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Friday, September 21, 2018

दादा-दादी दिवस



आज सुबह टीवी पर सुंदर वचन सुने थे. ज्ञान रत्नों से आत्मा को अपना श्रृंगार करना है, फिर उस  ज्ञान का उपयोग करना है. सुने हुए को यदि व्यवहार में नहीं लाया, अपना संस्कार नहीं बनाया, तो सुनना व्यर्थ ही है. योग की शक्ति से ही ज्ञान को भीतर स्थिर किया जा सकता है, अन्यथा स्वंय को छलना ही कहा जायेगा. परमात्मा से यदि संबंध जुड़े तो आत्मा पवित्र बन जाती है, पवित्रता की शक्ति स्वतन्त्रता की शक्ति है. पवित्र आत्मा को कर्मों के बंधन नहीं बांधते. पञ्च तत्वों से बना यह तन भी तब आत्मा को बंधन नहीं लगता, वह इसका आधार लेकर जगत में लीला करती है. वह देह में रहकर भी अशरीरी ही रहती है. ऐसी स्थिति में दुःख का नाम भी नहीं रहता. इसी खुशी में आत्मा शरीर से मोह निकाल देती है. यदि देह से ममत्व है तो आत्मा बंधन में है, जब तक पवित्र नहीं बने हैं, तथा कर्मातीत अवस्था नहीं हुई है, तब तक विदेह भाव सिद्ध नहीं होता. देह सहित सब वस्तुओं से ममत्व हटा देना है. जब देह इस स्थिति में नहीं है कि आत्मा स्वयं आनंद में हो और अन्यों को आनन्द बांटे तो नई देह लेने का वक्त आ गया है, तब आत्मा नई राह पर निकल पडती है. मक्खन से ज्यों बाल निकल जाता है, वैसे ही देह से आत्मा आराम से निकल जाती है, यदि देह में ममत्व नहीं है.
स्कूल में दादा-दादी दिवस मनाया जा रहा है, उसे एक भाषण देने के लिए कहा है. दोपहर को कुछ लिखने बैठी तो बचपन के कितने ही चित्र सम्मुख आने लगे. दादी से सुनी कहानियाँ और दादा के यूनानी दवाघर से खाए स्वादिष्ट चूर्ण. लगभग दस वर्षों तक वे सब साथ रहे. उसके बाद भी समय-समय पर मिलते रहे. आजकल कम ही बच्चों को दादा-दादी का साथ मिल पाता है.

रात्रि के आठ बजे हैं. चार दिनों के बाद आज कलम उठाई है. ब्लॉग पर आज कुछ भी पोस्ट नहीं किया, फेसबुक पर तस्वीरें अवश्य पोस्ट कीं. कल बड़े भाई चले गये, जाते समय उनका भी मन भर आया था, दिन भर मन थोड़ा उदास रहा, पर वक्त के साथ भावनाएं अपने आप ही सम्भल जाती हैं. उन्हें यकीनन यहाँ रहना अच्छा लगा होगा. जून जब से आये हैं, उन्हें सर्दी-जुकाम की शिकायत है, ठंडे देशों से ही शायद यह सौगात मिली है. उन्हें नीचे बैठने में दिक्कत हो रही है, सो कुछ देर कुर्सी पर बैठकर प्राणायाम किया. दोपहर को एक सखी के घर गयी उसकी सासुमाँ का श्राद्ध था. उसके बाद बच्चों की योग कक्षा में, अगले हफ्ते गाँधी जयंती मनाने के लिए उनसे कहा है. कुछ सार्थक होना ही चाहिए. स्वच्छता अभियान के लिए कुछ करे ऐसा भी मन में आता है. अपने समय और शक्ति का पूरा उपयोग करना होगा उसे, एक-एक क्षण का उपयोग करना होगा. जून कल से दो दिनों के लिए गोहाटी जा रहे हैं. कल से दीवाली की सफाई भी आरम्भ करनी है. पुब्लिक लाइब्रेरी से आयुर्वेद पर एक किताब भी लायी है, उस दिन भाई को लाइब्रेरी दिखने ले गयी थी, वहीं मिली थी. काफी अच्छी किताब है.
मौसम आज भी सुहाना है. पिछले दिनों लेखन व साधना में जो गतिरोध उत्पन्न हुआ, उसे पटरी पर लाने का सुंदर अवसर मिला है. सुबह स्कूल गयी. बच्चों को योग सिखाया. कुछ बच्चे वाकई करना चाहते हैं, पर अन्यों के कारण कर नहीं पाते. शिक्षिकाएं यदि अपनी-अपनी कक्षा के बच्चों पर थोड़ी नजर रखें तो सभी शांत रह सकते हैं. उसने सोचा अगली बार यदि ऐसा हुआ तो वह स्कूल इंचार्ज से कहेगी. प्रधानाध्यापिका कुछ दिनों के लिए बाहर गयी हैं. उनकी माँ वृद्धा हैं, उन्हें भूलने का रोग हो गया है. भाई विदेश में रहते हैं. समाचारों में सुना, प्रधानमन्त्री ने पाकिस्तान के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाने का निर्णय लिया है.


Saturday, May 12, 2018

बहते हुए कमल



आज सुबह आत्मभाव में रहने का अनुभव कितना प्रबल था, देह स्वयं की अनुमति के बिना हिल नहीं सकती, बिलकुल जड़ हो गया था शरीर. भीतर से किसी के कहते ही उठकर बैठ गया. मन भी आत्मा के सम्मुख विवश है, वह लाख कहता रहे पर जब तक अन्तर्वासी हामी नहीं भरता, उसकी बात का क्या अर्थ है, तभी तो वे मन से जिन वायदों को करते हैं, उन्हें टूटने में देर नहीं लगती, क्योंकि किसी गहराई में वे स्वयं ही उन्हें पूरा करना नहीं चाहते. आत्मा तक पहुंच होगी तभी तो उसकी ‘हाँ’ या ‘न’ को समझ पाएंगे. ध्यान के सिवा आत्मा को जानने का कोई तरीका नहीं है.

कल रात को कितना सुंदर स्वप्न देखा. नदी किनारे कुछ ऊँचाई पर एक कच्ची-पक्की सड़क के किनारे उनका घर है. ऊपर से नदी दिखती है. पानी में हजारों की संख्या में लाल कमल बहे चले आ रहे हैं. कितने वास्तविक लग रहे थे. पर उसे विचार आया कि नदी के उस पार जाकर निकट से देखे, फिर फूल समाप्त हो गये. पानी बह रहा था और उसमें एक पतली सी नौका थी, जिसके द्वारा नदी को पार किया जा सकता था. तभी अचानक स्वप्न बदल गया. अब एक वाहन में बैठकर वह सड़क के अंत तक जाती है. वापसी में एक बहुत बड़ा सा शेर पानी से निकल कर सड़क किनारे स्थित पर्वत पर चढ़ जाता है. ड्राइवर भी भयभीत है. शेर बोनट पर आकर खिड़की से सिर अंदर कर लेता है, मृत्यु निकट है पर अचानक वह शेर शांत हो जाता है, वे उसके पंजे बाँध देते हैं और वह उसका चेहरा सहलाती है. वह मित्र बन गया है. कितना अद्भुत था यह स्वप्न ! सुबह नींद भी समय से खुल गयी. क्लब के आयोजन का प्रबंध कार्य ठीक चल रहा है, यकीनन इस बार का कार्यक्रम पहले से अच्छा होगा. परसों पूरा दिन उसी को समर्पित होगा. इस डायरी के पन्ने पर नीचे लिखा वाक्य कितना सुंदर है, उसने सोचा फेसबुक पर उसे पोस्ट करेगी.

We find comfort among those who agree with us, growth among those who don’t.
By Frank A.Clark

कल रात्रि कोई स्वप्न नहीं देखा. आज पढ़ा व कल सुना था कि बायीं करवट लेकर सोना बहुत फायदेमंद है. आज से वही करेगी. मन को व्यर्थ के संकल्पों से बचाना है, जो कुछ बाहर दिखाई दे रहा है, अथवा जिसके बारे में मन सोच रहा है, वह सब प्रतिपल बदल रहा है. भीतर मन की गहराई में जो एक रस, स्थिर, अडोल सत्ता है, वही सदा एक है, उसी में टिकना है, वह ऊर्जा का स्रोत है. मन के व्यर्थ विचार उसे व्यर्थ बहाना है. वही ऊर्जा कविता बन सकती है, प्रेम, ज्ञान और शांति बन सकती है. वही उर्जा संसार के हित में कुछ करने की शक्ति बन सकती है. कल नैनी के पुत्र के अन्नप्राशन में गयी. उसे अच्छी तरह पाल रहे हैं ऐसा लगा, काफी चुस्त है और ठीक बढ़ रहा है. आज माली ने एक नई क्यारी खोदी, उनके सुंदर बगीचे में एक और कदम ! आज धूप में बैठने का भी मुहूर्त निकला है, अंदर काफी ठंड है, यहाँ धूप में कितनी राहत है. पड़ोस के घर में मजदूर काम कर रहे हैं, नये पड़ोसी आने में अभी समय लगेगा. आज एक पाकिस्तानी गीत देखा, सुना, जो उन बच्चों की याद में बना है जिन्हें आतंकवादियों ने स्कूल में ही मार दिया था. आतंकवादी निरीह बच्चों तक को नहीं छोड़ते. समाचारों में सुना एक नया वायरस निकला है जो कई देशों में तबाही मचा रहा है, जिसका इलाज अभी खोजा नहीं गया है, लेकिन यह वायरस आया कहाँ से ?

आज का सारा दिन क्लब में गुजरा. सुबह सामान्य थी, वे प्रातः भ्रमण के लिए गये. तत्पश्चात तैयार हो ही रही थी की एक सखी का फोन आया. वह बुला रही थी. दोपहर को जून के साथ ही लंच के लिए लौटी और उन्होंने ही वापस जाते समय छोड़ दिया. शाम को फिर एक बार घर आई नाश्ते के लिए और उसके बाद रात्रि साढ़े आठ बजे. गोहाटी, जोरहाट, तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, मार्गरेट तथा स्थानीय आस-पास के कितने ही डिजाइनर और वस्त्र विक्रेताओं ने अपने स्टाल लगाये थे. इसी तरह का आयोजन दो माह बाद एक बार और करना है. जून ने कहा, वह उस दिन कहीं घूमने चले जायेंगे, सम्भवतः दिन भर अकेले रहना उन्हें खल गया है. हो सकता है उनका कोई टूर अपने आप ही तभी निकल आये.   


Monday, March 26, 2018

अंतरलोक का जाल



फिर एक अन्तराल, आज पाँच दिनों बाद लिखने का सुयोग मिला है. जून कल देहली गये हैं और वहाँ से सूरजकुंड जायेंगे, जहाँ एक दिन की कोई कांफ्रेस है. सो इस समय किसी भी कार्य की शीघ्रता नहीं है. साढ़े दस बजे हैं, कुछ देर पहले वह विशेष बच्चों के स्कूल से आई है. वहाँ बच्चों को व्यायाम करवाया और जून के लाये रेनकोट आदि दिए. लडकियों का हॉस्टल भी बन गया है, उसके लिए कुछ नियम आदि के लिए कुछ सुझाव उससे मांगे थे, लिखकर दिए. शाम को मीटिंग में जाना है. आज मन एक गहन चिन्तन में डूबा है. कल देर शाम को क्लब से फिल्म देखकर अकेले लौटते समय मन में जो भय की लहर दौड़ी वह व्यर्थ थी. भय का एक संस्कार कहीं गहरे बैठा है मन में, जो हल्की सी उत्तेजना से उभर आता है, लेकिन इससे मुक्ति पानी होगी. रात को नींद में थी, अचानक कुछ गिरने की आवाज आई. वही संस्कार जाग गया और मन ने कैसे-कैसे दृश्य दिखाने शुरू कर दिए. चाहिए तो यही था कि रौशनी करके देख लेती क्या गिरा है पर भय के कारण मन कल्पना करने लगा. एक स्वप्न में देखा, जून भी हैं और वे दोनों देखने गये हैं कि कौन सी तस्वीर गिरी है. फिर पूजा के कमरे में जाकर देखते हैं, कम्प्यूटर गायब है, यानि कोई चोर आया था. कितना स्पष्ट था सब कुछ. दूसरे स्वप्न में गैलरी में कोई पीला पेंट बह रहा है, जो छत से आती किसी पाइप से आ रहा है. छत पर देखा तो नैनी है, उसने एक प्लेट में पीला रंग रखा है, पानी उस पर से बह कर आ रहा है. माया इस तरह मानव को नचाती है. ये स्वप्न किस तरह उन्हें भ्रमित करते हैं, ये उनकी ही कल्पना होते हैं अक्सर. फिर सुबह उठी तो स्वयं पर ही आश्चर्य हो रहा था, क्या इतने दिनों की साधना भी भीतर का भय नहीं निकाल पायी. ध्यान करने बैठी तो राज खुलने लगे. सबके मूल में है मृत्यु का भय, यानि देह छूट जाने का भय. एक स्वप्न ने ही यह भ्रम पैदा कर दिया है कि अभी बीस वर्ष तो और जीवन है ही, सो बीस वर्ष तक देह को बचाए रखना होगा, पर कौन जानता है, कौन सा पल अंतिम होगा. देह बनी रहे इसलिए व्यायाम के प्रति भी गहन आसक्ति है. फिर दूसरे के शब्दों को, दूसरे के ज्ञान को प्रस्तुत करना, यह तो चोरी का संस्कार है, इसी कारण कई बार मन में यह भाव आता है कहीं चोरी तो नहीं कर रहा कोई उनकी. उनका स्वयं का मन जो कृत्य करता है, उसी की आशंका उन्हें होती है. संसार तो दर्पण है, उनका खुद का मन ही उसमें झलकता है. भावों की चोरी तो महानतम चोरी है. जब तक मन पूरी तरह से भय व आशंका से मुक्त नहीं हो जाता, समाधि नहीं घटती और समाधि ही तो लक्ष्य है. परमात्मा उसके भीतर के साारे विकारों को एक-एक कर दूर करने में उसकी सहायता कर रहे हैं. वृथा बोलना तो छूट गया है पर वृथा सोचना नहीं छूटा है, उसे भी छोड़ना होगा, मन को खाली करना होगा !

कल कुछ नहीं लिखा, सुबह बंगाली सखी के यहाँ गयी, वृद्धा आंटी से मिली. दोपहर बाद प्रेस, शाम को योग कक्षा और ऐसे ही दिन बीत गया. आज सुबह क्लब की एक सदस्या के साथ बाजार गयी, रेशमी कपड़े से बने गुलाब के फूल लेने थे, वार्षिक उत्सव के लिये, अगले हफ्ते मिलेंगे. वह थाईलैंड जा रही है, दो सप्ताह बाद लौटेगी. उसे सभी सदस्याओं के नामों की नई सूची बनानी है. योग पर भी कुछ और लिखना है. इस समय दिन के साढ़े तीन बजे हैं. जून दिल्ली से आ चुके हैं पर आते ही सीधे दफ्तर चले गये, शायद पांच बजे तक आयेंगे. ड्राइवर सामान दे गया है, ढेर सारे फल लाये हैं, देसी-विदेशी दोनों तरह के. एक स्टील का पतीला और छह कटोरी-प्लेट्स. उन्हें खरीदारी करने में काफी आनन्द आता है. परमात्मा की कृपा है कि इस समृद्धि के योग्य बनाया है. आज सुबह उठने से पूर्व एकतारता का अनुभव हो रहा था, तैलधारवत ध्यान का अनुभव ! परमात्मा के लोक में अपूर्व शांति है, उस शांति का प्रस्फुटन उन्हें उनके विचारों, कार्यों और शब्दों द्वारा करना है, यही तो आध्यात्मिकता है. रामकृष्ण परमहंस की कथा पढ़ते समय कितना आनन्द आता है. वे जीते-जागते परमात्मा ही थे, जैसे सद्गुरू हैं. उनका सान्निध्य उसे इस जन्म में मिलेगा अथवा नहीं ? किन्तु परमात्मा के साथ अभिन्नता का अनुभव जिसे होता हो, उसके लिए संत सान्निध्य का क्या अर्थ है, सद्गुरू के पास रहकर भी कुछ लोग भीतर के लोक में प्रवेश नहीं कर पाते हों शायद. दीदी कुछ दिनों के लिए व्हाट्सऐप ग्रुप से चली गयी थीं, फिर लौट आई हैं और ग्रुप का नाम भी बदल दिया है, भाई ने नया नाम दिया है, अच्छा चिह्न है यह, सबके मध्य दूरी कम होगी.

Wednesday, January 31, 2018

पुनर्नवा- बाज पक्षी


कल शाम जून आ गये. सुबह जब वे उठे वर्षा हो रही थी. छाता लेकर प्रातः भ्रमण के लिए गये. आज पुराने अखबार व वर्षों से सहेज कर रखीं पत्रिकाएँ रद्दी वाले को दे दीं. जीवन आगे बढ़ता जाता है, वे पुरानी वस्तुओं को व्यर्थ ही सहेजकर बैठे रहते हैं. कल एक पुरानी परिचिता का फोन आया, वह दो माह बाद दादी बनने वाली हैं. जून के सहकर्मी की पत्नी से भी बात हुई. वे बच्चे का आगमन शल्य क्रिया द्वारा चाहते हैं. आजकल सामान्य प्रसव को भी लोग छोड़ते जा रहे हैं, भारत में कुछ ज्यादा ही. परसों पुस्तकालय से रसेल की यूरोपीय दर्शन पर लिखी पुस्तक लायी थी, कठिन है, फिर भी प्रयास तो करना है. आज ब्लॉग पर यात्रा विवरण प्रकाशित किया.

आज मौसम धूप भरा है. गर्मी बढ़ गयी है. उसे चाय की जगह अब शरबत पीना शुरू करना होगा. दोपहर को भीतर किसी ने कहा, मन के कहे में जो चलेगा उसे परिणाम तो भुगतना होगा. शब्द कठोर थे. फेसबुक पर रश्मिप्रभा ने भी लिखा, जानते हुए कि आग में हाथ डालने से जलेगा, फिर भी लोग डालते हैं. होश जगाना है, प्रतिपल होश जगाये रखना है. ऊर्जा जो इतनी कीमती है, बेहोशी में यूँ ही बही जाती है. सुबह उठकर सबसे पहला काम यही करना है, रात को सोने से पूर्व भी होश जगाना है और दिन भर भी इस बात का ध्यान रखना है. भीतर का मौन जितना प्रगाढ़ होगा, होश बढ़ेगा. होश जितना बढ़ेगा, मौन गहरा होगा. सुबह उठी तो स्वप्न जैसा कुछ चल रहा था, व्यर्थ का मनोराज्य..जो कभी-कभी जाग्रत में भी चलने लगता है. आज जून को आने में देर हो रही है. बाहर से कुछ लोग आये हैं, सम्भवतः उन्हीं के साथ व्यस्त होंगे. उसने मोबाइल पर सद्गुरू का एक संदेश सुनना आरम्भ किया, कितना सुंदर ज्ञान है और कितनी आसानी से उपलब्ध है. सुबह माली से कहकर ग्रीन हॉउस पर पारदर्शी पोलीथिन लगवा कर पौधों को वर्षा के जल से बचाने का प्रबंध किया. धूप तो मिलती रहेगी. ऐसे ही उन्हें मन को व्यर्थ के चिन्तन से बचना है, सार्थक तो जारी रहेगा ही.

कल ईद का अवकाश था. सुबह विशेष अल्पाहार बनाया. जून शाम को मेहमान कक्ष के लिए नये पर्दे लाये. इस वर्ष क्लब की कमेटी में उसका नाम भी है, वह मीटिंग में गयी. भोजन गरिष्ठ था, सो रात को स्वप्न देखे. एक स्वप्न में उसका पर्स खो जाता है, सारा सामान उसके हाथ में है पर खाली पर्स कहीं रख दिया है. एक स्वप्न में रेत और कोयले के चूरे से भरे गढ्ढे, बड़ी विशाल मशीनें, और काम करते हुए लोग दिखे. अजीब गोरखधन्धा है उनका अवचेतन मन. सुबह टहलने गयी तो कितने शुभ विचार मन में आ रहे थे. मृणाल ज्योति की सहायता किस प्रकार करे, इसके विचार. उनके लिए वे एक कमरा बनवा दें, एजीएम में चाय का प्रबंध कर दें. एक बच्चे की फ़ीस ही दे दें. हर महीने खाद्य सामग्री दें. जून को कहा, उन्होंने भी दान की महत्ता को समझा और बाजार से ढेर सा सामान ले आये. माली के लिए अपनी चप्पल निकाल दी., ट्रैक सूट भी देने को कहा. आज शाम को मौसम सुहावना हो गया था, शायद रात को वर्षा हो.

आज दोपहर अस्पताल गयी थी. उस नन्ही बच्ची को देखने, जो आज सुबह ही जन्मी है दस बजे के लगभग. जून के सहकर्मी की पत्नी ठीक थी, कोई दर्द नहीं हुआ, दवाइयों की मदद से कितना आसान हो गया है बच्चे को जन्म देना. उसकी टीचर माँ ने भी बताया, उनके स्कूल की तीन शिक्षिकाओं के बच्चे भी सिजेरियन हुए हैं. आज सद्गुरू की लिखी पुस्तक ( उन्होंने तो बोला है, उसे संकलित किया गया है) दोबारा पढ़ रही है. समझ कुछ बढ़ी है, सो ज्यादा समझ में आ रही है. फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ी बाज पक्षी के बारे में. वृद्ध होने पर वह अपने को पुनः युवा बनाता है. एक सौ पचास दिनों का समय लगता है उसे अपने पंजों, पंखों व चोंच को तोड़कर पुन नया उगाने में. उसके बाद कुछ वर्ष और जीवित रहता है. उन्हें भी स्वयं को पुनः-पुनः नया करना है. आज सुबह उठी तो मन में कई विचार थे. ध्यान में उत्तर मिले. परमात्मा उनके भीतर ही है, उन्हें उसे देह से पृथक जानना है. जानना तो शुद्ध बुद्धि से ही होगा. मन का दर्पण जब शुद्ध होगा तभी उसमें वह झलक दिखायेगा. उनका जीवन विशाल हो, प्रेममय हो तथा उस परमात्मा की गवाही देने वाला हो तभी मानना होगा उसको उन्होंने प्रेम किया है. अगले माह राखी है. उसके लिए सामान लाना है. इस माह के अंत में गुरू पूर्णिमा है. साधना का फल है सेवा, अब यही मन्त्र है जिसे उन्हें जपना है. क्लब का काम भी सेवा की भावना से साधना है, तब यह बोझ न लगकर आनन्द ही देगा !  


Monday, December 18, 2017

पीकू और वृद्धावस्था


आज गर्मी ज्यादा है. सुबह धूप निकल आयी थी जब वे प्रातः भ्रमण से लौटे. सुबह नेट पर लिखा, दोपहर को भी. जून को दो कविताएँ भेजी हैं प्रिंट करके लाने के लिए. व्हाट्सएप पर सबसे बात हुई, नन्हे से फोन पर बात हुई वह किसी कांफ्रेंस में जा रहा था. कल की फिल्म अच्छी थी, ‘पीकू’, जिसमें वृद्धावस्था की समस्या को बड़े रोचक ढंग से दिखाया गया है. टिपिकल बंगाली संस्कृति को भी हल्के-फुल्के अंदाज में दर्शाया गया है. जून आजकल बहुत व्यस्त हैं. प्लास्टिक से ईंधन बनाने का एक प्रोजेक्ट है, उस पर काम शुरू किया है. कल टेंगाघाट में एक पाइप लाइन को साफ करते समय हाइड्रोजन सल्फाइड गैस बन गयी थी जिससे आठ लोग बेहोश हो गये. अब सभी ठीक हैं. उसी की जाँच कमेटी का हेड उन्हें बनाया गया है. उनकी क्षमता है काम करने की, तभी आजकल वे समय पूर्व ही दफ्तर के लिए निकल जाते हैं, और दोपहर को वह अक्सर उनके जाने के बाद ही उठती है. अभी-अभी पुनः अहसास हुआ कि व्यर्थ ही ऊपर के दातों पर दबाव पड़ रहा था, वे बेहोशी में ही कितने काम करते रहते हैं. जीवन एक फिल्म की तरह आँखों के सामने से गुजरता जाता है, वे उसे साक्षी होकर देखते रहें तो सब कुछ कितना सुंदर है. परमात्मा तभी इतना आनन्दमय है क्योंकि वह कभी किसी के काम में दखल नहीं देता !

आज सुबह चार बजे से पहले उठी, सुबह रोज की तरह सुहावनी थी. ‘फिटबिट’ शायद कल कहीं गिर गया, मन थोड़ा सा परेशान हुआ पर बुद्धि ने समझा लिया, एक दिन तो देह भी छूट जाएगी, फिर किसी वस्तु के खोने का क्या दुःख करें ? अपने भीतर हजारों खजाने भरे हैं जो अभी तक खोजे भी नहीं गये हैं ! उसने शोकग्रस्त महिला के पिता के लिए एक कविता लिखी.

इक्यानवे वर्ष की उम्र में समोए हैं
बच्चों का सा जोश
युवाओं सी लचक भी तन में
और साधकों का सा होश !

शिवानंद को गुरू माना था
नेहरु से प्रेरित हो किये योगासन
शरीर विज्ञान के ज्ञाता अनोखे
कुंडलिनी शक्ति का किया जागरण !

अष्टांग योग से परिचय पुराना
सुषुम्ना का राज भी गुरू से जाना
खा सकता अधिक कम खाकर ही कोई
कहते, इस सूत्र को सदा अपनाना !

लचीली है बैकबोन
उनकी भी अब तक
सहधर्मिणी को भी योग सिखाया
मुँह की लार भी कीमती शै है
जीने की कला से परिचित कराया !

थोड़ी सी खुराक लेते
सदा गर्म पानी पीते
चमकती त्वचा का यही है राज
पाया है भीतर ज्ञान का प्रकाश
बरसती है बाहर तभी हर पल उजास !

जून अभी तक आये नहीं हैं, वैसे भी आज शनिवार है जब लंच के बाद उन्हें अवकाश होता है. भूख लग रही थी सो उसने सलाद तो खा लिया है, शेष भोजन उनके आने के बाद ही होगा. सुबह से लगातार वर्षा हो रही थी, अभी कुछ थमी है. साप्ताहिक सफाई के बाद घर अच्छा लग रहा है. मृणाल ज्योति के नये हॉस्टल के लिए वे कुछ सामान लाये हैं, अगले हफ्ते जाकर देगी.  नैनी का सातवाँ महीना चल रहा है पर वह आराम से काम कर रही है. कल सुबह बड़ी बुआजी से बात की, वह भाभी के अल्प जीवन के लिए दुखी हो रही थीं. इन्सान किस तरह अपने भयों को छिपाना चाहता है. बात करते-करते अंत में वह प्रसन्न हो गयी थीं. आज सुबह से मन अनंत ऊचाईयों में  दौड़ा जा रहा है, कैसी मस्ती छाई है. एक तितली को मस्त उड़ते देखा, काफी देर तक वह कलाबाजियां दिखाती रही. चेतना तितली के रूप में कितना अनोखा अनुभव करती होगी. परमात्मा अनेक रूपों में प्रकट हुए जा रहा है....

Tuesday, November 14, 2017

नया सवेरा


मृत्यु और जीवन – ६     


रहती है एक अव्यक्त देह..इस देह के भीतर
वह सूक्ष्म देह ही धारण करती है नई देह
इच्छाओं, कामनाओं और अभीप्साओं से बनी है सूक्ष्म देह
जो धारण किये है पिछले जन्मों की स्मृतियाँ
जो जान लेता है यह सत्य  
धारण करता है अपार वैराग्य
और मुक्त हो जाता है वासनाओं और कामनाओं से
क्या अर्थ है बार-बार उसे दोहराने का
जो मिटता रहा है हर बार देह के साथ ही
फिर शुरू हो जाती रही है नई दौड़
हो जाता है जारी एक बार फिर अपने को भुलाने का प्रयास भी
अंतहीन है यह प्रक्रिया
कभी तो जागना होगा
मौत का सच जानना होगा
चक्रव्यूह से निकलना होगा बाहर
अन्यथा बार-बार सहना होगा दर्द
बार-बार बहाने होंगे आँसू
न जाने कितनी बार देखी जा चुकी है यह जीवन की फिल्म
फिर भी नहीं चुकती वासना
फिर-फिर दोहराया जाता है वही खेल 
और खोया रहता है एक भ्रम में जीवन
फिसलता जाता है हाथों से
वह जीवन जो वास्तव में मृत्यु है
मात्र आवरण है जीवन का  !

मृत्यु और जीवन – ७     

मृत्यु से घिरे हुए भला
कोई जी कैसे सकता है
जिसे भय है मरने का वह जी कहाँ पाता है
यात्रा करनी होगी हर चेतना को
अपने आप को जानने के लिए
जगानी होगी प्यास भीतर उस अनाम की
मौत असत्य कर देती है जीवन के अनुभवों को
लेकिन एक ऐसा जीवन भी है जो सत्य है
 परम मुक्ति को प्राप्त आत्मा नहीं धरती देह कोई
क्योंकि नहीं शेष है कोई कामना अब उसकी
मृत्यु एक छाया है जीवन की
उससे कोई भागेगा कैसे
भला लड़ेगा कैसे...
उसका सामना नहीं करता कोई
ड़ाल कर आँखों में आँखें
मुक्त हुआ जा सकता है जानकर ही उसको
ज्ञान से जगाना होगा एक नया सवेरा

जिसमें मृत्यु का कोई नहीं है डेरा !

Tuesday, September 19, 2017

क्रिकेट का विश्वकप


आज होली है, हर बार से कुछ अलग रही आज की होली ! रंग को छुआ भी नहीं, पर अंतर रंग गया हो तो बाहर के रंग और क्या करेंगे. दोपहर को स्वयं को सोते हुए देखा, बिलकुल स्पष्ट, भीतर कोई जाग रहा था और देह शांत थी, श्वास भी गहरी हो गयी थी. बाद में कोई स्वप्न चलने लगा. जब स्वप्न नहीं रहेंगे तभी पूर्ण मुक्ति का अनुभव होगा. इस समय टीवी पर क्रिकेट विश्वकप का मैच चल रहा है. भारत बहुत विषम परिस्थिति में है. पांच विकेट गिर गये हैं. शाम को नाश्ते में लिट्टी चोखा बनाया, होली का विशेष भोजन. बड़ी भाभी अब पहले से बेहतर हैं, भाई शांति से उनकी देखभाल कर रहे हैं.

आज सुबह उठी तो एक स्वप्न की स्मृति बनी हुई थी. वे नन्हे के घर गये हुए हैं. उसे अपने मित्रों के साथ एक विवाह में जाना है. मित्र पहले ही आ गये हैं पर वह स्वयं अभी आया नहीं है. आता है तो कहता है वह नहीं जायेगा, बिलकुल तटस्थ लग रहा है. एक दिन स्वप्न में गुरूजी को कितना स्पष्ट देखा था. एक में तो वह दूर से निकल जाते हैं तेज-तेज चलते हुए, दूसरे में वे उनके निकट हैं, उनका स्नेह बरस रहा है. अज दोपहर को भी बहुत जीवंत स्वप्न थे. एक अनोखी दुनिया उसके भीतर खुल गयी है, जागृत से भी अधिक जीवंत दुनिया. विपासना केंद्र में एक दिन ध्यान के वक्त ऐसा अनुभव हुआ जैसे हाथ में काला पेन आ गया है निब वाला और पलक झपकते ही सारा बांया हाथ काला हो गया, आश्चर्य करे इससे पूर्व ही सामान्य हो गया. एक क्षण में कोई पूर्व कृत्य जैसे सम्मुख आया हो. एक बार तो किसी के खांसने की आवाज ऐसे लगी जैसे कोई वृक्ष गिर गया हो. एक दिन तो स्वयं को देह से पृथक महसूस किया. आज सुबह चार बजे एक बाद उठी. प्रतिदिन की भांति रही दिनचर्या. इतवार था और महिला दिवस भी, सो इडली का नाश्ता जून ने बनाया. शाम को एक विवाह उत्सव में जाना है. कल लेडीज क्लब की मीटिंग है और डेंटिस्ट के पास भी जाना है. नीचे के दातों की स्केलिंग कर दी है, कल शेष करेगा.

आज घर में गुरू पूजा है. तैयारी लगभग हो चुकी है. बड़ी भाभी के लिए प्रार्थना करने का मन होता है. ईश्वर उन्हें शक्ति दे. आज प्रातः भ्रमण से लौटते समय भीतर का वासी कितना मुखर हो गया था. कितने स्पष्ट शब्दों में अपने होने का अहसास दिला रहा था. अब लग रहा है कितने दूर की बात है. सुबह वाकई सतयुग होता है, मन कैसा खिला-खिला सा. दोपहर तक उसी भाव में डूबा रहा मन. तितली पर एक कविता भी लिखी. बगीचे में सुंदर फ्लौक्स खिले हैं, देर से खिले पर बहुत सुंदर हैं. फूलों की बहार है इस समय उपवन में. नन्हे से बात की, वह अपने काम से खुश है, काम ज्यादा है पर उसे कोई शिकायत नहीं है. यू ट्यूब पर श्री श्री के विचार सुने. परमात्मा की उपस्थिति को हर पल अपने होने से अभिव्यक्त करने वाले सद्गुरू कितना बड़ा योगदान समाज, देश और दुनिया को दे रहे हैं.     


Saturday, September 9, 2017

नदी और मौसम


सुबह आठ बजे से नौ बजे तक, दोपहर ढाई से साढ़े तीन बजे तक तथा शाम छह से सात बजे तक सामूहिक साधना होती थी. जिसमें सभी साधकों का पूरे वक्त उपस्थित रहना आवश्यक था. शेष समय में कभी–कभी पुराने साधकों को अपने निवास स्थान पर ध्यान करने के लिए कहा जाता था और कभी-कभी कुछ नये और पुराने साधकों को शून्यागारों में ध्यान करने के लिए कहा जाता था. गोल पगोड़ा में स्थित शून्यागार एक विशिष्ट आकार के छोटे-छोटे ध्यान कक्ष थे, जिनमें अकेले बैठकर ध्यान करना होता था. एक दिन शून्यागार में ध्यान करते हुए अनोखा अनुभव हुआ, जिसमें एक क्षण के लिए स्वयं को देह से अलग देखा, जैसे वह पृथक है और देह बैठकर ध्यान कर रही है. जैसे ही इस बात का बोध हुआ, अनुभव जा चुका था.

विपश्यना आरम्भ होने पर चौथे दिन के उत्तरार्ध से गुरूजी ने शरीर में होने वाली संवेदनाओं पर ध्यान देने को कहा. पहले दिन केवल नाक के छल्लों तथा ऊपर वाले होंठ के ऊपर वाले भाग पर ही, बाद में सिर से लेकर पैर तक एक-एक अंग पर कुछ क्षण रुकते हुए वहाँ होने वाली किसी भी तरह की संवेदना को देखना था. यह संवेदना किसी भी प्रकार की हो सकती थी, दर्द, कसाव, खिंचाव, सिहरन, खुजली, फड़कन या अन्य किसी भी प्रकार का शरीर पर होने वाला अनुभव. मुख्य बात यह थी कि संवेदना चाहे सुखद हो या दुखद, उसके प्रति किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं करनी थी. वे सभी संवेदनाएं स्वतः ही उत्पन्न होकर नष्ट हो जाती हैं, साक्षी भाव से इस अनित्यता के नियम का दर्शन करना था. उनका अंतर्मन न जाने कितने संस्कार छिपाए है और हर पल वे नये संस्कार बनाते चल रहे हैं. उनसे जाने-अनजाने जो भी गलत-सही हुआ है, उसका हिसाब तो चुकाना ही होगा. औरों को देखकर जो द्वेष का भाव मन में जगता है वह भीतर गाँठ बनकर टिक जाता है. प्रकृति का नियम है विकार जगाया तो व्याकुल तो होना ही पड़ेगा. अतीत में जगाये विकार समय आने पर देह पर किसी न किसी रोग के रूप में आकर प्रकट हो सकते हैं. साक्षी का अनुभव होने के बाद राग, द्वेष व मोह के बंधन नहीं बंधते.

आठवां दिन आते आते तो मन भी जैसे दूर खो गया लगता था, देह पर होने वाले सुख-दुःख जैसे किसी और को हो रहे हैं. मन एक असीम मौन में डूबा हुआ है. लगा, सारा विश्व जैसे एक ही सूत्र में पिरोया हुआ है और वह सूत्र उस से होकर भी जाता है, सदा से ऐसा ही था और सदा ऐसा ही रहेगा, यह देह एक दिन गिर जायेगी फिर भी यह चेतना किसी न किसी रूप में तो रहेगी ही. एक दिन गोयनका जी ने कहा, मन और देह दोनों एक नदी की तरह हैं. मौसम बदलते हैं तो नदी भी बदलती है वैसे ही मन और देह के भी मौसम होते हैं. देह का आधार अन्न है और मन का आधार संस्कार हैं जो हर पल बनते-मिटते रहते हैं. मन के किनारे बैठकर जो इसे देखना सीख जाता है वह इससे प्रभावित नहीं होता. 

Thursday, May 11, 2017

चेरी टमाटर


आज भी बादल बने हैं आकाश पर, ठंडी हवा बह रही है. पिताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा. बुढ़ापा एक रोग है, उस पर कई रोग शरीर को लग जाते हैं. बुढ़ापा आने पर मृत्यु का भय भी सताता है और भी न जाने क्या-क्या घटता है मानव के मन के भीतर, पर जो अपने आप को जान लेता है, वह बच जाता है, जगत में कितने ही लोग ऐसे हुए हैं, जो जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझ कर मुक्त हो गये हैं.

पिछले तीन दिन व्यस्तता के कारण कुछ नहीं लिखा. दो दिन क्लब की कुछ सदस्याओं से मिलने गयी, उनकी विदाई के लिए कविता लिखने के लिए कुछ बातें जाननीं थीं. एक दिन होली थी, आज भी गगन पर बदली है. पिताजी अपेक्षाकृत बेहतर हैं. वृद्धा आंटी अभी तक अस्पताल में हैं. कल रात को एक अनोखा स्वप्न देखा. उसने एक छोटी कन्या का हाथ पकड़ा है, पर देखते-देखते वह घुटनों के बल चलती हुई दूर निकल जाती है पर उसका हाथ, हाथ में ही रह जाता है, घबरा कर उसे देखती है तो पता चलता है वह अधजला है, उसे छोड़ देती है और अगले ही पल शरीर से बाहर होने का अनुभव घटता है, देह से कुछ शोर करता हुआ बाहर निकलता है, घूमकर लौट आता है, पूरे वक्त होश बना हुआ था. कल की तरह पहले भी एक बार देह से बाहर का स्वप्न देखा था. परसों एक सुंदर रंगीन तितली को देखा था जिसे वह पकड़ना चाहती है. उसके रंग इतने चमकदार थे कि..कैसे अनोखे से स्वप्न..कुछ कहने कुछ बताने आते हैं पर रहस्य ज्यों का त्यों बना ही रहता है. आज क्लब में मीटिंग है, तीन महिलाओं के लिए तीन कविताएँ भी पढ़नी हैं. सभी तो यहाँ एक डोर से बंधे हैं..परमात्मा की डोर से..

अप्रैल का प्रथम दिन ! पिछले दो दिन फिर व्यस्त रही. शनिवार को घर में सफाई में, कल रात की पार्टी की तयारी में. अच्छा रहा कल रात्रि का आयोजन, सभी लोग आये थे, विवाहित और अविवाहित, तीन नन्हे बच्चे भी थे. अभी कुछ देर पहले मृणाल ज्योति स्कूल से आयी, उन्हें होली की मिठाई दी, रंग लगाया और योग-व्यायाम कराया. यकीनन उन्हें अच्छा लगा होगा, बगीचे के चेरी टमाटर भी ले गयी थी और एक लौकी भी. जून बाजार होकर आने वाले हैं, नैनी के बेटी के लिए एक स्कूल बैग, पानी की बोतल तथा एक कापी लेकर, आज ही उसका दाखिला थोड़ी दूर स्थित एक घर में चलने वाले स्कूल में कराया है.


पिताजी बाहर कुर्सी पर बैठे-बैठे सो रहे थे. उसने जब कहा, थोड़ी देर लेट जाएँ तो कहने लगे, हाँ, परेशान हो रहे हैं वे. क्या कोई ऐसा भी समय आता है जब दुःख से बचने की भी जरूरत महसूस नहीं होती. कोई अपने दुखों से बच सकता है फिर भी नहीं बचता, कैसे विडम्बना है यह. मौसम आज भी बदली भरा है, ठंडा है, सुबह ढेर सा पानी पिया. होली के बाद से ही भोजन गरिष्ठ हो रहा था, मिठाई भी जिसमें शामिल थी, पानी तन की एक औषधि है, जैसे वायु एक औषधि है मन की, शायद अग्नि औषधि है आत्मा की ! इसी महीने एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखनी है एक ! 

Thursday, January 14, 2016

गुलाबी धूप


ज्ञान की प्राप्ति कैसे हो, इसका जवाब हरेक को खुद ही खोजना होगा. सत्य का आचरण हो तो ज्ञान अपने आप प्रकट होने लगता है. वे सत्य का निर्वाह नहीं करते, अनावश्यक झूठ भी बोलते हैं, कभी अहंकार के कारण वे झूठ का आश्रय लेने में नहीं हिचकते. भय और शंका का शिकार फिर उन्हें ही होना पड़ता है. उनके जीवन का हर पल शंका रहित हो, तृप्ति भरा हो, आनन्दमय हो, इसके लिए जरूरी है कि सत्य का आश्रय लें, स्वभाव में टिकें. संसार तो दर्पण है, वे जैसे हैं वैसा ही उसमें दिखाई देगा. संसार तो कोरा कागज है, वे जैसा चित्र उस पर बनाएं वैसा ही दीखता है. परम स्वीकार ही परम स्वतन्त्रता है.

वे देह नहीं हैं देही हैं. देहाध्यास का लक्षण है जड़ता, लोभ, काम, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध तथा अहंकार तथा आत्मा का लक्षण है उत्साह, सृजनात्मकता, उदारता, संतोष, प्रेम ज्ञान तथा निरभिमानता. उन्हें यह अधिकार है कि दोनों में से जो चाहे चुन लें. देहाध्यास की आदत जन्मों-जन्मों से पड़ी हुई है, यह उसी तरह सरल है जैसे पानी का सदा नीचे को बहना, आत्मा में रहने के लिए अभ्यास करना पड़ता है, ऊपर उठना हो तो श्रम चाहिए, गिरने में तो कोई श्रम नहीं है. आज सुबह नींद खुल जाने के बाद भी जो वह नहीं उठी तो स्वयं को देह ही मान रही थी, कल जून द्वारा गलती निकाले जाने पर भीतर जो परमाणु हिले, वह भी देहाभिमान के कारण. कल शाम लोहरी की पार्टी में जो शिकायत भीतर उठ रही थी वह भी इसी कारण थी कि आत्मा में स्थिति नहीं थी, पर इस समय जो भीतर नाद सुनाई दे रहा है, ध्यान में जो अद्भुत रंग दिखे वे आत्मा के कारण हैं. मन, बुद्धि तथा संस्कार के माध्यम से आत्मा ही अपनी शक्ति को दिखाती है, पर वह उनसे परे है. जीवन की सार्थकता इनके पार जाकर उस आत्मा को जानने में है. उसने प्रार्थना की, उसके जीवन से उसकी साक्षी मिले जो अदृश्य है, जो सुक्ष्तं भी है अस्थुल्तं भी. जहाँ सरे द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं और जो सारे विरोधाभासों की जड़ है. वह परमात्मा ही उसका केंद्र है, वही लक्ष्य है, परिधि से केंद्र तक जाना है.

उन्हें जीवन से जो भी चाहिए, वह उनके पास पहले से ही मौजूद है, उन्हें जीवन के लिए जो भी चाहिए वह भी उनके पास है, तो भी वे क्या चाहते हैं कि सारी उम्र बीत जाती है और तलाश खत्म ही नहीं होती. शायद इसलिए कि उन्हें इस बात का पता ही नहीं है कि जो खजाना उनके पास है वह गहरे गाद दिया है और ऊपर इतनी घास उग आई है कि अब लगता ही नहीं कभी यहाँ खजाना रहा होगा. सत्संग के औजार से अब वह घास हटाने का काम शुरू हुआ है, झलक मिलने लगी है. पर मजा तो तब है जब इसे बाँट सकें. अनंत खजाना है तो अनंत शक्ति भी होनी चाहिए बांटने की, क्योंकि बांटने से ये कम होने वाला है नहीं. यह जगत उनसे प्रेम के रूप में उनकी भौतिक उपस्थिति को चाहता है, शांति व आनन्द से उसे कोई सरोकार नहीं. वे दोनों उन्हें स्वयं के लिए चाहिए और जब जगत से कुछ नहीं चाहते तो शक्ति अपने आप प्रवाहित होने लगती है. उसके विचार कुछ स्पष्ट नहीं हो पा रहे हैं, भीतर जो स्पष्ट है वह बाहर आकर कैसे मिलजुल जाता है. घृणा, प्रेम, लोभ, उदारता, क्रोध, ज्ञान, उत्साह, जड़ता ये सभी उनके भीतर साथ-साथ रहते हैं. एक ही शक्ति के दो रूप..तो कौन सा रूप वे बाहर प्रदर्शित करते हैं, इस पर निर्भर करती है मन की शांति ! शांति के बिना आनन्द हो ही नहीं सकता. अध्यात्म की यात्रा कितनी विचित्र है, यहाँ विरोधाभास ही विरोधाभास है. एक पल में लगता है मंजिल करीब है फिर अगले ही पल लगता है अभी तो चलना शरू ही किया है !

हरी घास पर फूलों के मध्य बैठकर गुलाबी धूप का आनन्द लेते हुए डायरी लिखना तथा बीच-बीच में ठंडी हवा से सिहर जाना..इन सर्दियों में पहली बार हो रहा है. प्रकृति का कितना अद्भुत करिश्मा है, बीहू, मकर संक्रांति के आते ही बादल छा गये, ठंड बढ़ गयी, लोग देर रात तक आग तपते रहे और बीहू की छुट्टियाँ खत्म होते ही धूप निकल आयी है. यह जगत कितने आश्चर्यों से भरा हुआ है और जगत्कर्ता भी आश्चर्यों की खान है. उनका खुद का जीवन, तन, मन कितने-कितने आश्चर्यों से भरा है ! प्रकृति में अनंत जीव हैं, उनके भीतर भी लाखों जीव हैं. यह सब कुछ कितना अद्भुत है. आज सुबह उठी तो लगा रात भर में कितने स्वप्न देख लिए. अजीबोगरीब स्वप्न. एक में तो घोर अंधकार में वे सड़क पर बैठकर चल रहे हैं. छोटी ननद का छोटा पुत्र आगे है और वह मध्य में जून पीछे हैं, अँधेरा घुप है पर वे ख़ुशी-ख़ुशी आगे बढ़ रहे हैं. आज जून भी जल्दी उठ गये, कल उन्हें आत्मा को जानने से क्या होता है, इस पर जो भाषण दिया था, उसका असर रहा होगा. जो फ्रेंच नहीं जानता उसे यदि कोई फ्रेंच में समझाये तो उसे क्या समझ में आयेगा. इसी तरह जो आत्मा को नहीं जानता वह परमात्मा के बारे में क्या समझ पायेगा. आत्मा को जानना तो पहला कदम है, वे देह नहीं हैं, आत्मा हैं इस विश्वास को दृढ़ करते जाना है तथा आत्मा में जीना शुरू करना है. इसकी अनुभूति होने लगती है जब वे बार-बार इसका चिन्तन करते हैं, ध्यान करते हैं और देह, मन अदि को स्वयं से अलग देखने लगते हैं. उनका मन हावी नहीं होता, देह स्वस्थ रहती है. बुद्धि विकसित होती है तथा भीतर प्रकाश तथा शांति का वातावरण छाया रहता है. ऐसी शांति जिसकी गहराई नापी नहीं जा सकती !

  

Tuesday, December 8, 2015

झील की तलहटी


जब तक कोई अपनी सारी वृत्तियों को इष्ट के चरणों पर विलीन नहीं कर देता तब तक जीवन में विशेषता नहीं होती. एक बार अन्न का दाना अंधकार में दब जाता है तो ही हजार गुना होकर वापस आता है. सद्गुरू को जब कोई समर्पित हो जाता है तो उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता ! जीवन की सारी भयानकता सद्गुरू के मिलने तक ही होती है, उसके बाद तो केवल भगवान ही भगवान जीवन में रहते हैं ! हर घटना तब उसके लिए शुभ ही होती है. नया दृष्टिकोण, नयी विचार धारा, नया जीवन मिलता है ! उसको भीतर से रस मिल जाता है और वह एकाग्र हो जाता है ! यही एकाग्रता फिर सजगता में बदलती है और सजगता ही ध्यान है, सुरत है, प्रेम है, भक्ति है, ज्ञान है !
ज्ञान तो मिल जाता है पर उसमें टिकने के लिए आसक्ति का त्याग करना पड़ता है. सुख के प्रति आसक्ति और कर्म के प्रति आसक्ति इसमें टिकने नहीं देती. टिकने के बाद तो कण-कण में व्याप्त चेतना का सहज ही अनुभव होने लगेगा.

देह प्रत्यक्ष है, आत्मा परोक्ष है. परोक्ष को पाकर ही एक तृप्ति का, शांति का अनुभव होता है. इस शांति को पाकर यदि राग हो जाये तो यह शांति भी अशांति का कारण बन जाती है. उसके भीतर भी मौन उतर आया है, गहरा मौन, विचार आते हैं पर विचार जैसे ऊपर-ऊपर तैरते हैं, नीचे की झील साफ दिखाई देती है. बस चुपचाप इस झील की तलहटी में बिछी ठंडी गीली रेत पर पड़ी सीपियों में से किसी एक पर उसका ध्यान रहता है. वहाँ से ऊपर जगत के कोलाहल में आने का भी मन नहीं होता. ऐसा ही अनुभव आज ध्यान में हुआ जब डेढ़ घंटे से भी ज्यादा कुछ मिनटों तक वह प्रकाश के समुन्दर में डूबती-उतराती रही. वह प्रकाश अब भी गंध रूप में उसके साथ है !

सद्गुरू वह है जिसके ‘भीतर’ को सारी सुप्त शक्तियाँ धारण करने का मौका मिलता है, वह निस्वार्थ भाव से उन शक्तियों का उपयोग जगत के लिए करता है. उसके भीतर अपार करुणा, अपार कृपा होती है, जो सभी को बिना किसी भेदभाव के मिलती है. उसने साधना इन शक्तियों को पाने के लिए नहीं की होती, वे तो सहज प्रेम के कारण ही चेतना का ध्यान करते हैं, आत्मा में रमन करते हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि इतनी शुद्ध हो जाती है कि वे इस दृश्य जगत के पीछे अदृश्य सत्ता को देख लेते हैं. जगत की क्षण भंगुरता, परिवर्तन शीलता, स्वप्नावस्था तथा नश्वरता को पहचान उसे त्याग देते हैं. स्वरूप से तो नहीं त्याग सकते पर मन से त्याग देते हैं ! उनके पास सारी दृष्टियाँ होती हैं, वह सारे मार्ग बता देते हैं, अपनी अपनी योग्यता व रूचि के अनुसार साधक उनमें से किसी एक पर चलने के लिए समर्थ है !


जीवन का एक सत्य है कि संसार को किसी का मन नहीं चाहिए, उसकी सेवा चाहिए, बस उनका काम होता रहे, मन की किसी को जरूरत नहीं है और यह मन न ही परमात्मा के किसी काम का है, वह तो मन से परे है, तो ध्यान और प्रेम के मार्ग पर इसे मर ही जाना होगा. अहंकार को ही केवल मन चाहिए, यह इसी के बल पर जीता है. ‘मैं’ है तो इच्छा है, डर है, कामना है, सुख है, दुःख है, यदि ‘मैं’ ही नहीं तो इनमें से कोई भी नहीं और तब मन भी नहीं. बिना अहंकार के जीने वाले को हो सकता है यह दुनिया पागल कहे, पर उसकी भी कोई चिंता नहीं, पागल तो हर व्यक्ति यूँ भी हर दूसरे को समझता ही है. हर कोई स्वयं को बुद्धिमान ही जानता है और दूसरे को नासमझ, तो यदि कह भी दिया तो सुन लेना चाहिए. कोई ध्यान के द्वार से लौटा हो या भक्ति के, इसका पता तो चले, कोई रेखा तो हो जो उसे और एक संसारी को नास्तिक को अलग करती हो, पर सद्गुरू यह भी तो कहते हैं कि भेद नहीं है. दो हैं ही नहीं तो भेद हो कैसे, दूसरा कोई है ही नहीं, जो भी हैं वे भी तो उसी परमात्मा का ही रूप हैं. परमात्मा ही विभिन्न रूपों में अपने को व्यक्त कर रहा है. एक बार अपने भीतर प्रवेश मिल गया तो सारे भेद मिट जाते हैं !    

Saturday, May 23, 2015

हरिवंशराय बच्चन की आत्म कथा


आज उसने सुना, जिसका जन्म होता है वह विनाश को प्राप्त होगा ही. आज पुनः उसे कृष्ण मिले, भक्ति भी प्यार की तरह है जो कभी-कभी अपने मुखर रूप में होता है. तन-मन दोनों फूल की तरह हल्के हैं. हृदय में ज्ञान की ज्योति जल रही है, अभी कुछ कितना स्पष्ट है. यह सृष्टि, ईश्वर, प्राणी और इनका आपस में संबंध ! सत्य ही जानने योग्य है, सभी उसी की खोज में हैं. कोई पहली सीढ़ी पर है, कोई पांचवीं तो कोई सौवीं पर पहुंच गया है. जब कोई भीतर-बाहर एक हो तभी उसे अनुभव कर सकता है. उसको जानने के लिए उसके जैसा होना पड़ता है. आज सद्गुरु की आँखों में नमी थी, वह अपने गुरू के प्रति कृतज्ञता का अनुभव कर रहे थे. गुरू का ऋण चुकाना असम्भव है. वह इतना अनमोल खजाना साधक को सौंप देते हैं. सुबह साढ़े चार पर उठे वे, कोहरा भी था और बदली भी. नन्हे को स्कूल भेजा. छोटी बहन को फोन किया वह ‘हवन’ करके अपनी शादी की वर्षगाँठ मना रही है. भांजियों से भी बात की. कल छब्बीस जनवरी के विशेष भोज के लिए सभी सखियों को आमंत्रित किया.

कल का भोज अच्छा रहा. सभी मित्र परिवार आये थे. बाहर लॉन में सब बैठे थे. सुबह कुछ देर परेड देखी. नन्हा नेहरू मैदान में परेड देखने गया था. उसने वापस आने में बहुत देर की. वे परेशान हो गये थे, मन कहीं लग नहीं रहा था. जून को गुस्सा था और उसे चिंता, पर दोनों ही व्यर्थ थे, क्योंकि नन्हा आराम से वहाँ परेड देख रहा था. आज उसने छोटी भाभी से बात की. कल सुबह मंझले भाई ने भी ‘हवन’ करवाया, माँ की बरसी इस तरह उन्होंने मनायी. वे लोग उनके बारे में, उनकी बीमारी व उनके इलाज के बारे में बातें करते हैं, उनके वस्त्र वक्त-वक्त पर दान करते हैं. आज वह भी मन्दिर जाएगी और कुछ दान देगी. माँ कहाँ होंगी कोई नहीं जानता. उनकी आत्मा तो शाश्वत है, वह किसी देह को धारण कर चुकी होंगी और सम्भवतः इस जन्म की बातें भूल भी गयी हों. वे जन्म से पूर्व भी अव्यक्त होते हैं और मृत्यु के बाद भी, बीच में कुछ ही समय तक व्यक्त रहते हैं. इस क्षणिक जीवन में जितने शुद्ध होते जाते हैं, उतना ही मृत्यु का भय कम होता जाता है. अपने उस स्वरूप का अनुभव इसी रूप में होने लगता है जो मृत्यु के बाद अनुभव में आने वाला है. यह रूप तो उन्हें अपनी पूर्वजन्म की इच्छाओं और वासनाओं के कारण मिला है. उनके कर्म यदि इस जन्म में निष्काम हों तो अपने शुद्धतम रूप में प्रकट हो सकते हैं, वैसे भी इस जगत में ऐसा है ही क्या जो उन्हें तुष्ट कर सके !
आज बहुत दिनों बाद सुबह टीवी पर जागरण नहीं सुन पा रही है. केबल नहीं आ रहा है. सुबह वे समय पर उठे, नन्हे को पढ़ने जाना था, गया, पर टीचर नहीं मिले. आज बसंत पंचमी का अवकाश है. आज ही सरस्वती पूजा भी है. उसके लिए तो एकमात्र आराध्य कृष्ण हैं, उन्हीं से सभी देवी-देवताओं का प्रागट्य हुआ है. कल उसने जून से गुस्सा किया जब उन्होंने कहा केबल एक साल के लिए कटवा देते हैं, उसे सुबह के सत्संग का आकर्षण था, पर देखो, आज कृष्ण ने वह भी मिटवा दिया. उन्हें किसी भी वस्तु से बंधना नहीं है. मुक्ति के पथ पर चलना शुरू किया है तो जंजीर यदि सोने की भी हो तो उसे काट देना चाहिए. सतोगुण तक पहुंच कर उससे भी पार जाना होता है सच्चे साधक को, पर वह तो अभी भी तमोगुण का शिकार हो जाती है. कल जून ने उसे ‘हरिवंशराय बच्चन’ की आत्मकथा के तीन भाग  उनकी सर्वश्रेष्ठ कविताओं का संकलन तथा दो अन्य कविता की पुस्तकें लाकर दीं. उनका प्रेम ही तो है यह, वह उसकी हर छोटी-बड़ी इच्छा को पूर्ण करना चाहते हैं, यही प्रेम है, पर वह इसका प्रतिदन नहीं दे पाती है. ईश्वर साक्षी है कि उसके मन में शुद्ध प्रेम जगा है, जो सामान्य प्रेम से थोड़ा अलग है. इस संसार के हर जीव के प्रति, जड़-चेतन सभी के प्रति, उस परम सत्ता के प्रति, पंचभूतों, धरा, आकाश, नक्षत्र, सूर्य तथा चन्द्रमा सभी उसके प्रेम के पात्र हैं. इस प्रेम का कोई रूप नहीं, यह अव्यक्त है, अनंत है और सर्वव्यापी है. इस प्रेम ने उसके स्व को अनंत विस्तार दे दिया है. कृष्ण को प्रेम करो तो वही प्रेम कृष्ण की सृष्टि की ओर भी प्रवाहित होने लगता है !

  

Saturday, November 15, 2014

गॉल ब्लैडर में स्टोन



मन की वृत्ति ऐसी हो कि इस जग को रैन बसेरा ही समझे, जिस तरह पंछी आते हैं, एक-एक तिनका चुनकर लाते हैं और नीड़ बनाते हैं, फिर कुछ दिन रहकर निर्मोही होकर उड़ जाते हैं. वे संग्रह पर विश्वास नहीं करते, अपने कर्मों के भरोसे रहते हैं, पर इन्सान के पास जोड़ने का, संग्रह का व्यसन है. जबकि उसे पता नहीं कि जिन वस्तुओं को वह संभाल कर रख रहा है वे उसकी हैं ही नहीं ! उसकी तो यह देह भी नहीं, पंचतत्वों से बनी यह देह तो प्रकृति की है. साधन रूप में मिली है”. बाबाजी ने आज ये वचन कहे थे सुबह. लेकिन जब तक देह है तब तक तो इसके प्रति कर्त्तव्य का पालन करना होगा. सुबह छोटी बहन का मेल पढ़ा, जून ने जवाब भी दे दिया है. कल दोपहर उसने ‘वनिता’ के लिए दो कविताएँ भेजीं. कल दोपहर लिखने का प्रयास किया पर बात बनी नहीं, कई दिनों से नया कुछ लिखा नहीं, जैसे स्रोत के इर्दगिर्द खरपतवार उग आये हैं अथवा काई जम गयी है. पहले उसे साफ करना होगा, तभी धारा फूटेगी. मन को ऊंचे केन्द्रों में ले जाना होगा, निस्वार्थता का पालन करना होगा. वाणी पर संयम और हृदय में प्रेम, अपने आप में आना होगा जो हम वास्तव में हैं. निर्मुक्त, शुद्ध, समर्थ, पूर्ण आत्मा..जिसे कुछ पाने की चाह शेष नहीं, जो झूठे अहम् का शिकार नहीं, जो परहित के लिए ही जीता है क्योंकि उसका हित इसी में है, जो बांटना चाहता है.

एक सखी की बेटी का बुखार अभी तक ठीक नहीं हुआ है, आज पूरे बाईस दिन हो गये  हैं, उससे बात की, वह फोन पर ही रुआंसी हो गयी. उसने तय किया, कल दोपहर या हो सके तो आज ही वह उससे मिलने जाएगी. शाम को क्लब की मीटिंग है, जाना है, कहीं दबी-छिपी यह इच्छा भी है कि कोई नाटक में उसके अभिनय की तारीफ करेगा. अभी तक कई लोग कह चुके हैं, शायद इसी के पीछे नेता और अभिनेता भागते हैं, खैर, वैसे भी उसे जाना था, क्लब की सदस्यता ली है तो सभा में जाना भी एक कर्त्तव्य है. आज बाबाजी को नहीं सुन पायी, मंझली भाभी को फोन किया, वह भी भाई के गॉल ब्लैडर में स्टोन के आपरेशन को लेकर थोड़ी परेशान थी. कल रात को भाई ने बताया था और रात भर वह डरावने सपने देखती रही, अचेतन मन कैसे भयभीत हो जाता है. समाचारों में हिंदुस्तान, पाकिस्तान के अच्छे संबंधों के बारे में आशान्वित लोगों के विचार सुनकर अच्छा लगता है, भविष्य में वह भी कभी पाकिस्तान जा पायेगी अगर ऐसा हो गया तो !


मानव का जन्म आत्म वैभव का अनुभव करने के लिए हुआ है न कि निराश होकर जीवन की गाड़ी को घसीटते हुए किसी तरह दिन गुजारने के लिए ! जीवन का लक्ष्य ऊंचा होगा तो साधन अपने आप मिलते जायेंगे, आज बाबाजी ने एक सूत्र और बताया कि माह में दो दिन उपवास रखा तो तन-मन दोनों हल्के रहते हैं. कल उनकी मीटिंग अच्छी रही, कार्यक्रम तथा जलपान दोनों ही बहुत अच्छे थे. एक नई सदस्या ने सम्बोधित किया, धीरे-धीरे ही सही सभी अपने खोलों से बाहर आ रहे हैं. उसके नाटक की तारीफ़ भी दो लोगों ने की पर अब लगता है कितना ओछापन है यह उम्मीद पालना, नीचे गिरना ही है. यह छोटी-मोटी वाह-वाही विनम्र नहीं बनाती बल्कि एक झूठा नशा देती है. बड़े-बड़े कलाकार कितने मजबूत होते होंगे भीतर से कौन जानता है ? कल दोपहर वह उस सखी के यहाँ गयी, बेटी का इलाज ठीक चल रहा है, बस वक्त कुछ ज्यादा लग रहा है. कल रात भाई से बात की, आप्रेशन ठीक हो गया. दीदी को फिर से मेल भेजा है, महीने में दो बार उपवास रखने की बात पर अमल करना ठीक होगा !