Monday, January 19, 2015

नरेंद्र कोहली का "महासमर"


पिछले चार दिनों से डायरी नहीं खोली, तभी तामसिकता ने अपनी जड़ें गहरी कर लीं. आध्यात्मिक मार्ग पर जितना ऊंचा चलो गिरने का भय उतना ही अधिक होता है. आज सुबह भी अलार्म सुनने के बावजूद रजाई उठाने का छोटा सा कार्य हाथों ने नहीं किया क्योंकि मन अलसाया था. तन गर्मी चाहता था. देह को इतना सुविधाभोगी बनाना और मन को प्रमाद्युक्त रखना तो नीचे गिरने का साक्षात् प्रमाण है, फिर पिछले चार दिनों से सत्संग भी ठीक से नहीं सुना. डायरी में कुछ लिखा नहीं अर्थात मनन-चिन्तन भी नहीं हुआ, बल्कि पठन हुआ. पिछले दो-तीन दिन नरेंद्र कोहली जी की ग्रन्थमाला ‘महासमर’ का प्रथम भाग पढ़ती रही. महाभारत के पात्रों में कितना काम-क्रोध-लोभ-मोह भरा हुआ है, सम्भवतः उसी का प्रभाव अचेतन मन पर पड़ता रहा हो, कुछ भी हो, ये लक्षण उत्तम नहीं हैं. कल योग शिक्षक से भी भेंट हुई, क्रिया में सु-दर्शन भी हुए. आज सुबह उठाने के लिए उसने प्रार्थना भी की थी. स्वप्न में नीली आकृति भी देखी पर जब मद का राक्षस बैठ हो तो दैवी शक्तियाँ भी क्या करें. उसके पापों का ढेर जितना बड़ा है, पुण्यों का संचय उतना ही कम है, सो पाप प्रबल हैं किन्तु गुरू के चरणों में प्रार्थना करने से उनकी कृपा मात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं फिर उसके आराध्य तो गुरुओं के परम गुरू कृष्ण हैं. इस क्षण से हर पल सजग रहना होगा ताकि भक्ति मार्ग की ओर बढ़ते कदम ठिठके नहीं, पीछे तो हरगिज न आयें ! आज नन्हा भी घर पर है, पिछले कुछ दिनों से वह ज्यादा गम्भीर हो गया है परीक्षा की तैयारी ठीक चल रही है, स्कूल व घर दोनों जगह ही. गणित का अभ्यास उतना ही करता जितना करना चाहिए, लेकिन ज्यादा कहने का कोई लाभ नहीं. वह स्वयं समझदार है. वह उन्हें हर हाल में प्रिय है.

आज संगीत की परीक्षा का फार्म भर दिया. अगले हफ्ते शुल्क जमा करना है. मई में परीक्षा होगी. कल वे हिंदी पुस्तकालय गये. श्रील प्रभुपाद की ‘भगवद गीता’ लायी है, वहाँ भागवद के भी सभी भाग हैं. ‘महासमर’ का प्रथम भाग भी वहीं से लायी थी. महाभारत पढ़ने के लिए योग शिक्षक ने कहा था सो पढ़ने का अवसर मिल गया है. भगवद गीता अमूल्य ग्रन्थ है. इसमें अभय को जीवन में प्रमुखता सड़ने का संदेश है. भयभीत व्यक्ति मृत्यु से पहले ही मर जाता है. भय ही व्यक्ति को जीवन में कई समझौते करने पर विवश करता है. निर्भीक व्यक्ति को कोई झुका नहीं सकता.

आज क्रिसमस है. एक सखी को शाम को चाय पर बुलाया है. फूलों से उसे प्यार है और उनके लॉन में ढेरों फूल खिले हैं. वह अपनी पुस्तक भी उसे देना चाहती है लेकिन यह सब करते हुए अहंकार की हल्की सी भावना भी नहीं आनी चाहिए. नहीं आएगी क्योंकि यह सब उसने कहाँ किया है. प्रकृति ने उससे करवाया है, इसमें उसका कोई योगदान नहीं है.

आज दोपहर उन्होंने aol के बच्चों के कोर्स ‘आर्ट एक्सेल’ की एक शिक्षिका को खाने पर बुलाया है. aol से उनका नाता धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है. मौसम आज सुहावना है. महासमर में कल पहली बार कृष्ण का उल्लेख हुआ, मन जैसे भावों से भर गया. उसका नाम अंतर में कैसी शांति भर देता है.



2 comments:

  1. महासमर पढ़ते हुए कुछ ही दूसरा काम कर पाना मुमकिन नहीं ...
    जादू है नरेंद्र कोहली जी के लेखन में ...

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  2. सही कहा है आपने...स्वागत व आभार !

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