Thursday, April 7, 2016

आदमीनामा


आजादी की इकसठवीं सालगिरह ! आज उन्होंने पहली बार झंडा ऊँचा लगाया है. ओशो कह रहे हैं सतयुग और कलियुग दोनों साथ-साथ चलते हैं, व्यक्ति पर निर्भर है कि वह किस युग में रहना चाहता है. उसका जीवन अंधकार से भरा हो अथवा प्रकाश से यह उसके ऊपर निर्भर है. राम, कृष्ण इसलिए पूजे जाते हैं क्योंकि उन्होंने सतयुग में रहना चुना, उनके साथ ही रावण, कंस तथा अँधेरे में रह रहे लोग भी थे. ‘मैं’ जब शुद्ध ‘मैं’ में परिवर्तित हो जाता है, अहंकार मुक्त हो जाता है तो सारे प्रश्न स्वयं हल हो जाते हैं.
आज भी घर में रंगाई-पुताई का काम चल रहा है. सारा घर अस्त-व्यस्त है, लेकिन उसका मन अनंत विश्राम में डूबा है. मजदूरों के रूप में भी वही चेतना है. वही जड़ में है वही चेतन में. वह जब एकटक कहीं देखती है, दीवार हो या घास का मैदान, सब कुछ रूप बदलने लगता है. जैसे सब कुछ पिघल रहा हो, नजर बदली तो नजारे बदले ! ऑंखें बंद करते ही जैसे आकाश नजर आता है नन्हे-नन्हे सितारों से युक्त ! भीतर व बाहर एक ही सत्ता है और सत्ता में परम शांति है, विश्राम है, आनन्द है, कितना अनोखा अनुभव है यह, कोई नहीं समझ सकता जब तक कि वह स्वयं ही न जाने. सद्गुरू ने उसे यह अनुभव कराया है, कृपा का पात्र समझा है. उनकी वह दृष्टि जो उस पर पड़ी थी, भीतर बीज बो गई थी, अब वह पनपने लगा है !
उनके देश में कितनी ही उन्नत, महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ संस्थाएं हैं, जहाँ ज्ञान है, प्रकाश है और जीवन-मूल्यों की शिक्षा दी जाती है. जहाँ कला है, विज्ञान है, शोध है, आदर्श हैं, समूह भावना है, जहाँ देश की विरासत को, प्रेम को बढ़ावा दिया जाता है. जहाँ सीखने का, जानने का और कुछ नया करने का जोश है, जहाँ सामान्य से ऊपर उठकर कुछ ऐसा करने की प्रेरणा मिलती है जिसका असर सारी मानवता पर पड़ता है अथवा तो जहाँ मानव अपने भीतर से जुड़ता है. वह भी अपने भीतर से जुड़ी है, जहाँ एक ऐसी सत्ता का साम्राज्य है जो प्रेम के तन्तुओं से बनी है, शांति जिसका आधार है और आनन्द के वस्त्र जिसने धारण किये हैं. वह सत्ता ज्ञान की तलवार लिए है और सुख के कमल पर बैठी है, वह पावन सत्ता उनमें से हरेक के भीतर है, सभी एक न एक दिन उसका ज्ञान पा लेंगे. सद्गुरू की कृपा से इस जन्म में उसे वह ज्ञान मिला है. उसका समय, उसकी ऊर्जा, उसकी वाणी, उसके विचार, उसकी बुद्धि सभी कुछ उसी से भरी हुई हो. वाणी में दोष अब भी बहुत दिखाई देता है, भीतर छल भी है और द्वेष भी साफ दिखाई देता है. अब से पूर्ण प्रयत्न करेगी कि ऐसी गलती दोबारा न हो. अभी कुछ देर में एक छात्रा पढ़ने आने वाली है, उसे ‘आदमीनामा’ पढ़ाया था. नजीर की यह कविता इसी फितरत पर तो बयान दर्ज करती है, आदमी कितने रंग बदलता है. रक्षक भी वही है, भक्षक भी वही है. कभी वह प्रेम का पुतला बन जाता है तो कभी क्रोध का अंगार, कभी द्वेष से भर जाता है तो कभी ऐसा अनुरागी कि उसे देखकर फरिश्ते भी शरमा जाएँ !

पिछले चार दिनों से डायरी नहीं लिखी, याद नहीं आता क्यों समय नहीं मिला. कल इतवार था सो तो ठीक है, शनि को भी वह सुबह योग सिखाने जाती है, शुक्र व गुरूवार को क्या व्यस्तता थी, उम्र के साथ-साथ याद भी कमजोर पड़ती जाती है. अगले वर्ष अर्ध शतक लग जायेगा. अभी कल की ही बात लगती है, विवाह से पहले घर के सामने रहने वाली एक पागल सी लडकी ने पूछा, कितने साल की हैं आप, तो ‘बीस’ जवाब में सुनकर वह बोली, इतनी बड़ी ! पर आज तो अर्ध शतक भी ज्यादा नहीं लगता. मन तो वैसा ही है बल्कि गुरूजी की कृपा से बच्चों जैसा हो गया है ! अभी-अभी एक सखी से बात की, उसे नन्हे के जॉब की खबर उसकी बिटिया ने दी है.   

Wednesday, April 6, 2016

राखी के धागे


आज ‘अंकुर बाल संस्कार केंद्र’ में बच्चों से राखियाँ बनवानी हैं, अगले शनिवार को रक्षाबंधन का त्योहार है. वे सभी मिलकर मनाएंगे. कल शाम मीटिंग में साहित्य सभा ‘जोनाली सारू’ के बारे में पता चला. मंगल को है शाम चार बजे. वह जा सकती है, जून को बताना होगा. धीरे-धीरे उसका कार्य क्षेत्र बढ़ता जा रहा है. कृष्णाय अर्पणमस्तु सब उसी की लीला है. जो कुछ भी इस सृष्टि में हो रहा है वही करा हो रहा है, मूल तो वही है, जो हो सो हो उसके सारे कर्म उसी को अर्पित हैं, मन द्वारा सोचना भी तो एक कर्म है, वाणी का कर्म तथा स्थूल कर्म, सभी उसी की लिए हों. कल रात सुना अहंकार का भोजन दुःख ही है, दुःख के कीट खाकर ही वह जीवित रहता है और अहंकार किये बिना मानव रह नहीं सकता. कितना सही कहते हैं सद्गुरु, ‘मैं’ को मिटाए बिना उनके दुखों का अंत नहीं हो सकता और ‘मैं’ को दिन-रात पोषने का वे उपाय करते हैं, चाहते हैं शीतलता और मिलती है जलन, क्योंकि बढ़ते हैं आग की तरफ, दुःख को सम्भाल कर रखते हैं, शायद वे दुःख ही चाहते हैं.
परसों उन्हें मृणाल ज्योति जाना है, राखी का त्यौहार मनाने. उसने स्कूल की हेड मिस्ट्रेस से बात की, उन्होंने हिंदी में स्कूल का एक एक छोटा सा परिचय लिखने को भी उसे कहा है. कल पुस्तकालय का कार्यक्रम ठीक हो गया, दुलियाजान कालेज के एक रिटायर्ड अध्यापक से मिलना हुआ. कल कवि गोष्ठी है, उससे कहा गया है कि हिंदी के लिए भी ऐसी ही शुरुआत वह करे ! उनके पास ऊर्जा है, काम करने की इच्छा है तो कोई भी कार्य असम्भव नहीं है. आज दोपहर को वस्त्रों की आलमारी ठीक करनी है, पुराने वस्त्र निकलने हैं नयों को सहेज कर रखना है, ऐसे ही उनका मन है, पुराने सड़े-गले अनुभवों को, विचारों को निकाल कर नये ताजे शुभ विचारों से इसे भरना है ताकि निरंतर आगे बढने की प्रेरणा मिलती रहे ! इसी हफ्ते दोनों कमरों में पेंट भी होना है, दीवाली से पूर्व की सफाई ! आज ध्यान में परमात्मा से एकता का अनुभव कितना स्पष्ट था, उसे आँखें बंद करते ही आत्मा का अनुभव करवाता है वही, उससे परे भी वही है, कितनी गहन शांति का अनुभव मन करता है. वे ध्यान नहीं जानते तो जीवन के एक सुंदर अनुभव से वंचित रह जाते हैं, अपने आपको जाने बिना जीवन कितना सूना होता होगा, लेकिन जब तक इसका अनुभव नहीं होता तब तक यह सूनापन भी कहाँ दिखता है ?  

कल शाम वह साहित्य सभा की मीटिंग में गई, उसे जून को बताना याद ही नहीं रहा, वहीं से फोन करके बताया, वे थोड़ा क्रोधित हुए पर जल्दी ही सामान्य हो गये, जब देखा कि उनके क्रोध का उस पर कोई असर नहीं हो रहा है. पर बाद में उसे अहसास हुआ अपनी ख़ुशी के लिए किसी को परेशान करने का उसे कोई हक नहीं है. उसे उनके लिए एक कविता भी लिखनी है कल उनका जन्मदिन है, दोपहर को उन्होंने पहली बार उसे एक मनोवैज्ञानिक की तरह समझाया, जैसे पहले कई बार वह उन्हें कुछ कहती रही है. ईश्वर कितने-कितने रूपों में उनके सम्मुख आता है. वह परिपक्व हो रहे हैं, जीवन में हर एक को धीरे-धीरे ऊपर आना है, कोई जल्दी कोई देर से, पर कोई-कोई ही आत्मा को लक्ष्य बनाकर चलता है. अहंकार मुक्त होकर ही कोई शुद्ध चेतना के रूप में स्वयं को जानता है. अहंकार का अर्थ ही है वह अन्यों से भिन्न है, श्रेष्ठ है, तथा उसे संसार के सारे सुख-आराम चाहिए, उसे जीना भी है और स्वयं को कुछ मनवाकर जीना है, लोग कहें, देखो, यह फलाना है, अर्थात इस ‘मैं’ का भोजन  है द्वेष, स्पर्धा, भेद और यही सब क्रोध का कारण है, क्रोध दुःख का कारण है अर्थात अहंकार का भोजन दुःख ही हुआ, जैसे ही कोई अपने शुद्ध स्वरूप को जान लेता है, सारा विश्व एक ही सत्ता से बना है, प्रकट हो जाता है, माया का खेल खत्म  हो जाता है, अब न कुछ पाना है न किसी से आगे बढ़ना है, न कुछ करके दिखाना है, अब तो बस खेलना है, लीला मात्र शेष रह जाती है. वह असीम सत्ता जैसे छोटी सी देह में, मन में समा जाती है, अब जो भी होगा वह उसी के द्वारा होगा और वह तो एक ही काम जानता है, खेल उत्सव, मस्ती और उसके लिए सुख-दुःख, मान-अपमान समान है, वह कालातीत है, द्वन्द्वातीत है, गुणातीत है, अपरिमेय है, आनन्द, शांति, प्रेम, ज्ञान, शक्ति, पवित्रता और सुख का भंडार है. उसे कुछ करके कुछ पाना ही नहीं है, तो अब सारी दौड़ समाप्त हो गयी, सारा दुःख समाप्त हो गया, जन्मों-जन्मों की तलाश समाप्त हो गयी, अब तो बस होना मात्र शेष है !  

Monday, April 4, 2016

फेन, तरंग, बूंद


शाम के पांच बजे हैं. शाम का नाश्ता बना लिया है और रात के भोजन की तैयारी भी हो गयी है. जून आज देर से आने वाले हैं, सो उसने डायरी उठा ली है. मन पर नजर डाले तो एक इच्छा दिखाई देती है. आंटी के द्वारा कमल के फूल का फोटो देख लिया गया या नहीं, यदि हाँ तो उन्हें कैसा लगा, इसकी जानकारी मन चाहता है. लेकिन कल सवेरे ही उन्हें फोन करना ठीक रहेगा. इसी हफ्ते पुस्तकालय में एक मीटिंग है उसे जाना ही चाहिए. ‘साहित्य सभा’ से एक पत्र आया है जो उसे हिंदी पढ़ने आने वाली छात्रा पढ़कर सुनाएगी. सभी को राखियाँ व पत्र मिल गये हैं पर किसी ने भी जवाब नहीं दिया. आज मानव कितना भावना शून्य होता जा रहा है. उनमें वह भी शामिल है. खैर ! कलयुग का अंत समय है ( ब्रह्मकुमारियों के अनुसार ). बाहर मौसम अच्छा है, शीतल मंद पवन डोल रही है पर वह यहाँ अंदर बैठी है. प्रकृति के निकट जाने का कोई अवसर चूकना नहीं चाहिए. प्रकृति, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी में आत्मा है और जहाँ भी आत्मा है उससे ऊर्जा तो निकल ही रही है. सुबह चार बजे उठी और चालीस मिनट लग गये पानी पीने, नित्य क्रिया आदि करके योग के लिये बैठने में, सुबह वक्त कितनी तेजी से दौड़ता है. आज ध्यान भी एक घंटे से कम हुआ. राखी बनाना शुरू किया, कई सारी बना ली हैं. बनाना कितना सरल है. किसी भी वस्तु से, वस्त्र, ऊन या धागे से ही बनायी जा सकती हैं. सासु माँ बाहर बैठी हैं बरामदे में. वह शांत रहकर सुबह से शाम तक का वक्त कैसे बिना अशांत हुए गुजार देती हैं, अचरज होता है, सुबह टहलने जाती हैं, फिर आकर स्नान, नाश्ता आदि, कभी किचन में कुछ काम कर लेती थीं पर अब उनका मन नहीं होता. दोपहर को आराम करती हैं, कुछ देर टीवी, फिर शाम का भ्रमण और फिर केवल बैठना, शाम को टीवी देखना उन्हें ज्यादा पसंद नहीं है. बीच-बीच में दवा और मालिश आदि में कुछ वक्त जाता है. उनमें धैर्य बढ़ रहा है !
 
आज सुबह से परमात्मा उसे सचेत करने का प्रयत्न कर रहे हैं और उसने जैसे अचेत रहने की कसम खा ली है. सुबह अलार्म बजा तो पांच मिनट बाद उठी. बाथरूम में पानी गिरा दिया बिना इसकी परवाह किये कि बाद में अन्यों को भी बाथरूम इस्तेमाल करना है. नैनी की चाय बनायी तो गैस पर ही उबलती रह गयी, उसने भी ध्यान नहीं दिया. दलिया बनाया तो उसमें सब्जियां डालकर ही छोड़ दिया, दलिया डालना ही भूल गयी, तुर्रा यह कि एक बार खोल कर देखा भी तब भी समझ में नहीं आया कि कुछ गलती हुई है. कॉर्न फ्लेक्स में गाय के दूध की जगह अमूल डाल दिया. हर कदम पर गलतियाँ ही गलतियाँ. परमात्मा सोचता होगा सजग रहने का अब तो प्रयत्न करेगी पर ध्यान में भी वही इधर-उधर के ख्याल. मन टिकता ही नहीं था यह अस्थिर मन किसकी निशानी है, यह प्रमाद की निशानी है. मोह की निशानी. कुछ कर ले, कुछ बन जाये, कुछ पा ले, ऐसा जो ज्वर भीतर है, यह उसी की निशानी है. परमात्मा उन्हें झकझोर कर जगाता है. आँखें खोलो, क्या पाना है? कहाँ जाना ही ? क्यों इतनी भाग-दौड़, क्यों इतनी आतुरता, इतनी शीघ्रता, मन जैसे रेस में भाग रहा है, द्वन्द्वों से ग्रसित मन कहीं टिककर बैठता ही नहीं, ऐसा तो नहीं होता एक साधक का मन, यह सद्गुरू कहना चाहते हैं !
आज सुबह पुनः दस मिनट देर से उठी, पर अपेक्षाकृत मन सजग था सो अभी तक तो कोई भूल नजर नहीं आती, हाँ एक भूल जो हर पल, हर वक्त, चैबीसों घंटे, सातों दिन, बारह महीने जारी है, वह है वाणी की कटुता. वाणी का दोष ठीक नहीं करती है सो यह बढ़ता ही जा रहा है. इसी क्षण इसके प्रतिकार का मौका मिला है, अच्छा है, झट उपयोग कर लेना चाहिए. आज का सत्संग एक नर्सरी चलाने वाले के यहाँ है, पर उनका जाना सम्भव नहीं होगा. कल दिनकर की ‘कवि’ कविता पढ़ी. कवि का हृदय कोमल होता है किसी का भी दुःख हो उसे छू जाता है, उसका हृदय दूसरों की पीड़ा को अनुभव करता है, वह जीवन को एक ऐसे नजरिये से देखता है जिसमें सभी एक हैं, एक ही परिवार के अंग, सबका सभी कुछ साझा है. ऐसा कवि हृदय ही एक दिन परम सत्य की ओर बढ़ जाता है. कल शाम मीटिंग है, फिर एक सखी के यहाँ पूजा में जाना है, पता नहीं, दोनों जगह जाना सम्भव होगा या नहीं. जून कल ‘परंपरा पनीर मसाला’ लाये हैं, उसकी गंध से भी मन भर गया है जैसे भोजन कर लिया हो. सुबह उन्होंने वजन व रक्त दबाव नोट किया, ऊपर का नब्बे से भी कम है और नीचे का साठ से. वजन पचास से. बीपी कम होने से उसे कोई दिक्कत तो नहीं होती. कल जीजाजी ने पर्यावरण पर कुछ भेजने को कहा, उन्हें तीन कविताएँ भेजी हैं.


आज मौसम अपेक्षाकृत गर्म है, वर्षा नहीं हो रही है. सुबह थोड़ा जल्दी उठी, मन शांत है, जिसका बीपी इतना कम हो उसका मन शांत नहीं होगा तो क्या होगा. इस वक्त लग रहा है कि ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो करना शेष हो. जैसे सारे कार्य हो चुके हैं. अब तो बस एक उसी की प्रतीक्षा है, यह भी क्या एक कार्य नहीं हुआ, प्रतीक्षा तो उसकी करें जो कहीं दूर हो, आने वाला हो, जो कहीं गया ही नहीं, सदा निकट ही है, जो स्वयं ही है वह भला क्यों और किसकी प्रतीक्षा करे, तो प्रतीक्षा भी नहीं बस अपने होने का अहसास लेकिन इस अपने होने में अहंकार नहीं, केवल होने का अहसास. जब ‘मैं’ ही नहीं रहा तो करेगा कौन, कर्ता नहीं है केवल एक सत्ता है, वह सत्ता सहज रूप से कर्म होते देखती है, शरीर के भीतर श्वास आ जा रही है, दिल धड़क रहा है, हाथ लिख रहा है, मन संकल्प उठा रहा है, लेकिन इन सबको एक सूत्र में बाँधने वाला कोई नहीं, ये सब वैसे ही हैं, जैसे जल में तरंगे, बूंदें, लहरें, फेन सभी अपने आप में स्वतंत्र भी और एक भी !

Thursday, March 31, 2016

खोया हुआ सा कुछ - निदा फाजली


जब कोई मर्यादा को तोड़ देता है तब पतन निश्चित है. ज्ञान की अग्नि में मन रूपी सोने को उन्होंने तपाया है किन्तु ज्ञान की मर्यादा का भंग भी वे कर देते हैं. सत्य तो यह है कि स्वयं को मुक्त जानकर मर्यादा रखते ही नहीं, बड़ों के प्रति सम्मान भी एक मर्यादा है, वाणी की भी मर्यादा है. उनके भीतर की ग्रन्थियों को जो खोल दे वही तो मर्यादा है. मर्यादा भंग करते-करते वे इतने असंवेदनशील हो गये हैं कि जिनके प्रति व मर्यादाहीन हो रहे हैं उनकी भावनाओं का भी ध्यान उन्हें नहीं आता. आज जून दिल्ली गये हैं, दो दिन बाद आएंगे. उसे आराम से रामकथा सुनने का मौका मिला है. संत कह रहे हैं सोच को हृदय तक लाना आयास-प्रयास से नहीं होता, ज्ञान को प्रेम में बदलना सायास नहीं होता. हृदय में स्वतः आना ही ज्ञान की सफलता है. बुद्धि और हृदय जब एक हो जाते हैं तभी योग होता है. हृदयवान व्यक्ति जब बुद्धि के बहकावे में आ जाये तो घाटे का सौदा है पर बुद्धिमान व्यक्ति जब हृदय के क्षेत्र में आ जाये तो यह परमात्मा तक की यात्रा है. निरंतर उस तत्व से जुड़ जाना ही संतुष्टि है. ऐसा संतोष जब मिलता है तब सारी तृष्णायें छोटी हो जाती हैं. असंगता, समता, निरभिमानी होना, अक्षोभता तथा अनंतता ये सभी ज्ञान की मर्यादाएं हैं. प्रेम की प्रगाढ़ता में ये टूटती हैं पर तब ज्ञान सफल हो जाता है. प्रेमी असंग नहीं होता, वह समता भी नहीं रख पाता, विरह उसे सताता है. प्रेमी अभिमानी भी है, उसे प्रियतम का और अपने प्रेम का अभिमान है. हाँ, प्रेम भी अनंत होता है. इसलिए इसकी तो चिंता ही नहीं करनी चाहिए यदि वे सभी को प्रेम बांटते रहे तो उनके पास कम हो जायेगा और यदि कोई बदले में उन्हें प्रेम न दे तो वे खाली हो जायेंगे, बल्कि जब कोई किसी को प्रेम देगा तो वह अपने आप पुनः भर जायेगा. परमात्मा ही तो प्रेम है, वही तो आनन्द है, शांति है, तो जब कोई किसी को इनमें से कुछ भी देता है तत्क्षण वह जगह भर जाती है. आज पुस्तकालय में मीटिंग थी, मुख्य अतिथि को उसने आदरपूर्वक असमिया गमछा पहनाया. आज की कथा में यह शेर भी सुना था पता नहीं किसका लिखा है-
ये तुझसे किसने कहा कि दिल गम से तबाह नहीं
ये और बात है कि मेरे लब पे आह नहीं
एक मैं हूँ कि सरापा सवाल हूँ
एक तू है कि तुझे फुर्सते निगाह नहीं !

निदा फाजली की पुस्तक खोया हुआ सा कुछ उसने पढ़ी, कल से पढ़ रही है. एक आत्मकथात्मक उपन्यास भी पढ़ा था. हर लेखक/ कवि/ कलाकार के भीतर साझा दर्द होता है, साझी खुशियाँ होती हैं. प्रकृति के विभिन्न रूपों से प्रेम, ईश्वर की मौजूदगी का अहसास या तलाश और रिश्तों को गहराई से महसूसने की ताकत, भीतर उमड़ता ढेर सारा प्यार, जिसे बिखरने के लिए कोई रास्ता नहीं नजर आता. निदा फाजली से पाठक का एक रिश्ता बन जाता है, वह उसे अपना जैसा लगता है. उनके दोहे भी अच्छे लगे. सीधे-सादे शब्दों में दिल की बात, दिल की गहराई से निकली बात ही दिल को छू जाती है.

‘वो सूफी का कौल हो या पंडित का ज्ञान
जितनी बीते आप पर उतना ही सच जान

माटी से माटी मिले, खो के सभी निशान
किसमें कितना कौन है कैसे हो पहचान

युग-युग से हर बाग़ का ये ही एक उसूल
जिसको हँसना आ गया वो ही मिट्टी फूल

जीवन भर भटका किये खुली न मन की गाँठ
उसका रस्ता छोड़कर देखी उसकी बाट’

आज तीज है, सावन के शुक्ल पक्ष की तीज. उसने सुबह-सुबह मंझले व बड़े भाई तथा बड़ी बुआ से बात की. जून कहते हैं वह भावनाओं को ज्यादा महत्व देती है, बुद्धि को कम. भावना के साथ-साथ बुद्धि का होना भी कितना आवश्यक है, मात्र भावना के कारण वह कितनी बार मूर्ख बनी है. मुरारी बापू कहेंगे, कोई बात नहीं, मूर्ख बनी है न, किसी को बनाया तो नहीं. खैर, ओशो कहते हैं कि बेवकूफ ही परमात्मा के मार्ग पर चल सकते हैं, पर वह कहते हैं ऐसा बेवकूफ बुद्द्धि का अतिक्रमण कर जाता है, यहाँ तो बुद्धि के लाले पड़े हैं, लांघने की बात ही नहीं है. परमात्मा की कृपा तो हर क्षण बरस रही है, लूट मची है, इतनी ज्यादा है कि दोनों हाथों में नहीं समाती, अनवरत बरस रही है, लगातार उसकी कृपा हरेक पर बरस रही है. वे आँखें मूँदे बैठे रहें तो कोई क्या करे. वर्षा पुनः शुरू हो गयी है. दस बजे तक रुक जानी चाहिए. आज सुबह स्वीपर नहीं आया, अब आया है जो उसके ध्यान का समय है. दस बजे एक परिचिता के यहाँ जाना है, उसे समय दिया है. पूजा की छुट्टियों वे यात्रा पर जायेंगे. जून ने अभी से टिकटें कर दी हैं. उनके जीवन में पहले से कहीं अधिक क्रियाशीलता है, इसका पता कल बनाई लिस्ट देखकर लगता है. उसे भी अपनी ऊर्जा का पूरा उपयोग करना है. आजकल कितने अनोखे अनुभव होते हैं, जैसे वह है ही नहीं, बस वही है. उसके हाथों की जैसे कठपुतली है, वह जैसा कहे वैसा करती जाये. कितना असीम है वह और कैसे एक मानव के हृदय में समा जाता है. कितना असंग है पर लगता है उसका संग कभी छूटता ही नहीं ! वह जादूगर है !     


     

Wednesday, March 30, 2016

हंस का विवेक


आज वर्षा रुकी है पर मौसम सुहाना है. कल शाम को हुए सत्संग में उसने गाइडेड मैडिटेशन कराया. जब तक सोच-सोच कर बोल रही थी, अंग्रेजी थोड़ी अटपटी थी पर बाद में जब सहज होकर बोलने लगी तो अपने आप ही जैसे शब्द निकलते गये. कल हयूस्टन में लिखी डायरी पढ़ी, अच्छी रचना हो सकती है कितना कुछ लिखा हुआ है जो टाइप करना है. ईश्वर ने उसे शब्दों से प्रेम सिखाया है पर वह उस कला की उतनी कद्र नहीं कर रही, इच्छा शक्ति की कमी, आत्मविश्वास की कमी, प्रमाद तथा ऐसे ही किसी दुर्गुण के कारण ही तो, संकल्प करती है पर पूरे नहीं कर पाती. अज टीवी पर सुना, स्वामी रामदेव जी कह रहे थे वह कुत्ते की तरह होता है जो अपने संकल्पों का पालन नहीं करता. हंस की तरह उन्हें बनना है. हंस जो नीर-क्षीर का विवेक कर सकता है. अगले महीने रक्षाबन्धन का त्यौहार है. जून के हाथ राखियाँ भिजवा सकती है, पत्र लिखने होंगे. कल शाम एक नयी फिल्म देखी, ‘जाने तू या जाने ना’.

आज एकादशी है. गुरु माँ गा रही हैं. ‘करां सजदा ते सिर न उठावां कि दिल विच रब दिसदा’ जब बुद्ध को ज्ञान हुआ तो वृक्षों में असमय फूल आ गये, वे जो अपनी संवेदनशीलता खो चुके हैं, खिले हुए फूल भी नहीं देख पाते. उस पर राम कृपा हुई है तभी सत्संग में रूचि है. जून से इस विषय पर थोड़ी बातचीत भी हो गयी. वह इतने व्यस्त हैं अपने रोजमर्रा के जीवन में कि उससे निकालकर कुछ और सोचने की उनके पास फुर्सत ही नहीं है. आज वह छोटी बहन के लिए एक बहुत सुंदर कार्ड लाये. कल सभी को राखी के पत्र लिखे. इस समय दोपहर की कड़ी धूप है, पंखे की हवा पसीना सुखाने में असमर्थ है. सुबह सवा चार पर उठी, प्राणायाम आदि किया, ध्यान भी आज घटा. देह में पित्त का प्रकोप शायद बढ़ गया है. पीठ पर घमौरी निकल आयी है, वर्षों बाद ऐसा हुआ है शायद दशकों बाद, बचपन मे घमौरी से उसका चेहरा लाल हो जाता था. परमात्मा उसे किसी भी अनुभव से अछूता नहीं रखना चाहते. पहले दांत, फिर गला फिर पीठ और आगे जाने क्या-क्या, पर हर अनुभव कुछ न कुछ सिखा जाता है. संवेदनशील होना भी और नम्र होना भी. कल पुस्तकालय की मीटिंग हो गयी अब कला प्रतियोगिता अगले महीने होगी. दो बजने को हैं, उसे कई सारी कविताएँ टाइप करनी हैं.

वे सदा इस इंतजार में रहते हैं कि कब वे शाश्वत सुख पा सकते हैं, वे यदि विवेक का उपयोग करें तथा स्वयं को आत्मा जानें तो इसी क्षण उस परमात्मा को पा सकते हैं, क्यों कि वह उनका अपना आप है, वह कभी उनसे अलग ही नहीं हुआ, वह है तो वे हैं, वे ही नहीं सभी उसी से हैं. जड़-चेतन सब उसी की लीला है. अभी कुछ देर पूर्व एक औरत गोदी में छोटे बच्चे को लेकर आई. कहने लगी कि उस व्यक्ति ने उसे इन घरों से पैसे मांगने के लिए भेजा है. पति का परसों ब्रेन का आपरेशन होने वाला है, उसने जब कहा उनका नम्बर दो, फोन करके पता करेंगे तो उलटे पावों लौट गयी. लोभ की प्रवृत्ति उसके भीतर है, शायद इसी कारण मदद करने को तुरंत मन नहीं हुआ. गुरु माँ कहती हैं जो लोभी होगा उसे रोग होंगे ही. लेकिन यह लोभ नहीं है बल्कि सजगता है, खैर ! आज मौसम पुनः ठंडा है. कल शाम पांच बजे से रात दस बजे तक बिजली गायब थी, वे तारों की छाँव में बैठे थे, पहली बार उन्होंने रात का भोजन बाहर खाया. नैनी की नन्ही बेटी पढ़ने आई थी पर उसका मन पढ़ने में जरा भी नहीं लगता है, कुछ ही देर बाद उसकी बनी ड्राइंग लेकर घर चली गयी है. अगले महीने स्कूल खुलने पर ही शायद उसमें पढ़ाई के प्रति रूचि जगेगी.   

Monday, March 28, 2016

पूजा की तैयारी


आज वे गुरु पूजा का उत्सव मना रहे हैं, उसने स्वयं हॉल बुक किया, वहाँ चादरें व दरियाँ आदि छोड़कर आई. शाम को चार बजे फूल, अगरबत्ती तथा दीपदान आदि लेकर जाना है, गुरूजी की तस्वीर तथा माला भी. जून नारियल व अनार आदि फल ला रहे हैं. यह सारा सामान दोपहर बच्चों के पढ़ने आने से पहले ही एकत्र करना है. सारा प्रबंध ठीक होना चाहिए. आज सभी को गुरू पूर्णिमा का संदेश भी भेजा लेकिन मंझले भाई को छोड़कर किसी का जवाब नहीं आया है. मौसम आज गर्म है, शाम तक सम्भवतः ठीक हो जाये. रात को अजीब सा स्वप्न देखा, अपने किसी पिछले जन्म की बात थी. आज भी गुरूजी को सुना. वह कितनी सुंदर परिभाषा देते हैं मन की, मन यानि जो ‘मैं नहीं हूँ’. वे अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय कोष में रहने वाले जीव नहीं हैं. वास्तव में वे इन सबसे परे सत्यस्वरूप हैं. सद्गुरु उन्हें उनके उसी रूप का परिचय देते हैं. उन्हें कितना अपनापन, कितनी ख़ुशी और समझ देते हैं. बदले में वे उन्हें दे ही क्या सकते हैं. यदि कृतज्ञता देते भी हैं तो वह उनके स्वयं के लिए ही लाभप्रद है, प्रेम देते हैं तो वह भी उन्हें ही भरता है. अपने भीतर के सारे विकार, सारे दोष, सारी कमियां यदि वे उन्हें दे दें तो वे उन्हें भी भस्म कर देते हैं. सद्गुरू ऐसे होते हैं !
आज भी सुंदर वचन सुने थे. प्रेम ही वह सूत्र है जिसे पकड़कर वे ईश्वर तक पहुंच सकते हैं तभी वे जानते हैं कि वे अस्तित्त्व की उर्मियाँ हैं, इससे उनका कोई विरोध नहीं है. जब वे प्रेमपूर्ण हो जाते हैं तो ध्यान पूर्ण हो जाते हैं. जब आँख भर कर अपने को देखते हैं तो पाते हैं कि वे हैं ही नहीं. अपने को मिटाने पर अपने में ही यह पता चलता है कि वे नहीं हैं और वैसे ही उन्हें पता चलता है कि परमात्मा है. वे हैं यह सोचना ही आँखों पर पड़ा पर्दा है. ध्यान में वही मिटता है जो है ही नहीं. जो है वह कभी मिटता ही नहीं. जब तक मन अशांति से ऊबे नहीं तब तक झूठ-मूठ ही खुद को बनाये रखना चाहता है, अहंकार की यात्रा जब तक तृप्त नहीं होती तब तक ‘मैं’ नहीं मिटता !
आज सुबह सोमवार का सीडी लगाकर प्राणायाम किया. सुबह वे अस्पताल भी गये, सारे टेस्ट कराए. फ्राईब्राइड्स हैं तीन, पर छोटे हैं सो डाक्टर के अनुसार इसके कारण कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. आज वर्षा हो रही है मौसम ठंडा है. कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी सारी समस्या उसके मन द्वारा ही बनाई गयी हो. वे अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं. खैर शाम तक पता चल जायेगा. हाथ-पैरों में जो हल्का-हल्का सा दर्द हो रहा है वह शरीर में हुए किसी इन्फेक्शन के कारण हो सकता है. जून उसका ध्यान रख रहे हैं. कल दोपहर उसकी नैनी की जेठानी ने आत्महत्या करने का प्रयास किया. वह शायद अपने पति को डराना चाहती थी पर हॉस्पिटल जाते-जाते रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गयी, तीन छोटी लडकियाँ हैं उसकी !
टीवी पर usa ओहियो में कही जा रही मुरारी बापू की कथा आ रही है. दोपहर को ‘साहित्य अमृत’ तथा ‘सरस्वती सुमन’ को पत्र लिखने हैं. जून का पायजामा सिलना है. आज भाव ध्यान किया, अद्भुत था जैसे कोई फिल्म चल रही हो, सुंदर दृश्य दिखे, पर जो देखने वाला है वही दृश्य है, जो दिखता है वह मन का प्रतिबिंब है. मन सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त हो, राग-द्वेष से मुक्त हो तथा प्रेम से भरा हो तो स्वस्थ रहा जा सकता है. मन में कोई वासना न हो, उसके मन में यह तीव्र वासना है कि शरीर स्वस्थ रहे, पर प्रारब्ध के अनुसार या प्रज्ञापराध के कारण फल तो मिलने ही वाला है !


Sunday, March 27, 2016

गुरु पूर्णिमा का उत्सव


लगता है इस बार ‘गुरु पूर्णिमा’ का उत्सव वे उस स्थान पर नहीं मना पाएंगे जहाँ वह बच्चों को योग सिखाने जाती है. एओल की टीचर ने अभी तक स्वीकृति के लिए फोन नहीं किया है. खैर, जो भी हो, वह लिख रही थी कि जून के दफ्तर के प्रमुख की पत्नी का फोन आया, वह अगले हफ्ते यूएस जा रही हैं अपने बड़े बेटे के पास जिसकी दूसरी सन्तान होने वाली है. भारतीय माता-पिता सहर्ष अपने बच्चों के बुलाने पर चले जाते हैं, पर अमेरिका में जन्मने वाले ये बच्चे भी क्या इसी तरह अपने माता-पिता पर भरोसा कर पाएंगे. आज धूप तेज निकली है, कल दिन भर वर्षा होती रही. उसके स्वास्थ्य में हल्का सुधार है, जून उसका बहुत ध्यान रख रहे हैं. लगता है एक चक्र पूरा हो गया है, अब से कुछ वर्ष पूर्व वह इसी तरह डायरी लिखती थी, जब वह अनुभव नहीं हुआ था. अपने स्वास्थ्य की बातें तथा इधर-उधर की बातें और उसके बाद से...संत वाणी तथा ज्ञान की गहन बातें ! अब भीतर तृप्ति है सो कुछ पाना शेष नहीं है, अपना पता चल गया है तो अपने दोष भी साफ नजर आते हैं. ईर्ष्या का आभास ध्यान के दौरान भी हुआ, अहंकार व क्रोध तो झलक ही जाते हैं पर उस वक्त भी यह अहसास रहता है कि वह ‘वह’ नहीं जो विकारों से ग्रस्त है, वह साक्षी आत्मा है. पीछे के बंगले के सर्वेंट क्वाटर से एक बच्चा आज पढ़ने आया है, ईश्वर ने उसे ऐसा जन्म दिया है कि उसके पढ़ने का कोई प्रबंध नहीं है. इस जगत में न जाने कितने अभागे ऐसे हैं जो अपने जीवन को अर्थ नहीं दे पाते, अपने ही कर्मों का फल वे भोगते हैं पर ऐसे कर्म जो उन्होंने अज्ञानावस्था में किये होते हैं. माया के अदृश्य फंदों में जकड़े ये मानव ये भी नहीं जानते कि ये कैद हैं, क्यों कैद हैं ये तो बाद की बात है. कल शाम छोटी बहन से बात की, वे लोग परसों वापस यूएई जा रहे हैं. चचेरा भाई वहां ठीक है. नन्हा अपने हॉस्टल पहुंच गया है, उसका खर्च बहुत बढ़ा हुआ है, जून कभी-कभी चिंतित होते हैं, पर उसे कुछ कहते नहीं, वह इतने समर्थ हैं कि सहर्ष सब कर रहे हैं.

कल शाम टीचर का प्रतीक्षित सकारात्मक फोन आया, अब उसे अपनी एक सखी के साथ मिलकर सारी व्यवस्था करनी है. कल शाम तथा रात सोते वक्त तक मन में वही विचार आ रहे थे. गुरूजी इतने सारे देशों में इतने सारे आयोजन कर लेते हैं. उनके पास अनंत शक्ति है, वह कितने सहज रहते हैं. परमात्मा न जाने कब से इतने सारे ब्रह्मांडों को चला रहा है और वह उनसे विलग है, जल में कमल की भांति ! वे एक छोटा सा घर भी ठीक से नहीं चला सकते. घर के दो चार लोगों को ही प्यार नहीं दे सकते. उन्हें भी अपनी ऊर्जा का प्रयोग करना है, गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाने का अर्थ है अपने भीतर की अपार सम्भावनाओं को उजागर करना ! उसे सद्गुरु से कितना कुछ मिला है, अपरिमित प्रसन्नता, अनंत ज्ञान तथा सेवा करने की प्रेरणा, सबसे बड़ी बात अपनी पहचान, आत्मसम्मान तथा आत्मविश्वास, ईश्वर की खोज करने की प्रेरणा तथा ऊर्जा ! गुरु का होना जीवन को खिला जाता है, उन्हें अपने होने का अर्थ मिलता है, अब इस गुरु पूर्णिमा को उन्हें सार्थक बनाना है, सफल करना है. आज से ही तैयारी शुरू कर दी है. मन को भी उच्च भावों में स्थित रखना है, देह से ऊपर, छोटे मन व तुच्छ बुद्धि से भी ऊपर..एक उदार चित्त के साथ इस पवित्र आयोजन को करना है. इस दिन वहां जो भी उपस्थित हो उसे गुरु की कृपा का अनुभव हो ऐसा वातावरण उन्हें बनाना है. सद्गुरु इस ईश्वर की कृपा रूप प्राप्त शरीर में सत्यता का बोध कराते हैं. अंतःकरण में व्याप्त चैतन्य तथा सर्वत्र व्याप्त चैतन्य एक ही है यह ज्ञान देते हैं. जो इन्द्रियों का रस, विचार का रस, भावना का रस, आनन्द का रस इन पंच शरीरों से लेता रहता है तो ऐसे ही शरीर उसे मिलते हैं पर जब गुरू साधक को इनसे पार ले जाता है तो वह शांतात्मा हो जाता है.