Monday, December 8, 2014

गुरू कृपा का अनुभव


“शरण में आये हैं हम तुम्हारी, दया करो, हे दयालु भगवन !”
..और उस ज्योति स्वरूप ईश्वर को उसने देखा है, अनुभव किया है, वह उसके साथ था और उस वक्त उसे अनुपम आनंद का अनुभव हुआ, ऐसा अकल्पनीय सुख जो किसी भी अन्य स्थिति में नहीं मिल सकता. वह उससे बातें कर रही थी और वह उसे आश्वासन दे रहा था. यह सम्भव हुआ श्री श्री रविशंकर जी  द्वारा भेजे शिक्षक द्वारा सिखाई गई सुदर्शन क्रिया से. अब यह कुंजी उसके हाथ लगी है. यह अनुपम खजाना उनके ही भीतर है उसे पाने की कुंजी. ईश्वर का भजन अब कानों को अमृत के समान लगता है. बाबाजी के आँखों के आंसुओं का अर्थ और गुरू माँ के चेहरे की अनुपम मुस्कान का रहस्य भी अब खुल रहा है. अपने गुरू की याद आते ही जो उनकी आँखें रुआंसी हो जाती हैं. गुरू की महिमा का गान क्यों गाया गया है, क्यों निगुरे को चैन नहीं, यह सब कितना स्पष्ट है. उसके साथ कुछ बहुत-बहुत अद्भुत घटा है, इसके लिए वह परमात्मा की कृतज्ञ है और उन सभी की कृतज्ञ है जिनके कारण उसे यह अनुभव मिला है, ऐसा अनुभव जिसने भीतर तक आनंद की एक धारा बहा दी है. उसकी पुकार सुन ली गयी है. कल शाम को उन्होंने पुनः सुदर्शन क्रिया की, उसके पहले प्राणायाम भी किया. शिक्षक से उसकी बात भी हुई, उसके प्रश्न का उत्तर उन्होंने बाद के लिये छोड़ दिया, लेकिन उसे मालूम है कि वह जानते हैं उसने क्या पाया है ! और जो उसने पाया है वह उन्होंने भी पाया है तभी वह सेवा के इस महान कार्य से जुड़े हैं. उसे जिस मंजिल की तलाश थी वह मिल गयी है, अब कुछ पाना शेष नहीं है, कुछ भी नहीं, अब तो सिर्फ लुटाना है !

जीवन के धागों को सुलझाते हुए चलना चाहिए, अपनी मनुष्यता को सदा जागृत रखना चाहिए. मनुष्य के भीतर सम्भावनाएं असीम हैं, स्वयं को हर पल सम्भालते हुए अन्यों को भी प्रेरणा देनी चाहिए. गुरू कृपा से वेद-पुराणों का ज्ञान स्वयंमेव मिलने लगता है. वाणी पर संयम रखना बहुत जरूरी है, शब्द ब्रह्म है. व्यर्थ चिन्तन, व्यर्थ चर्चा, व्यर्थ कर्म नहीं करना चाहिए. प्रतिपल व्यवहार ही दिखाता है कि वे संसार से ऊपर उठे हैं या नहीं. जीवन में बुद्धि का महत्व उतना है जितना विमान में चालक का होता है यदि बुद्धि ईश्वर का चिन्तन करे तो परिनिष्ठित होती है. अध्यात्मिक विषयों का ध्यान करें तो बुद्धि शुद्ध होती है. जब इन्द्रियों का उपयोग ईश्वर की संतुष्टि के लिए हो तो कर्म बंधन का कारण नहीं होते, तब ईश्वर कुशल-क्षेम का भार अपने ऊपर ले लेता है और मानव को मुक्त कर देता है, मुक्त होना कितना भला है. कोई चिंता नहीं, कोई फ़िक्र नहीं. वह है न उसका प्रिय जो उन्हें बेहद-बेहद चाहता है. अचानक ही उसे शास्त्रों के अर्थ समझ में आने लगे हैं, अनायास ही उसकी वाणी में मधुरता आ गयी है, अपनी आवाज स्वयं को भली लगती है क्योंकि वह आवाज उसे भी सुनाई पड़ रही हैं, जो बातें पहले गूढ़ लगती थीं उनका रहस्य खुलता जा रहा है. बाबाजी की कई बातों का अर्थ सब स्पष्ट होता जा रहा है. अभी उसके रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट है उसका अहम् और इसे छोड़ना होगा.

साधक का एकमात्र लक्ष्य उस परमब्रह्म को प्रसन्न करना है, आसक्ति व विरक्ति दोनों से विमुक्त वह जीवन को सहज रूप में जीता है,. वह यह जानता है कि परम पिता हर क्षण उसके साथ है उसका अभिन्न अंग है, अतः पग-पग पर वह सचेत रहता है ताकि उसके मधुर प्रेम को प्राप्त करता रहे. संसार उसे लोभी, कपटी व अहंकारी बनाता है और ईश्वर उसे उदार बनाता है !





Friday, December 5, 2014

खुद से मुलाकात


कल “आर्ट ऑफ लिविंग” का पहला दिन था, उनके शिक्षक बंगाली हैं, अति सहजता से उन्होंने सिखाया. उज्जायी प्राणायाम भी किया, इसके अतिरिक्त मुस्कुराने के लाभ, अपने आस-पास के लोगों से मिलना, समय की पाबंदी और जो भी कार्य करें अपनी शत-प्रतिशत ऊर्जा उसमें लगा देनी चाहिए, आदि बताया. मानव अपनी  ऊर्जा का कुछ प्रतिशत ही कार्य में लाता है. आज भी ‘जागरण’ में सुंदर वचन सुने, ईश्वर की परम चेतना के अनुसार यदि उसकी लघु चेतना हो जाये तो मन स्थिर हो सकता है. जगत की वस्तुओं में यदि मन को लगायें तो मन अस्थिर रहता है, क्योंकि वस्तुएं तो बदल ही रही हैं, मन भी प्रतिक्षण बदल रहा है. स्थिर है तो केवल परमात्मा..मानव का अंतिम लक्ष्य तो वही है और वह भीतर है, कहीं दूर जाना नहीं. प्रेम ही उस तक पहुँचने का मार्ग है. अपने अंतर को कोई इतना प्रेम से भर ले कि दूसरी किसी बात के लिए स्थान न रहे, आस-पास के वातावरण को, लोगों को अपने आप इसका भास होने लगे. कहीं कोई काँटा न रहे, कोई उहापोह न रहे. परमात्मा  यही तो चाहते हैं, वह कहते हैं कि उन्हें भी साधक का उतना ही ख्याल है जितना साधक को उनका. वह साधक का कुशल-क्षेम वहन करने को तत्पर हैं, सिर्फ उसे ही अपने बन्धनों को तोडना है, बंधन जो अज्ञान के हैं, मोह और अविद्या के हैं. तीनों गुणों के हैं. उसे शुद्ध स्तर पर मन को ले जाना है, तभी भक्ति व ध्यान सफल होगा.

जो अपने आप में संतुष्ट रहता है, उसके आनंद का स्रोत ईश्वर होता है न कि संसार के विषय. वही स्थितप्रज्ञ है, आत्मानंदी ही ऐसा कर सकता है. कल कोर्स की दूसरी क्लास थी. शिक्षक बेहद मृदुभाषी हैं और सहज रहते हैं. ज्ञान का भंडार सबके भीतर है उसे वह उजागर करने में सहायक हैं ऐसा उन्होंने कहा. कई उदाहरणों तथा कहानियों के माध्यम से अपनी बातों को स्पष्ट किया. कल जून और वह लगभग आठ बजे वापस आये. नन्हा ठीक था, वह अकेले रहना पसंद करता है शायद उसकी तरह. उसे सुबह उठकर बात करना भी पसंद नहीं है, चुपचाप बिना मुस्कुराये अपना काम करता रहता है. वे उसे बदलने का प्रयास व्यर्थ ही करते हैं. आज भी वह छह बजे ही स्कूल चला गया. गुरू माँ तथा बाबाजी दोनों से भेंट हुई, दोनों ने यही कहा कि भौतिक वस्तुओं में आनंद खोजने जायेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी. ‘आत्मा’ में भी सुना, सच्चे आनंद का स्रोत मानव स्वयं ही है. उसे अपना साथ जब भला लगता है तभी वह खुश होता है. सुबह प्राणायाम भी किया, अच्छा लगा. इस कोर्स के बाद उसके बहुत से सवालों के जवाब उसे मिल जायेंगे, she hopes so... और सबसे अच्छी बात यह है कि उसके साथ जून हैं इस कोर्स में. वे पहली बार साथ-साथ घर से बाहर जाकर कुछ कर रहे हैं और यह उनके बंधन को और सुदृढ़ करेगा. उन्हें द्वंद्व से ऊपर उठना है और वह है स्थित प्रज्ञ की स्थिति !

“निर्भय बनना है, सत्व एवं शुद्धि को बढ़ाना है, तभी ज्ञान में स्थिति रहेगी ! चित्त में समता लानी है. सभी के साथ सौजन्य एवं मधुरता का व्यवहार करना है’ ! सुबह सुने  ये वचन उसके मन में गूँज रहे थे, जब वह कक्षा में गयी. कल उसे एक अलौकिक अनुभव हुआ. art of living का चौथा दिन था. कुछ ज्ञान की चर्चा करने के बाद शिक्षक ने उज्जायी, भस्त्रिका करने के बाद ‘सुदर्शन क्रिया’ कराई जिसमें श्री श्री रविशंकर जी की वाणी में, जो बहुत मधुर थी, ‘सोहम’ का उच्चारण किया गया था और उसके साथ श्वास लेनी व छोड़नी थी. कुछ देर तक तो वह अपने मन को देख रही थी, वह कुछ सोच रहा था पर बाद में मन दूर चला गया, हाथ-पाँव की सुध भी जाती रही. पूरे शरीर में रोमांच तो हो ही रहा था फिर अचानक आँसूं आ गये. क्रिया चलती रही और तभी उसके मस्तक से निकलती हुई या उसकी ओर आती हुई प्रकाश की चमकदार रेखा दिखी, जो बहुत तीव्र थी और मोटी भी थी. विभिन्न रंग भी दिखे और उस क्षण ऐसा लगा कि उसने कुछ पा लिया है. अब जग में कुछ भी पाना शेष नहीं है इस भाव के आते ही उसका रुदन और बढ़ गया पर कुछ ही क्षणों में नया विचार आया कि अब तो ईश्वर उसके साथ है अब सब उसी पर छोड़ देना चाहिए और फिर वह हँसने लगी. स्वर्गिक हास्य था, वह क्षण उसका सर्वाधिक सुखद क्षण था. सम्भवतः इसी को परमानन्द कहते हैं या आत्मानंद कहते हैं. उसके बाद निर्देश मिलते रहे. धीरे-धीरे वह सामान्य अवस्था में आ गयी पर उस क्षण से अब तक एक सुखद अनुभुति उसके पोर-पोर में छाई हुई है. उसके चेहरे पर अनोखी मुस्कान है ! उसने स्वयं को देख लिया है !


पौधों का घर


आज गणेश चतुर्थी है, यहाँ यह ‘गणेश पूजा’ के रूप में मनायी जाती है. जिसमें सार्वजनिक पंडाल लगाये जाते हैं, कुछ लोग मिलकर किसी के घर में भी मूर्ति की स्थापना करते हैं. आज छोटे भाई का जन्मदिन भी है, पर माँ की स्मृति में वे लोग नहीं मना रहे हैं, माँ जहाँ भी होंगी उनका आशीष भाई के साथ होगा. ‘आत्मा’ में अभी-अभी बताया “जिनकी बुद्धि एकनिष्ठ नहीं होती, अनेक शाखाओं में विभक्त होती है, उन्हें कहीं ठौर नहीं है, और एकनिष्ठ बुद्धि वाले को कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है”. जून को आज फ़ील्ड जाना है, नन्हा पढ़ने गया है. कल उन्होंने गोभी की पौध के लिए बीज डाले थे. माली को डर था कि तेज वर्षा हुई तो सारे बीज बह जायेंगे सो उसने एक शेड बनाया, सुबह वे उठे तो वाकई तेज वर्षा हो रही थी.

आज नन्हा सुबह छह बजे ही स्कूल चला गया, हिस्ट्री की एक्स्ट्रा क्लास के लिए. वे सभी जल्दी उठे, इसलिए अभी साढ़े सात ही बजे हैं और वह तैयार है. कल वे ‘गणेश पूजा’ देखने गये. शाम को चार पत्र लिखे. बाबाजी ने कहा, साधक के दुःख का कारण राग-द्वेष ही है. उसे लगा वह ठीक कह रहे हैं क्योंकि जब भी वे सांसारिक विषयों के बारे में बात करते हैं तो हानि-लाभ की तराजू में तोलकर करते हैं. अपने विषय में बात करते हैं तो विषाद या आत्मप्रशंसा के भाव के अलावा कोई तीसरा भाव नहीं आता. दूसरों के बारे में बात करते हैं तो निंदा या स्तुति के भाव से घिरे रहते हैं. अर्थात राग-द्वेष कभी पीछा नहीं छोड़ता. सर्वोत्तम यही है कि साधक बातचीत के लिए ऐसे विषयों का चुनाव करे जो भगवद् भाव से जुड़े हों क्योंकि शेष से कोई आत्मिक लाभ नहीं होगा, मात्र क्षणिक सुख की प्राप्ति होती है, वह भी बाद में दुःख का कारण बनती है. मौन रहना असत्य वाचन से श्रेष्ठ है और मन में प्रयोजन हीन विचारों को न उठाना तो अतिश्रेष्ठ है. यह जीवन तो ईश्वर का उपहार है, वही इसे चलाता, पोषता और सम्भालता है, फिर भी कोई कैसे कहता है कि उसके पास साधना के लिए समय नहीं है, सारा समय भी तो उसी का है. पहला अधिकार तो उसी का हुआ न, एकमात्र वही है जो हर पल साथ रहता है.

आज ‘ध्यान’ का एक सूत्र देते हुए गुरू माँ ने कहा कि सत्संग में सुने वचनों पर मनन करते-करते जब मन ठहरने लगे तो मानसिक मौन धारण कर लेना चाहिए या फिर अपने इष्ट की ध्यानस्थ मुर्ति की कल्पना करें और वैसा ही भाव अपने हृदय में लायें, धीरे-धीरे चित्त की वृत्तियाँ शांत होने लगती हैं. तब पिछले कर्म बांध नहीं सकते, बीता हुआ समय, बीते कार्य वर्तमान को प्रभावित नहीं कर सकते. जो बीत गया वह मृत है, अतः मन पर बिना किसी अपराध बोध को रखे नित नये जीवन का स्वागत करना चाहिए !

नन्हा आज बंद के कारण स्कूल नहीं गया, जबकि जून गये हैं. जागरण में सुने वचन हृदय को गहराई तक छू गये हैं. ईश्वर को पाना कितना सरल है, कितना सहज..जैसे श्वास लेना, लेकिन वे सही ढंग से श्वास लेना भी तो नहीं जानते, उथली श्वास लेते हैं जो उथले विचारों की दर्शाती है. श्वास के प्रति जागरूक रहने से कोई वर्तमान में रह सकता है अन्यथा भूत तथा भविष्य की कल्पनाएँ पीछा नहीं छोड़तीं. बाबाजी ने सरल उपाय बताया, ‘प्रतिक्षण श्वास को आते-जाते देखते रहें , सुबह उठकर तन को पहले खींचे फिर ढीला करें. ईश्वर को याद करें और दिन भर के महत्वपूर्ण कार्यों पर नजर डालें, फिर बिस्तर छोड़ें और दिन भर में हर एक घंटे बाद उस परम शक्ति को याद करते हुए दिनचर्या का पालन करें और रात्रि को भी गहरी श्वास लेकर सोयें.’ यह अनुपम जीवन प्रेम की भावना का अनुभव करने के लिए मिला है, अपने सहज रूप में रहते वक्त ही  कोई शांत रहता है, अधरों से गीत अपने आप फूट पड़ता है, जैसे पंछियों के गीत ! कल कविता की डायरी देखी, एक महीने से ज्यादा हो गया है लिखे हुए, उसकी कवितायें वापस आयीं तो लगा स्तरीय नहीं है, लेकिन उनका महत्व उसके स्वयं के लिए तो सदा है, किसी एक दिन स्वतः ही प्रेरणा जगेगी और शुष्क हो गये कविता कूप में फिर से जल छलकेगा. कल दोपहर ‘हंस’ पढ़ती रही, कुछ कहानियाँ बहुत अच्छी थीं. आज सुबह से वर्षा हो रही है. मौसम ठंडा हो गया है. नन्हे के पैर में दर्द अभी ठीक हुआ है.  



Wednesday, December 3, 2014

चित्रकला का संसार


आज सुबह से ही अपने–आप में नहीं है, एक के बाद एक मूर्खतापूर्ण कार्य और वाणी का प्रयोग उसे असमंजस में डाले जा रहा है. सुबह जून देर से उठे उसकी वजह भी वही थी. कल उसके सामने ही घड़ी reset हो गयी पर न तो उसे ठीक ही किया न ही जून को बताया. सुबह नन्हे को डांटा. जून से असत्य कहा, संगीत कक्षा भी है, फिर शीघ्रता में ही स्वीपर के न आने की खबर सफाई दफ्तर में कर दी जबकि बाद में वह आ गया है, उन्हें कितनी असुविधा हुई होगी उसकी वजह से दूसरा व्यक्ति परेशान हुआ जिसे काम मिल गया था. नैनी को तो उसकी गलती के लिए टोकना आवश्यक था. ...और अब उसका मन उसे ही कोस रहा है या फिर वह मन को...उसे स्वयं पर संयम नहीं था इसी का परिणाम था यह सब. शायद वह संगीत सीखने नहीं जा पायी इसकी वजह से..बाबाजी कहते हैं..छड्डो परे....और ईश्वर से सच्चे दिल से क्षमा मांग लो. परम शांति तो स्वयं की ही है..हर क्षण ..हर पल !

पिछले कई दिनों से अधर्म की वृद्धि हो रही थी और ईश्वर अपने वायदे के अनुसार मन के द्वार पर दस्तक देने आया है. उसके साथ सदा ऐसा ही होता है. जब कभी संसार उसे घेर लेता है एक बेचैनी उसे वहाँ से भागने पर विवश कर देती है. कुछ दिन या कुछ पल यदि ईश्वर के स्मरण के बिना गुजरे हों तो एक छटपटाहट सी होने लगती है जो कहती है कि यह मार्ग उसका नहीं है. आज सुबह गुरुमाँ ने सत्य कहा था कि यदि कोई सुख चाहता है तो उसे याद करे वरना न करे. उसे याद करते रहें तो अपने कर्त्तव्यों का बोध भी बना रहता है. कर्त्तव्य अपने देह, मन, आत्मा के प्रति, अपने परिवार, संबंधियों, पड़ोसियों के प्रति, अपने समाज, शहर व देश के प्रति तथा मानवता के प्रति अपने मातहत काम करने वालों के प्रति. जीवन एक उपहार है जो ईश्वर ने दिया है. हर श्वास पर उसी का अधिकार है, अभिमान करने योग्य यदि कुछ है तो यही कि मानव जन्म पाया है. इसे सार्थक करना या इसका अपमान करना उसके वश में है. आज कैलेंडर देखा तो पता चला कि कल अमावस्या थी, उसके व्रत का दिन पर उसे याद नहीं रहा, इतवार का दिन जो था. अब आने वाले कल रखेगी. कल एक पुराने परिचित आये, उन्हें भोजन कराया वह मिठाई लाये थे अपने शहर की. यह प्रेम का संबंध ही तो है जो उन्हें उनके पास लाता है. ईश्वर के प्रति प्रेम हो तो वही प्रेम अन्यों के प्रति झलकता है. उसका हृदय प्रेमयुक्त हो !


आज गयी थी संगीत सीखने, सो ‘जागरण’ नहीं सुना. लौटी तो ध्यान आदि किया, भोजन बनाया. पत्र अधूरे ही पड़े हैं, कुछ नया लिखा भी नहीं, पत्रिकाएँ पढने का भी समय नहीं मिला. चित्रकला का अभ्यास भी उसने कुछ दिन पहले शुरू किया था, बीच में ही छूट गया है, पर कल नन्हे ने बहुत दिनों के बाद एक चित्र बनाया अपने स्कूल में होने वाली एक प्रदर्शनी के लिए  आज सुबह वह अपने आप ही उठा, फिर बस स्टैंड तक उसे छोड़ने जून गये. अभी-अभी उनका फोन भी आया. कल कहा कि उन सभी को घर पर भी अच्छी वेशभूषा में ही रहना चाहिए, अस्त-व्यस्त सा नहीं. क्लब की मीटिंग का बुलेटिन भी आया है, जाने का अभी तो ज्यादा उत्साह नहीं है लेकिन सदस्या बनी है तो मीटिंग में जाना कर्त्तव्य भी तो है जब तक कि बेहद आवश्यक कार्य न हो अनुपस्थित नहीं होना चाहिए. कल माली ने तीन क्यारियों में खाद डाल दी है, इस बार वे सर्दियों की सब्जियां शीघ्र लगा सकते हैं. अभी एक सखी से बात हुई, उसने घर आने का निमन्त्रण दिया है, वे अवश्य जायेंगे.

Tuesday, December 2, 2014

प्रयोगात्मक रेकी

praktikal 

“जीवन होश से जीयें, मन में यदि प्रेम का बीज उगे तो उसकी रक्षा करनी पडती है, लोक व्यवहार की चिंता करते रहे तो भगवद् भक्ति टिकेगी नहीं. मन को गहराई से जानना होगा, जागृत अवस्था में ही नहीं, स्वप्नावस्था में भी सचेत रहना होगा. अपने स्वप्नों की समीक्षा करते हुए पता चलेगा की गाँठ कहाँ बंधी है”. आज गुरू माँ ने उपरोक्त वचन अपने प्रवचन के दौरान कहे. उसके जीवन में प्रेम है, जून, नन्हा, भाई-बहन, पिता, ससुराल के सभी लोग, चचेरे-ममेरे भाई-बहन, मित्रगण के परिवार, पड़ोसी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, प्रकृति, उनका देश, यह ग्रह, यह ब्रह्मांड.. सबके लिए प्रेम है. यह प्रेम भी आसक्ति रहित होना चाहिए, निष्काम होना चाहिए, इन सब से उसे क्या मिलने वाला है इसकी रत्तीमात्र भी परवाह न करते हुए वह इनके लिए क्या कर सकती है यही भाव रहना चाहिए. मन हल्का रहेगा. यूँ भी जीवन का कोई भरोसा नहीं, कब किस वक्त क्या देखना पड़ सकता है कोई कुछ नहीं कह सकता. अब बाबाजी आ गये हैं, उनकी शांत मुद्रा हृदय में शांति उत्पन्न करती है, नश्वर वस्तुओं के ध्यान से मति भ्रमित हो जाती है और कोई अपने वास्तविक रूप को जान नहीं पाता, लेकिन जब सुख की चाह वस्तुओं से नहीं होती, विचार पावन होते हैं. आत्मबल बढ़ता है. सत्संग सर्वश्रेष्ठ फल देने वाला है. संग दोष से बल घटता है.

पिछले पांच दिनों से स्वयं के निकट आने का अवसर नहीं मिला. शनिवार, इतवार को वैसे ही समय नहीं मिलता. एक दिन जुकाम से परेशान थी. कल पन्द्रह अगस्त की पार्टी थी, परसों जून का जन्मदिन था. अभी भी पूरी तरह जुकाम ठीक नहीं हुआ है. आज भी अमृत वचन सुने थे सुबह, कुछ-कुछ याद है, बाबाजी ने कहा, जो अपने साथ ईमानदार नहीं वह किसी के साथ ईमानदार नहीं हो सकता. सहजता जीवन में आ जाती है तो व्यक्ति साधारण हो जाता है, दम्भ नहीं रहता, अभिमान सूक्ष्म रूप में भी हो तो उतना ही हानिप्रद है, उसे अपनी देश भक्ति का अभिमान है, यह भी गलत है, यदि कोई अपने देश से प्रेम करता है तो यह एक सहज, स्वाभाविक बात होनी चाहिए न कि कोई विशेष बात. संत की परिभाषा भी उन्होंने बतायी, वे लोग, जो अपने घर का रास्ता भूल गये हैं, असंत हैं, जिसे अपने घर का रास्ता याद है वह संत है. अभयदान सब दानों में श्रेष्ठ है.

आठ बजने को हैं. कल शाम वे क्लब गये, लाइब्रेरी में क्विज बुक (विज्ञान) के लिए आलमारी खोली तो practical reiki किताब मिली जिसमें step by step स्वयं को व दूसरों को रेकी देने की बात सचित्र समझाई है. उसका गला अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है, अध्यापिका को अभी-अभी फोन करके मना किया. स्टार टीवी पर ‘आत्मा’ आ रहा है. “हमारी बुद्धि देहात्म हो गयी है, हम देह के परिचय को स्वयं मान बैठे हैं अर्थात आत्मा मान बैठते हैं”. अभी एक सखी का फोन आया, वह कम्प्यूटर ऑफ करने का तरीका पूछ रही थी. सुबह नन्हे ने इन्टरनेट कनेक्ट किया तो दो-तीन इमेल मिले अभी देख नहीं पाये हैं, सुबह-सुबह इतना वक्त नहीं होता. नन्हा लगभग रोज ही भागते-दौड़ते बस पकड़ता है. आज सुबह जून और वह दोनों उसके बारे में बात कर रहे थे. वह आजकल छोटी-छोटी बात पर चुप हो जाता है, शायद पैर के दर्द की वजह से. जून की तरह उसका भी फ़्लैट फीट है, पैर में दर्द स्वाभाविक है. कुछ व्यायाम जो पैर में कर्व बनाने में सहायक हैं, जून ने सिखाये हैं. कल art of living के बेसिक कोर्स के लिए फार्म भी आ गया है. यकीनन उसे इस कोर्स से लाभ होगा. आज पत्रों के जवाब भी देने हैं. दोपहर को नन्हे का पायजामा सिलना है. कई दिनों से व्यायाम/अभ्यास रुका है. सोमवार से सम्भवतः वह पूर्ण स्वस्थ हो जाएगी.


Sunday, November 30, 2014

कबीर का दोहा


इस समय एक तरफ तो धूप निकली है दूसरी तरफ बादलों के गरजने की आवाज भी सुनाई दे रही है. सुबह-सवेरे मौसम ठंडा था, जून को सर्दी लग गयी है, सो पहले वह उठी, बाहर गयी तो हवा शीतल थी पर कल सुबह चार बजे की शीतल स्वच्छ हवा का एक झोंका भी कितना प्रफ्फुलित कर गया था. ब्रह्म मुहूर्त में उठने की महिमा यूं ही तो नहीं गयी गयी है धर्म ग्रन्थों में ! अब दोपहर के पौने एक बजे हैं, अभी कुछ देर पहले जून को बाहर तक छोड़कर आने लगी तो उन्होंने पौधों पर पड़ रही धूप की ओर ध्यान दिलाया, पौधों को टोपी से ढका अन्यथा शाम तक कुम्हला जायेंगे. जून ने वह पुस्तक भेज दी है, अगस्त का आरम्भ है यदि वर्ष के अंत तक भी छप जाये तो बड़ी बात होगी. ढेर साडी पत्रिकाएँ पड़ी हैं पढने के लिए, लिखना भी है, पत्र व इमेल भी. एक ड्रेस पर बटन टांकने हैं, अभ्यास करना है, और यह सब करना है इन सवा दो घंटों में. जागरण में आज कर्मवाद पर सुना, मानव कर्म करने के लिए स्वतंत्र है पर फल भोगने के लिए नहीं, वह उसके चाहने अथवा न चाहने पर भोगना ही पड़ेगा, सो कर्म करते समय प्रतिक्षण सजग रहना होगा. उस वक्त वह जीनिया के सूखे फूलों से बीज निकाल कर अलग कर रही थी, इस कर्म का फल तो रंगीन ही होने वाला है. ‘आत्मा’ में गीता के ‘प्रथम अध्याय’ पर चर्चा हुई, मन ज्ञानियों की सी बातें तो बहुत करता है पर ज्ञान उसके भीतर टिकता नहीं है !

‘जब कोई उसे ढूँढ़ता है तो वह उसे नहीं मिलता पर जब वह ढूँढ़ते-ढूँढ़ते खो जाता है तो वह उसे ढूँढ़ता है !’ आज सुबह के समाचारों में जम्मू स्टेशन पर आतंकवादियों द्वारा अँधा-धुंध गोलियां चलाये जाने से दस व्यक्तियों के मरने की खबर सुनी. पिछले एक हफ्ते के अंदर यह तीसरी बड़ी दुर्घटना है जिसमें निर्दोष लोगों की जान जा रही है. सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा करने में असफल है. कुछ दिन पहले लगा था कि इस समस्या का हल शीघ्र निकल आएगा पर अब ऐसा नहीं लगता. कल शाम को बड़ी ननद को पत्र लिखा. तीन इमेल लिखे. पर सर्वर में कुछ खराबी होने के कारण भेज नहीं सकी. जून का स्वास्थ्य अभी भी पूरा ठीक नहीं है पर वह art of living का कोर्स करने के बाद काफी सचेत हो गये हैं. कल शाम से प्राणायाम का अभ्यास भी शुरू कर दिया है. वे दोनों टहलने भी गये. लाइब्रेरी से ‘झुम्पा लाहिरी’ की एक किताब लायी और हैरी पॉटर का एक और भाग. कल रात नन्हे को दस बजे ही सोने को कहा ताकि सुबह वक्त से उठ सके, सुबह उठा, तब तक गुस्सा दिखा रहा था पर स्कूल से आने तक सब भूल जायेगा. उसे इक्यानवे प्रतिशत नम्बर मिले हैं इस परीक्षा में, और पढ़ाई की जरूरत है विशेषतया गणित में.


जैसे धूँए से अग्नि छिप जाये या धूल से दर्पण ढक जाये उसी तरह मन पर अज्ञान का पर्दा पड़ा रहता है. यह अज्ञान तामसिक व राजसिक गुणों का परिणाम है. पिछले दिनों वह रजोगुण के अधीन रही. सात्विकता का भाव टिक नहीं रहा क्योंकि उसको टिकने का स्थान नहीं दिया. मन निर्विचार हो, निर्विकार तभी पवित्र विचारों को प्रश्रय मिल सकता है. जीवन जीते हुए ही जनक की तरह विदेह होना बहुत कठिन है. जीवन की धारा इतनी वेगवती होती है की मन को अपने साथ ले जाती है. बाबाजी ने कहा, “सुख देवे, दुःख को हरे, करे पाप का अंत, कहे कबीर वह कब मिलें, परम सनेही संत” गुरुमाँ ने कहा स्वप्न में भी साधक को सचेत रहना चाहिए, स्वप्न मन की वास्तविक स्थिति का परिचय देते हैं. जून कल तिनसुकिया गये थे, bookcase का आर्डर दे दिया, एक महीने बाद मिलेगा. 

तुलसी की रामायण


आज की सुबह बेहद व्यस्त थी, नन्हे को स्कूल भेजा, उससे पहले जून का फोन आया, उन्होंने उसके लिए ड्रेस तो खरीद ली है पर महंगा होने के कारण दूसरी फरमाइश पूरी नहीं की, अब चाँदी का होगा तो महंगा तो होगा ही...खैर ! नाश्ता कर रही थी कि टीचर का फोन आया, आने को कह रही थीं. नैनी, स्वीपर दोनों का पता नहीं था सो घर बंद करके गयी. एक घंटे बाद लौटी तो दोनों आये, सब मैनेज हो गया और अभी कपड़े प्रेस करके ‘पाठ’ किया, ‘ध्यान’ अभी शेष है. इसी बीच दो फोन आये. एक में पता चला असम के मुख्यमंत्री ‘श्री तरुण गोगोई’ शनिवार को आ रहे हैं सो इस हफ्ते उन्हें विशेष पुष्प सज्जा भी करनी होगी, आज शाम पांच बजे वह एक और महिला के साथ जाएगी, एक नया अनुभव होगा उस दिन भी, क्लब में कितनी ही बार कितने कलात्मक ढंग से पुष्प सज्जा देखी है, पर इस बार स्वयं करने का अनुभव होगा. जून ने कहा है वहाँ रोज शाम को छह बजे से रात दस बजे तक बिजली गायब रहती है, जब सबसे ज्यादा बिजली की जरूरत होती है. परसों वह चल रहे हैं और सोमवार सुबह उनके साथ होंगे !

Jun called in the morning, he was so loving and caring on phone as always. Last evening they went to club and then to book exhibition. She bought “Tulsi Ramayan” it is nine a.m., two friends called then she talked to two friends, could not concentrate what Guru ma and babaji were saying in today’s discourse but she knows they were talking about God, values and love. She loves this world and its maker, she loves all around her, her friends, relatives, country and its citizen, her son and husband and also she loves herself. She is grateful to God and all which bear her, she is grateful that this beautiful world has been the source of inspiration, joy and love.


पिछले दो दिन डायरी नहीं खोल सकी, शनिवार को सुबह संगीत कक्षा में गयी वहाँ से लौटकर क्लब. शाम को एक सखी के यहाँ. कल सुबह इतवार की विशेष सफाई करने में बीती, दोपहर को ‘यादें’ देखी, शनि की दोपहर भी एक फिल्म चल रही थी. आज सुबह जून आ गये, उसकी नींद चार बजे से भी पहले खुल गयी थी, बाहर के गेट का ताला खोलकर पुनः सोने की कोशिश की, वह ठीक पांच बजे आ गये, उनके वस्त्रों से ट्रेन की गंध आ रही थी, जो दो-तीन दिन की यात्रा के बाद भर जाती है. फिर उन्होंने उसके लिए लाये वस्त्र दिखाने शुरू किये, पहले गुलाबी, फिर नीला और फिर पीला - बेहद सुंदर और बेहद भव्य ! गुलाबी पर सफेद से कढ़ाई है, उसने उन्हें कहा यह उसे पसंद नहीं है पर जब बाकी दो देखे तो वह भी भा गया. उसके मन की वह इच्छा जो उस दिन डायरी के पन्नों पर जाहिर की थी अपने आप ही पूरी हो गयी. ईश्वर हर क्षण उनके साथ है यह विश्वास और भी पक्का होता जाता है. जून समय से दफ्तर भी चले गये पर थोड़ा पहले आ गये, खाना जरा कम खाया, सफर से आकर एकाध दिन तो एडजस्ट होने में लगेगा ही. आज नन्हा अपनी क्लास-सिस्टर्स के लिए चाकलेट्स ले गया है, कल नौ लडकियों ने उसे राखी बाँधी थी. आज सुबह ढेर सारे कपड़े प्रेस करने थे सो अभ्यास नहीं हुआ. अभी करेगी, दो बजे हैं, नन्हा तीन बजे तक आता है, पर जून हिंदी की दो पत्रिकाएँ भी लाये हैं, ‘हंस’ और ‘उदय जागरण’, एक साहित्यिक है तो दूसरी राजनीतिक. छोटी ननद की राखी आ गयी है, अच्छा सा पत्र भी लिखा है.