Monday, July 9, 2012

नए वर्ष में


नया वर्ष आया और पांच सूरज दिखा भी गया, आज छह तारीख है, दोपहर को सोयी नहीं आज, कितने सारे काम हो गए. कपड़े प्रेस किये, साड़ी को फाल लगायी और अब सोच रही है कि शाम को  नाश्ते में कुछ ऐसा बनाये जो पहले कभी न बनाया हो. नन्हा खेल कर थक कर सो गया है.

दिन की शुरुआत सामान्य ढंग से, मौसम अच्छा था, कल दिन भर छाए बादलों की तुलना में बिल्कुल उल्टा यानि धूप निकली थी. दोपहर का खाना उसने अकेले ही खाया, जून अपने साथ किन्हीं मित्र को लाए थे, उनके जाने के बाद वह नन्हें को सुलाने का प्रयत्न कर रही थी कि पास में रहने वाली एक नवविवाहिता परिचिता आ गयी, उसके ही शहर की रहने वाली है, शायद छोटी बहन के साथ पढ़ी भी हो. पूरी दोपहर उसी के साथ बातें करते बीती, नन्हा खेलने में मग्न हो गया. अब बैठने भी लगा है, कुछ महीनों में चलना भी सीख जायेगा और फिर बोलना भी. उसके जाने के बाद ही सोया. जून के आने पर भी वह सो रहा था. वह घूमने गए हैं. घर से पत्र आया है, छोटा भाई जयपुर चला गया है. पिता जी का भी तबादला पुराने शहर हो गया है.

मौसम आज भी खुशगवार, दोपहर पूर्व सोनू को लेकर पार्क में गयी तो धूप बहुत तेज थी. लौटते समय उसकी समान उम्र के दो बच्चों से मिली, रिक्की के सर में दायीं ओर चोट लग गयी है, ऊपर से पता नहीं चलता अंदरूनी चोट है उसकी माँ ने बताया, नन्हा भी दो-तीन बार गिर चुका है, उसका ख्याल रखना होगा, उसने मन में तय किया.   
क्रमशः

Saturday, July 7, 2012

घड़ी का अलार्म


अभी-अभी वे लोग घर वापस आये हैं, इतवार की अलसाई सी दोपहरी है. गए थे किसी परिचित के घर, पर वे भी शायद इसी तरह कहीं निकले हुए थे, थोड़ा सा घूमघाम कर वापस आ गए. नन्हा रास्ते में ही सो गया था. जून सोने जा रहे हैं. नूना को कोई काम नजर नहीं आ रहा था, सोचा डायरी ही लिखे. आज ठंड भी ज्यादा नहीं है. कौवे की आवाज बार-बार आ रही है और शायद कोई नल भी ठीक से बंद नहीं हुआ है पानी टपकने की आवाज भी रह रह कर आ रही है. और सब शांत है उसके मन की तरह. कोई उद्वेग नहीं, कोई हिलोर नहीं. सोया हुआ कितना अच्छा लगता है मानव, उसने दोनों को सुख की नींद सोये हुए देखा. कल उसके सर में दर्द था, लगभग हर माह ऐसा होता है. आज वह ठीक है. ज्यादा काम जून ने ही किया. महरी भी छुट्टी पर है, ठंड भी कल ज्यादा थी, सूर्य के दर्शन तो आज हुए हैं, आज भी धूप आंखमिचौली खेल रही थी. यहाँ घर पर धूप बस दो बजे तक ही रहती है, उसके बाद न आगे न पीछे. दिसम्बर का एक दिन और शेष है फिर आरम्भ होगा नया वर्ष.

वर्ष का अंतिम दिन. मौसम अच्छा है, धूप कितनी सुहा रही है, कच्ची और गुनगुनी धूप. सोनू नींद में कुनमुना कर फिर सो गया है. आज से एक सप्ताह के लिये क्लब में कार्यक्रम है पर वे नन्हें के साथ बहुत देर नहीं रुक सकते वहाँ. जून आज पहले अर्ध में दफ्तर नहीं गया, वर्ष के अंत में सभी बची-खुची छुट्टियाँ खत्म करते हैं. उनकी घड़ी में अलार्म नहीं है सो नींद भी आज छह बजे के बाद खुली. कल नए वर्ष के तीन गुलाबों वाले कार्ड मिले. धूप फिर चली गयी है सो बाहर बैठने से कोई लाभ नहीं वह उठकर अंदर चली गयी.

Friday, July 6, 2012

दाल का पानी


नन्हा देर से सोया है सो अभी तक जगा नहीं है, नूना के मन का अश्व विचारों की धूल उड़ाता जा रहा है. उसे समझ में नही आता क्या उचित है क्या अनुचित, सब कुछ जैसे अपने आप हो रहा है, उनका कोई अधिकार ही नहीं, वे पर चले जा रहे हैं बस यूँ ही... जैसे बहे जा रहे हों नदी की धारा में. वह पल भर भी बैठ कर सोच नहीं पाती कि क्या करना चाहिए. क्या थे वे और क्या  हो गए हैं, कोई व्यवस्था नहीं रह गयी है. वर्ष समाप्त होने को आया है. अगले महीने उनके विवाह की वर्षगाँठ है, पिछले वर्ष उसने जून से कहा था कि बहुत अच्छी तरह मनाएंगे वे यह दिन पर अब उसे लगता है कि किसी को भी नहीं बुला पाएंगे. मन में बातें उठती ही चली जाती हैं बिन बुलाए मेहमान की तरह या फिर बिन बुलाई नदी की बाढ़ की तरह. उसने सोचा आज दोपहर वह सोयेगी नहीं, बस चुपचाप बैठकर सोचेगी कुछ. आज धूप तेज है मन होता है बाहर धूप में बैठे थोड़ी देर, उसने सोचा जून भी आने वाले होंगे.

कल क्रिसमस है, बचपन में सभी त्योहारों को मनाने का कितना चाव होता है. वे क्रिसमस ट्री सजाया करते थे, और दिन भर यीशू के गीत गाते थे. आज इस समय वह जो डायरी लेकर बैठी है उसका कारण वही यादें हैं. अभी सुबह ही है सोनू खेल रहा है बीच-बीच में शोर मचाता है. रेडियो सीलोन से बौद्ध संदेश सुनाया जा रहा है पर उसे कुछ भी समझ में नहीं अ रहा है. क्योंकि उनका ट्रांजिस्टर थोड़ा अस्वस्थ है. नन्हा अब करवट लेकर सोने लगा है, बड़ा हो रहा है. मैच आरम्भ हो गया है भारत और श्रीलंका के मध्य. उसने खाना तो बना लिया है पर स्नान नहीं किया महरी कपड़े धो रही है. रोज सुबह का वही क्रम है ऐसे जाने कितने दिन गुजर गए और कितने और गुजर जायेंगे. एक दिन वे सोचेंगे कि सारा जीवन बीत गया इसी उहापोह में, कुछ तो किया ही नहीं. सचमुच सिर्फ अपने तन-मन की चिंता ही व्यस्त रखती है हर पल. और कुछ कहाँ सोच पाते हैं, यह जो दुनिया में इतनी बातें होती हैं उन्हें  पता ही नहीं चलता. कितना दुःख है दुनिया में पर साथ में कितनी खुशी भी तो है कहाँ मिलती है उन्हें उसकी झलक भी ज्यादा. हाँ, अपने में व्यस्त तो वे खुश हैं बेहद खुश. जून, नूना और नन्हा बस तीन प्राणी, छोटा सा संसार है उनका. उसे ध्यान आया दाल उतारनी है कहीं कुकर में पानी खत्म ही न हो जाये. 
क्रमशः

खेल-खिलौने


कल जून के साथ एक छोटी सी दुर्घटना घट गयी, उसकी बाइक मोड़ते समय फिसल गयी. जल्दी आ गए थे वे, नूना उस समय बाहर वाले कमरे में कपड़े प्रेस कर रही थी. नन्हा पास ही खेल रहा था कि देखा उसके दायें बाजू में पट्टी बंधी है, पर उसने कहा मामूली खरोंच है और उसके बाद आज सुबह तक रोज की तरह सभी कार्य किये. कल तक तो वे बिल्कुल ठीक हो जायेंगे. कल घर से चिट्ठी आयी, सबसे मीठी चिट्ठी माँ का होती है, अब उनकी यात्रा में केवल पांच दिन रह गए हैं.

लगभग एक माह पश्चात उसने पुनः डायरी खोली है. कुछ दिन यात्रा में निकल गए कुछ उसकी तैयारी में फिर वापस आकर पुनः घर सहेजने में. नन्हा आज पांच माह का हो गया उसे ट्रिपल एंटीजन व पोलियो की तीसरी खुराक देने आज अस्पताल ले गए थे. सुबह जब वापस आया तो ठीक था पर दोपहर से ही बेहद परेशान है. पहली बार इतना रोया है. जून उसे इस हालत में छोड़कर ऑफिस भी नहीं जाना चाहते थे. इस समय सोया है. जो भी घर में आता है उसे देखकर बहुत खुश होता है. सभी के बुलाने पर हंस देता है, अपनी प्यारी सी हँसी. उसे कुछ होता है तो वे दोनों कितने परेशान हो जाते हैं. लगता है उसका पेट भी ठीक नहीं है. कल परसों उसे आलू खिलाया था व बिस्किट भी, शायद इसी का असर होगा, अभी तक तो वह सिर्फ दूध व सेरेलक पर था.

आज नन्हा ठीक है, कल रात वह कई बार उठा पर जल्दी ही सो जाता था. इस समय पेट के बल लेट कर सामने पड़े खिलौने को पकड़ने की कोशिश कर रहा है, इस तरह लेटने से वह जल्दी ही थक जाता है. अब वह सीधा होकर सर्वोत्तम से छीना-झपटी कर रहा है, पढ़ने का या कुछ भी करने का उसका एक ही तरीका है, वस्तु को सीधे मुँह में ले जाना ऐसा न कर पाने पर शोर मचा कर गुस्सा दिखाता है. सोया रहे तो उठते ही खिलौना उठा लेता है. वे यदि दूसरे कमरे में हुए तो उसके खिलौने की आवाज से ही समझ जाते हैं कि वह उठ गया है.
क्रमशः

Wednesday, July 4, 2012

असम बंद


नवम्बर का आरम्भ हो चुका है. दीवाली का उत्सव आया और उन्हें हँसा कर चला भी गया. कितने कितने दिन बीत जाते हैं कुछ पढ़ाई लिखाई किये बिना, यदि वह सचमुच चाहे तो रोज ही ऐसा कर सकती है. कभी वक्त सचमुच फिसल जाता है, कभी याद नहीं रहता और कभी आलस्य वश.. दिन बीतते जा रहे हैं, कुछ दिनों में नन्हा चार महीने का हो जायेगा. इसी माह उन्हें घर जाना है. मौसम में बदलाव तो आया है पर अभी भी दिन में धूप तेज होती है, रातें ठंडी हो गई हैं. सोनू जग गया है और बड़ी-बड़ी आँखें कर इधर उधर कुछ देख रहा है. सुबह-सुबह उसकी मालिश और स्नान का नियम अभी तक तो टूटा नहीं है, जब ठंड बढ़ जायेगी तो सम्भवतः सोचना पड़ेगा.

आज असम बंद है. जून का ऑफिस भी बंद है. न कोई कार्यालय खुला है न कोई सवारी चल रही है. मोटरसाइकिल, कार सब बंद है. उन्हें नन्हें को लेकर अस्पताल जाना था आज ही उसे दूसरा ट्रिपल एंटीजन का इंजेक्शन लगना था और पोलियो ड्रॉप्स भी दिलवानी थी. सुबह से जून इसके लिये प्रयत्न कर रहा था और आखिर वह उसे स्कूटर पर ले ही गया. सुबह जल्दी उठे थे वे. रात को हुई वर्षा के कारण बाहर सभी कुछ धुला-धुला था, लॉन, पेड़-पौधे, आकाश सभी कुछ. कल छोटे फूफा जी का पत्र आया. कुछ दिन बाद वे घर जायेंगे तो सबसे मिलेंगे. सोनू से सब पहली बार मिलेंगे. आज कल कुछ लिखने के लिये डायरी उठाने पर उसे समझ नहीं आता कि क्या लिखे, कोई अच्छी सी बात मन में आती ही नहीं क्योंकि पढ़ना छूट गया है. विचार से विचार जन्मते हैं.

Tuesday, July 3, 2012

पटाखों की गूंज


जब भी पिछले दिनों उसने सोचा कि कुछ लिखे या पढ़े, नन्हें मियां ने आवाज दे दी, अब उसके जगते हुए ही वह लिख रही है, अभी तो चुपचाप खेल रहा है, पर पता नहीं कब ऊँ ऊँ आ आ शुरू कर दे, और चाहे कि उसके साथ बातें करो. मौसम ठंडा हो गया है. सर्दियाँ आ ही गयी हैं. उसने सोचा कि उसके लिये एक और स्वेटर तो बना ही लेना था अब तक. हो सकता है आज कल में माँ का भेजा पार्सल मिल ही जाये.
जून लाइब्रेरी गए हैं और नन्हा सो रहा है यानि नूना फुरसत में है, ऐसे पल कहाँ मिलते हैं आजकल तभी तो आज उसने आठ खत लिखे. वैसे छह बज चुके हैं किसी भी क्षण वह आ जायेंगे. नन्हें के लिये कितने सुंदर स्वेटर भेजे हैं माँ ने, उसकी आँख की समस्या ज्यों की त्यों है अब घर जाने पर ही उसका इलाज होगा.
परसों दीवाली है ज्योति उत्सव, और कल है भारत की प्रिय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की पुण्य तिथि. उन्हें इस दुनिया से विदा हुए कितना समय बीत गया है पर उनकी स्मृति अभी भी ताजा है. जून का परीक्षाफल अच्छा रहा वह एक ग्रेड ऊपर चढ़ गये हैं. आज बहुत दिनों बाद इसी खुशी में नूना ने पूरा खाना बनाया है. उसके आने से पहले मेज सजा कर रखी है. नन्हे को भी शायद आभास हो गया कि माँ व्यस्त है वह आराम से सोया. कल उसे लेकर वे अपने दो मित्र परिवारों के यहाँ गए, उसने गुलाबी स्वेटर पहनाया था, बहुत खिल रहा था उस पर. जून ने उसके कितने फोटो खींचे हैं, जब बन कर आएँगे कितना अच्छा लगेगा. दीवाली के दिन वह नूना के भी खींचने वाला है. यदा-कदा  पटाखे कई दिनों से बजने लगे हैं, उनकी आवाज से सोया हुआ छोटू चौंक जाता है.   

Sunday, July 1, 2012

प्याज के पकौड़े


चार बज गए हैं, जून अभी तक नहीं आये हैं, कोई काम होगा नहीं तो...दोपहर को आये थे एक बार सामान रखने. नूना दस-पन्द्रह मिनट बाहर बरामदे में खड़ी होकर उनकी राह देख रही थी फिर सोचा इतने समय में कुछ लिख लिया जाये. कितने-कितने दिन निकल जाते हैं हाथ में कलम उठाये. क्या यह वही है जो लेखिका बनने का स्वप्न देखा करती थी. आज उसकी चचेरी बहन का जन्म दिन है पहले याद आया होता तो कार्ड जरूर भेजती और पत्र भी भेजती. उसे याद आया कि इस हफ्ते कोई खत भी नहीं आया है. आज उनका घर फिर से साफ और सुंदर दिख रहा है कल दोनों ने मिलकर सफाई की थी पहले के दिनों की तरह, जब उनकी नई-नई शादी हुई थी. आजकल कितनी जल्दी अँधेरा हो जाता है, जून को पता है कि शाम को नन्हें को घुमाना भी है, वह और तेजी से उसका इंतजार करने लगी. जैसे कि इस तरह वह जल्दी आ जायेंगे. अगले महीने ननद की शादी है पर अभी तक वे निश्चय नहीं कर पाए हैं कि इतने छोटे बच्चे के साथ इतना लम्बा सफर वे कैसे करेंगे, जून के अकेले जाने पर भी तो सभी को निराशा होगी...

उस शाम अचानक बदली घिर आयी थी. कहीं जाने का सवाल ही नहीं था, जून को प्याज के पकौड़े बनाने का जोश सवार हो गया. पहले बोले प्याज कम है, प्याज और डाला तो बेसन कम हो गया, फिर बेसन ज्यादा हो गया तो पानी और डाला. और फिर इतने सारे ...पर बेहद कुरमुरे पकौड़े बने थे. रात का भोजन वैसे ही पड़ा रहा उन्हीं से काम चल गया.