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Wednesday, August 26, 2015

हवा चली..


धन्य है भारतवर्ष और धन्य हैं वे कि उनके पास ज्ञान का अतुल भंडार शास्त्रों के रूप में विद्यमान है. वे इसकी महिमा को समझें और इसके अनुसार चलें. अपने से बड़ों की सेवा करना तथा उनका सम्मान करना तथा छोटों को स्नेह देना..आज पुनः उसने बेवजह शब्द मुँह से निकाले, फिर भी स्थिति पहले से बेहतर हुई है. कल रात जून ग्यारह बजे आए. नन्हे से बहुत दिनों के बाद अध्यात्म पर चर्चा की. ध्यान किया. इस समय वह किताब पढ़ रहा है, शेष सभी सो रहे हैं, बाहर तेज धूप है, भीतर एसी के कारण ठंडक है, इस बार वर्षा कम हो रही है वर्ष के इस हिस्से में. दोनों भांजे अपेक्षकृत शांत तथा सुधरे हुए बच्चे हैं, बात मानते हैं तथा खाने-पीने में भी ज्यादा नखरे नहीं करते हैं. शाम को सत्संग में जाना है, निकट ही एक परिचित के यहाँ है. सुमिरन बना रहता है आजकल, अनुभव यदि एक बार हो जाये तो विस्मृत हो भी कैसे सकता है. जैसे किसी को अपने होने का अहसास हर क्षण रहता है, वैसे ही उसके होने का ज्ञान भी सदा रहता है. उसका प्रेम भीतर रिसता रहता है और वही भीतर से उदित होकर बाहर बिखरता है. उन्हें सजग होकर उसके रूप को अशुद्ध होने से बचाना है. मन उसमें कुछ जोड़ने या घटाने लगता है तो वह प्रेम दूषित हो जाता है.

कल रात को गर्मी बहुत थी और थोड़ी देर के लिए बिजली गुल हो गयी, सभी परेशान थे, पर वह इसका लुत्फ़ उठा रही थी. गर्मी का असर नहीं हो रहा था भीतर की जीवंतता और मुखर हो उठी थी. जून आज फ़ील्ड गये हैं शाम को छह बजे तक आयेंगे. कल सुबह उसे दो सखियों के साथ बच्चों से मिलने जाना है, वे भी उतने ही उत्सुक होंगे जितनी उत्सुकता उन्हें है. बाहर सम्भवतः तेज हवा चल रही है, दरवाजे की आवाज से उसने अनुमान लगाया है, पिछले कई दिनों से हवा जैसे बंद थी. सुबह सद्गुरु को सुना था, अब कुछ याद नहीं है, आजकल वह धर्म को सुन नहीं पा रही पर जी रही है. हर समय भीतर एक ऊर्जा के प्रवाह को अनुभव करती है. ‘उसकी’ उपस्थिति का अहसास हर क्षण होता है. वह है तो वे हैं. अब लगता है जैसे मन की समता पहले से कहीं देर तक टिकी रहती है और यदि मन कभी एक क्षण के लिए विचलित होता भी है तो कोई भीतर है जो उसका साक्षी रहता है अर्थात होश तब भी कायम रह पाता है. इसी महीने उसका जन्मदिन भी आ रहा है, इस वर्ष उसने जाना यदि कभी कोई उसके बारे में लिखे तो लिख सकता है. सद्गुरु कहते हैं जो जानता है वह कहता नहीं किन्तु वह जिस जानने की बात कह रही है वह तो निज स्वभाव है.


फिर एक अन्तराल..कभी प्रमाद तो कभी व्यस्तता..आज नये महीने का पहला दिन है. पुनः संगीत का अभ्यास भी शुरू किया है और लिखना भी. परसों जन्मदिन था, अच्छा रहा. मौसम पिछले हफ्ते से ही सुहावना हो गया है. वर्षा दिन-रात नहीं देखती कभी भी शुरू हो जाती है, इस समय थमी है. पिछले हफ्ते सत्संग में उसने ‘अंकुर बाल योजना’ के लिए सभी को निमंत्रित किया. उसने इस प्रोजेक्ट का नाम अंकुर रखा है, इसमें वे छोटे-छोटे बच्चों को, जो अभी अंकुर हैं और भविष्य में वृक्ष बनेंगे, अध्यात्म के मार्ग पर प्रेरित कर रहे हैं. जिनके माता-पिता के पास उन्हें देने को संस्कार नहीं हैं, घरों का माहौल दूषित है, नशा आदि जहाँ रोज की बात है. प्राणायाम, ध्यान, सत्संग तथा योगासन के माध्यम से उन्हें एक सन्मार्ग पर ले जाने को प्रेरित कर रहे हैं.   

Thursday, November 22, 2012

बीहू की चाय



उसने अपने बचे हुए कामों की एक सूची बनाई, कुछ कपड़ों को दुरस्त करना है, कढ़ाई का काम अधूरा है, आगे बढ़ाना है, कपड़े प्रेस करने हैं. नन्हे का स्वेटर ठीक करना है. मफलर बुनना है. व्यायाम करना है, नियमित न करने से उसका पाचन ठीक नहीं रह पाता. अखबार पढ़ना है. आज शाम उन्हें एक सहभोज में भी सम्मिलित होना है. जून अभी कुछ देर पूर्व आए थे, अब उसी भोज की तैयारी के सिलसिले में गए हैं. आजकल उनके कैम्प में रहने के कारण उसे काफी एकांत मिल जाता है कुछ लिखने के लिए, पर कहाँ लिख पाती है, भावनाएं जैसे शांत हो गयी हैं..विचार थम गए हैं..किसी ने सही कहा है कि मानसिक उथल-पुथल ही सशक्त रचना को जन्म देती है. मन शांत रहे तो फिर कैसी रचना ? लेकिन मन अशांत हो यह भी उसके लिए पीड़ादायक स्थिति होती है, तब उसकी झुंझलाहट का शिकार नन्हा और जून ही होते हैं.

कल शाम पार्टी में दो समूह बन गए, बल्कि तीन, पुरुष अलग, महिलाएँ दूसरे कमरे में और बच्चे तीसरे कमरे में. घर आकर जून देर तक ब्रश करते रहे, मुखवास से मुँह धोते रहे. उसे अच्छा नहीं लगेगा इसलिए. पर वह खुद ही नहीं समझ पाती कि उसे क्या अच्छा नहीं लगेगा. उसके भीतर एक डर है कि कहीं उसका इस तरफ झुकाव न हो जाये. आधी रात हो गयी सोते सोते, देर से सोये तो सुबह देर से उठे, जून बिना कुछ खाए गए, नन्हा स्कूल भी न जा सका और उसने भी उपवास किया. फिर वह लंचब्रेक में आए, उन्होंने एक साथ भोजन किया और अब सब ठीक है. पर जिस बात के कारण ऐसा हुआ उस पर कोई चर्चा नहीं हुई. सो मन में एक कसक तो रह ही गयी पता नहीं कब दूर होगी. उसकी छात्रा ने नन्हे को एक चाकलेट दी, उसका अंतिम दिन है आज, एक सवाल लायी है. वे दो फिल्मों के कैसेट भी लाए थे, एयरपोर्ट व बीस साल बाद... पर अभी तो उसे बहुत काम करना है, सामने वाली उड़िया लड़की को खाने पर बुलाया है, वह बोलती कुछ ज्यादा है लेकिन है बहुत अच्छी...अब शायद ही कभी उससे मिलना हो.

आज नन्हे के स्कूल से फोन आया, उसकी तबियत ठीक नहीं थी सो वे उसे घर ले आए, उसे खांसी है, इस समय सोया है, उसके दस्ताने व टोपी भी मिल गयी स्कूल ड्रेस की. जून कह गए हैं कि कोलकाता से लाने के लिए सामान की लिस्ट बना दे, उसने लिखा, एक बड़ा लैम्प शेड, लाल या हरा. नन्हे का जैकेट, जूता और एक हरी कैप, रील धुलवानी है. और कुछ उसे याद नहीं आया. वैसे भी उन्हें घर शिफ्ट करना है अगले छह महीनों में, नया सामान नए घर में ही लेना ठीक रहेगा. कल नहीं परसों या उससे भी एक दिन पहले माँ-पिता के दो पत्र आए थे और एक शुभकामना कार्ड भी, बहुत सुंदर सा.

जून घर पर होते हैं तो समय का पता ही नहीं चलता. आज शनिवार है. सुबह वह समाचार देख रही थी टीवी पर कि घंटी बजी, सोचा दूधवाला होगा, पर ऑफिस से ड्राइवर आया था, जून ने एक खाली चेक मंगवाया था. वह थोड़ी कन्फ्यूज हो गयी और बाद में बहुत देर तक परेशान रही कि इतना सा काम वह नहीं कर सकी. उस दिन उर्जा सरंक्षण पर प्रदर्शनी देखने गए थे, सेंट्रल स्कूल के एक छात्र ने अपने स्टाल दिखाया, फिर कमेन्ट लिखने को कहा था तो उसके गाल लाल हो गए...क्यों ऐसा होता है, इतनी उम्र हो गयी है  आखिर कब जाकर उसमें परिपक्वता आयेगी या यूँ ही कट जायेगी उम्र. पडोस की एक बालिका से एक किताब लायी है विज्ञान की, एक मैजिक स्क्वायर है उसमें, उसे नोट करना है.

रविवार है आज, जून दोपहर को ही चले गए, कल वह ऑफिस से आए तो जैसे कुछ हुआ ही न हो, ऐसे थे. वह बहुत अच्छे हैं और बहुत प्रिय..  परसों आएँगे. नन्हे की तबियत अब ठीक है, जून दो कैसेट दे गए हैं, गुरु दक्षिणा और अंकुर. दोनों ही अच्छी हैं, पर अंकुर कुछ अधिक.