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Thursday, August 4, 2016

हरी घास पर


आज धूप कल की सी तेज नहीं है, कल कई हफ्तों बाद वर्षा रुकी थी. परसों उनकी मीटिंग थी, उसने दो कविताएँ पढ़ीं. एक जन्मदिन की कविता भी लिखी. हिंदी कविता में कई दिनों से कुछ नहीं भेजा. कल साहित्य अमृत में रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक अच्छी कहानी पढ़ी. पिता अपनी बेटी के दिल को समझता है, ऐसे ही उसने एक दिन पिताजी से कहा था कि वह कुछ करें.. माँ से नहीं कहा जब उसके नाम का खत उसे नहीं मिल रहा था. माँ-पिताजी भोजन लगने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. उसके बाद उन्हें विश्राम करना है, दोपहर बाद उठना है फिर शाम की तैयारी और इस तरह एक दिन और बीत जायेगा..एक दिन ऐसे ही जीवन पूर्ण हो जायेगा..

कल स्टोर की सफाई की, आज नैनी किचन की सफाई कर रही है. डिब्रूगढ़ रेडियो स्टेशन से छम छम छमा छम ..गीत बज रहा है. आज सुबह पंछियों की आवाज सुनकर नींद खुली. आचार्य प्रद्युम्न जी को सुना, राग-द्वेष से मुक्त होकर ही कोई परमात्मा का अनुभव कर सकता है. भीतर जब शांति हो, स्थिरता हो, आनन्द हो तब वह धीरे से आता है.

मई का आरम्भ हुए तीसरा दिन है, आज मौसम गर्म है. एसी खराब हो गया था अभी मकैनिक आया है जो न जाने कितने घरों में एसी बनता है. आज सुबह वे साढ़े चार बजे उठकर सीधा टहलने गये. सुबह की स्वच्छ हवा में टहलना एक सुखद अनुभव था. नेहरु मैदान की हरी घास पर लोग नंगे पैरों चलकर ठंडक अपने भीतर भर रहे थे. जून कल दोपहर यात्रा से लौटे तो काफी ठीक लग रहे थे. शाम को उन्होंने डायरी में अपनी अस्वस्थता के बारे में लिखना भी शुरू किया है, अब वह जल्दी ही पूर्ण ठीक हो जायेंगे. भजन के साथ गुनगुनाने भी लगे हैं आजकल. उन लोगों ने सोचा है हर शाम कुछ अलग तरह से बिताएंगे. क्लब जाना भी आरम्भ करेंगे तथा कुछ समय लाइब्रेरी में बिताएंगे. सद्गुरु की कृपा से यह परिवर्तन आरम्भ हुआ है, एकरसता आ जाने से जीवन कैसा सूना-सूना हो जाता है. उन्हें इस सुंदर जीवन को जो ईश्वर के अमूल्य देन है, रसपूर्ण बनाना ही होगा. वह भारत के एक बड़े अस्पताल के डाक्टर से मिलकर आये हैं और उन्हें कोई बीमारी नहीं है, मात्र तनाव है, तनाव का कारण माँ की बीमारी हो सकता है और उनका तनावग्रस्त होने का स्वभाव..जो अब बदल रहा है, स्वयं को बदले बिना मानव महाजीवन को पा ही नहीं सकता. उसे भी अपने समय का सही उपयोग करना है, अपनी ऊर्जा का, शक्ति का सही उपयोग करना है ताकि मन प्रफ्फुलित रहे, सरस रहे और जीवन एक उत्सव बन जाये ! गुरूजी का असम यात्रा का सीडी जो एक परिचित ने दिया था, कल कम्प्यूटर पर चलाकर देखा, कितनी सुनहरी यादें छिपी हैं उसमें..सद्गुरु को आज भी सुना..कितना उत्साह है उनकी वाणी में कितना ओज और कितना तेज.


Tuesday, December 1, 2015

कलम का सिपाही


कल शाम को जो द्वंद्व शुरू हुआ उसकी परिणति हुई सुबह, जब वातावरण में फैले तनाव ने सभी को प्रभावित किया, तनाव के परमाणु वातावरण में किस तरह छा जाते हैं. उसका मन इतना संवेदनशील हो गया है कि रंचमात्र तनाव भी इसे पहाड़ सा चुभता है. यह समता में आने के लिए छटपटा उठता है. साधक का हृदय बहुत कोमल होता है, एक तरफ तो वह चट्टान की तरह कठोर होता है, दूसरी ओर फूल की तरह कोमल. कल रात उसने पीड़ा को निमन्त्रण दिया और आज सुबह उसने कंठ में हार पहना दिया. सद्गुरू कहते हैं इच्छाएं अवश्य पूरी होती हैं, यदि वे सच्चे हृदय से निकली हों. ईश्वर उसके सामने नई-नई परिस्थितियाँ भेज कर अपने को शुद्धतम बनाने का अवसर दे रहे हैं. उसके कल शाम के रवैये ने बताया कि अभी अहंकार शेष है. बात यदि सही भी हो तो उसको कहने का तरीका गलत होने होने से वह गलत हो जाती है. कृतज्ञता भुलाकर यदि कोई अपना पक्ष रखना कहेगा तो बात बिगड़ेगी, परिणाम अच्छा नहीं होगा. यदि उनकी किसी अच्छी बात से भी दूसरे को दुःख हुआ तो वह अच्छी बात व्यर्थ है. उन्हें कहने का ढंग ही नहीं आया. उनकी मंशा ठीक है इसकी खबर तो बस उन्हें ही है, सामने वाला तो वही जानता है जो उसे दीखता है, प्रभु उसे सिखा रहे हैं. अहंकार और क्रोध उसके भीतर हैं, उन्हें बाहर लाकर वह उसे सचेत कर रहे हैं.

नन्हे को बुखार है, जून जब फोन पर उसे हिदायत देते हैं तो लगता है उनके भीतर जैसे एक माँ का दिल है. कल उसकी परीक्षा भी है और अभी-अभी उससे बात की. उसका ‘आई-कार्ड’ जो खो गया था, उसे लेने डीन के ऑफिस में गया था. जून अब पहले की तरह देर तक नाराज नहीं रहते, परिपक्वता की यही निशानी है. कल सुबह नैनी को उसने अपनी पुरानी आदत (पैटर्न) के अनुसार कुछ ज्यादा ही कड़े शब्द बोले, उसके प्रति नूना के मन में जरा भी द्वेष नहीं है पर वह उसे जवाब दे, यह उसका अहंकार सहन नहीं कर सका. अहंकार कितना प्रबल है इसका पता तो चल हो गया, उधर उसका अहंकार भी कुछ कम नहीं है. कल से वह काम पर नहीं आई है. जो काम करने को उसे कहा था, बगीचे का वह काम भी वैसे ही पड़ा है. वह शायद अब वह काम करना नहीं चाहती. खैर, वक्त ही बताएगा कि इस समस्या का क्या हल निकलता है. फ़िलहाल एक लडकी बाहर से आकर काम कर जाती है.

वह प्रेमचन्द पर लिखी किताब ‘कलम का सिपाही’ पढ़ रही है जो उनके छोटे बेटे अमृत राय ने लिखी है, किताब इतनी रोचक है और बताती है प्रेमचन्द कितने साफ दिल तथा हंसमुख थे, लिखना उनके लिए बेहद जरूरी एक काम था, पूजा से भी बढकर जरूरी ! उनके लिए लेखन कितना सहज था जैसे श्वास लेना, वह रोज नियम से लिखते थे, इस बात से बेखबर कि कौन उन्हें पढ़ता है या साहित्य के नियम क्या हैं, लिखना उनके खून में था. उसने लिखने को कभी इतना महत्व दिया ही नहीं, ज्यादातर समय तो घर-गृहस्थी के कार्यों में गया, जब से अध्यात्म के रास्ते पर चलना शुरू किया तब से तो पढ़ने तथा प्राणायाम करने में ज्यादा समय लगता है. टीवी पर संतों व महात्माओं को सुनने में भी बहुत समय लगाया है, जिसका परिणाम है अपने भीतर का अनुभव ! वह अनुभव अनोखा है, वह तो इस ब्रह्मांड की सबसे कीमती शै है ! किससे नजर मिलाऊँ तुझे देखने के बाद, जिसे एक बार अपने भीतर उस आनन्द की झलक मिल जाये वह खुद को ही भूल जाता है संसार की तो बात ही और है. कवि कहता है, अपना पता न पाऊँ तुझे देखने के बाद, और ऐसा मन स्वालम्बी होता है, उसे जो चाहिए उसके लिए वह अपने दिल का द्वार खटखटाता है, वह जो चाहता है भीतर ही मिल जाता है.


आज उसने सुना, उन्हें स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाना है, जहाँ कोई भेद नहीं है, वहाँ अद्वैत है, सब एक है. स्थूल में भेद है, वहीँ सारे विकार हैं, सूक्ष्म निर्दोष है, निर्विकार है, वह सारे दुखों से परे है. उस सूक्ष्म को पाना हो तो पहले इन्द्रियों को तपाना होगा, मन को जमाना होगा और तब उसमें आत्मा का नवनीत प्रकट होगा. कल रात उसके मन की अवस्था विचित्र थी, ईर्ष्या का अनुभव इतनी तीव्रता से हो रहा था. अहंकार के कारण ही ईर्ष्या आदि विकारों को प्रश्रय मिलता है. सद्गुरु ने कहा है, जिस क्षण यह ज्ञात हो जाये कि वह भूल कर रहा है, भूल से बाहर आ जाता है. वह भूल से बाहर तो आ पा रही थी पर भीतर कोई मंथन चल रहा था. बार-बार वही भावना प्रकट हो रही थी. ऐसे लगता है उसके भीतर का रस सूखता जा रहा है. रूखा-सूखा ज्ञान कब तक हृदय को हरा-भरा रखेगा उसे तो भक्ति का पावन जल चाहिए. ज्ञान के सहारे कोई भले आत्मा को जान ले पर आत्मा का आनन्द भक्ति के सहारे ही मिल सकता है, उसके कृष्ण की भक्ति और सद्गुरू की भक्ति ! आज का ध्यान कृष्ण का ही ध्यान होगा उसके ही मन्त्र का जाप होगा, आज सत्संग का दिन भी है. गोयनका जी कह रहे हैं की जिसकी जप प्रज्ञा जगे तो विनम्रता आ जाती है, यदि अहंकार नहीं गया तो प्रज्ञा नहीं मिली. संतुष्टि यदि नहीं है तो अभी तृष्णा नहीं मिटी. जो मिले उसमें संतुष्टि हो, दूसरों को देखकर ईर्ष्या न जगे, ईर्ष्या व्याकुलता को ही जन्म देती है. संतोष धन के सामने कोई धन नहीं !  

Thursday, August 2, 2012

काबुली चने


नन्हा अब ठीक है, कुछ देर पहले उसने आँखें खोलीं फिर करवट बदल कर सो गया. आज उसके खुद के गले में हल्की खराश महसूस हो रही है, जून होते तो उसे नमक पानी का गरारा करने को कहते. उसने दही लगाकर बालों को धोया था, अब ठंड के डर से कोई कब तक बालों को न धोए...ईश्वर भली करेंगे. आज पहली अप्रैल है, अभी तक तो किसी को मूर्ख नहीं बनाया, उसने सोचा पीछे रहने वाली असमिया पड़ोसन को आज बुद्धू बनाएगी.

इतवार की सुबह, दोनों बाप-बेटा अभी सो रहे हैं वह बाहर घूमने गयी थी, सड़क किनारे एक पॉपी का सूखा पौधा दिखा जिसके कुछ बीज उसने ले लिये अगले मौसम में उन्हें उगाएगी तब ढेर सारे पॉपी के फूल खिलेंगे, और तब वह आज का दिन याद करेगी. कल रात उन्होंने एक चीनी फिल्म देखी, उदास करने वाली, रुलाने वाली एक कविता हो जैसे. उसकी आँखें एक क्षण को नहीं सूखीं, बहुत दिन पहले एक और अच्छी चीनी फिल्म देखी थी. कल शाम जून कुछ सोच रहे थे, उन्हें ऑफिस का कुछ काम भी करना है, तीन-चार घंटों का शायद इसी का तनाव हो.

आज सुबह जून बहुत खुश थे, उन्होंने विवाह के बाद के साल को याद किया. नन्हा जल्दी उठ गया था पर दूध पीकर फिर सो गया, अब खरगोश से खेल रहा है, सचमुच का नहीं, खिलौने से. आज वह ट्रंक आ ही जायेगा जिसका उन्हें इतना इंतजार है. कल उनकी पड़ोसिन ने इडली बनायी परसों उसने दोसा बनाया था और साथ में मूंगफली की चटनी, सबने मिलकर खायी. वह जो नन्हे का स्वेटर बना रही थी कल पूरा हो गया, गले के बार्डर में बहुत सफाई नहीं आयी है. उसने सोचा वह खोल कर फिर से बनाएगी.
रेलवे स्टेशन से वह ट्रंक ले आये जून, उसमें सभी कुछ था जो वे डाल कर आये थे, बस कूकम और डाला गया था. वह नन्हे को लेकर पार्क में गयी तो जून ने चने बना दिए, बहुत स्वादिष्ट, उसे बहुत अच्छा लगा, वह जैसे पहले साल में पहुँच गया था, वही भोलापन और प्यार छलकती आँखें. कल वे दोनों उसके काम के कारण ग्यारह बजे तक बैठे थे. वह अखबार पढ़ रही थी पर आँखें थीं कि नींद से बोझिल हो रही थीं.