Monday, September 8, 2014

सीता का वनवास


फरवरी महीने का प्रथम दिन, मन की तरह आकाश पर भी बादल छाये हैं. जून आज मोरान गये हैं, शाम तक आयेंगे. सुबह वे जल्दी उठे. जून के जाने के बाद उसने फोन पर बात की, पिता अभी सोकर नहीं उठे थे, सो बात नहीं हो पायी. दीदी से बात की, उन्होंने एक अच्छी बात बतायी कि सभी लोग जो जीवित हैं अभी इस संसार में स्वप्न देख रहे हैं, माँ का स्वप्न पूरा हो गया, उनकी नींद खुल गयी है और वह इस सुख-दुःख के चक्र से मुक्ति पा गयी हैं. कल शाम वे टहलने गये तो मन में भरा विषाद फूट पड़ा. जून ने उसे सहारा दिया, कहा कि सुबह सभी से बात करे. नन्हे की परीक्षाओं के बाद फरवरी में घर जाने के लिए राजी किया. उन्हें उसकी मनः स्थिति का पूरा भान है. माँ कभी भी कोरी भावुकता की पक्षधर नहीं थीं. मोह, माया और ऊपरी दिखावा उन्हें बिलकुल पसंद नहीं था. जो उचित हो और जिससे किसी का अहित नहीं होता हो सोच-विचार कर ऐसा काम ही करना चाहिए.

उसके भीतर कभी ख़ुशी का एक झरना हुआ करता था, जिसमें से ख़ुशी रिस-रिस कर अधरों पर, कभी आँखों से झलका करती थी. दुनिया हसीन लगती थी पर आज वह सोता कहीं सूख गया सा लगता है. भीतर एक खालीपन उतर आया है और साथ ही एक नया  स्रोत उभर आया है, खरे पानी का स्रोत. आँसूं बेबात ही छलका करते हैं. दिल कमजोर हो गया है. दुनिया पर से विश्वास हटने लगा है. भूचाल की त्रासदी से पीड़ित लोगों को देखकर सिहरन होती है, उनका दुःख अपना सा लगता है. यह इतना सारा दुःख कहाँ से आ गया है. माँ जो इन सब दुखों से परे चले गयी हैं, उनके जाने से भी जिन्दगी में एक खालीपन आ गया है. कल एक परिचिता मिलने आयी, रोने लगी और फिर उसे चुप कराना पड़ा. संभल-संभल कर फिर कुछ ऐसा हो जाता है. जून उसके मन की हालत  समझते हैं और हर क्षण वह साथ देते हैं. लेकिन यह खालीपन बाहर से नहीं भरेगा, भीतर से ही इसे भरना होगा. बाहरी संबंध तो माने हुए हैं, स्थायी नहीं हैं. समय के साथ बदलते रहने वाले हैं. जीवन को पुनः परिभाषित करना होगा. स्वयं के सहारे जीना होगा. जीवन की क्षणभंगुरता को कौन समझ सकता है, जानते तो सब हैं. अन्यों से किसी बात की अपेक्षा नहीं रखनी होगी. हरेक को अपना रास्ता स्वयं बनाना है. कुछ भी स्थायी नहीं है. इतने दिनों से जो उसके मन में साध पल रही थी कि कोई तो कह दे, माँ नहीं है तो दुःख मत करो, हम तो हैं. पर कोई नहीं कहेगा. सभी बेबस हैं, जैसे वह खुद !

आज कोई फोन नहीं आया. मन स्थिर है. टीवी पर ‘उत्तर रामायण’ आ रहा है. लक्ष्मण को सुमन्त्र और राम को गुरु वसिष्ठ ज्ञान का उपदेश दे रहे हैं. सीता को वनवास होगा, राम को पत्नी वियोग सहना होगा यह सब बातें सुमन्त्र को पहले से ही ज्ञात थीं, फिर भी ऐसा होने पर वह दुखी थे, विह्वल थे. ऐसे ही सबको पता था कि हरेक की मृत्यु निश्चित होती है, कि माँ की हालत ठीक नहीं थी, कि उन्हें अंततः जाना ही था फिर भी इससे उनके जाने का दुःख कम तो नहीं हो जाता. वे सभी संवेदना की डोर से बंधे हैं. उनके मन सुख-दुःख, प्रसन्नता-अप्रसन्नता के वाहक हैं. दुःख के वक्त कोई किस तरह अपना कर्त्तव्य धर्म निभाता है वही उसके चरित्र को दर्शाता है. वह इस वक्त अपने आप को दुखी नहीं मान रही. रामायण के पात्रों ने जैसे उसकी चोट पर मरहम रख दिया है. एकाएक भूचाल आने पर जैसे सारे रास्ते और पथ गायब हो जाते हैं वैसे ही दुःख आने पर प्राणी हतप्रभ हो जाता है. ऐसे में उसे ज्ञान व दर्शन की बातें ही सहारा देती हैं. भूचाल से पीड़ित लोगों में नये जीवन की आशा का संचार करना होता है. उन्हें पुनः नये पथों का निर्माण करना होगा.


  

Sunday, September 7, 2014

गुजरात का भूकंप


परसों सुबह छोटी बहन ने फोन पर खबर दी, बात करते वक्त वह सामान्य थी पर फोन रखते-रखते ही रुलाई फूट पड़ी. मन जानता था कि यह होने ही वाला है. गुजरात में आए भूचाल में लाखों प्रभावित हुए हैं, हजारों की मौत हो गयी. एक झटके में वे गहरी नींद में सो गये. जीवन कितना क्षण भंगुर है. इलाहबाद में महाकुम्भ में एक ओर लाखों स्नान कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गुजरात के लोग दुःख और पीड़ा में डूबे हुए हैं. इन्सान प्रकृति के आगे कितना बेबस है.

कुछ देर पूर्व मंझली भाभी से बात की. आज वहाँ सभी फूल चुनने गये हैं. आज चौथा रस्म है, शनिवार को दसमी और छह को तेहरवीं. कल दिन भर जून बेहद उदास दिखे, उन्हें ऐसा देखकर उसने सामान्य रहने का प्रयास किया, पर सहज रूप से रहना अलग बात है कोशिश करना अलग. नन्हे का स्कूल आज बंद है, आज बसंत पंचमी है. सरस्वती पूजा का आयोजन जगह-जगह किया जा रहा है.

जीवन के सच बहुत कड़वे होते हैं, मानव आँखों पर रेशमी पर्दे डाले रहता है पर सच्चाई सारे पर्दे उठा सामने आ खड़ी होती है. मृत्यु भी एक ऐसी सच्चाई है. आज बापू की पुण्य तिथि भी है ‘शहीद दिवस’, सो आज मरण दिवस ही है. पर मृत्यु के बाद नया जन्म भी तो होता है. आत्मा को नव शिशु का कलेवर मिलता है एक बार फिर मृत्यु का ग्रास बनने के लिए. इसलिए ही संतों ने इस चक्र से मुक्ति को ही मानव का अंतिम लक्ष्य माना है. कितने जन्मों में कोई कितना कुछ पाए अथवा खोये, अंततः मृत्यु सब समेट लेगी. किन्तु इससे जीवन की महत्ता कम तो नहीं हो जाती. जीवन चाहे एक क्षण का हो या कुछ वर्षों का, अपने आप में एक उपहार है. जैसे और भौतिक वस्तुएं सदा साथ नहीं देतीं वैसे ही शरीर भी एक दिन नष्ट हो जायेगा. यही सनातन सत्य है. फूल खिलता है झरता है फिर खिलता है फिर झरता है, इससे फूल की महत्ता कम तो नहीं होती. जिसका जितना साथ मिला है उतना ही कृतज्ञ होते हुए उसे सम्मान देना चाहिए. गुजरात के उन हजारों लोगों को जो भूकम्प से आहत हुए हैं या मृत हो गये हैं, सच्ची श्रद्धांजलि वे सैनिक और समाज सेवी संस्थाओं के कार्यकर्ता दे रहे हैं जो दिन-रात वहाँ काम में जुटे हैं.


मन के आकाश पर काले घने बादल छा गये कहीं कोई रोशनी की लकीर नहीं, फिर एकाएक बादल छंटने लगे और नीला आकाश धूप की चमक लिए स्पष्ट हो उठा, यह आकाश जिस तरह है नहीं पर दीखता है, उसी तरह मन का यह भ्रम उहापोह है नहीं, दीखता है. सब कुछ स्वप्नवत है आज जागरण में फिर शरीर की अनित्यता और परमात्मा की नित्यता के बारे में सुना, वर्षों से सुनती आ रही है कि देह मरण धर्मी है. लगता था कि समझ भी लिया है पर ऊपर-ऊपर से समझना और उसे वास्तव में जानना, इन दोनों में काफी फर्क है. पता नहीं कहाँ से यह दुःख मन में आकर बैठ गया है जो माँ के इस तरह चले जाने से ही उत्पन्न हुआ है. पहले-पहल लगा था कि मन सम्भला रहेगा पर पिछले दिनों की तरह उनकी स्मृति के अलावा कोई और बात मन में नहीं टिकती. शायद उसे स्वयं को ज्यादा समय देना चाहिए, धीरे-धीरे सब स्वयं ही सामान्य हो जायेगा. जून भी आजकल बहुत चुप रहते हैं. कल जब वह आये और यह बताया कि वे नहीं जा रहे हैं तो उसे बहुत दुःख हुआ. उन दोनों में से एक को वहाँ पहुंचना है ऐसा निर्णय वे कर चुके थे क्यों कि नन्हे को ले जाना ठीक नहीं होगा. कल उसके स्कूल में कवि सम्मेलन प्रतियोगिता थी. उसका हाउस अंतिम स्थान पर रहा, उसने भाग लिया और आज working model competition में भी भाग ले रहा है. सुबह दो सखियों के फोन आये उनके साथ भी वही बात हुई. गुजरात में मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही है. प्रकृति निर्मम है. 

Friday, September 5, 2014

कोहरे का जाल


आज पूरे एक हफ्ते बाद डायरी खोली है. उस दिन जून उसे छोड़ने एयरपोर्ट गये थे. वह दिल्ली पहुंच गयी थी शाम साढ़े सात बजे, घर पहुंचते नौ बज गये. अगले दिन सुबह साढ़े चार बजे ही भाई के साथ टैक्सी स्टैंड गयी. कोहरा घना था और स्टेशन तक के रास्ते में कुछ भी नजर नहीं आ रहा था, लग रहा था कोई स्वप्न चल रहा है. उड़ान के दौरान भी और ट्रेन में भी सारा वक्त मन में एक वही ख्याल मंडरा रहा था. कोहरे के कारण उनकी ट्रेन बहुत रुक-रुक कर चल रही थी. दोपहर बाद वे गन्तव्य पहुंचे, मंझला भाई लेने आया था पर उसकी गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो गया, भागदौड़ में उसे भरवाने का वक्त ही नहीं मिला था, बस से वे अस्पताल पहुंचे. जहाँ शेष सभी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. थोड़ी देर में ही अस्पताल गयी, उनको ऑक्सीजन दी जा रही थी और भी कई नलियां उनके विभिन्न अंगों से जुडी थीं, देखकर उसकी आँखें भर आयीं. वह उसे देखकर पहले तो खुश हो गयी थीं, जिसे उन्होंने ताली बजकर भी दर्शाया पर उसके आँसूं देखकर दुखी हो गयीं. वह बोल नहीं सकती थीं. उन्हें इतनी पीड़ा सहते देख सभी दुखी हैं पर कोई कुछ नहीं कर सकता. उसके बाद वह चार दिन वहाँ और रही. एक बार माँ ने उसका लिखा संदेश पढ़ा और आशीर्वाद भी दिया. लिखना भी चाहा पर इस बार उनकी लिखाई ठीक नहीं रह गयी थी. एक दिन बाद वह वापस दिल्ली आ गयी और अगले दिन असम, जहाँ जून और नन्हा उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे.

कल रात भर उसे वही स्वप्न आते रहे. ऑक्सीजन, हीमोग्लोबिन, ICU, और डॉक्टर, अस्पताल शब्द कानों में गूँजते रहे. एक बार माँ को बोलते हुए भी सुना. वह ठीक होकर आ गयी हैं और किसी बारे में पिता के सवाल का जवाब दे रही हैं. कल शाम वे लाइब्रेरी भी गये और माँ की बीमारी पर जानकारी हासिल की. उन्होंने बहुत कष्ट सहा है इस रोग के कारण. ईश्वर ही अब उनका सहायक है. उसका सिर भारी है, मस्तक के दोनों ओर की नसें तन गयी हैं. कल शाम को जून को तनावमुक्त रहने का उपदेश दे रही थी पर स्वयं तनावमुक्त रहना कितना मुश्किल है. आज सुबह सुना विजयाराजे सिंधिया तेईस दिन ICU में रहने के बाद स्वर्ग सिधार गयीं तो दिल धक से रह गया. माँ को भी अस्पताल में दो हफ्ते हो गये हैं. अभी-अभी छोटी बहन को फोन किया, शायद वह व्यस्त थी, फोन नहीं उठाया. जून भी उसे उदास देखकर परेशान हो गये हैं. उसे स्वयं को सामान्य रखने का प्रयास करना चाहिए, जिस बात पर उनका कोई वश नहीं है उसके बारे में चिन्तन करते रहने से क्या लाभ ? आज से संगीत का अभ्यास शुरू करेगी, मन को व्यस्त रखने से ही वह शांत रहेगा. सबसे बड़ा दुख संसार में है इच्छा, इच्छा पूरी हो जाये तो दूसरी उत्पन्न होगी, पूरी न हो तो दुःख देगी.

“कबिरा सब ते हम बुरे हम तज भलो सब कोई
जिन ऐसा करि देखिया मीत हमारा सोई”

मन को जितना धोते हैं उतना पता चलता है कि मैल की कितनी परतें चढ़ी हैं.


Thursday, September 4, 2014

जीवन और मृत्यु


कल दिन भर एक अजीब सी पशोपेश में गुजरा, जून के फोन भी कई बार आए. पहले वह मान गये कि नन्हा और मुझे वहाँ पहुंच जाना चाहिए पर रात को अस्पताल पहुंचकर उन्होंने न आने के लिए कहा. वह उसे व नन्हे को परेशानी से बचाना चाहते हैं. सभी लोग तो वहाँ हैं ही, दीदी, छोटी बहन, सभी भाई, पिता और जून. माँ की हालत में थोड़ा सुधार तो हुआ है पर अभी भी ऑक्सीजन दी जा रही है और वेंटिलेटर पर भी रखना पड़ेगा, जिसके लिए बड़े हॉस्पिटल में शिफ्ट करने की जरूरत थी. अब तक शायद यह कार्य हो चुका होगा. जून का फोन आने पर ही पता चलेगा. उसके मन में विचारों का एक प्रवाह चल रहा है. देह का संबंध तो एक न एक दिन छूट ही जाना है, मृत्यु के पाश से कोई नहीं बच सकता पर आत्मा का संबंध अमर है, उसका संदेश अवश्य माँ तक पहुंच रहा होगा. वह इस समय अस्पताल में जीवन और मृत्यु की लड़ाई लड़ रही हैं, किसकी जीत होगी कहा नहीं जा सकता. वह किसी भी फैसले के लिए तैयार है. उनका दुःख कम होगा. पिछले कई महीनों से जो परेशानी वह झेल रही थीं, उससे मुक्त हो जाएँगी. अपने जीवन के सारे कर्त्तव्य पूरे कर चुकी हैं. कोई ऐसी बात नहीं जो उन्हें मोहयुक्त कर सके, सत्संग व शास्त्रों का ज्ञान उन्हें है. मोहमाया के जाल को समझ कर काट चुकी हैं. अंतिम यात्रा पर निकलना तो एक दिन सभी को है. यदि ईश्वर ने उन्हें कुछ और मोहलत दी तो परिवार को उसका कृतज्ञ होना चाहिए, नहीं तो उनकी अंतिम यात्रा को स्वीकार कर भावपूर्ण श्रद्धांजलि देनी चाहिए. ईश्वर पर भरोसा रखते हुए उनकी यात्रा को सुखद बनाने का प्रयत्न करना चाहिए.

इस समय उसे जून के फोन का इंतजार है, कल रात फिर उन्होंने आज भी न चलने के लिए कहा, उसे उनकी बात माननी चाहिए पर अपने मन का क्या करे ? दीदी से बात की तो लगा उसे वहाँ पहुंच जाना चाहिए. माँ बहुत बेचैन हैं उसके बारे में पूछ रही थीं. रात भर सो नहीं पायीं, भाई ने बताया. उनकी तबियत काफी खराब है यह तो स्पष्ट ही है, इसके बिना कोई ICU में नहीं रहता. वह यह लिख ही रही थी कि जून का फोन आया , कल वह स्वयं ही आ रहे हैं, रात को फिर फोन करेंगे. उनसे बात करके मन हल्का हो गया, उनकी आवाज में कोई जादू है जो उसे अपने वश में कर लेती है. उनसे बात करने के बाद ही नित्य के कार्य-कलाप में व्यस्त हो पायी. ध्यान में ईश्वर से सलाह मांगी, वह भी जून की तरफ हैं.

सुबह से दो बार फोन आ चुका है. उनकी फ्लाइट लेट है. सुबह छोटी भाभी से बात हुई, माँ की तबियत जो सुधर रही थी, फिर खराब हो गयी है. अभी-अभी फोन की घंटी बजी तो दिल धक से रह गया, कहीं वही खबर न हो जिसका डर हमेशा बना रहता है. कल रात को सोये कुछ ही देर हुई थी कि किसी के फुसफुसाने की आवाज आई, दिल जोरों से धड़कने लगा. रात को स्वप्न में देखा, माँ नहाने गयी हैं, कपड़े धोने की आवाज आ रही है, पिता ने उसे उन्हें बुला लाने को कहा. उसने कपड़े धोने को मना किया तो बोलीं, हाँ, सिर में दर्द भी है. आवाज कमजोर थी. दूर होने की वजह से वह उनसे मिल नहीं पा रही है जबकि उसका मन हमेशा वहीं रहता है. नन्हा आज सुबह समय पर उठ गया, सभी काम समय पर किये फिर थोड़ा पहले ही बस स्टैंड चला गया. वह घर में रहता था तो चहल-पहल सी रहती थी पर अब न जाने क्यों मन रुआँसा सा हो रहा है. अभी-अभी फोन फिर से आया है. उनकी फ्लाइट कैंसिल हो सकती है. आज उन्हें  दिल्ली में ही रहना पड़ सकता है.

जून आज सुबह आ गये. कल उनकी फ्लाइट गोहाटी में ही टर्मिनेट हो गयी. आगे की यात्रा रात्रि बस से करनी पड़ी. आज उसे जाना है, पर फ्लाइट का कोई भरोसा नहीं है, देर से चलेगी. बड़े भाई दिल्ली में उसे लेने आयेंगे. आज ही उन्हें एक विवाह में भी जाना है. यही है जीवन की निस्सारता, दुनियादारी तो निभानी ही पड़ेगी. जून सुबह-सुबह ही ऑफिस चले गये. इतने दिनों की यात्रा के बाद भी वह अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर ठीकठाक हैं. उसे भी इस बल की बहुत आवश्यकता पड़ने वाली है. पहली बार हवाई जहाज से अकेले सफर करना है. सुबह नन्हे से बात भी नहीं कर पायी.



Tuesday, September 2, 2014

अस्पताल में


नन्हे का होमवर्क अभी भी खत्म नहीं हुआ है, उसका स्कूल अगले हफ्ते खुल रहा है. आज सुबह एक अच्छी बात सुनी, यदि किसी को आध्यात्मिक उन्नति करनी है तो अपनी आस्था, निष्ठा और श्रद्धा को एक बिंदु पर केन्द्रित करना होगा, भटकाव कहीं पहुंचने नहीं देगा, जैसे कोई किसान अपने खेत में जगह-जगह गड्ढे खोदता है, उसका विश्वास डगमगाता रहता है और इस तरह कुआँ कभी पूरा नहीं हो पाता. इसी तरह साधक कभी योगी, कभी भक्त, कभी वेदांती, कभी उपासक बन जाता है, उसकी निष्ठा एक तरफ न होकर अनेक ओर बिखर जाती है. उसका लक्ष्य कभी नहीं मिलता. ईश्वर के सान्निध्य का अनुभव वह क्षणिक रूप से तो करता है पर सदा उसी में अनुरक्त नहीं रह पाता.

आज के दिन की शुरुआत जून से फोन पर बात के साथ हुई, नैनी आज फिर छुट्टी पर है सो सुबह के काम करते-करते ग्यारह बज गये हैं, आज दोपहर को वह सखी अपने बेटे के साथ आएगी. पड़ोसिन का फोन आया, आजकल वह उसका ज्यादा ध्यान रखने लगी है. जब से उसे सूट लाकर दिया है, लिखकर वह मुस्कुरा दी. आज का प्रवचन करुणा और मैत्री पर था. सुनते समय कई उद्दात भाव हृदय में उठते हैं, संवेदनशीलता, करुणा, सहानुभूति और मैत्री. यही गुण मानव को मानव बनाते हैं. छोटी बहन से बात हुई, उसे बच्चों से अलग रहना मान्य  नहीं, चाहे बीच-बीच में परेशानी खड़ी हो, फ़िलहाल उसकी फील्ड ड्यूटी नहीं है. ‘योग वशिष्ठ’ में श्रीराम की जीवनचर्या का, उनके विषाद का वर्णन पढ़कर मन अभिभूत हो जाता है. रात को वह श्री अरविंद का ‘वेद रहस्य’ पढ़कर सोती है, अभी तक भूमिका ही चल रही है. 

आज उनका फोन डेड है सो जून से बात नहीं हो सकी, वह अवश्य ही प्रतीक्षा कर रहे होंगे. सुबह एक बार तो नींद खुल गयी पर वह पंछियों की आवाजों को सुनने का प्रयत्न  करने लगी, उसी समय हल्का उजाला भी खिड़की से स्पष्ट होने लगता है. सुबह ही सुबह लेडीज क्लब की एक सदस्या का फोन आया, उन्होंने शाम को बुलाया है. ‘हसबैंड नाईट’ के कार्यक्रम के लिए हिंदी में ‘नवरस’ पर कुछ लिखना है, ऐसा उन्होंने कहा. ‘जागरण’ सुना पर मन स्थिर नहीं रह पाया, कभी पढ़े साहित्य के नवरसों में डूबने लगा. महाकुम्भ पर समाचार देखे, दुनिया का विशालतम धार्मिक मेला कुम्भ करोड़ों लोगों के आगमन से सभी के आकर्षण का केंद्र बना है. मेले की व्यापकता का अनुमान लगाना कठिन है. भविष्य में कभी अवसर मिला तो वह अवश्य जाएगी. विदेशी पर्यटकों को योगासन करते व संगम में डुबकी लगाते देखना एक अनोखा अनुभव था. नागा साधुओं का जुलुस भी शोभनीय था. सदियों से यह मेला हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक बना हुआ है, ईश्वर की अनोखी कृतियों में यह भी एक है. दोपहर को वह बच्चा आयेगा, पढ़ने में अच्छा है, उसका लेख भी स्पष्ट है.  

कल रात वे सो चुके थे, पता नहीं कितने बजे होंगे, फोन की घंटी बजी, उसने फोन उठाया पर उधर से कोई आवाज नहीं आई. अजीब सी बेचैनी मन पर छाई थी. कुछ देर बाद पुनः घंटी बजी तो उसने जानबूझकर फोन नहीं उठाया. फिर फोन शांत हो गया. कोई बुरी खबर होगी, इसका भी अंदेशा था, अजीब से ख्यालों ने मन को घेर लिया था. रात के सन्नाटे में धीमी आवाजें भी स्पष्ट सुनायी देती हैं. जून के बिना रात डरावनी लग रही थी. ईश्वर भी कहीं दूर चले गये थे, ईश्वर जिसको दिन में अपने आस-पास ही महसूस करती है. फिर पता नहीं कब सो गयी. नन्हा दूसरे कमरे में आराम से सोया था. सुबह फिर फोन की घंटी से ही नींद खुली, बड़ी भाभी का फोन था, माँ अस्पताल में हैं. वे लोग शताब्दी से घर जा रहे हैं. जून से बात हुई तो पता चला, वह भी यहाँ न आकर उनके साथ ही जा रहे हैं. उन्होंने कहा, वहाँ पहुंचकर खबर देंगे.



Monday, September 1, 2014

योग वशिष्ठ - महारामायण


कल शाम से ठंड एकाएक बढ़ गयी है, अभी तक कोहरे ने सूरज को ढक रखा है. ऐसी शीतलता पहाड़ों पर लोग रोज ही महसूस करते होंगे. कल दुबारा डायरी नहीं खोल सकी. दोपहर को चार पत्र लिखे, शाम को वे टहलने गये, क्लब जाने का उत्साह नहीं हुआ. अभी-अभी पड़ोसिन का फोन आया, उसे लगा था सम्भवतः अस्वस्थता के कारण वे क्लब नहीं जा रहे हैं, फिर उस बातूनी सखी का फोन आया, उसे अपने बेटे के लिए एक ऐसी ट्यूटर चाहिए जो होमवर्क करा सके. दोपहर को वह कुछ समय निकाल सकती है और क्लास वन के बच्चे का साथ यकीनन अच्छा रहेगा, सो उसने हाँ कर दी है. जून को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी. कल वह जा रहे हैं, उन्हें इतवार को किये जाने वाले कार्य आज ही कर लेने हैं जिसमें बालों में मेंहदी लगाना भी शामिल है. कल रात उसने जून से पूछा कि विवाह की वर्षगाँठ मनाने का उनकी नजर में क्या औचित्य है, उन दोनों के सोचने का ढंग एक ही निकला. उसे भी हर दिन उतना ही खास लगता है जितना वह दिन !

कल शाम अंततः वे क्लब गये और वहाँ का माहौल बेहद खुशनुमा लगा. हर तरफ फूलों की बहार ही बहार थी. सामने के बरामदे को बेहद कलात्मक ढंग से सजाया गया था. पीछे स्टेज था तथा शामियाना लगाया गया था. आग तपने के लिए भी इंतजाम था. लोग आकर्षक पोशाकों में थे.

सुबह जून से बात हुई, कल शाम गन्तव्य पर पहुंच कर भी उन्होंने समाचार दे दिया था. कल रात कई बार उसकी नींद खुली, स्वप्न भी देखे जो परेशानी को बढ़ाने वाले थे. उनके जाने पर पहली रात ! सुबह सवा छह बजे उठी, नैनी कल बिना कहे दिन भर नहीं आयी, इस समय काम कर रही है, उसने अपनी गलती मान ली और उसकी फटकार का कोई विरोध नहीं किया जैसा कि वह पहले करती है. इधर कुछ दिनों से उसमें बदलाव आया है. कल क्लब गये थे वे, नीली साड़ी सुंदर लग रही थी, जून होते तो फोटो खींचते. नन्हा लिख रहा है, सुबह उसे नॉवेल पढने पर कुछ दिनों के लिए रोक लगाने को कहा तो बुरा मान गया. ‘नसीहत’ पचाना आसन काम नहीं है. आज ‘योग वशिष्ठ’ की कथा प्रारम्भ हुई है, कहानी में कहानी कहने की संस्कृत साहित्य में अनोखी प्रथा है. आज गोयनका जी भी आये थे, विपासना के बारे में आरम्भिक व्याख्यान दिया. मन को ऊपरी सतह पर शांत कर लेना तो सहज है पर भीतर का पता तो वक्त पड़ने पर ही चलता है. उस दिन ट्रेन में यात्रियों की भीड़ देखकर वे विचलित हो गये थे. आज सभी के फोन आये सभी ने एनिवर्सरी की मुबारकबाद दी.

आज सुबह सवा छह बजे चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर नींद खुली. उठते ही जून के होटल का नम्बर लगाया, वे भी उठ चुके थे. रात को दस बजे सो गयी थी, पर कुछ देर बाद बड़ी भाभी का फोन आया, वे परसों शुभकामना देना भूल गयी थीं, भाई से भी बात हुई. जून दिल्ली में उनसे मिलने जायेंगे. कल एक परिवार को लंच पर बुलाया था, वे लोग सुबह ही तिनसुकिया मेल से आये थे. एक और सखी तभी घर की चाबी देने आई, वे मुम्बई जाने के लिए एयरपोर्ट जा रहे थे. उन्हें इतनी जल्दी थी कि एक मिनट भी नहीं बैठे. जून की समय की पाबंदी की आदत के कारण वे लोग यात्रा पर निकलने से आधा घंटा पहले ही पूरी तरह से तैयार होकर बैठ जाते हैं.





रॉबिन कुक की किताब - टॉक्सिन


 नये वर्ष का दूसरा दिन, सारा दिन घर की सफाई में बीता. शाम को वे टहलने गये, जबकि जून को हल्का जुकाम है, दफ्तर में काम भी ज्यादा था, इसी हफ्ते उन्हें टूर पर भी जाना है. वे कल ही घर से वापस आये हैं, पर यह सुंदर ब्राउन डायरी उसे जून ने आज लाकर दी है. नन्हा पढ़ाई में व्यस्त है, बीच-बीच में पत्रिकाएँ पढ़ने लगता है. आज सुबह फोन से अन्य सभी से बात हुई. दीदी का फोन शायद कल आये. छोटी बहन बेहद उदास थी, उसे बेटियों की बहुत याद आ रही थी, जो उसकी फील्ड ड्यूटी के कारण पिछले कुछ दिनों से दादी के पास हैं. माँ, पिता और बच्चे तीनों अलग-अलग शहरों में रहने को विवश हैं, परिस्थितियाँ कुछ ऐसी हैं कि वे साथ नहीं रह सकते. माँ की तबियत फिर ज्यादा खराब हो गयी थी, वे दवा लेना बंद कर देती हैं फिर तकलीफ उठाती हैं. वृद्धावस्था इन्सान को लाचार बना देती है. पड़ोसिन को उसका लाया हल्के धानी रंग का चिकन का सूट पसंद आया, जो उसने मंगाया था. कल बंगाली सखी ने उनके दोपहर के खाने का और उड़िया सखी ने रात के खाने का इंतजाम किया था, थकान भी बहुत थी, सो अच्छा लगा. एक अन्य सखी से फोन पर बात हुई. इस बार उसने कुछ आध्यात्मिक पुस्तकें भी खरीदीं. एक पुस्तक ‘रेकी’ पर भी ली जो ट्रेन में ही पढ़ ली थी, प्रयोग में लाने हेतु कई बातें हैं, ध्यान की विधि भी है. परसों रात वे ट्रेन में थे जब पिछला साल गुजरा और नये वर्ष ने पदार्पण किया. पर इस बार कुछ विशेष नहीं लगा. अब पहले की तरह ख़ुशी के मौके तलाशने का मन नहीं होता, हर पल, हर दिन एक सा लगता है. यह रोजमर्रा की जिन्दगी, यह दिन-रात, महीने-वर्ष का बीतना तो चलता ही रहता है. असली चीज तो इसके पीछे है. परमेश्वर से उनका नाता.. जो सदा एक सा है !

‘मानव के पास विचार, भाव और विवेक का बल है लेकिन वह उसका उपयोग नहीं करता. अपने बाहरी  व्यक्तित्व को संवारने का यत्न तो करता है पर मानसिक, बौद्धिक व आत्म व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास नहीं करता, सो आडम्बर और पाखंडपूर्ण जीवन जीता है’. उसे लगा, सचमुच भीतर से वे जितन सत्य के निकट होंगे, यथार्थ का सामना करेंगे, वास्तविकता को पहचानेंगे, उतना ही आंतरिक व्यक्तित्व व्यक्त होगा. अपने आदर्शों को मूर्त रूप देना होगा तथा उसे जीवन में उतारना होगा.

जनवरी की ठंड का अहसास आज पहली बार हुआ जब दोपहर होने से पहले हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गयी पर बाद में धूप निकल आई. सुबह वे पांच बजे उठे, रोजमर्रा के कामों को करते-करते सुबह गुजरी. सफाई का कुछ काम भी जारी रहा, कुछ अब भी शेष है. दोपहर को साड़ी में पीको किया, फाल लगाई. इतवार को क्लब मीट में पहनने के लिए नई पोशाक तैयार है. कल शाम उद्घाटन था, वे नहीं गये, आज भी शायद ही जाएँ. शाम को ठंड में ठिठुरते हुए अलाव के पास लोगों की भीड़ देखने जाने का मन अब नहीं होता. आज सुबह बहन से बात हुई, वह दोनों बच्चों और सास के साथ हिमाचल आ गयी है. उन्होंने उससे कहा है उसकी छोटी बिटिया को वे अपने साथ रख सकते हैं जब तक उसकी सर्विस का अनुबंध काल खत्म नहीं होता, पर उसे नहीं लगता यह सम्भव होगा. वे तीनों बहुत निर्भर हैं एक-दूसरे पर सो अलग-अलग रहना उनके लिए सजा न बन जाये. नन्हा फिजिक्स के गृहकार्य में लगा हुआ है. इस यात्रा में उसने रॉबिन कुक की किताब toxin उपहार मिले पैसों से खरीदी. बनारस में काफी घूमा और पतंगें उडायीं. सास-ससुर का स्वास्थ्य भी ठीक ही लगा. अगले एकाध महीने में वे लोग नये मकान में चले जायेंगे, जीवन में परिवर्तन होगा जो अच्छा ही है. इस छोटी सी यात्रा ने उनके मनों में भी नया जोश व उत्साह भर दिया है. यहाँ तक की नैनी भी काम मन लगाकर कर रही है. आज सम्भवतः वे कुछ देर बगीचे में भी टहल सकें, यदि जून समय पर घर आ जाएँ. उन्हें कल अपग्रेडेशन का लेटर मिला है, इतवार को उन्हें दिल्ली जाना है.

सुबह उठे तो ठंड बहुत थी, फिर समाचारों में सुना, पूरे उत्तर भारत में शीत लहर का प्रकोप है. शिमला में हिमपात हुआ है. बहन का ख्याल हो आया, पर इस समय धूप निकल आयी है. पंछियों की आवाजें रह रहकर आ रही हैं जो धूप का स्वागत करती प्रतीत होती हैं. आज ‘जागरण’ में उच्च विचार सुने जो प्रेरणादायक होने के साथ-साथ दर्पण का कार्य भी कर रहे थे. उसे भी लगा, वे छद्मवेश बनाये रखते हैं. उनकी कथनी व करनी के बीच की खाई निरंतर गहरी होती जाती है. मानव होने के नाते उनके कुछ कर्तव्य हैं कुछ उत्तरदायित्व हैं जो वे सुविधा होने पर पूरा करते हैं, कभी असुविधा का बहाना बना टालते रहते हैं. इस समय उसके मन में कई विचार एक साथ आ रहे हैं सो गड्ड-मड्ड हो रहे हैं, सर्वप्रथम अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होते हुए उसे एक्सरसाइज कर लेनी चाहिए तब तक मन भी व्यवस्थित हो चुका होगा.