Wednesday, February 10, 2016

या देवी सर्वभूतानां


नवरात्रि उत्सव आरम्भ हो गया है. देवी की आराधना का उत्सव अर्थात चेतना की शक्ति की आराधना. सद्गुरु ने कितनी सहजता से इसका अर्थ बताया. विष्णु के कान के मैल से उत्पन्न मधु-कैटभ को मारने में जब विष्णु असमर्थ हुए तो देवी को आना पड़ा. चंड-मुंड का नाश भी देवी करती है. चंड अर्थात ऐसी चेतना जो केवल शरीर के निचले हिस्से में स्थित है, हृदय को प्रमुखता देती है, भावुक है तथा मुंड जो दिमाग को प्रमुखता देती है. दोनों ही अकेले-अकेले खतरनाक हैं, दिल व दिमाग का सामंजस्य ही व्यक्ति को पूर्ण बनाता है. जब आत्मा की शक्ति जगती है तो दोनों में संतुलन होता है. रक्तबीज का नाश भी देवी ने किया, अर्थात रक्त में घुले विकार चाहे वे शारीरिक रोग हों या मानसिक रोग, उनका नाश भी आत्मा की शक्ति से सम्भव है. नवरात्रि के नौ दिन गर्भ में नौ महीनों के वास के समान है, जिसके बाद नई सृष्टि देखने को मिलती है.

बचपन से अभी तक उससे कितनी ही भूलें हुई हैं, असत्य बोलना, चोरी और वाणी के अनगिनत अपराध, बुरे संकल्पों के, ईर्ष्या, द्वेष, परनिन्दा व और भी कितने-कितने अपराध होते ही रहे हैं, जो अनजाने में हुए उन्हें तो परमात्मा भी सम्भवतः क्षमा कर देता हो, लेकिन जो लोभ वश, स्वार्थ वश, अज्ञान वश, मोह वश हुए या किये उनसे छुटकारा तो वक्त ही देगा, कभी दुःख के रूप में, कभी ग्लानि के रूप में. लेकिन कल दोपहर मन को एक ग्रन्थि से छुटकारा मिल गया, भीतर जैसे कोई घड़ों जल डालकर धो गया हो ऐसी स्वच्छता का अनुभव हुआ ! गुरूजी भी कहते हैं सभी विकार प्रेम का ही विकृत रूप हैं, तो वह प्रेम ही था जो अभी अपने शुद्ध स्वरूप में नहीं आया था, जो उन दिनों उसे भरमा रहा था. विकृत प्रेम ही ईर्ष्या है, अब जब स्वयं को आत्मा जान लिया है, भीतर सन्नाटा है. शास्त्र कहते हैं ज्ञान की अग्नि में सारे संचित कर्म जल जाते हैं, अब केवल प्रारब्ध कर्म ही शेष हैं. जिनका भुगतान समता से करना है. ससुरल से माँ-पिताजी आये हैं, उन्हें कोई बात दुःख देने वाली न लगे, वाणी पर नियन्त्रण रहे, ऐसी ईश्वर से प्रार्थना है. जून अपने दफ्तर में व्यस्त हैं, आईएसओ सर्टिफिकेट लेने के लिए उन्हें काफी काम करना पड़ रहा है.  

आज सुना, उन्हें स्मृति के साथ-साथ धृति का विकास करना है. धृति का अर्थ है धारणा, धैर्य ! धारणा यदि दृढ हो, मन यदि एक वस्तु पर टिककर उसी का चिन्तन करे तो समाधान हो जाता है. धैर्य की कमी से ही आज संबंध बिगड़ रहे हैं. सहन शक्ति की कमी से ही दूसरों के दोष दिखाई देते हैं, वाणी का अपराध होता है. इस जीवन में सभी को अपनी यात्रा अपने ढंग से करनी है. साधक को आग्रह त्यागकर प्रेम से मध्य मार्ग निकलना है. जीवन की परिस्थितियाँ तो बदल रही हैं, उनके हाथ में समता में रहना है, नहीं तो प्रवाह उन्हें बहा ले जा सकता है. समता से ही आंतरिक प्रसन्नता बनी रह सकती है. परमात्मा सभी के भीतर है, सभी उसके भीतर हैं और फिर भी वह अप्रकट है, छिपा है, सभी को उसकी माया ने ढका हुआ है. वेद का ऋषि कहता है उसके भीतर जो परमात्मा रूपी प्रकाश है उसका आवरण हटा दो, वह उस प्रकाश से ही प्रार्थना करता है. वे इस जगत में प्रेम अनुभव करने व बांटने ही तो आये हैं, अथवा तो सहयोग करने, शरीर द्वारा सहयोग करना तथा मन द्वारा प्रेम देना ही तो साधक का लक्ष्य है !

  

Monday, February 8, 2016

दशावतार


सद्गुरु को आज भी सुना. दसों अवतार मानव की चेतना में निरंतर कैसे घट रहे हैं इसके बारे में बता रहे थे. कल्कि का अवतार भीतर ही होगा जब जगत में कोई पराया नहीं रह जायेगा. आज भी सुबह से बादल बरस रहे हैं. सभी देवी-देवता भी चेतना में विद्यमान हैं. आत्मा कितनी पावन है, शुद्ध, शांत, ज्ञानयुक्त, आनन्द और सुख से पूर्ण शक्तिशाली. वे व्यर्थ ही छोटी-छोटी बातों से परेशान होते हैं. जीवन कितना विशाल है और कितने अनोखे रहस्यों से भरा हुआ, उन्हें बस आँख खोलकर देखने की जरूरत है. प्रेम चारों ओर बिखरा है. आज के ध्यान में कमल पर बैठ देवी की हल्की सी झलक मिली.

कल शाम वर्षा की झड़ी लगी थी, क्लब में मीटिंग थी पर वह जा नहीं पाई. परसों घर में ही होली मिलन में महिलाओं की मीटिंग का आनन्द लिया. आज धूप निकली है. गुरू जी आज से दिल्ली में सत्संग, प्राणायाम शिविर कर रहे हैं, रोहिणी सेक्टर-१० में उनका कार्यक्रम है. एक सखी ने फोन करके कहा, इस बार क्लब के वार्षिक उत्सव की थीम ‘लव एंड पीस’ है, उस पर अपने विचार लिखने हैं. प्रेम और शांति तो उनका मूल स्वभाव है, वे बने ही उसी के हैं. प्रकृति के कण-कण में यह प्रेम झलकता है, आकाश की नीलिमा में घोर शांति है, अन्तरिक्ष में गहन शांति है और प्रेम वह शक्ति है जिसके कारण ग्रह सूर्य के चारों ओर एक चक्र में अनवरत घूम रहे हैं, उनका अस्तित्त्व ही इस पर आधारित है. उसके दांत में हल्का दर्द अभी भी हो रहा है, परसों पुनः डेंटिस्ट के पास जाना है. कुछ देर पूर्व दीदी का फोन आया, डाक्टर के कहने पर जीजाजी ने सामिष भोजन लेना शुरू किया है.

आज सद्गुरु ने काली के भयंकर रूप की व्याख्या की. शक्ति यदि शांत चेतना से उदित हुई हो तभी कल्याणकारी होती है. ज्ञान शक्ति, क्रिया शक्ति तथा इच्छा शक्ति ! उनके भीतर तीनों शक्तियाँ हैं तथा परम चेतना भी है. उनका जीवन तभी सार्थक होगा जब इन शक्तियों का सदुपयोग वे कर सकें, अन्यथा ये शक्तियाँ विनाशकारी भी हो सकती हैं. अपने भीतर की सौम्यता, सहजता, शांति, सरलता, प्रेम का विनाश तथा अपने बाहर की समरसता का विनाश ! उन्हें हर पल सजग रहने की आवश्यकता है, जीवन का कीमती समय पल-पल कर यूँ ही बीत रहा है, हाथ में कुछ आ नहीं रहा. कभी लगता है कि इस परम खजाने की तलाश थी वह तो यहीं है, पूर्ण तृप्ति का अहसास होता है फिर जरा सा चूके नहीं कि वह तृप्ति कहीं खो जाती है, फिर तलाश..क्या यही साधना की नियति है, अनवरत खोज, मंजिल सदा दूर चली जाती है. यदि खोज समाप्त हो जाये तो वह तृप्ति बासी नहीं लगने लगेगी, शायद इसीलिए प्रकृति उनके मार्ग में नित नए आकर्षण फैलाती है कि बचो इनसे. पिछले कुछ दिनों से पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन के प्रति आकर्षण बढ़ गया था. जब सारी वासनाएं छूट गयीं तो नया  जाल फेंका इंद्र ने और वह उसमें फंसती ही जा रही थी कि कल सचेत हुई. भोजन उन्हें इसलिए चाहिए कि शरीर स्वस्थ रहे न कि स्वाद के लिए. पिछले दिनों होली के उत्साह में आत्मा से दूर चली गयी, मन कितने-कितने रूपों में उन्हें ठगने आता है और वे उसके शिकार हो जाते हैं. पिछले दिनों स्वाध्याय भी कम हुआ, आज सजगता बढ़ी है. तीन दिनों बाद उन्हें एक और यात्रा पर निकलना है. यह जीवन एक यात्रा है और इस विशाल यात्रा में छोटी-छोटी कुछ यात्रायें हैं.   


कृष्ण चरित्र - बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की पुस्तक


आज द्वादशी है, रंग पाशी का उत्सव, होली के आने में अब तीन-चार दिन रह गये हैं. आज दोपहर को कोई पढ़ने नहीं आया और उसे कहीं जाना भी नहीं है. कल डेंटिस्ट के पास पुनः जाना है. उसने सोचा क्यों न कुछ पंक्तियाँ उसी के लिए लिखे, उस दिन उसका व्यस्तम दिन था. मरीजों की कतार बढ़ती जा रही थी, हरेक के दातों का इतिहास उसकी डायरी में दर्ज था. कैसा लगता होगा लोगों के मुखों में झांकना, श्वेत मोती से, पान मसाला खाने से हुए काले, पीले, गंदे, टूटे-फूटे दातों को देखना और फिर दुरस्त करना, दातों का डाक्टर बनने का निर्णय कोई कैसे और क्यों लेता होगा या ईश्वर स्वयं ही उनके भीतर बैठ ऐसी बुद्धि देते होंगे, ईश्वर की दुनिया में सभी तरह के कार्यकर्ता मिलते हैं. वह स्वयं ही अनेक होकर बैठ गया है.

‘कृष्ण चरित्र’ अभी-अभी खत्म की है, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित तथा ओमप्रकाश द्वारा अनुवादित इस पुस्तक में कृष्ण को ईश्वर को अवतार मानते हुए उनके मानवीय रूप को प्रकाशित किया गया है. ईश्वर जब मानव रूप लेकर अवतरित होते हैं तो वे मानवीय गुणों की सीमा का अतिक्रमण नहीं कर सकते, यदि उन्हें दैवीय शक्ति का ही उपयोग करना हो तो वे बिना मानवीय रूप लिए भी कर सकते हैं, हाँ, मानव होते हुए उनके गुण चरम सीमा तक पहुंच सकते हैं. वे सोलह कला सम्पूर्ण थे, जीवन के सभी क्षेत्रों में अग्रणी तथा कुशल, चाहे वह कला हो, धर्म हो अथवा राजनीति, ऐसे कृष्ण को जो आदर्श मानव थे प्रणाम करके कौन अपना उद्धार करना नहीं चाहेगा. आज सुबह ‘मृणाल ज्योति’ गयी, योग के बाद हास्य आसन भी कराया, लौटकर डाक्टर के पास जाना था. कल जो कविता लिखी थी, दंत चिकित्सक उसे दे दी. असमिया होने के बावजूद वह भी हिंदी में थोड़ा-बहुत लिख लेते हैं. आज मूसलाधार वर्षा हुई, गर्जना भी भी बड़े जोरों से की बादलों ने. इस समय रुकी हुई है. आज उसका विद्यार्थी मेघनाथ पढ़ने नहीं आया, जो मेघ का नाथ है वह मेघों से भयभीत होकर घर में छुपा बैठा है.

उत्सव मन में कैसा उल्लास जगा देता है. आज गुरूजी की बातें सुनीं और उसके बाद प्रेम का कैसा ज्वार चढ़ा भीतर, बड़े, मंझले, छोटे तीनों भाई-भाभी, दीदी-जीजाजी, पिताजी, चचेरी बहन सभी से बात की, फुफेरी बहन को कल फोन किया था. छोटी बहन का दुबई से फोन आया वे लोग सागर किनारे होली खेलेंगे, फिर स्नान तथा वहीं भोजन का भी प्रबंध होगा. ‘लेडीज असोसिएशन’ की तरफ से यह कार्यक्रम होली के उपलक्ष में आयोजित किया गया है. छोटा चचेरा भाई भी वहाँ पहुंच गया है, उसे टाइल्स फैक्ट्री में काम मिला है. आज भी मौसम भीगा है, प्रकृति भी होली खेल रही है.


प्रेम का जो ज्वार चढ़ा था उस दिन, उसी की परिणति है, आज उसने लाइन की सभी महिलाओं को आमंत्रित किया है, होली मिलन की दावत के लिए.. कल दोपहर डेढ़ बजे. गुझिया और गुलाब जामुन तो हैं ही, छोले और टिक्की और बनाएगी. आज सुबह सुना साधक को मनसा निराकारी रहना है, वाचा निरहंकारी रहना है तथा कर्मणा निर्विकारी अवस्था में रहना है. देह भान में आते ही मन कमियों को देखने लगता है, वाणी में अहंकार भी तभी आता है और ऐसे में कर्म भी पावन नहीं होते. मन आत्मा के जागृत होने पर बेबस हो जाता है, वह इधर-उधर जाना तो चाहता है पर एक क्षण की सजगता उसे वापस खींच लाती है, उसकी डोर आत्मा के हाथ में आ जाती है. अभी कुछ देर पूर्व वर्षा होने लगी थी, अब पुनः तेज धूप निकल आई है, ऐसे ही मन है एक पल में भूत में चला जाता है अगले ही पल भविष्य में छलांग देता है, आत्मा सदा वर्तमान में रहती है, वह पवित्र, शांतिमय, आनन्द से भरी, शक्तिशाली, ज्ञानयुक्त, सुख स्वरूप तथा प्रेमिल है. ऐसी आत्मा का ज्ञान उसे सद्गुरू की कृपा से हुआ है !   

Thursday, February 4, 2016

नदी का पाट


फिर एक अन्तराल, इस बीच बहुत कुछ घटा. जून के दफ्तर में दो-तीन दिन काम ज्यादा रहा. आर्ट ऑफ़ लिविंग के एक टीचर ने क्रिया करवाई. ड्राइंग-डाइनिंग में पेंट हुआ और आत्मा का ज्ञान दृढ़तर हुआ, उस पर जून की नाराजगी का असर पहले से कम हुआ, उन पर भी कम होना ही था, वह भी आत्मा के बारे में सुनने लगे हैं. दीदी दुबई से लौट आई हैं. उसे सभी की चिंता करने का मोह भी घटा है. सप्रयास कोई कार्य नहीं करना है. नियमित कर्त्तव्य तथा सहज प्राप्त कार्य व सेवा के कार्य बांधने वाले नहीं होते. उसे हर हाल में इसी जन्म में मुक्त होना है. परमात्मा की व सद्गुरु की उसपर विशेष कृपा है. उसे बुद्धि योग मिलाया है. भीतर की सूक्ष्मतम सच्चाईयों को समझने की बुद्धि प्रदान की है. अनवरत अनहद नाद की धुन गूंजती है, आत्मा का आनन्द फूट-फूट पड़ता है सो और नये कर्म बंधने का प्रयास व्यर्थ ही होगा. उसे संतोष का धन प्राप्त हुआ है. कितने जन्मों में उसने वही गलती दोहराई होगी पर इस जन्म में नहीं, सद्गुरु को देख-सुन कर तो जरा भी नहीं. वह कितने सहज हैं, मुक्त, आनन्द से भरे. उनके भीतर भी वही आत्मा है. सत्, चित् आनन्द वही परमात्मा है. आज ध्यान में उसकी उपस्थिति का अहसास हुआ. मन है ही नहीं, एक मौन है जो भीतर पसरा है, शांत नदी के चौड़े पाट की तरह जिसमें आकाश अपना चेहरा देखता है !

परमात्मा से प्रेम हो जाये तो यह जगत होते हुए भी नहीं दिखता. वह प्रेम इतना प्रबल होता है कि सब कुछ अपने आप साथ बहा ले जाता है, शेष रह जाता है निपट मौन, एक शून्य, एक खालीपन, लेकिन उस मौन में भी एक नये तरह का संगीत गूँजता है, वह खालीपन भी भरा हुआ है कुछ खास ही तत्व से. अभी कुछ देर पहले फोन की घंटी बजी, वह उठा नहीं पायी, पता चल गया लेडीज क्लब की किस सदस्या का था, वह अवश्य उस लेख के बारे में बात करना चाह रही होगी जो उन्हें क्लब के लिए लिखना है. कल उसे डेंटिस्ट के पास जाना था. एक दांत में rct कराने. कोई भय नहीं था. मन शांत था. डाक्टर ने दांत में दवा भरकर छोड़ दिया है, लगातार दवा की गंध मुंह में आ रही है. किन्तु उसने स्वयं को देह मानना छोड़ दिया है सो वह गंध परेशान नहीं कर रही. वह अपना सभी कार्य सामान्य रूप से ही कर पा रही है. बैंगलोर में एक सखी का आपरेशन होना था, हो गया है, शायद इतवार को वह लौट आये. दीदी से पता चला, छोटी भांजी आई है, उससे बात करनी है. कल शिवरात्रि है, उनके यहाँ सत्संग है. आज भी वर्षा हो रही है, मार्च का महीना यहाँ ऐसा ही होता है.
जैसे-जैसे कोई परमात्मा के निकट होता जाता है, वह सरल और सहज होता जाता है, तब छोटी और बड़ी बातों में कोई भेद नहीं रहता, सारे भेद मिट जाते हैं. वह पहले छोटी-छोटी बातों में उलझा रहता था, उनसे दूर हुआ और स्वयं को ऊपर उठाया फिर उन ऊपर की बातों से भी दूर हुआ और एक चक्र जैसे पूर्ण हुआ, अब कोई भेद नही रहा.


कल सत्संग में कम लोग आये, हलुए का प्रसाद बच गया. आज गुरूजी ने बताया, देह, मन, बुद्धि, प्राण, चित्त, अहंकार तथा आत्मा इन सातों स्तरों के बारे में जानना चाहिए. आत्मा के कारण ही इनका अस्तित्त्व है. एक अर्थ में सभी को आत्मा कहा जा सकता है, धीरे-धीरे उनसे ऊपर उठते जाना है, फिर आत्मा से भी परे स्थित परमात्मा को जानना है. 

Monday, February 1, 2016

तुलसी ममता राम से..समता सब संसार


पिछले दो-तीन दिनों से डायरी नहीं खोली. नीरू माँ कह रही हैं कि पति-पत्नी को आपस में मेल से रहना चाहिए. उसे जून की गम्भीरता को भी सहज स्वीकार करना चाहिए. उनके मुखड़े पर सहज मुस्कान अपने आप भीतर से ही जगेगी. उसकी प्रतीक्षा करनी होगी. क्लेश उदय कर्म नहीं है पर हानि कर्म का फल है. इसलिए हानि होने पर मन में समता बनाये रखना ही पुरुषार्थ है. क्लेश करना अज्ञानता के अधीन है, जो भी कर्म उदय होता है वह अपने ही कर्मों के कारण है. वे अज्ञान के कारण स्वयं अपनी राह में कांटे बिछा लेते हैं और बाद में पछताते हैं. एक व्यक्ति जो सुख की चाह में बाहर भटकता है, दुखी होकर ही लौटता है, क्योंकि वह बाहर मिलता ही नहीं. आज जो सुख है कल वही दुःख में बदल जायेगा. हरेक को अपने भीतर झांकना है.

आज सुबह महीनों बाद एक घटना घटी, होना तो यह चाहिए था कि उस पर इसका जरा भी असर न हो, समता के भाव में रहने का अभ्यास बढ़ जाना चाहिए था, पर कुछ सोचने पर विवश किया ही है इस घटना ने. उसके किसी पूर्वजन्म के कर्म का ( इस जन्म के ही सही, पूर्व कर्म का ) हिसाब भी चुकता हो गया. कल ही उसने लिखा कि क्लेश उदय कर्म नहीं है सो दुःख तो मनाना ही नहीं है. भीतर पूर्ववत् शान्ति है पर बाहर के काम कुछ और ही कहानी कह रहे हैं. कल रात से ही बल्कि पिछले कुछ दिनों से ही तनाव दिख रहा था. कल रात को झलक मिली थी और आज सुबह वह पूर्णतया प्रकट हो गया. एक निमित्त बना उसका वह कृत्य जिसे जैसे किसी ने जानबूझ कर करवाया. वातावरण कितना बोझिल हो जाता है जब कोई तनाव में होता है. इसका मूल कारण भीतरी है, उनके सारे दुःख खुद के ही बुलाये हुए होते हैं. वे स्वयं को ठीक से जानते नहीं, उनकी इच्छाएं ही दुःख को जन्म देती हैं. पिछले कुछ दिनों से उसे देह में कुछ परिवर्तन लग रहा है. आजकल आसन करते समय मध्य में कुछ देर विश्राम करना पड़ता है, भार बढ़ गया है. अहंकार बहुत सूक्ष्म रूप से अपना काम कर जाता है और वे उसके शिकंजे में फंस जाते है. उनकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है और वह गलत रास्ते पर ले जाती है. इतना तो सद्गुरु से सीखा है, Accept people as they are accept situation as it is.अपनों का प्रेम जब तक चाहिए तभी तक उनका क्रोध भी प्रभावित करता है. जब ‘चाहिए’ का आग्रह न रहे तब मुक्त ही हैं.

कल शाम सत्संग में जाना नहीं हो सका. घर पर ॐ ध्यान किया. जून ने कल सुबह की बात की और पुनः वातावरण हल्का हो गया. जब मन भारी हो तो उसका असर वातावरण पर पड़ता है. अभी ध्यान कर उठी है. आत्मा में स्थित होने का नाम ही तो ध्यान है. वे जब मन, बुद्धि, चित्त या अहंकार अथवा शरीर या संसार में स्थित होते हैं तो उनके गुणों को ग्रहण करते हैं, जब आत्मा या परमात्मा में स्थित होते हैं तो..

चार दिनों का अन्तराल..पिछले कई दिनों से लिखने का क्रम छूट सा गया है. आज इस समय दोनों छात्राएं प्रश्न पत्र हल कर रही हैं, सो उसे यह समय मिल गया है. कल शाम वे ऑयल की पचासंवी सालगिरह पर आयोजित कार्यक्रम देखने गये. संगीत, नृत्य तथा गायन का कार्यक्रम..तेज रौशनी, तेज आवाजें, शोर और तड़क-भड़क वाले कपड़े. शास्त्रीय व लोक कला ही उन्हें ज्यादा भाती है बजाय आधुनिक गीत-संगीत के. रात लौटने में देर हो गयी तो बिना भोजन किये सो गये. अब जून भी भोजन पर निर्भरता कम करते जा रहे हैं. परसों शाम आत्मा पर ब्रह्मकुमारी द्वारा बताया गया ज्ञान वह ध्यान से सुन रहे थे. आज सुबह एक पुरानी परिचिता से बात हुई, वह पहले की तरह धीरे-धीरे बोलती हैं. एक अन्य परिचिता से भी बात हुई, वह दवा के सहारे अपनी थॉयराइड की बीमारी पर नियन्त्रण पा चुकी हैं. उसने आज जून को परीक्षाओं के लिए शुभकामना हेतु चार कार्ड लाने को कहा था, उन्होंने भिजवा दिए हैं. सुबह उसकी कविताओं को प्रिंट करके लाये जो ‘कुछ रिश्ते मीठे से’ के नाम से एक फ़ाइल में लगाई हैं ! वह उसका बहुत ध्यान रखते हैं, वह खुद उन्हें कभी-कभी तीखे वचन बोल ही देती है. चाहे उनकी मंशा भली ही क्यों न हो अप्रिय सत्य कभी नही बोलना चाहिए, साधक को तो बिलकुल नहीं. उसे दो जगह अपनी कविताएँ भेजनी हैं, पुस्तकालय जाना है. पूजाकक्ष की अलमारी सहेजनी है. कम्प्यूटर एडिक्शन पर इंटरनेट से कुछ जानकारी भी लानी है. ये सारे कार्य आज व कल दो दिनों में खत्म करने हैं.


Friday, January 29, 2016

हुम्मस की रेसिपी


आज ध्यान में पूरा एक घंटा नहीं बैठ सकी, नाश्ता करने के बाद कुछ भारीपन लग रहा था और ठंड भी. लेकिन ध्यान का अनुभव अच्छा था. श्वेत रंग का प्रकाश दिखा तथा सोहम् की धुन सुनाई दी. भीतर कितनी ध्वनियाँ तथा कितने प्रकाश छिपे हैं, वे बाहर ही देखते हैं बाहर का सुनते हैं, जो एक ही जैसा है पर भीतर की दुनिया अचरज से भरी है. भीतर का सब कुछ नया है अभी उसके लिए, हर पल कुछ नया ही होता है. कल शाम ऑयल पर हिंदी में लिखे एक लेख को वे थोड़ा ठीक-ठाक करते रहे, जून उसकी कविता भी दे रहे हैं क्योंकि स्वर्ण जयंती के अवसर पर प्रकाशित होने वाली पत्रिका में हिंदी में लिखे लेख बहुत कम मिल पाए हैं. उसे भी ऑयल से जुड़े किसी विषय पर एक लेख लिखना है, जून से सहायता लेनी होगी. नैनी की बेटी के रोने की आवाज आ रही है, उसके पैर पर लगी चोट पर उसके पिता पट्टी बाँध रहे हैं. नैनी अपने बेटे को प्यार से पुकार रही है, प्रेम कहीं भी हो सब सुंदर कर देता है. आज धूप खिली है. उसने ‘हुम्मस’ बनाया है, काबुली चने की अरब देश में खायी जाने वाली चटनी, पर वैसा नहीं बना है, उसे और पीसने की आवश्यकता है सम्भवतः. आज गुरूजी ने ‘नारद भक्ति सूत्र’ पर बोलना शुरू किया है. दम्भ, अहंकार, आसक्ति बाँधते हैं, वे निर्दोष भाव में रहकर स्वयं को मुक्त रख सकते हैं. जहाँ कोई अहंकार न हो, प्रेम ही झलकता हो, सहज प्रेम जिसमें कोई प्रदर्शन नहीं है. मुम्बई में बाबा रामदेवजी का योग विज्ञान शिविर चल रहा है, जहाँ एक जैन मुनि भी आये थे. कितना सुंदर भाषण उन्होंने दिया. देश में सौ करोड़ की लागत से पुराने ऐसे स्थान नये बनाये जा रहे हैं जहाँ पशुओं की हत्या की जाती है. जो लोग ऐसा जघन्य काम करते हैं, वे स्वयं भी पशु योनि में जन्म लेते हैं तथा मारे जाते हैं.

आज फिर धूप गायब है, लेकिन भीतर का सूरज खिला है ध्यान का, प्रेम का, मस्ती का और रचनात्मकता का सूरज ! दस बजने को हैं, जब तक बच्चे आते हैं, उसे कुछ खास कार्य करने हैं. बुआजी तथा फुफेरी बहन को फोन करना है. दीदी को भी उनकी सुखद यात्रा के लिए शुभकामनायें देनी हैं वह कल दुबई जा रही हैं, कोहरे के कारण फ्लाइट लेट भी हो सकती है, तथा नया लेख लिखने की तैयारी करनी है. अभी-अभी फोन पर बात की, फुफेरी बहन बीमार होने पर भी उत्साह से भरी है. उसके दोनों गुर्दे खराब हो गये हैं, पर जीने का उत्साह जरा भी घटा नहीं है. जिजीविषा ही है जो भयानक से भयानक रोग से लड़ने की शक्ति भीतर भर देती है. नैनी की बेटी पढ़ने आ गयी है, गाना गाते-गाते गृह कार्य कर रही है. आज लंच में मकई की रोटी बनानी है, सरसों की जगह मूली का साग.


आज भी कल के सूत्रों को आगे बढ़ाया गुरूजी ने, जो भक्त होता है वह स्थूल जगत को आनन्दित करता ही है, सूक्ष्म जगत को भी प्रभावित करता है. आज जून ने सिन्धी साईं दादा जेपी वासवानी के बताये तीन वाक्य बोले- God is with me, God is watching me, God is witnessing me. वह भी धीरे-धीरे रंग ही जायेंगे, आखिर कब तक कोई परमात्मा से दूर रह सकता है. वे अपना जीवन तभी तो प्रेममय तथा शांतिमय बना सकते हैं जब विकारों से दूर हों ! ..और विकारों से दूर होने की शक्ति उन्हें परमात्मा से मिलती है, जब उसके प्रेम का अहसास होता है. इस क्षण मन शांत है, अभी-अभी ध्यान करके उठी है, कुछ दृश्य बिलकुल स्पष्ट दीखते हैं ध्यान में सामान्य अवस्था से भी स्पष्ट, भीतर ही यह सारा ब्रह्मांड छिपा है. कल ‘विवाह संस्कार’ पर कुछ लाइनें लिखीं. कल्याण के संस्कार विशेषांक से पढ़कर. पति-पत्नी को एक मन होना ही चाहिए नहीं तो सिवाय तनाव के कुछ हाथ नहीं आता, लेकिन सत्य का आश्रय लेकर ही, अन्याय में गलत कार्य में साथ दिया तो दुःख ही मिलेगा.. इस हफ्ते कई विवाह कार्ड मिले, सभी को बधाई संदेश भी भेजने हैं. इस ठंड में भी बच्चे पढ़ने आये हैं, ज्ञान पाने की इच्छा मानव में नैसर्गिक रूप से होती है. 

Thursday, January 28, 2016

‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का ‘एडवांस कोर्स’


उसे स्मरण हो रहा है पिछले वर्ष लगभग इन्हीं दिनों में वे ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का ‘एडवांस कोर्स’ करने गये थे. उसने ढूँढ कर वह डायरी निकाली जिसमें उन तीन-चार दिनों का जिक्र था. वे संध्या के वक्त डिब्रूगढ़ के एक होटल पहुंचे थे. बाहर ही आयोजन कर्ता व एक टीचर खड़े थे, जो उन्हें अंदर ले गये, धीरे-धीरे और लोग भी आते गये. देर शाम तक सभी को कमरे मिल गये. ठंड बहुत थी सो वे सामान आदि सेट करके रजाई में बैठकर टीवी देख रहे थे कि फोन आया. एडवांस कोर्स के शिक्षक  आ गये हैं तथा सभी को संबोधित करेंगे.  होटल के सामने ही एक विवाह भवन था, वहाँ भी कुछ लोग ठहरे थे. उसी के प्रांगण में लोग कुर्सियों पर बैठे थे तथा ऋषि जी सभी को होने वाले कोर्स के बारे में कुछ समझा रहे थे.
अगले दिन सुबह पौने छह बजे वे उस मन्दिर के लिए निकले, जहाँ के विशाल प्रार्थना भवन में  कोर्स होना था. साढ़े चार बजे उठकर नहा-धोकर वे तैयार हो गये थे. छह बजे से ही कोर्स आरम्भ हो गया. दो महिला शिक्षिकाओं ने अगले चार दिनों तक छह से साढ़े आठ बजे तक जॉगिंग, आसन, व्यायाम तथा भारतीय ग्रामीण महिला के रोजमर्रा के कार्य, जानवरों की नकल, हॉकी, कबड्डी आदि खेल खिलाकर सभी को खूब हंसाया. उसके बाद नाश्ते के लिए निकट ही स्थित रोटरी क्लब के हॉल में जाते थे. पोहा या दलिया, हर्बल टी था एक फल का पौष्टिक नाश्ता बहुत स्वादिष्ट लगता था. इसके बाद सभी समूह (पांच समूह बना दिए गये थे ) सेवा के कार्य में लग जाते थे. उन्हें एक-दो बार बर्तन धोने का काम मिला. एक बार शौचालय की सफाई का तथा एक बार ध्यान कक्ष की सफाई का काम मिला, सभी मन से सेवा करते थे. दस से एक बजे तक साधना का पहला सत्र तथा तीन से छह तक दूसरा सत्र चलता था. दोपहर एक बजे भोजन मिलता था जिसमें बिना तेल-मसाले की सब्जी, दाल-चावल, सलाद तथा चुपड़ी हुई रोटी होती थी. भोजन हल्का व सत्विक था. शाम का भोजन छह बजे ही मिल जाता था, उसके बाद सांध्य भ्रमण तथा सात बजे सत्संग शुरू होता था, आठ बजे वे अपने होटल आ जाते थे.
अगले दिन शिक्षक ने उन्हें बताया कि उनके भीतर दस तरह के प्रेम हैं जो विकारों के कारण हैं. जब वे इन सभी तरह के प्रेम से आगे बढ़कर उसे ईश्वर, गुरु या आत्मा के प्रति समर्पित कर दें तो धीरे-धीरे ये विकार भी जीवन में नहीं रहते. ये दस प्रेम हैं-
अपने व्यक्तित्व से प्रेम – अहंकार
व्यक्ति विशेष से प्रेम – मोह
अपने परफेक्शन से प्रेम – क्रोध
दूसरों के परफेक्शन से प्रेम – जड़ता
अपने रूप से प्रेम – ईर्ष्या
अपनी कल्पना से प्रेम – कामना
वस्तुओं से प्रेम – लोभ
भूतकाल से प्रेम – नीरसता
भविष से प्रेम - डर  

उनका मूल स्वभाव तृप्ति, उत्सुकता, प्रेम तथा कृतज्ञता का है. ये सब भाव हैं लेकिन क्रोध, लोभ, मोह आदि भावनाएं हैं. ध्यान के लिए दो सुंदर सूत्र बताये-
१.      किसी की भावनाओं का तथा विचारों का बाहर की घटनाओं से कोई संबंध नहीं है. वे उन्हें घटनाओं से जोड़ देते हैं.
२.      मन के स्तर पर जो भावना है शरीर के स्तर पर वह तरंग या संवेदना है. यदि उन्हें भावना से मुक्त होना है तो साक्षी भाव से शरीर में हो रहे स्पंदनों को देखना चाहिए. साक्षी भाव से देखने पर नकारात्मक स्पंदन बदल कर सकारात्मक हो जाता है तथा सकारात्मक ऊपर उठ जाता है.
शिक्षक ने सारे चक्रों में रहने वाली भावनाओं तथा भावों की भी जानकारी दी.
सहस्रार चक्र – परमानन्द
आज्ञा चक्र – क्रोध, ज्ञान, सजगता
विशुद्धि – पश्चाताप, कृतज्ञता
अनहद – नफरत, डर, प्रेम
मणिपुर – ईर्ष्या, लोभ, उदारता, तृप्ति
स्वाधिष्ठान – वासना, सृजनात्मकता
मूलाधार – जड़ता, उत्साह

कोर्स के दौरान उन्होंने गुरूजी के वीडियो सीडी भी देखे. जिसमें ‘मौन की महत्ता’ तथा ‘साधन चतुष्ट्य’ प्रमुख थे. गुरूजी ने कहा साधक को न तो स्वयं पर, न समाज पर, न साधना की पद्धति पर तथा गुरु पर कभी संशय नहीं करना चाहिए, बल्कि स्वयं में ज्ञान को उतार कर पहले परखना चाहिए. साधक के पास साधना के चार सोपान हैं- विवेक, वैराग्य, षट् सम्पत्ति तथा मुमुक्षत्व.
विवेक के द्वारा वे स्थायी, अस्थायी, नित्य-अनित्य, सुख-दुःख का भेद करते हैं.
देखे हुए तथा सुने हुए विषयों के प्रति तृष्णा का शांत हो जाना वैराग्य है.
शम, दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा, समाधान षट् सम्पत्ति हैं.
शम – मन का नियन्त्रण
दम – इन्द्रियों का नियन्त्रण
तितिक्षा – सहन शक्ति
उपरति – कार्य में अंत तक उत्साह रखना
समाधान – वर्तमान में आनंदित रहना
मुमुक्षत्व है अपने जीवन में दुःख को देखकर उससे मुक्त होने की आकांक्षा. दुःख से मुक्ति उन्हें सुख की ओर और सुख प्रेम की ओर ले जाता है, तथा प्रेम अंत में भक्ति की ओर, भक्ति ऐसा प्रेम है जहाँ दूसरे की आवश्यकता नहीं है. 

अगले दिन सुबह छह बजे से ही मौन आरम्भ हो गया था जो चौथे दिन दोपहर तक चला. उन्होंने कई ध्यान तथा क्रियाएं कीं. एक ध्यान में आती-जाती श्वासों को ध्यान से देखना था तथा एक अन्य ध्यान में हर चक्र पर तीन मिनट ध्यान करना था. ज्ञान के दो सूत्र भी दिए गये.
१.      शिकायत करना दानवी प्रवृत्ति है.
२.      प्रशंसा करना दैवीय गुण है.
इस तरह मन को उत्साह से भरे और ज्ञान की सम्पदा को समेटे वे वापस लौटे.