Thursday, January 22, 2015

श्री अरविन्द का वेद रहस्य


उसने प्रार्थना की, उनका चित्त विषमता मुक्त और कामनाओं से मुक्त रहे. भौतिक सौन्दर्य के पीछे छिपे उस दिव्य सौन्दर्य का अनुभव करे. तीनों गुणों से परे उस गिरधर कान्हा का ध्यान उन्हें हो जो चिन्मय है. अज्ञान का आवरण जो उनकी आत्मा ने ओढ़ा हुआ है, छिन्न-भिन्न हो जाये, सहज प्रेम का स्रोत जो अंतर में प्रवाहित हो रहा है वह सारी बाधाएँ पारकर जीवन में बहने लगे, और यह तभी सम्भव है जब अनंत का सुख उनके हृदयों में समा जाये, मन भी तो अनंत है, उसकी गति अगम्य है, अपार है तो उसे तृप्त वही तो कर पायेगा जो स्वयं अगम्य है, वही कान्हा उसका सखा है !

ईश्वर के प्रति प्रेम ही वास्तविक प्रेम है, यह प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता, प्रेम के लिए ही प्रेम होता है, क्योंकि वह इतना मोहक है, इतना पवित्र है, इतना उच्च है कि प्रेम किये बिना कोई रह ही नहीं सकता. भगवद् भक्ति का सुख कभी समाप्त नहीं होता, यह धरा से प्रवाहित होते जलस्रोत की तरह है जो निरंतर बहता रहता है !

उसने सोचा, मानव तीन स्तरों पर जीते हैं, देह के स्तर पर, मन के स्तर पर और तीसरा आत्मा के स्तर पर. इन तीन स्तरों की तुलना पदार्थ की तीन अवस्थाओं से की जा सकती है. ठोस, तरल तथा गैसीय अवस्था. देह स्थूल है, जहाँ भिन्नता का भाव रहता है, जैसे दो ठोस वस्तुएं अपनी भिन्न प्रकृति बनाये रखती हैं. दूसरा तरल जैसे मन जो सूक्ष्म है, तरल की तरह मन भी एक-दूसरे के निकट आयें तो भिन्नता कम होती है. आत्मा यानि गैसीय अवस्था जो इतनी सूक्ष्म है कि हर जगह व्याप्त हो जाती है. आत्मा के स्तर पर कोई भेद नहीं रह जाता.


आजकल वह ‘श्री अरविन्द’ द्वारा रचित ‘वेद रहस्य’ पढ़ रही है. वेद को वे कर्मकांड का वर्णन करने वाली पुस्तक के रूप में जानते हैं, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं का आवाहन किया जाता है कि वे यज्ञ के माध्यम से हवि स्वीकार करें और इच्छित वर दें, जिनमें धन-धान्य, सम्पत्ति, गोधन, अश्व तथा कई अन्य भौतिक लाभ हैं, लेकिन इस पुस्तक में यज्ञ के रूपक को आध्यात्मिक अर्थ दिया है जिसमें अग्नि मन के संकल्प का प्रतीक है, इंद्र मन का प्रतीक है. मानव जन्म की सार्थकता इसी में है कि मानव मन के उच्चतम केन्द्रों तक पहुँचे, उन रहस्यों को खोजें जो अतिचेतन मन में छुपे हैं. चेतन, अवचेतन और अचेतन मन से परे प्रकाश के उस लोक को चुन लें जो उन्हें अतिमानव बनाता है. जहाँ से समय-समय पर ईश्वर के संदेश तो आते हैं पर रहस्य रहस्य ही रह जाता है. ईश्वर को वही तो जान सकता है जो उसके निकट जाये, उच्च का संग करने से मन स्वयंमेव उच्च स्तरों पर जाने लगता है. 

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