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Thursday, May 10, 2012

बेल्जियम फिश


अप्रैल की अंतिम सुबह कितनी ठंडी है. वर्षा बदस्तूर जारी है. रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण ‘सर्वोत्तम’ में उन्होंने साथ-साथ एक लेख पढ़ा, ‘बॉब ग्रीन’ का लिखा हुआ- मेरी बेटी का पहला साल, लेखक ने अपने अनुभवों का कितना मोहक व सजीव चित्रण किया है कि पढ़ते-पढ़ते वे भी अपने भविष्य के सपनों में खो गए. एक किताब ‘The Voyage out’ जो पिछले चार-पांच दिनों से वह पढ़ रही थी, समाप्त हो गई, नायिका rechel का दुखद अंत हुआ, शायद वह विवाह और बच्चों के लिये नहीं बनी थी, वह कुछ और ढूँढ रही थी. नायक के प्रति वह सहानुभूति नहीं जगा पायी. टीवी पर उन्होंने ‘सत्यजित रे’ द्वारा निर्देशित एक नाटक देखा सुखांत, जो बहुत अच्छा था
आज मई दिवस है. एक हफ्ते की वर्षा के बाद आज सूर्य भगवान ने दर्शन दिए हैं. सुबह आँखें खोलीं तो धूप जैसे उनमें भरती जा रही थी. पूरा कमरा रोशनी से खिला हुआ था. पर दो घंटे बाद ही कितना अँधेरा हो गया, बादल घिर आये, यहाँ का मौसम पल-पल मिजाज बदलता है. टीवी पहले से बेहतर हुआ लगता है, चित्र हार देखा और आशा भोंसले का साक्षात्कार भी, जो उन्हें बहुत अच्छा लगा. आज शाम क्लब में पेट्रोलियम मिनिस्टर का सम्बोधन है जून वहाँ जायेगा और नूना अपनी मित्र के पास, वह भी उसी की तरह पहली बार माँ बनने वाली है. उनके सुख और परेशानियाँ एक सी हैं. उसी ने कार्ड्स का एक नया खेल सिखाया था “बेल्जियम फिश”. 
अब वह सुबह जल्दी उठकर टहलती है या शाम को धुंधलका होने के बाद. दिन में बाहर निकलना उसे अच्छा नहीं लगता, कुछ लोग देखने लगते हैं. वजन बहुत बढ़ गया है, सभी कपड़े टाइट हो गए हैं. उन दोनों को दो महीने बाद की उस घटना का इंतजार है जो उनके जीने के ढंग को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है. उनके नन्हें मेहमान का आना.
उस दिन इतनी मेहनत से बूस्टर लगाया था, पर उसमें कुछ खराबी आ गयी है अब फिर घंटो की मेहनत और कुछ लोगों के सहयोग से उसे उतारना होगा. कल उन्होंने दोनों घरों पर पत्र लिखे जो पोस्ट करने के लिये जून को देना वह भूल गयी है. आजकल वह अकेले ही लाइब्रेरी जाता है उसके लिये एक साथ चार किताबें लाया है. इतवार होने के कारण कल दोपहर का खाना उसने ही बनाया सिंधी पुलाव व भरवां भिन्डी की सब्जी. शाम को जब वह घर पर नहीं था नूना ने उसका एक पुराना पत्र पढ़ा, कितनी यादें सजीव हो गयीं. वे एक दूसरे का पर्याय बन गए है, एक-दूसरे के बिना अस्तित्त्व की कल्पना करना भी असह्य है, वह चाहती है कि जून और आगे बढ़े, परिश्रमी, और हिम्मती बने, अपने कार्य में कुशलतम बने और पढ़े, सारी जिंदगी उसके सामने पड़ी है, और यही उम्र है जब कितना भी उड़ेंलते जाओ मन से उत्साह कम नहीं होता.