मेरी माटी मेरा देश
आज सुबह का आरंभ ‘ध्यान’ से हुआ।देह से बाहर अनंत आकाश में विचरने का अनुभव! आत्मा रूपी हंस देह रूपी पिंजरे से ध्यान में ऊपर उड़ जाता है। संभवत: इसी को संतों ने गाया है, “चल हंसा उस पार”। उसके बाद वे टहलने गये। रास्ते में ही समाचार सुने, फिर कल के “मन की बात” की रिकार्डिंग। मोदी जी ने कई जानकारियाँ दीं, पंद्रह अगस्त की तैयारी के लिए, प्रेरित किया। ‘मेरी माटी मेरा देश' अभियान में भाग लेने को कहा। जिसका उद्देश्य वीर शहीदों को श्रद्धांजलि देना है। आज़ादी के अमृत महोत्सव के समापन कार्यक्रम के रूप में इसमें देश के कोने-कोने से सात हज़ार पाँच सौ कलशों में मिट्टी और पौधे लाये गये हैं।हर ग्राम पंचायत में अमृत वाटिका भी लगाई गई है। लोकसभा में अभी भी गतिरोध बना हुआ है। इतना अवश्य हुआ है कि जो अविश्वास प्रस्ताव आने वाला था, वापस ले लिया गया है।
जून ने सुबह के नाश्ते में आज बिना किसी तरह की मदद लिए अकेले ‘दोसा’ बनाया, नारियल की चटनी व सांबर भी ! उन्हें दक्षिण भारतीय भोजन खाना और बनाना दोनों समान रूप से पसंद है। दोपहर को उसने मानव कौल की एक पुस्तक पढ़ी, जिसका नाम भी “तुम्हारे बारे में” है।अच्छी है, छोटी-छोटी यादें हैं, विचार हैं, जो विभिन्न यात्राओं के दौरान लेखक की कलम से उतरे। वह सच को कितनी आसानी से व्यक्त कर देते हैं।लेखक ने एक अन्य लेखक विनोद शुक्ला की तारीफ़ की है, मौक़ा मिलने पर उन्हें पढ़ेगी। पापा जी से बात हुई, उन्होंने भी गुरुजी की तरह कहा, ध्यान में कुछ करना नहीं है, बस चुप होकर बैठ जाना है। वह ओशो को सुनते हैं और सुनते-सुनते आत्मभाव में दृढ़ होते जा रहे हैं।उन्हें अपने वृद्ध होने का जरा भी अहसास नहीं होता।बानवे वर्ष की उम्र में वह स्वस्थ हैं और मानसिक रूप से सबल भी। उसकी कविता की तारीफ़ की उन्होंने।
कल उसकी एक लंबी-चौड़ी, अच्छे-ख़ासे डील-डौल वाली महिला से मुलाक़ात हुई, जो पहले पार्लर चलाती थी। कोविड के दौरान बंद कर दिया। अब बुलाने पर लोगों के घर जाती है। दो भारी बैग उसके पास थे, एक हाथ में दूसरा पीठ पर। घर बैठे सैलून जैसी सुविधा देनी हो तो सारा सामान चाहिए। उसने बड़े गर्व से बताया, बेटे का नाम संमित विहान है, जो पढ़ाई में होशियार है। वह भक्तिभाव से भरी हुई थी। हनुमान जी पर गहरी श्रद्धा है और देवी को भी मानती है। उसकी बातें सुनकर अच्छा लगा। प्रभु की कृपा ही माननी चाहिए यदि किसी के अंदर भक्ति का भाव जगा है।
आज पूर्णिमा है, अभी-अभी आकाश में चन्द्र दर्शन हुए, तस्वीरें भी उतारीं। शाम को वे आश्रम गये थे, राधा कुंज में बैठे, जहाँ बहुत सी नयी वस्तुएँ आ गई हैं। कुछ नये फ़व्वारे, नयी बेंच और नयी मूर्तियाँ भी। हवा शीतल व तेज थी। झील में कुछ पक्षी बैठे थे, जो उनके जाते ही उड़ गये। वहाँ से वे शिव मंदिर गये। कुछ देर बैठकर ध्यान किया, गुरुजी की आवाज़ में शिव मंत्र का जाप चल रहा था। शिव की उपस्थिति चाहे अदृश्य हो पर आश्रम में हर पल गुरुजी की उपस्थिति का अहसास हो रहा था।वह हर पत्ते, हर सरंचना पर, हर कहीं मौजूद थे।लग रहा था, जैसे उनके क्षेत्र में वे अनाधिकार तो प्रवेश नहीं कर रहे। उन्होंने ऐसे कौन से पुण्य कर्म किए थे, जो इस पवित्र आश्रम में जब चाहें जा सकते हैं।
सुबह टहलते समय जून के साथ ध्यान पर कुछ बात हुई। सांसारिक वस्तुओं के अतिरिक्त कोई सुख का स्रोत है तो वह “ध्यान” है। जब एक बार भीतर इसका अनुभव हो जाता है, तब अपने आप ही मन जगत से उपराम होकर भीतर ठहरना सीख जाता है। आज शाम वे इस्कॉन मंदिर गये, राजाधिराज मंदिर, या राधाकृष्ण मंदिर, जो एक पहाड़ी पर बना, एक विशाल भव्य मंदिर है। बड़े लंबे-लंबे गलियारे और और सुंदर मंडप। ऊपर से दूर-दूर तक के नज़ारे और इमारतें दिखायी देती हैं। आरती का समय हो रहा था, सो उन्होंने उसमें भाग लिया, बाद में प्रसाद भी ग्रहण किया। आज नूना ने ओबीए की वरिष्ठ सदस्या के लिए एक कविता लिखी, जो उन्हें लंच पर ले गई थीं। सभी को अच्छी लगी, उनकी बेटी ने अपने पारिवारिक समूह में भी भेज दी है। कुछ पुरानी कविताओं की मात्राएँ दुरस्त कीं। कुछ देर ‘सावित्री’ का अनुवाद सुना।इस महाकाव्य को लिखने के पीछे कितना महान उद्देश्य था श्री अरविंद का। परमशक्ति को धरा पर उतार लाने की कल्पना ही कितनी महान है। मानव तो भगवान को दूर बैठाकर ही प्रसन्न हो जाता है।उपनिषदों में लिखा है, परमात्मा एक था और उसने बहुत होने की इच्छा प्रकट की। मानव जीवन का उद्देश्य है, परमात्मा को अपने माध्यम से व्यक्त होने देना, सदा सजग होकर जीना तथा भगवद् संकल्प को सत्य सिद्ध करना। उसने श्रीमाँ के वचनों पर आधारित एक चर्चा भी सुनी थी। जिसमें बताया गया था, आत्मा किस तरह शरीर और मन से जुड़ती है। कभी-कभी तो मन ही प्रधान होता है, आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती भीतर ! कितनी अनोखी बातें हैं ये। यदि कोई ध्यान से देखे, मन की सारी इच्छाएँ दूसरों को लेकर होती हैं। कभी उन्हें स्वयं को सिद्ध करना है, कभी कुछ दिखाना है अथवा कुछ देना है। गुरुजी कहते हैं, एक क्षण के लिए यदि कोई सोचे, दूसरा कोई है ही नहीं, तो उसे कितनी शांति अनुभव होगी। मन की सारी दौड़ ख़त्म हो जाएगी।
आज सुबह वे मुख्य सड़क पार करके एक नयी बन रही सोसाइटी में टहलने गये, प्लॉट्स कटे हुए थे और सुंदर बगीचे भी तैयार हो गये हैं। ‘एलिमेंट ऑफ़ अर्थ’ नामकी यह जगह भी उसी समूह की है जिस समूह की उनकी यह सोसाइटी है। शाम को वे पहले एक मित्र दंपत्ति के घर गये, फिर वहाँ से थरालू स्टेट लेक से होते हुए पूरे दो घंटे चलकर वापस आये। रास्ते में कुछ तस्वीरें भी उतारीं। उनके लिए यह रास्ता देखा हुआ था, पर मित्रों के लिए रास्ता बहुत लंबा था। रास्ते में बाइक पर जाते हुए एक-दो परिचित मिले, जो उन्हें घर से इतनी दूर देखकर आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे। कल उन्हीं मित्रों के साथ इस्कॉन मंदिर भी जाना है। जून को गाड़ी चलाने में अब जरा भी दिक़्क़त नहीं होती। आज सुबह एक महिला ने उनका फ़्लैट किराए पर लेने के लिए कुछ अग्रिम धनराशि दी, पर शाम को उनका फ़ोन आया, पति का तबादला मुंबई हो गया है, सो वे लोग शीघ्र ही यहाँ से चले जाएँगे। वाक़ई जीवन कितना अनिश्चित है !
कल शाम वे मंदिर गये थे।उनके मित्रों को भी मंदिर की विशालता तथा भव्यता ने मोह लिया। उन्होंने राधा-कृष्ण के साथ अन्य देवी-देवताओं के विग्रहों के दर्शन किए, दान किया, प्रसाद लिया, लड्डू-पेड़े ख़रीदे और सूर्यास्त के चित्र उतारे।आज शाम एक बिलकुल ही नये रास्ते पर गये। अगरबत्ती फ़ैक्ट्री से होते हुए प्रकृति फार्म पर पहुँचे, एक घंटे में घर वापस आ गये। रास्ता अच्छा था, दो झीलें मिलीं। आजकल उन्हें नये-नये रास्तों पर टहलना अच्छा लगता है। शाम को नन्हे का फ़ोन आया, कल दस बजे तक पहुँच जाएगा। संभवत: वे सब बैंगलोर के प्रसिद्ध विशाल उद्यान लाल बाग जायें।
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