन बुलाये ही चले जाते हैं.


दस बजे हैं, अभी विचार आया कि एक परिचिता से किये वादे को निभाने के लिए उनके यहाँ जाये. उनका बगीचा देखा, जगह ज्यादा है पर सूझ-बुझ से उसका उपयोग हुआ हो ऐसा नहीं लगता, खैर, वापस आयी तो लंच का समय होने ही वाला था. जून के दफ्तर जाने के बाद संगीत का अभ्यास किया, नये शिक्षक के सिखाने का तरीका बिलकुल अलग है और शुल्क भी तिगुना. पर संगीत को पैसों से नहीं तोला जा सकता. परसों शाम को तेजपुर की साधिका का फोन आया. योग शिक्षक तेजपुर में आ चुके होंगे. आज सुबह  जागरण में सुना, आसक्ति ही मानव को बांधती है. वास्तव में वह मुक्त है. अनंत शक्ति का भंडार है, लेकिन असली रूप को भुला बैठा है. उस दिन उसे अंतरतम की झलक मिली थी, अतिशय आनंद की अनुभूति हुई थी. वही आनंद थोडा थोड़ा करके रोज रिसता है और उसके अंतर को हरा-भरा रखता है. 

Thursday, January 1, 2015

गीत समर्पण के


पिछले दो दिन डायरी नहीं लिख सकी. सुबह का वक्त जो श्रवण-लेखन में बीतता है, छुट्टी होने पर अन्य कार्यों में चला जाता है. जीव हर वक्त इन्द्रियों को तुष्ट करने में लगा रहता है. देहात्म बुद्धि से निजात पाना कितना कठिन हो जाता है पर इन सबके बीच ‘क्रिया’ के क्षण वरदान बनकर आते हैं, जब मन आत्मभाव में स्थित हो जाता है. आज बड़े भांजे का जन्मदिन है, सुबह सभी से बात की, कल रात पिता से भी बात हुई, उन्होंने बताया, पत्र लिखा है. दीदी ने पत्र का जवाब फोन पर दिया. कल दोनों भाई उनके यहाँ परिवार सहित पहुंच गये आज दोपहर तक वापस आयेंगे. कुछ देर पहले छोटी बहन का फोन आया उसने नन्हे से यहाँ का पिन पूछा और कुशलता का समाचार लिया दिया. सुबह ससुराल से फोन आया यह याद दिलाने के लिए कि वे बधाई देने के लिए फोन अवश्य करें. यह फोन उन सभी परिवारजनों को आपस में जोड़े हुए है.

आज पूरे एक हफ्ते बाद नन्हे का स्कूल खुला है. वे सुबह जल्दी नहीं उठ पाए सो क्रिया भी नहीं हो सकी. अभी कुछ देर पहले बाबाजी का हिमाचल में हुआ सत्संग देखा, मन भर आया, गुरू का सन्निध्य कितना अमूल्य होता है. योग शिक्षक से वे पिछले इतवार को डिब्रूगढ़ में मिले थे, उसके बाद से कोई खबर नहीं है. उस दिन एक मित्र परिवार ने दो कैसेट दिए एक में समपर्ण के गीत हैं. सुनकर बहुत अच्छा लगता है. गुरू उन्हें कितनी ऊँचाइयों तक ले जाते हैं, गुरू भीतर ही हैं, सदा उनके पास हैं पर फिर भी किसी बाहरी आश्रय की आवश्यकता का अनुभव होता है, कोई ऐसा जो दो आँखों से ही अंदर का सारा हाल जान लेता है, जिसका एक वचन ही काफी होता है. जीवन के प्रत्येक कार्य के लिए किसी न किसी से शिक्षा लेनी पड़ती है तो ईश्वर को जानने जैसे महान कार्य के लिए गुरू की आवश्यकता हो इसमें आश्चर्य क्या है. गुरू मन का वैद्य होता है. जो विकारों से मन को मुक्त करता है. ऐसा सद्गुरु आसानी से नहीं मिलता, पर ईश्वर की अनुभति वही करा सकता है. वह शिष्य के मंगल की कामना हर क्षण करता है, उसका हृदय ईश्वर की तरह अनंत प्रेम से भरा हुआ है. कल शाम से ही बल्कि दोपहर से ही उसका सिर भारी था, खैर, शरीर का अपना धर्म है और आत्मा तो सदा मुक्त है, कल उसने इन दोनों को अलग-अलग रखते हुए कोई दवा आदि नहीं ली और रात को कब अपने-आप ही दर्द ठीक हो गया पता नहीं चला. आज ‘जागरण’ में विभिन्न चक्रों के बारे में सुना. आत्मा के स्तर पर जीना यदि कोई सीख ले तो सारे चक्र अपने आप ही जाग्रत हो जायेंगे और उनसे मिलने वाली ऊर्जा से जीवन ओत-प्रोत हो जायेगा.

कल अंततः जून को शिक्षक का ईमेल मिला. उनके भाई का देहांत हो गया था जिसके एक्सीडेंट की खबर सुनकर वे गोहाटी गये थे, जीवन कितना क्षणिक है यह उनसे बेहतर कौन जान सकता है. देह का संबंध क्षणिक है मात्र ईश्वर से मानव का संबंध शाश्वत है. उन्होंने उसे दो आदेश दिए थे पहला सेवा करनी चाहिए दूसरा ऋषिकेश जाकर एडवांस कोर्स करने का आदेश. पर दोनों ही आदेशों का पालन वह नहीं कर पायी है. सेवा करने की क्षमता नहीं है, अपने परिवार और निज आत्मा की सेवा करने में ही सारा समय बीतता है. ईश्वर प्राप्ति की इच्छा बलवती होती जा रही है. कृष्ण की चेतना में अपनी चेतना जोड़ने की इच्छा. भगवद स्मरण के सिवा और कोई भी कार्य स्वीकार्य नहीं लगता है. आज सुबह वे उठे तो गला खराब लग रहा था पर अब देह को आत्मा से अलग रख कर देखने की कला गुरूजी ने सिखा दी है. परमात्मा उसे जिस हाल में रखना चाहें, क्योंकि वही सब करा रहे हैं. उसके लिए जो भी अच्छा है वही होगा. वह जड़ वस्तु पर निर्भर न रहकर चेतना की ओर कदम बढ़ा रही है. इन्द्रियां अपना काम करती रहेंगी, मात्र उसकी चेतना इन्द्रियों की ओर न जाकर कृष्ण की ओर जा रही होगी.


कल सुबह एक सखी आई थी अपनी समस्या लेकर और गुरूजी ने उसे उसकी सहायता करने की प्रेरणा दी. सुबह उसको फोन किया. सुबह एक अन्य सखी के साथ बाजार गयी, वह अपने यहाँ कल पूर्णिमा की कथा का आयोजन कर रही है. बाद में लंच भी होगा जो उसके जन्मदिन का भी होगा, क्योंकि उस दिन करवाचौथ है. कल शाम दीदी का फोन आया उन्होंने बताया उनके घर के पास एक नर्सिंग होम बिक रहा है वह चाहती हैं वे सभी मिलकर उसे खरीद लें और चलायें पर उन्हें यह विचार जंच नहीं रहा है, न तो  उन्हें इसका कोई अनुभव है और न ही इतना धन है. जून आज देर से आने वाले हैं. इसी माह होने वाले एक कोर्स के लिए सहायता करने में व्यस्त हैं. कल पिता का एक लम्बा सा पत्र आया है. उसने उनके लिए एक कार्ड खरीदा और अभी छह कार्ड खरीदे जो जिनको मिलेंगे उन्हें ख़ुशी अवश्य देंगे, क्योंकि बहुत प्यार से चुने गये हैं. सुबह एक सखी को भी उसने इसी प्यार और विश्वास की बात कही, उसका जीवन कैसा अजीब सा हो गया है उसने स्वयं ही बना लिया है. ईश्वर से प्रार्थना करेगी और गुरूजी से भी की उसे सामर्थ्य दे, शक्ति दे ! art of living ने जैसे उसके जीवन में एक शांति, स्निग्धता और प्रेम की लहर ला दी है वैसी ही लहर उसके जीवन में भी आये. वह अपने रिश्तों की कद्र करना सीखे.