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Tuesday, September 8, 2020

बारिश की बौछार

 

आज सुबह घर से निकलने के लिए तैयार थे पर न ओला मिली न उबर, काफी देर इंतजार किया फिर नन्हे के मित्र ने कहा, उसकी कार ले जाएँ. आधे घण्टे में ही पहुँच गए. रास्ता बहुत सुंदर है, सड़क भी अच्छी है, गांव से गुजरते हुए, मन्दिरों के दर्शन करते सोसायटी के पिछले गेट से वे घर पहुँचे तो जाली के दरवाजे लेकर कारीगर खड़े थे. जो उनकी प्रतीक्षा ही कर रहे थे. थोड़ी देर में एसी लगाने दो मकैनिक भी आ गए. दोपहर तीन बजे तक दोनों काम हो गये. कुछ देर विश्राम करने के बाद वे वापस आ गए. कुछ देर पूर्व नीचे शॉप में गयी तो शीशे का दरवाजा इतना साफ था कि खुला समझकर टकरा गयी, ध्यान कहीं और था. दोपहर को योग वशिष्ठ पढ़ा था जिसमें चेतना के जागरण के सिवा और कोई बात ही नहीं है. स्वयं के प्रति सजग व्यक्ति को जगत के प्रति असजग तो नहीं हो जाना चाहिए. नन्हे ने गृहप्रवेश के निमन्त्रण के लिए  सुंदर इ कार्ड बनाया है. पंडित जी व कैटरर को उसने एडवांस भी दे दिया है. कल रात्रि गुरूजी का एक वीडियो देखा, ‘कला’ के बारे में समझा रहे थे. बहुत सुंदर विधि से उन्होंने कला व कविता की परिभाषा बताई. सुबह सोमनाथ में दिए उनके प्रवचन को सुना, अमृत के समान मधुर हैं उनके बोल ! इस बार की कविता का विषय है ध्यान, उसने सोचा व्हाट्सएप कविता ग्रुप में ‘ध्यान’ पर लिखी कोई पुरानी कविता पोस्ट करेगी. 

शाम को घर वापस आ रहे थे कि अचानक तेज बूंदें पड़ने लगीं, विंड स्क्रीन पर लगातार चल रहे वाइपर के बावजूद सड़क साफ नहीं दिखाई दे रही थी. जून आज भी नन्हे के मित्र की कार लेकर आये.  दोपहर को एसी यूनिट के सिलसिले में दो मकैनिक आये. उन्हें दीवार में हुए छेद को सीमेंट से बन्द करना था, छत से रस्सी के सहारे लटक कर उन्होंने यह काम किया, काफी खतरा था इसमें. इसके अलावा माइक्रोवेव ओवन भी आयी और तकिये भी, अक्टूबर में जब वे यहां आएंगे अपने साथ कुछ सामान लाना ही शेष रहेगा. किताबें, वस्त्र, कलात्मक वस्तुएं, गमले और कुछ फर्नीचर. आज पहली बार यहां के डिपार्टमेंटल स्टोर में गयी, एक महिला चला रही थी, साथ में थी उसकी दुबली, लंबी बिटिया.  कुछ छोटे-मोटे सामान खरीदे, दो रातें उन्हें यहाँ बितानी होंगी. दोनों बिल्लियां सो रही हैं, दफ्तर जाते समय नन्हा उन्हें खाना-पानी देकर बालकनी में बन्द कर देता है, ज्यादातर समय सोती रहती हैं. योग वशिष्ठ पढ़ते समय कैसी अनुभूति होती है. इस संसार में सारा भय, विषाद और दुःख तभी तक है जब तक मन है, यानि आत्मा नहीं है. एक ही आत्म तत्व विभिन्न रूपों में प्रकट हो रहा है, जब तक यह ज्ञान दृढ नहीं हो जाता, दुःख से छुटकारा नहीं हो सकता. आज दोपहर को उनके पड़ोसी आये थे, वह बहुत शांत स्वभाव के व्यक्ति हैं सुबह साढ़े तीन बजे उठ जाते हैं, टहलने जाते हैं, और घर आकर प्राणायाम करते हैं. 


अतीत के पन्ने .....कॉलेज की अंतिम परीक्षा का प्रथम दिन है. कितनी ख़ुशी होती है जब किसी वस्तु को वे अंतिम बार विदा देते हैं. जैसे आज वह पहले कोर्स को दे देगी. कल पढ़ाई के बीच में थोड़ा सा विश्राम लेने के लिए निर्मल वर्मा की एक सशक्त कहानी पढ़ी, किसी विदेशी कहानी जैसे लगती है. 

पहली परीक्षा के बाद सात दिन का अंतराल था. दिन भर पढ़ाई की, शाम को टीवी पर फिल्म थी ‘गमन’, अच्छी थी, एक समस्या प्रधान फिल्म. 


दिन भर किताबों में बीता पर शाम को यहाँ क्लब का वार्षिकोत्सव था, अच्छा लगा सिर्फ एक नाटक को छोड़कर, उस नाटक की कथावस्तु एक घटिया नारेबाजी जैसी बनकर रह गयी, जो लोगों को हँसा जरूर सकती है पर कुछ सोचने पर विवश नहीं कर सकती. पढ़कर उसे वे वर्ष याद आ गए, दो-तीन नाटकों में उसने भी अभिनय किया था. एक का निर्देशन भी. उस दिन नाटक और लेख प्रतियोगिता का पुरस्कार उसे भी मिला था. उसकी पढ़ाई पूरी होने वाली थी, अब तो आत्मनिर्भर होना था, यही लक्ष्य था उसका अब नौकरी ढूंढना. शमे फिरोजा प्रोग्राम में सुना था कि जिंदगी बेमकसद हो तो जिंदगी नहीं रहती. एक सीधी सच्ची राह चुन कर उस पर चलते जाना है जैसे एक दिन एक जिन्न ने आदमी से कहा उसे खजाना पाना है तो इस रास्ते पर सीधा चलता  जाये, दांये-बांये देखा तो पत्थर बन जायेगा. 


Friday, November 29, 2019

बुद्धं शरणं गच्छामि




कल का पन्ना कोरा ही रह गया है, स्वास्थ्य ठीक न हो तो उत्पादक क्षमता कितनी घट जाती है. डायरी में आज भी कल की तरह नासिका में विचित्र सी गंध आ रही है . कल दिन भर मन में अनुत्तरित प्रश्न चलते रहे, आज सुबह तक सन्देह का सा वातावरण था. कोई स्वास्थ्य संबन्धी समस्या है या कोई रहस्य है सृष्टि का. आज दोपहर कोर्स का अंतिम दिन था, सेंटर गयी, वहाँ का सकारात्मक वातावरण तथा टीचर के प्रेरणादायक वचन सुनकर मन पुनः आह्लाद से भर गया है. जो भी  है परमात्मा का प्रसाद है, आज से पूर्व किसी भी स्वास्थ्य संबंधित समस्या ने उसे परेशान नहीं किया, पर गंध आने पर भविष्य में कोई समस्या हो सकती है, इसी भय का असर था कि मन घबरा गया था. कल किसने देखा है, जो ‘है’ उसी पर ध्यान देना है. जो नहीं है उसे महत्व नहीं देना है. गुरु का ज्ञान भी उसी वक्त काम आता है जब वे शरणागत हो जाते हैं उनके हाथ में कुछ नहीं है, जो भी जब भी होगा उसका सामना वे करेंगे, यह भरोसा गुरु उन्हें देता है. गुरूजी कहते हैं, परमात्मा, आत्मा और गुरु में कोई भेद नहीं है. उसका जीवन किसी के काम आये तभी सार्थक होगा. जो काम वह भली प्रकार कर सकती है, उसी के द्वारा संसार के किसी काम आ सकती है. उसने सोचा कल स्कूल जाना है, एक नए सन्देश के साथ, फिर कैलेंडर पर नजर गयी, कल बुद्ध पूर्णिमा है. वह लिख रही थी कि ड्राइवर का फोन आया, उसे दस किलो अख़बार की रद्दी चाहिए, शाम को ले जायेगा. छोटे भाई ने आज छोटी बुआ से वीडियो कॉल पर बात करायी, उनका सुंदर घर भी देखा. कुछ वर्ष अस्वस्थ रहने के बाद अब वह पुनः ठीक हो रही हैं. 

नौ बजने वाले हैं आज बुद्ध पूर्णिमा है. भगवान बुद्ध  के जीवन पर आधारित एक धारावाहिक  भी है यू-ट्यूब पर, दो एपिसोड देखे. सभी भाग देखेगी एक एक कर ! ब्लॉग पर उनके बारे में दो पोस्ट्स लिखीं, उनका जीवन आज भी एक मिसाल है, अनोखी थी उनकी तपस्या और अद्धभुत था उनका ज्ञान.  आनन्द ने उनके उनकर वचनों को संग्रहित किया. काश्यप उनके प्रिय शिष्य थे. रात वे समय पर सोये सो सुबह भी सहजता से उठे. माली से कुछ काम करवाना था, बुलवाया पर उसके सर में पीड़ा थी, शायद ज्यादा नशा करने के कारण. योग कक्षा में आज बच्चों को आनंद पूर्वक बड़ा करने के कुछ उपाय बताये, जो उस किताब में पढ़े थे. नैनी को भी बताना है, वह अपने बेटे को बहुत डांटती है. विचित्र गन्ध विदा हो गयी, इस समय नासिका से भीनी-भीनी मधुर गन्ध आ रही है. परमात्मा की सृष्टि में सब कुछ कितना रहस्यमय है. आज दोपहर डॉक्टर के पास भी गयी थी, उसने एक फ्री एयर स्प्रे दिया है, दिन में एक ही बार डालना है. एक्स रे  भी किया. आज क्लब में ‘अक्टूबर’ फिल्म थी. जून गए थे. 

परसों वे शिवसागर गए थे, कल तीन कविताएं लिखीं, एक परसों के पन्ने पर है, आशा और विश्वास से भरे शब्द.. यदि पीड़ा न हो जीवन में तो सुख का सम्मान भला कौन करेगा. इन कविताओं को एक-एक कर ब्लॉग पर प्रकाशित करेगी, हो सकता है उसके शब्द किसी आकुल उर को शांति की एक छांव दे जाएँ. इस समय रात्रि के आठ बजे हैं अभी-अभी छोटे भाई का फोन आया. आज सुबह छह बजे उसे कोई उठाने आया था, किन्हीं हाथों ने उसे स्पर्श किया और थपकी देकर कहा भोई, उठो, उठो ! उसने आवाज भी स्पष्ट सुनी और वह सुबह से ही आश्चर्य विमुग्ध है. परमात्मा उनके आस-पास है, वह कभी उनसे दूर नहीं होता, वे ही अपनी व्यर्थ की उलझनों में उसे भुला बैठते हैं. टीवी पर तेनालीराम की चतुराई की कहानी आ रही है. 

Monday, September 10, 2018

तीन परतों वाला केक



आज टीवी पर सुंदर वचन सुने, “इन्द्रियां प्रतिक्षण जीर्ण हो रही हैं, आयु नष्ट होती जा रही है और मृत्यु सामने खड़ी है, फिर भी उन्हें दुखदायी सांसारिक भोगों में सुख भास रहा है. जन्म, मृत्यु और जरा संबंधी दुखों से सदा आक्रांत होकर संसार में मनुष्य पकाया जा रहा है तो भी वह पाप से उद्व्गिन नहीं हो रहा है. जैसे कछुआ अपनी इन्द्रियों को समेट लेता है, वैसे ही साधक कामनाओं को संकुचित करके रजोगुण रहित हो जाता है.’’
“भोग में रोग का भय है, ऊँचे कुल में पतन का भय है. मान में दीनता का, रूप में वृद्धावस्था का तथा देह में काल का भय है. संसार में सभी वस्तुएं भयपूर्ण हैं, भय से रहित तो केवल वैराग्य ही है.”
उनके शुभ और अशुभ कर्मों के एकमात्र साक्षी वे स्वयं ही हैं, क्योंकि कर्मों के पीछे की भावना ही उन्हें शुभ अथवा अशुभ बनाती है. मनसा, वाचा, कर्मणा किये गये हर कर्म का फल उन्हें ही मिलने वाला है. अज्ञान दशा में जो कर्म उन्होंने आज तक किये हैं, उनका फल सुख या दुःख के रूप में सम्मुख आने ही वाला है. उनको सम अवस्था में रहकर ही काटा जा सकता है, अन्यथा नये कर्मों का जाल खड़ा हो जायेगा. जैसे यदि कोई अपनी आदत या संस्कार के कारण दुःख पा चुका है, पुनः वही स्थिति आने पर उसे समता बनाये रखनी है न कि पूर्व की भांति उसे दोहराना है, तब तो वह उस संस्कार को दृढ ही करता जायेगा. जहाँ कहीं भी आसक्ति दिखाई दे तो उसमें दोष दृष्टि करके स्वयं को उससे मुक्त करना चाहिए, क्योंकि जहाँ वह परमसुख का स्रोत है, वहाँ कुछ भी नहीं है, कोई विचार कोई भाव भी वहाँ प्रवेश नहीं पा सकता. उनकी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं होती रहती है, अनावश्यक का ही त्याग करना है.

शाम के सात बजे हैं. आज स्वतन्त्रता दिवस है. सुबह वे समय से उठे, नेहरू मैदान जाने से पूर्व प्रधानमन्त्री का भाषण सुना. अस्पताल में मरीजों को मिठाई दी. कम्पनी में बहुत उत्साह से आज का दिन मनाया गया. घर में भी झंडा फहराया और लड्डू बांटे. प्रधानमन्त्री का भाषण उत्साहवर्धक था. उन्होंने पाकिस्तान में बढ़ते असंतोष का भी जिक्र किया. नैनी ने आज सुबह पुत्र के जन्मदिन के केक का फोटो दिखाया. तीन परतों में सजा था, जिसपर एक बच्चे का पुतला था तथा एक गेंद. केक बनाकर सजाने के एक से एक नायाब तरीके निकल रहे हैं. आजकल नेट से देखकर लोग काफी सृजनशील हो गये हैं. शाम को वे यात्रा की तैयारी के लिए खरीदारी करने गये. सुबह ध्यान में गुरूमाँ के मुद्रा ध्यान का सीडी लगाया, अंत में एक सखी के साथ नृत्य किया, उसे भी आनन्द आया होगा.
साढ़े आठ बजे हैं. अज उसने स्वयं से वादा किया है कि वह सहजता से शुद्ध अंग्रेजी भाषा में बोलने का अभ्यास करेगी, और किसी के भी सम्मुख इस भाषा में बोलने से झिझकेगी नहीं. परमात्मा उसके साथ है उसने कल्पना में एक विशाल समूह के सामने स्वयं को अंग्रेजी में भाषण करते हुए देखा, उसे लगा वह कर सकती है. अगले हफ्ते उसे एक कोर्स के लिए गोहाटी जाना है. वहाँ उसे समूह मे काम करने का अवसर भी मिलने वाला है.

आज जो पीड़ा है, कल वही हँसी बनेगी. विनाश की महाक्रीड़ा से ही नई सृष्टि जगेगी ! ब्रह्मा ने सृष्टि की, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार ! हर अश्रु छिपाए है भीतर, एक मुक्त हँसी का कलरव स्वर ! आज एक परिचिता के घर गयी पहली बार, उसने अपनी सीडी दिखाई, सुनाई. असमिया, हिंदी, तथा बंगाली गाना सुनाया जो अपनी माँ के लिए लिखा है तथा फिल्माया है. उसकी माँ ने भी पूरा साथ दिया है. कितनी ऊर्जा है उसमें. चित्रकला का भी पांच वर्षीय डिप्लोमा कोर्स कर रही है, अंतिम वर्ष में है. लिखती भी है, संगीत भी देती है और गाती भी है. केक भी बनाती है. परमात्मा ने उसे सब कुछ दिया है, सुंदर भी है, पर फिर भी संतुष्ट नहीं. इन्सान को कितना भी मिल जाये, वह तृप्त होना नहीं जनता. तृप्ति केवल और केवल आत्मा में जाकर ही मिलती है. जो भी वे होना चाहते है,  वे हैं ही, यह जानकर ही मन शांत होकर बैठ जाता है.   

Monday, March 26, 2018

अंतरलोक का जाल



फिर एक अन्तराल, आज पाँच दिनों बाद लिखने का सुयोग मिला है. जून कल देहली गये हैं और वहाँ से सूरजकुंड जायेंगे, जहाँ एक दिन की कोई कांफ्रेस है. सो इस समय किसी भी कार्य की शीघ्रता नहीं है. साढ़े दस बजे हैं, कुछ देर पहले वह विशेष बच्चों के स्कूल से आई है. वहाँ बच्चों को व्यायाम करवाया और जून के लाये रेनकोट आदि दिए. लडकियों का हॉस्टल भी बन गया है, उसके लिए कुछ नियम आदि के लिए कुछ सुझाव उससे मांगे थे, लिखकर दिए. शाम को मीटिंग में जाना है. आज मन एक गहन चिन्तन में डूबा है. कल देर शाम को क्लब से फिल्म देखकर अकेले लौटते समय मन में जो भय की लहर दौड़ी वह व्यर्थ थी. भय का एक संस्कार कहीं गहरे बैठा है मन में, जो हल्की सी उत्तेजना से उभर आता है, लेकिन इससे मुक्ति पानी होगी. रात को नींद में थी, अचानक कुछ गिरने की आवाज आई. वही संस्कार जाग गया और मन ने कैसे-कैसे दृश्य दिखाने शुरू कर दिए. चाहिए तो यही था कि रौशनी करके देख लेती क्या गिरा है पर भय के कारण मन कल्पना करने लगा. एक स्वप्न में देखा, जून भी हैं और वे दोनों देखने गये हैं कि कौन सी तस्वीर गिरी है. फिर पूजा के कमरे में जाकर देखते हैं, कम्प्यूटर गायब है, यानि कोई चोर आया था. कितना स्पष्ट था सब कुछ. दूसरे स्वप्न में गैलरी में कोई पीला पेंट बह रहा है, जो छत से आती किसी पाइप से आ रहा है. छत पर देखा तो नैनी है, उसने एक प्लेट में पीला रंग रखा है, पानी उस पर से बह कर आ रहा है. माया इस तरह मानव को नचाती है. ये स्वप्न किस तरह उन्हें भ्रमित करते हैं, ये उनकी ही कल्पना होते हैं अक्सर. फिर सुबह उठी तो स्वयं पर ही आश्चर्य हो रहा था, क्या इतने दिनों की साधना भी भीतर का भय नहीं निकाल पायी. ध्यान करने बैठी तो राज खुलने लगे. सबके मूल में है मृत्यु का भय, यानि देह छूट जाने का भय. एक स्वप्न ने ही यह भ्रम पैदा कर दिया है कि अभी बीस वर्ष तो और जीवन है ही, सो बीस वर्ष तक देह को बचाए रखना होगा, पर कौन जानता है, कौन सा पल अंतिम होगा. देह बनी रहे इसलिए व्यायाम के प्रति भी गहन आसक्ति है. फिर दूसरे के शब्दों को, दूसरे के ज्ञान को प्रस्तुत करना, यह तो चोरी का संस्कार है, इसी कारण कई बार मन में यह भाव आता है कहीं चोरी तो नहीं कर रहा कोई उनकी. उनका स्वयं का मन जो कृत्य करता है, उसी की आशंका उन्हें होती है. संसार तो दर्पण है, उनका खुद का मन ही उसमें झलकता है. भावों की चोरी तो महानतम चोरी है. जब तक मन पूरी तरह से भय व आशंका से मुक्त नहीं हो जाता, समाधि नहीं घटती और समाधि ही तो लक्ष्य है. परमात्मा उसके भीतर के साारे विकारों को एक-एक कर दूर करने में उसकी सहायता कर रहे हैं. वृथा बोलना तो छूट गया है पर वृथा सोचना नहीं छूटा है, उसे भी छोड़ना होगा, मन को खाली करना होगा !

कल कुछ नहीं लिखा, सुबह बंगाली सखी के यहाँ गयी, वृद्धा आंटी से मिली. दोपहर बाद प्रेस, शाम को योग कक्षा और ऐसे ही दिन बीत गया. आज सुबह क्लब की एक सदस्या के साथ बाजार गयी, रेशमी कपड़े से बने गुलाब के फूल लेने थे, वार्षिक उत्सव के लिये, अगले हफ्ते मिलेंगे. वह थाईलैंड जा रही है, दो सप्ताह बाद लौटेगी. उसे सभी सदस्याओं के नामों की नई सूची बनानी है. योग पर भी कुछ और लिखना है. इस समय दिन के साढ़े तीन बजे हैं. जून दिल्ली से आ चुके हैं पर आते ही सीधे दफ्तर चले गये, शायद पांच बजे तक आयेंगे. ड्राइवर सामान दे गया है, ढेर सारे फल लाये हैं, देसी-विदेशी दोनों तरह के. एक स्टील का पतीला और छह कटोरी-प्लेट्स. उन्हें खरीदारी करने में काफी आनन्द आता है. परमात्मा की कृपा है कि इस समृद्धि के योग्य बनाया है. आज सुबह उठने से पूर्व एकतारता का अनुभव हो रहा था, तैलधारवत ध्यान का अनुभव ! परमात्मा के लोक में अपूर्व शांति है, उस शांति का प्रस्फुटन उन्हें उनके विचारों, कार्यों और शब्दों द्वारा करना है, यही तो आध्यात्मिकता है. रामकृष्ण परमहंस की कथा पढ़ते समय कितना आनन्द आता है. वे जीते-जागते परमात्मा ही थे, जैसे सद्गुरू हैं. उनका सान्निध्य उसे इस जन्म में मिलेगा अथवा नहीं ? किन्तु परमात्मा के साथ अभिन्नता का अनुभव जिसे होता हो, उसके लिए संत सान्निध्य का क्या अर्थ है, सद्गुरू के पास रहकर भी कुछ लोग भीतर के लोक में प्रवेश नहीं कर पाते हों शायद. दीदी कुछ दिनों के लिए व्हाट्सऐप ग्रुप से चली गयी थीं, फिर लौट आई हैं और ग्रुप का नाम भी बदल दिया है, भाई ने नया नाम दिया है, अच्छा चिह्न है यह, सबके मध्य दूरी कम होगी.

Monday, February 27, 2017

तेज पत्ते का पेड़


मन के भीतर उपजा एक छोटा सा शब्द या विचार मन की शांति को भंग करने में समर्थ है, यह तो अच्छा है कि यह उनके हाथ में है उसे उपजाएँ या नहीं, लेकिन तभी तक जब तक वे सजग रहते हैं. एक बार बेहोशी में कोई विचार उपजाया तो बात हाथ से निकल सकती है और ऊपर से तुर्रा यह कि वह शब्द एक बीज बनकर भीतर जम जायेगा और भविष्य में आलंबन मिलने पर पुनः पनप सकता है. लेकिन शब्द का जन्म किसी न किसी कामना के कारण होता है, कामना ही हर दुःख के जड़ में है, कोई उसे प्रेम का नाम दे यह उसकी स्वतन्त्रता है पर भीतर कहीं भय है जो कामना को जन्म देता है और यह भय अकेले रह जाने का है, इसका मूल भी तो मृत्यु के भय में है. वे मरना नहीं चाहते किन्तु आत्मा में स्थित रहें तो मृत्यु का भय नहीं और आत्मा में रहें तो अकेलेपन का भी भय नहीं और कामना का तो वहाँ प्रश्न ही नहीं उठता. हर कामना अभाव से उपजती है, आत्मा पूर्ण है वहाँ कोई अभाव नहीं. जीवन कितना सुंदर है और वे इसे कुरूप बनाने में लगे रहते हैं. वे उन दुखों को पैदा कर लेते हैं जिनका वास्तव में कोई अस्तित्त्व ही नहीं है, वे संशय के जाल में स्वयं को फंसा लेते हैं, जहाँ विश्वास के फूल खिले हैं. उनका दुःख के प्रति लगाव तो देखते ही बनता है. वे उगते हुए सूर्य में अंगारे खोज लेते हैं और बहते हुए धारे में तलवारें खोज लेते हैं. जो उनके पास है उसकी कद्र करने की बजाय  उसके खो जाने के अज्ञात भय में रातों की नींद गंवा देते हैं !

‘जो तू है सो मैं हूँ’ इस उक्ति को जाने कितनी बार कहा, सुना था. आज पूरी तरह से अनुभव भी कर लिया. कल रात्रि सोने से पूर्व अस्तित्त्व जैसे उस पर बरसा. ऐसा अनुभव पहली बार हुआ, अज्ञात ने जैसे उसे चारों और से घेरे में ले लिया थे. अचिंतनीय भावों की वर्षा हो रही थी. शांति इतनी सघन थी कि..और तब प्रतीत हुआ कि जैसे वह है इस देह में अपनी यात्रा पूर्ण करती हुई वैसे ही अन्य आत्माएं हैं सबके साथ प्रेम का ही नाता है. जो वह है वही वे हैं, कोई भेद है ही नहीं, तभी उनके द्वारा किसी को कहा गया कटु वचन उन्हें भी दुःख दे जाता है और उनके द्वारा किसी को कहा गया प्रेमपूर्ण वचन उन्हें ही तृप्त कर जाता है क्योंकि उन्होंने स्वयं को ही कहा होता है. मन और आत्मा दोनों ही परमात्मा की सन्तान हैं, आत्मा सुर है मन असुर, आत्मा कृष्ण है और मन कंस है, मन जब तक अर्जुन नहीं बन जाता उसे मरना होगा. भक्त होकर ही मन आत्मा से एक हो जाता है, रावण होकर वह आत्मा का विरोध करता है, विभीषण होकर उसकी शरण में जाता है. जून का फोन आया था सुबह, वह उसका सच्चा मीत है, उसकी आत्मा है, उसे उसने कुछ मूर्खतापूर्ण शब्द कहे जो स्वयं को ही चुभने लगे, उससे क्षमा मांगी, मन हल्का हो गया. सुबह ध्यान के वक्त भीतर कविताएँ जन्म ले रही थीं. असीम है सद्गुरू की कृपा..उनकी कृपा ही उसे यहाँ तक लायी है, परमात्मा की चौखट पर लाने वाले उसके प्यारे सद्गुरू को कोटि कोटि प्रणाम उसने भेजे.

सरदारनी आंटी को कार्ड, फूल व छोटा सा उपहार देकर आयी है. अब उनके दिल्ली जाने से पहले सम्भवतः एकाध बार और उनसे मिलना हो. आज दायीं तरफ की पड़ोसिन का फोन आया, वे लोग भी तबादले के कारण दिल्ली जा रहे हैं. जून के एक और सहकर्मी भी जा रहे हैं, एक दिन तो सबको छोड़ना ही था, अच्छा है एक-एक कर सब बिछड़ रहे हैं. मन मुक्त रहेगा जितना उतना परमात्मा में टिकेगा. आज सुबह ध्यान में एक आकृति दिखी पहले भी कई बार दिखती है, कौन है वह ? क्या है ? कौन जानता है, कोई दिव्य आत्मा या उसका कान्हा स्वयं ही ! जून आजकल बहुत शांत हो गये हैं, वे भी अध्यात्म के पथ के यात्री हैं. परमात्मा कभी भी किसीकी पुकार अनसुनी नहीं करता, वह अनंत है, वे उसकी एक बूंद कृपा के भी आकांक्षी नहीं हो पाते अहंकार के कारण.
कल उन्हें यात्रा पर निकलना है, तैयारी अभी शेष है. मन एक भिन्न उल्लास का अनुभव कर रहा है. अभी कुछ देर पूर्व धोबी आया था, पुराना कम्प्यूटर जो उसे दिया था, चला ही नहीं, कह रहा था लौटा जायेगा. आज कढ़ी बनाई है. पिताजी को ताजा तेजपत्ता व कढ़ी पत्ता घर ले जाने का मन है. जून के मना करने के बावजूद ढेर सारे हरे पत्ते वह अपने सूटकेस में रख रहे हैं. यदि कपड़ों में कोई दाग लग जाये या गंध भर जाये इसकी परवाह किये बिना. 

Friday, August 16, 2013

बुद्ध पूर्णिमा


आज उनके यहाँ फोन लग गया, पीएंडटी फोन. अब जब चाहें जिससे चाहे बातें कर सकते हैं. कल शाम उसकी एक परिचिता ने फोन करके पूछा, क्या वह उनके स्कूल में एक महीने के लिए हिंदी पढ़ाने के लिए तैयार है, वह खुद एक महीने के लिए घर जा रही हैं और कोई टीचर नहीं है उनकी कक्षा लेने के लिए. पर उसे सम्भव नहीं लगता, सुबह सात बजे से दोपहर एक बजे तक उसे घर से बाहर रहना होगा, जून के लिए खाना सुबह से बना कर रख जाना होगा, फिर घर की सफाई और सारे काम... वह कभी राजी नहीं होंगे.

कल दोपहर बाद वह कुछ परेशान थी, उसकी एक सखी ने शाम को आने के लिए कहा था, उसने सारी तैयारी कर ली थी पर अचानक उसका फोन आया वे नहीं आ पायेंगे, तो उसके सब्र का बांध टूट गया और वह जानती है यह सिर्फ उसी घटना के कारण नहीं था बल्कि पिछले दिनों का मन में एकत्र गुबार था. उसे यह अहसास हो रहा था कि वह कुछ भी ऐसा नहीं कर पा रही है जो उसकी दृष्टि में सार्थक हो. एक अजीब से खालीपन का अहसास और एक ऐसी भावना जो तब उत्पन्न होती है जब अपने कुछ भी न होने का अहसास होता है. उस दिन उसकी इतनी इच्छा होते हुए भी जून उसके साथ वोट डालने नहीं गये, उनका नाम थो था ही, पर कहने पर नाराज हो गये. उसे लगता है उनके बीच एक रिश्ता भय का है जो और सारे रिश्तों पर हावी हो जाता है. वह उसे कभी उदास या कमजोर नहीं देख पाते, उनके सामने उसे सदा ही खुश और बहादुर नजर आना है. उन्हें किसी को परेशान देखकर सांत्वना देना या समझाना नहीं आता, बल्कि खुद भी परेशान हो जाते हैं, शायद यही फर्क है स्त्री और पुरुष में, लेकिन वह उसे और नन्हे को बहुत चाहते हैं, जैसे वे दोनों उन्हें.

आज सुबह दादा वासवानी ने बहुत विनम्रता पूर्वक बहुत सुंदर ज्ञान दिया. उनकी मुस्कान अप्रतिम है और शब्द उनके मुख से ऐसे झरते हैं जैसे बहुमूल्य मोती. उन्होंने कहा, अगर कोई स्वस्थ और प्रसन्न रहना चाहता है तो उसे अपना दृष्टिकोण सकारात्मक रखना होगा, नकारात्मक भावनाएं जीवन को अभिशाप बना देती हैं. उस दिन जून ने भले ही उसे नाराज होकर समझाया पर उसे उस भाव दशा से बाहर निकल लाये, उसने मन ही मन उन्हें धन्यवाद दिया. इस बार की यात्रा से वापस आते समय पिता ने उसे कुछ कापियां तथा नोटबुक्स दी थीं, उनमें से एक उसने आज पढ़ी, उसमें विचारों और सुझावों का एक खजाना है. विभिन्न विषयों पर छोटे-छोटे अनुच्छेद लिखे हैं. मनुष्य विचारों का एक पुतला ही तो है, जैसा कोई सोचता है वैसा ही वह हो जाता है. स्वस्थ रहने के लिये स्वस्थ विचार होने चाहिए. यह शत-प्रतिशत सही है क जिस दिन उसके मन में द्वेष के विचार पनपते हैं तो मन उखड़ा-उखड़ा सा रहता है और जब कभी प्रकृति की सुन्दरता को देखकर कोई अच्छा सा विचार, चाहे एक क्षण के लिए ही क्यों न हो, आता है, तो मन कैसे खिल जाता है

आज बुद्ध पूर्णिमा है, नन्हा अभी तक सो रहा है, जून टीवी पर गुड मोर्निंग इंडिया दख रहे हैं, विनोद दुआ ने यह कार्यक्रम शुरू किया है कुछ दिनों से. सुबह जागरण में ‘गिरी महाराज’ से सुना, जीवन में संयम होना चाहिए. पूरे वक्त उसे अपनी वाचालता का स्मरण होता रहा, पता नहीं क्यों उसे लगता है जब वे किसी के यहाँ गये हों या कोई उनके यहाँ आया हो तो चुप बैठना अच्छा नहीं है, और वह माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए अपनी तरफ से किसी विषय या व्यक्ति  पर बातचीत शुरू कर देती है. पर हर बार पछतावा होता है, किसी व्यक्ति के पीछे उसके बारे में बात नहीं करनी चाहिए या फिर अपनी निजी बातें भी हरेक को बताने की क्या आवश्यकता है. सिर्फ बोलने के लिए बोलना तो असंयमित होना ही कहा जायेगा. वह वादे क्योंकि निभाती नहीं इसलिए वादा नहीं करेगी पर यह प्रयास अवश्य करेगी कि भविष्य में सोच-समझ कर ही बोले.