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Tuesday, February 12, 2013

तंदूरी नाइट



   भाई ने घर पहुंच कर खत भेजा है, उनके साथ बिताए दिन अब तस्वीरों में कैद हैं, जो कुछ दिन बाद ही बन कर आयेंगी. कल से बीहू का अवकाश है, शाम को क्लब में बीहू का कार्यक्रम देखने भी वे जायेंगे. सर्वोत्तम में एक लेख आया है, क्या आपके “पति भी चुप्पे हैं”, रोचक लेख है, क्या दुनिया भर की पत्नियों की एक जैसी समस्याएं हैं, जून ने भी पढ़ा है यह लेख, वैसे वह इतने चुप्पे भी नहीं हैं, पर बातचीत शुरू कभी नहीं करते, बल्कि बचना चाहते हैं, उन्हें उकसाना पड़ता है. लिखना-पढ़ना पिछले दिनों छूट सा गया था, उसने पिजा बनाने की एक रेसिपी जरूर लिखी एक पत्रिका से, और उन्होंने बनाया भी है पिजा, खमीर की गंध कुछ ज्यादा आ रही थी, वैसे अच्छा लगा.

पिछले चार दिन फिर अवकाश...बीहू का भी और उसके लिखने का भी. कल दो मित्र परिवार आए थे, दोपहर बाद वे गए. इस समय दोपहर के पौने एक बजे हैं, वह बाहर लॉन में बैठी है, पंछियों की मिली-जुली आवाजें हैं, किसी ने किसी कुत्ते को लाठी से मार दिया है शायद, उसके चिल्लाने की आवाजें आ रही है, और तभी एक आवाज आई,  हॉकर की, हर माल एक दाम पर, उसने एक साबुनदानी खरीदी, एक स्पून स्टैंड और तीन छोटे-छोटे फूलदान..यानि पांच वस्तुएँ सब समान दाम की. सामान रखने घर में गयी तो भीतर मसालों की गंध भरी हुई थी, शायद पीछे वाले घर से आ रही थी. बाहर आई तो उसकी छात्रा पढ़ने आ गयी थी, धूप में ही बैठे वे, मगर उसकी ओर पीठ करके, वरना आँखों को चुभती है. अभी तक उसने चादर पर फूल पेंट करना शुरू नहीं किया है, जबकि छोटी पेंटर भाभी को गए नौ दिन हो गए हैं, वह सिखा कर गयी थी. नन्हा यदि आज भारत की बैटिंग देखता तो तो बेहद खुश होता, कामले और तेंदुलकर ने बहुत अच्छा खेला, दूसरी इनिंग शुरू हो गयी होगी पर अंदर जाने का उसका मन नहीं है.

इस साल उसे जो डायरी मिली है, वह इतनी बड़ी है कि लिखने में असुविधा होती है, लेकिन यह असुविधा उसे अच्छी लगती है, जैसे प्रिय के दोष भी गुण लगते हैं. सुबह ही है अभी, उसने गुलाब के तीन गमलों की निराई की, वे बनारस से लाए थे ये तीन गुलाब. आज धूप फिर आराम करने चली गयी है और अपनी जगह बादलों को भेज दिया है. रात को ‘तंदूरी नाइट’ देखकर सोयी थी, स्वप्न में दक्षिण अफ्रीका में घूम रही थी, नैरोबी के रेलवे स्टेशन पर. कुछ अंग्रेजों से मिलती है, एक लड़की भी है उनमें और सपने में वह उन पंजाबी दीदी के बेटे की मित्र है. सुबह तक यह स्वप्न सजीव था. नन्हा स्कूल गया है, कल कह रहा था, नहीं जायेगा, क्योंकि स्कूल में लड़ाई बहुत होती है. जुलाई में उसका टेस्ट है पिलानी में, अगर वहाँ दाखिला हो जाये, लेकिन क्या गारंटी है कि वहाँ लड़ाई नहीं होगी और खर्चा भी तो बहुत है, अभी मकान का भी कुछ निर्णय नहीं हो पाया है. कल उसने एक फूल पेंट किया था सफेद चादर पर गुलाबी फूल.

कल रात पहली बार विनोद दुआ का कार्यक्रम ‘परख’ देखा, अच्छा लगा. शाम को वे दो मित्रों के यहाँ गए, एक ने ब्रेड का एक नया नाश्ता खिला दिया और दूसरे ने कचौड़ी, घर आकर वे बिना कुछ खाए ही सो गए. आज नन्हा घर पर ही है, पढ़ाई कर रहा है, बीच-बीच में कुछ पूछ लेता है, अभी लक्ष्मी आई थी, कह रही थी, आलू की क्यारी में चूहे घुस गए हैं, आलू खा रहे हैं, वह आलू निकलना चाहती थी. पता नहीं इस साल इतने सारे चूहे बैग में कैसे हो गए हैं, दवा का असर भी विशेष नहीं हुआ.

आज मन बुझा-बुझा सा है, मन में डर है कि कहीं...थोड़े से दिन ज्यादा हो जाने पर ऐसा मानसिक तनाव उसे हो जाता है, क्या ऐसा औरों के साथ भी होता होगा, जून और नन्हा उसे परेशान देखकर खुद भी उलझन में पड़ जाते हैं. उसने स्वयं से कहा, निराशावादी नहीं होना चाहिए, जो भी होगा ठीक ही होगा. कल शाम वे फिर एक मित्र के यहाँ गए, ताकि कुछ देर मन भूल जाये, शायद वह व्यर्थ ही भयभीत है, जो होना है वह होगा ही, क्योंकि जब बात अपने हाथ में न हो तो उसे वक्त के हाथों में ही छोड़ देना चाहिए.


Friday, February 8, 2013

लहराती अलकें



मौसम में बदलाव आने लगा है, कितनी ठंडी हवा बह रही है, गर्मी का नामोनिशान नहीं. शायद यह सुबह हुई तेज वर्षा का ही असर है. आज दोपहर जून के साथ दो सहकर्मी भी आए थे. वह व्यस्त सुबह की बजाय इस खाली अपराह्न में डायरी लेकर बैठी है. बातें बहुत सी हैं, दिमाग में स्फुलिंगों की तरह आती हैं एक क्षण के लिए चमक दिखाकर चली जाती हैं. यह तो सच है कि आज वह अपने अच्छे मूड्स में से एक में है. ऐसे में कोई कविता भी बन सकती है या...इस हफ्ते अभी तक कोई पत्र नहीं आया. छोटी बहन का स्वास्थ्य अब ठीक होगा, पिछले पत्र में उसने लिखा था. ननद की शादी में शामिल होने उन्हें घर जाने में कुछ ही दिन ही रह गए हैं, उसे कोलकाता से एक साड़ी खरीदनी है और कुछ उपहार भी.
   सर्वोत्तम में एक पंक्ति अच्छी लगी कि लोग लेखक होने का स्वप्न तो रखते हैं पर अकेले घंटों टाइपराइटर पर बैठने की कल्पना नहीं कर पाते, लिखना एकांतिक, वैयक्तिक कर्म है जो समय मांगता है. समय की तो उसके पास कमी नहीं है, लेकिन इतनी अधिकता भी नहीं है. लिखने के लिए कुछ तो मन में होना चाहिए, कुछ कहने के लायक. वह कहाँ से आता है, वह कहीं रखा तो नहीं रहता कि उठाया और लिख दिया, वह तो अंदर से आता है अपने आप, जब कोई विषय लेखक चुनता है तो अब तक का सारा ज्ञान उस विषय के बारे में याद आने लगता है. धीरे धीरे पर्दे हटने लगते हैं और पर्त दर पर्त उधड़ती चली जाती है. जैसे सबसे सामान्य विषय है प्रेम, जितना सामान्य उतना ही असामान्य - लाखों प्रेम कहानियाँ लिखी जा चुकी हैं फिर भी हर कहानी  नई लगती है. जब किसी को बिना मांगे अपने आप ही सबका प्रेम मिलता रहता है, तो उसका महत्व पता नहीं चलता, फिर एक दिन जब कुछ अधूरेपन का अहसास होता है तब कीमत पता चलती है अनमोल प्रेम की. सर्वोत्तम के साथ एक उपहार आया है, “सर्वोत्तम मुशायरा” जिसमें कई गजलें बहुत उम्दा हैं. एक शेर उसे काफी पसंद आया जिसका भाव कुछ ऐसा था कि अब दुखी होने से क्या फायदा, राहे इश्क में ऐसा ही होता है. जगजीतसिंह, चित्र सिंह व लता के स्वरों में गायीं गजलें सुनती रही दोपहर बाद.. ऑंखें बंद करके चुपचप लेटकर..बहुत अच्छा लगा उसे.

जीवन में दुःख है, दुःख का कारण है, कारण दूर किया जा सकता है. कारण है इच्छापूर्ति में बाधा, बाधा तभी न रहेगी जब इच्छा ही न हो, इच्छाओं से परे एक मुक्त जीवन की कल्पना ही कितनी सुखद लगती है. उस दिन बुद्ध के ये वचन सुने थे तो अच्छा लगा था, अच्छी बातें किसे अच्छी नहीं लगतीं, पर उन पर अमल... करने का प्रयत्न तो किया जा सकता है न..आज उन्हें सोनू के स्कूल जाना है, छुट्टी के लिए प्रार्थनापत्र देना है और प्रोजेक्ट वर्क के बारे में बात करनी है. रवीन्द्रनाथ टैगोर का एक लेख पढ़ा, creation vs construction, शुरू में अच्छा लगा पर बाद में भाषा दुरूह होने के कारण समझ नहीं आ रहा था. कल वे एक परिचित के यहाँ बरसों बाद गए, अच्छा लगा, लोगों से मिलते-जुलते रहो तभी उनके बारे में पता चलता है.

पूरा अक्टूबर और आधे से ज्यादा नवम्बर बीत गया आज जाकर डायरी खोलने का सुअवसर आया है. इतने सारे दिनों में कई अच्छी बातें और कई बुरी बातें हुईं, लेकिन कुछ लिखे ऐसा मन नहीं हुआ. कोलकाता में ट्रैफिक जाम में जब फंसे थे तो एक कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आयी थीं लेकिन घर लाकर इतने सारे लोगों से मिलकर..तरह-तरह की व्यवस्ताओं में याद नहीं रही. उसने फेमिना से जून के लिए कुछ बातें नोट कीं, बालों की देखभाल के लिए, कह रहे थे, उनके बाल झड़ने शुरू हो गए हैं.  
  

Friday, July 6, 2012

खेल-खिलौने


कल जून के साथ एक छोटी सी दुर्घटना घट गयी, उसकी बाइक मोड़ते समय फिसल गयी. जल्दी आ गए थे वे, नूना उस समय बाहर वाले कमरे में कपड़े प्रेस कर रही थी. नन्हा पास ही खेल रहा था कि देखा उसके दायें बाजू में पट्टी बंधी है, पर उसने कहा मामूली खरोंच है और उसके बाद आज सुबह तक रोज की तरह सभी कार्य किये. कल तक तो वे बिल्कुल ठीक हो जायेंगे. कल घर से चिट्ठी आयी, सबसे मीठी चिट्ठी माँ का होती है, अब उनकी यात्रा में केवल पांच दिन रह गए हैं.

लगभग एक माह पश्चात उसने पुनः डायरी खोली है. कुछ दिन यात्रा में निकल गए कुछ उसकी तैयारी में फिर वापस आकर पुनः घर सहेजने में. नन्हा आज पांच माह का हो गया उसे ट्रिपल एंटीजन व पोलियो की तीसरी खुराक देने आज अस्पताल ले गए थे. सुबह जब वापस आया तो ठीक था पर दोपहर से ही बेहद परेशान है. पहली बार इतना रोया है. जून उसे इस हालत में छोड़कर ऑफिस भी नहीं जाना चाहते थे. इस समय सोया है. जो भी घर में आता है उसे देखकर बहुत खुश होता है. सभी के बुलाने पर हंस देता है, अपनी प्यारी सी हँसी. उसे कुछ होता है तो वे दोनों कितने परेशान हो जाते हैं. लगता है उसका पेट भी ठीक नहीं है. कल परसों उसे आलू खिलाया था व बिस्किट भी, शायद इसी का असर होगा, अभी तक तो वह सिर्फ दूध व सेरेलक पर था.

आज नन्हा ठीक है, कल रात वह कई बार उठा पर जल्दी ही सो जाता था. इस समय पेट के बल लेट कर सामने पड़े खिलौने को पकड़ने की कोशिश कर रहा है, इस तरह लेटने से वह जल्दी ही थक जाता है. अब वह सीधा होकर सर्वोत्तम से छीना-झपटी कर रहा है, पढ़ने का या कुछ भी करने का उसका एक ही तरीका है, वस्तु को सीधे मुँह में ले जाना ऐसा न कर पाने पर शोर मचा कर गुस्सा दिखाता है. सोया रहे तो उठते ही खिलौना उठा लेता है. वे यदि दूसरे कमरे में हुए तो उसके खिलौने की आवाज से ही समझ जाते हैं कि वह उठ गया है.
क्रमशः