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Tuesday, April 25, 2017

कुम्भ का मेला


कल नहीं लिखा, सुबह स्कूल गयी, दोपहर को नेट और ट्यूशन, शाम को भ्रमण और सत्संग, फिर बालिका वधू और समाचार, दिन निकल गया. बीच-बीच में पिताजी से सम्मुख, जून और नन्हे से फोन से बातचीत. आज इस समय शाम के साढ़े सात बजे हैं, जून दोपहर बाद लौट आये हैं. सदा की तरह उसके लिए एक उपहार लाये हैं, सिल्क का सूट ..बहुत सुंदर है और बहुत महंगा भी ! नन्हे ने कहा, उन्हें किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, वह परिपक्व है, जल्दी हो गया है, हर आगे वाली पीढ़ी पहले से ज्यादा समझदार होती है. वह अपने जीवन पर नजर डालती है तो साफ लगता है, उसकी दृष्टि ही साफ नहीं थी, बुद्धि परिपक्व नहीं थी, परमात्मा ने उसे धीरे-धीरे अपनी ओर आकर्षित किया.
बाहर लॉन में झूले पर बैठकर गर्म जैकेट और कॉट्स वुल के वस्त्रों के बावजूद सुरमई शाम की ठन्डक को महसूस करते हुए लिखना एक अनोखा अनुभव है. सामने साईकस का विशाल पेड़ है, गमले में है पर पत्ते कितने बड़े हो गये हैं, जिनमें मकड़ी ने अपना घर बना लिया है. सुबह ओस के कारण श्वेत रुई से बना प्रतीत होता है. आकाश का रंग सलेटी है, बादल हैं या कोहरा, कुछ समझ में नहीं आता. लोहे के झूले का स्पर्श ठंडा लग रहा है पर गालों को छूती शीतलता भली लग रही है. अभी कुछ देर में वे सांध्य भ्रमण के लिए जायेंगे. सुबह ‘महादेव’ देखा, गणेश का चरित्र कितना अच्छा दिखाया है तभी वे प्रथम पूज्य हैं.
वर्षों पूर्व जो सफर आरम्भ हुआ था अनजाने ही, अब वह पूर्णता की और जाता प्रतीत होता है. हर सवाल का जवाब भीतर ही है, बाहर नहीं है, बाहर आते ही सब कुछ असत्य हो जाता है. पौने आठ बजे हैं, जून और पिताजी टीवी पर अपनी-अपनी पसंद के कार्यक्रम देख रहे हैं. उसे इस क्षण कुछ देखने की चाहत नहीं है. आज सुबह परमात्मा शब्दों के रूप में बरसा. महाकुम्भ पर लेख पूर्ण हो गया, भेज दिया है. परमात्मा परम प्रसाद है, रसपूर्ण है. सुबह के घने कोहरे के बाद अब धूप निकल आई है.
आज मकर संक्रांति है, सुबह से उत्सव का माहौल ! उन्होंने प्रातःराश में चिवड़ा, गुड़ व दही ग्रहण किया साथ में आलूगोभी की सब्जी. टीवी पर कुम्भ के मेले में लोगों द्वारा स्नान करने के चित्र देखे. भीतर से प्रेरणा उठी उन्हें भी एक बार कुम्भ जाना चाहिए. जून ने कहा यदि वे दिल्ली गये तो उसे ले जा सकते हैं. नाश्ते के बाद वह मृणाल ज्योति के बच्चों द्वारा बनाये नये वर्ष के कार्ड्स बांटने गयी. पहले एक उड़िया सखी के यहाँ, वह स्नान कर रही थी, पतिदेव आये, धोती पहने हुए पूजा के वस्त्रों में, फिर एक बिहारी सखी के यहाँ गयी, वह पूजा कर रही थी. उसके पतिदेव सिल्क का कुरता पहने हुए थे, तिल का लड्डू खिलाया. असमिया परिचिता के यहाँ तिल व मूंगफली का एक लड्डू मिला, उनके यहाँ भी बीहू का नाश्ता लॉन में सजा था. एक अन्य उड़िया परिचिता घंटी वाले मन्दिर के बाहर बैठे लोगों के लिए भोजन  ले जाने की तैयारी में लगी थी, उसका लॉन बहुत सुंदर था, कमल की कलियां भी थीं. उसके एक छात्र की माँ ने चावल की खीर परोसी, जो गुड़ डालकर बनाई थी. वह चने की दाल, पूरी व खीर का नाश्ता कई लोगों को करा चुकी थीं. उनके यहाँ तीन सर्वेंट परिवार हैं. सभी लोग इस दिन दान-पुन्य करते हैं. एक अन्य सखी के यहाँ भी कई बच्चे थे. वह अपने भाई के पुत्र को नहलाकर तैयार कर रही थी, वे लोग यात्रा पर जाने वाले थे. एक अन्य परिचिता ने अदरक व तेज पत्ता डालकर लाल चाय पिलाई. लोग कितने प्यार से मिलते हैं, स्वागत करते हैं, एक महिला घर पर नहीं मिलीं, उनके पतिदेव ने कहा, आइये आंटी जी, क्या वह इतनी बुजुर्ग लगने लगी है. एक अन्य परिचिता पूजा करके उठी थीं, उन्हें शाम को सत्संग में आने के लिए कहा. दो अन्य को संदेश भेजे हैं, दोनों क्लब गयी होंगी, आज के दिन क्लब में भी विशेष भोज होता है. जून दफ्तर गये हैं. कल शाम वे जून के बॉस के परिवार को पहली बार बुला रहे हैं, पहले बाहर आग जलाएंगे, फिर भीतर रात्रि भोज.

बीहू का अवकाश समाप्त हो गया. कल दोपहर वे नदी किनारे गये, पानी में लहरों के हिलने पर डूबते सूर्य का पतिबिम्ब अनोखी छटा प्रस्तुत कर रहा था. कल शाम का आयोजन अच्छा रहा. सुबह वह नर्सरी गयी थी. गेंदे, कैंडीटफ्ट व पिटुनिया के पौधे लाने. मार्च तक फूल आ जायेंगे उनमें.