Tuesday, January 8, 2013

आँखों वाला पानी -नीरज



एक दिन उसने टीवी पर ‘नीरज’ को सुना जो अपने चिरपरिचित अंदाज में यह कविता सुना रहे थे-
“आदमी को आदमी बनाने के लिए
जिंदगी में प्यार की कहानी चाहिए
और लिखने के लिए कहानी प्यार की
स्याही नहीं आँखों वाला पानी चाहिए”

उसने सोचा, क्या यह जरूरी है की हर प्रेम कथा आंसुओं से ही लिखी जाये ! फिर तो यह तय है कि प्रेम के पथ पर चलना हो तो आंसुओं से गुजर कर ही जाना होगा..आंसू जो दुःख को हसीन बना देते हैं, ये न होते तो इंसान के अंदर ज्वालामुखी दबे रहते या तो चट्टानें..भारी से भारी दुःख भी इंसान इन के सहारे झेल जाता है, आंसू पानी नहीं एक वरदान हैं ईश्वर का मानव को...

अगर वह कुछ लिखना चाहे तो पहले विषय की तलाश करनी होगी, जाहिर है वह वही चुनेगी जो उसके लिए ज्यादा महत्व का होगा, तो बात यहाँ पर रुकी कि वह किसे ज्यादा महत्व देती है...हँसी को..आकाश को.. जीवन को.. मृत्यु को.. सम्बन्धों को.. या स्वाधीनता को...जुड़ाव को..प्यार को..बच्चों को..या मौसम को..कर्म को अर्थात कार्य को या कर्त्तव्य को..नहीं कर्त्तव्य के बारे में उसने कभी सोचा ही नहीं, पर काम करना, कुछ करना, कुछ करते रहना यह उसे सबसे जरूरी लगता है, नहीं तो इंसान अपनी नजरों में गिरने लगता है. जिन पलों में वह व्यस्त रहती है, खुश रहती है पर मात्र खुशी ही काम करने का कारण नहीं है इससे कहीं ज्यादा एक संतोष, एक अर्थ मिलता है जीवन को..लेकिन काम करने को कविता का विषय कैसे बनाया जा सकता है ? वह भी है उसके मन में क्या..

कर्महीन जीवन से सांसें प्रश्न पूछतीं
क्या आना-जाना ही हमारा
जीवन का उद्देश्य तुम्हारा ?
किसने दिया तुम्हें अधिकार
व्यर्थ करो ऊर्जा अपार !
ढक के रखो ज्योतिपुंज को
छाया हो घन अंधकार !
जो भर सकता जीवन का घट
क्यों प्यासा है?
जो चल सकता पर्वत पर्वत
क्यों बैठा है?
जो रच सकते अद्भुत सृष्टि
क्यों बेसुध हैं?
वरदान मिले इन हाथों को
अज्ञान रज्जु से क्यों बांधा ?
उसने कई कवितायें लिखीं उस दिन के बाद से अगले कई दिन तक रोज एक.

स्वप्न उसे अचरज से भर देते हैं, नींद को रहस्यमय बनाने वाले स्वप्न..

जब ईश्वर ने स्वप्न रचा होगा
कितना विचलित होगा
कभी झिझक, कभी डर तो कभी
मुस्कान भी झलकी होगी मन में
स्वप्न में वह छिपा जो नहीं रहता
अनदेखा, अनजाना वह स्वप्नों में
सदा से आया करता है !
स्वप्न रहस्यमयी सृष्टि का एक अनोखा रहस्य
जिसमें वह स्वयं को उजागर करता है
नई-नई राहें दिखाता
सवालों को हल करता कभी
नई चुनौतियों का सृजन करता है..










आक छीं...



कल इतवार था यानि लिखने का भी अवकाश, सुबह तो सारी टीवी के कार्यक्रमों में निकल जाती है, दोपहर को उन्होंने आर्गन्डी के कपड़े से फूल बनाये, पहले उन्हें अलग अलग रंगों में रंगा, फिर स्टार्च लगाया और तब  अलग अलग आकार के फूल बने. शाम को फिल्म देखी. नन्हे का आज विज्ञान का टेस्ट है, उसको सुबह बिस्तर से उठाना बड़ा मुश्किल है, ठंड भी काफी थी आज, पर अब धूप निकल आई है. कल शाम वह बेवजह उदास हो गयी ,कभी-कभी होता है ऐसा उसके साथ, पता नहीं क्यों ? जून उसे गाइड करते, उसे कुछ सिखाते, उससे ज्यादा रूचियाँ होतीं तो....शायद यही कारण है, उन्हें ऑफिस के काम के अलावा दुनिया की किसी वस्तु में दिलचस्पी नहीं है और अगर जरूरी न हो तो शायद..., हो सकता है कि वह कुछ ज्यादा ही सोच रही है पर यह बात सच है किसी हद तक..नन्हे के लिए उन्हें एक आदर्श होना चाहिए जो उसे मार्गदर्शन दे सके, उसे उत्साहित कर सके...पर उसे उनसे इतनी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि वह स्वयं ही उनकी अपेक्षाओं पर खरी नही उतरती. शायद कोई भी इंसान ऐसा नहीं जो अपनी अपेक्षाओं को पूर्ण कर पाता हो. लेकिन वह कोशिश तो करती है, उनके प्रति जागरूक तो है, पर वह तो उदासीन हैं जैसे...मस्त अपने आप में. गेंदे की जो पौध उन्होंने लगाई थी उसमें अच्छे फूल नहीं आ रहे हैं, सब खिल जायेंगे तब शोभा बढ़ेगी, वैसे हर फूल की अपनी सुंदरता होती है, आज वह अपनी कही हर बात काट रही है, शायद यह मौसम का असर है, खिली-खिली धूप का उजास मन को स्थिर रहने ही कहाँ दे रहा है. कुछ देर पहले वह उन पंजाबी दीदी को फोन करने की सोच ही रही थी कि उनका फोन आ गया, उनकी नौकरानी के यहाँ कल रात लड़ाई हो गयी, खून खराबे तक बात पहुंच गयी. पहले दिन से लेकर इस सृष्टि पर कितना खून बहा होगा इस धरती पर...पर समुन्दर अभी तक लाल नहीं हुआ..भगवान ?

कल लिखना शुरू ही किया था कि जून आ गए. और फिर दो दिन बीहू का अवकाश..वे बहुत घूमे, कार से, वैन से.. पैदल चलना, मीलों निकल जाना दूर-दूर.. यहाँ सम्भव नहीं है. हरे-भरे पेड़ों के बीच घूमना, काँटों भरे रास्तों पर, ऊबड़खाबड़ पगडंडियों पर ...जैसे उस दिन वे म्याऊं में घूम रहे थे, जो अरुणाचल प्रदेश में है, उसे बहुत अच्छा लगा था प्रकृति के बिल्कुल करीब होना. उसकी तीन कवितायें क्लब की वार्षिक पत्रिका में छपी हैं. सोचा था उसने एक तो अवश्य होगी. मौसम फिर बदली-बदली हो गया है, नन्हा जब स्कूल जा रहा था वर्षा भी हो रही थी. उन्हें घर जाने में बहुत कम दिन रह गए हैं.

परसों उन्हें जाना है, आश्चर्य है घर से न कोई पत्र न कार्ड आया है, वे लोग शादी की तैयारियों में इतने व्यस्त हो गये हैं कि...शायद आज आए. सिर्फ दो दिन के लिए जाना है उन्हें पर सर्दी की वजह से सामान काफी हो गया है, तैयारी लगभग हो गयी है, यात्रा करने से पूर्व जो उत्सुकता, उत्साह और थोड़ी घबराहट सामान्यतः होती है, शुरू होने लगी है. आस्ट्रेलिया और भारत के बीच फाइनल मैच खेला जा रहा है.

कल भारत छह रन से हार गया. शाम को दीदी मिलने आई थीं, उन्हें विदा करते समय दस-पन्द्रह मिनट वह बाहर खुले में खड़ी थी ओस टपक रही थी, उसे सुबह-सुबह दो तीन छींकें आयीं. नन्हे की चम्पक भी आई कल, बहुत खुश था.

Monday, January 7, 2013

दांत का दर्द



उसकी बंगाली सखी का जन्मदिन आने वाला था, जिसे बागवानी में बहुत रूचि थी. उसने सोचा एक कविता लिखेगी उसके लिए-
फूलों सा हो मन उसका
कलियों जैसी ऑंखें,
खुले पलक तो रंग-बिरंगी
मुस्कानें बिखरा दे !

पात-पात से बात करे
ऐसी भाषा उसकी हो
पंखुरी-पंखुरी ओस बिछी जो
ऐसी हँसी बिखेरी हो !

सुरभि कुसुम की बने भावना
विचार पराग बना हो,
वायु सुवासित ज्यों उपवन की
जीवन प्रमुदित उसका हो !

लहरा कर ज्यों झूमा करतीं
कुसुम कतारें विकसित हो,  
सहला दे हर मन की उलझन
पवन झकोरा प्रमुदित हो !

आज उन्हें साथ-साथ चलते हुए पूरे सात साल हो गए हैं. उसक मन भरा है भावों से और उन स्मृतियों से जब उन्होंने प्रेम के अमृत का घूंट पहली बार पिया था...जब पहले-पहल उन्होंने एक-दूसरे को चाहा था. तब से कितनी बार..कितनी ही बार महसूस हुआ है की जितना प्रेम वह उससे करता है उतना किसी ने किसी को नहीं किया होगा..क्या उसे भी कभी ऐसा लगा है ? और अब तो वे एक-दूसरे में इतना रच-बस गए हैं कि एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं..कुछ साल पहले उसने अपनी डायरी की शरुआत सात जनवरी से की थी और आज भी इस साल का पहला पन्ना है. कल रात एक स्वप्न देखा कि वे लोग यहाँ से जा रहे हैं..इतनी जल्दी में कि किसी से मिल भी नहीं सके, सामान पैक हो गया है बस कार का इंतजार है, हो सकता है यह स्वप्न उस बातचीत के कारण हो जो सोने से पूर्व उन्होंने की थी, वे उसकी छोटी बहन की शादी में जाने की बात पर चर्चा कर रहे थे.

कल व परसों नहीं लिख पायी, दांत में दर्द ज्यादा था, बांया गाल फूलकर गोलगप्पा हो गया है...चार-पांच दिन पूर्व ही उसने सोचा था कि अब वह पूर्ण स्वस्थ है कुछ भी नही होता..और ऐसा सोचना ही शायद पूर्वाभास था कि अब कुछ होने वाला है. डेंटिस्ट को अभी दिखाया नहीं है, पर दिखाना जरूरी है यहाँ या तिनसुकिया जाएँ शायद कल. कल से दवा शुरू की है, पता नहीं कब पूरी तरह ठीक होगा. कल उनकी ट्रेन व फ्लाईट की टिकट हो गयीं. उसने गलती से एक दिन पहले के पेज पर लिख दिया है..हालात क्या इतने बिगड़ गए हैं...

मौसम इस तरह बदले हैं अब के बरस
बरसात आ के चली गयी खबर ही न हुई

कल टीवी पर एक बेहद अच्छा कार्यक्रम देखा, आधुनिक उर्दू शायर मोयद्दीन पर, शेर कैसे होता है ? कितना अच्छा जवाब था उतने ही अच्छे सवाल का, एक बेचैनी सी होती है..कैफियत सी ..फिर शेर होता है खुदबखुद, बेइरादा. जून को यह प्रोग्राम पसंद नहीं...अगर वह भी साहित्य में दिलचस्पी लेता तो शायद ...मगर उसे इन बातों से कोई खास या आम कोई असर नहीं होता, उसका मन जल्दी पिघलता नहीं है जैसे वह कोई पंक्ति पढकर या सुनकर भावुक हो जाती है...फिर भी तो वह उसकी जान है, उसके होने से ऐसा लगता है जैसे अब कोई डर नहीं वह सब कुछ सम्भाल लेगा.. सम्भाल ही लेगा, और नन्हे की भी अपने पापा के बारे में कुछ यही राय है.





Saturday, January 5, 2013

होमियोपैथिक दवा- मीठी मीठी सी



आज फिर बहुत दिनों के बाद डायरी खोली है, आज भी मूड नहीं था पर सोचा, नियम के अनुसार चलना चाहिए न कि मूड के अनुसार. सुबह से सब सामान्य रहा है, थोड़ा सा दूध आज भी उबल कर गिर गया, इस बार घर से बड़ा पतीला दूध के लिए अवश्य लायेंगे उसने मन ही मन तय किया. नन्हा कल दोपहर इंग्लिश वर्कबुक में गृह कार्य करना भूल गया था, आज सुबह उसने देखा, फिर किसी तरह पूरा किया. इतवार को उसे कला प्रतियोगिता में जाना है, वह बहुत उत्साहित है. घर से माँ का पत्र आया है, दीदी को विदेश में पत्र लिखने के लिए एरोग्राम मंगाना है. उन्होंने ‘नॉर्थईस्ट टाइम्स’ लेना शुरू किया है उग्रवादी संघठन के समाचारों से भरा रहता है.

शनिवार और रविवार व्यस्तता में बीते, जैसे हमेशा बीतते हैं. आज सोमवार है, उसे भारीपन महसूस हो रहा है, पता नहीं तन की वजह से मन में या मन की वजह से तन में, एक के बिना दूसरा स्वस्थ रह भी कैसे सकता है. लेकिन शीघ्र ही यदि इलाज न किया तो...खतरा हो सकता है. आज बल्कि अभी से इलाज शुरू कर देना चाहिए, उसने तय किया सबसे पहले पत्रों के जवाब देने हैं, इससे भी मन हल्का हो जायेगा. प्रियजनों की स्मृति ही कितना सुकून देती है.
पुनः एक अंतराल ! अभी याद ही नहीं आ रहा था कि आज कौन सी तारीख है, सभी दिन सभी तारीखें बराबर हैं उसके लिए...सर में हल्का दर्द है और पेट में कुछ...उसने सोचा, पहले कुछ खाकर आयेगी, न खाने से ही ऐसा लग रहा होगा, ऐसा ही हुआ, खाकर ठीक लग रहा है. आज उसने तीन सखियों से फोन पर बात की. मौसम आज भी बादलों भरा है, तेज धूप अब कभी-कभी ही आती है, सर्दियाँ अब निकट हैं. नन्हा स्कूल गया है, काफी समझदार हो गया है, बड़ी-बड़ी बातें करता है, खूब हंसाता है उन दोनों को. कल साइंस में उसे ट्रिपल स्टार मिले, स्कूल से आते ही बताया उसने, बेहद खुश था. जून कल एक पाकिस्तानी कामेडी कैसेट लाए थे, यूँ ही सा है. आज वह तिनसुकिया गए हैं, इस हफ्ते घरों को खत वे लिखेंगे. सो आज सोमवार होने के बावजूद उसे खत लिखने का काम नहीं करना है.

कल शाम वह डहेलिया की कटिंग्स ले आयी अपनी बंगाली सखी से, और गुलाब की असमिया सखी से,.जो बागवानी में दक्ष है. पर माली अभी तक नहीं आया है, सब एक ही जगह मिटटी में लगी हैं. इस घर में उन्हें नए सिरे से बगीचा लगाना है कितना काम पड़ा है यहाँ बगीचे में करने को.
सितम्बर का अंतिम दिन, अक्टूबर का महीना यानि यात्रा का महीना. पूरे एक वर्ष बाद सभी से मिलकर कैसा लगेगा, अच्छा..बहुत अच्छा, कुछ दिन पहले वह यात्रा के नाम से ही घबरा गयी थी, पर अब प्रतीक्षा है उस दिन की, तैयारी करनी है पर अभी बहुत समय है.

उन्हें यात्रा से वापस आए भी कुछ दिन हो गए हैं, पर कुछ लिखा नहीं, क्या कहे इसे, प्रमाद, मूर्खता या उदासीनता और या दुनियादारी, दुनिया भर  के दूसरे कामों के लिए वक्त है, निकल आता है पर अपने पास आने के लिए, खुद से बात करने के लिए वक्त नहीं है, शायद उसे डर लगता है, अपनी शिकायत अपने आप से करने में, शीशे के सामने खुद को खड़ा करने में..यह डायरी उसके मन का आईना ही तो है, उसका मन जो नित नई बेवकूफियां करता रहता है, खुद भी परेशान होता है और अन्यों को भी करता है...खैर यह सब लिखने से कोई लाभ नहीं क्योंकि कल फिर वही होगा..और परसों भी वही..अंत नहीं है इसका, अंत हो सकता है पर इसके लिए मेहनत करनी होगी. मस्तिष्क का प्रयोग करना पड़ेगा, जो सदा आराम करता है..दिमाग का प्रयोग न करने से वह जंग लगे हथियार की तरह हो जाता है जो वक्त पर काम नहीं आता...उसने रुककर निश्चय किया कल जो हुआ उसे भूलकर आज की बात करेगी, उन दीदी के परिवार को खाने पर बुलाया है, सिंधी कढ़ी बनाएगी, तरला दलाल की ‘आस्वादन’ में देखेगी, शायद कोई नई रेसिपी मिल जाये अच्छी सी..गुलाबी-गुलाबी ठंड पड़ने लगी है, नन्हे की तबियत अब सम्भली है, होमियोपैथिक दवा दी है उसे जुकाम के लिए, उन्होंने तय किया है की उसे कभी एलोपथिक दवा नहीं देंगे, खुद भी नहीं लेंगे, जब तक सम्भव हो.

   









Friday, January 4, 2013

द साइप्रस ट्री



फिर वही प्रमाद और ढेर सारे बहाने...उसके पास अपने निकट आने के लिए दस मिनट भी नहीं हैं और वह कुछ करने का ख्वाब देखती है. शनिवार की ही बात है उसे कुछ भी रुच नहीं रहा था, मन का पंछी उड़ान भरने को आतुर था, और तब से अब तक फिर उसी पुरानी दिनचर्या में खप गया है मन अपने आप ही, दरअसल करने को घर में भी कुछ कम नहीं है..पर नया कुछ नहीं..खैर जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ ? जून और नन्हे को ढेर सारा प्यार करना..फिर उनके लिए नाश्ता, खाना बनाना..यह भी कोई कम काम है क्या, पर पहले प्यार की जो तीव्रता महसूस करती थी जो आकुलता ...वैसा अब क्यों नहीं लगता..शायद इसलिए कि अब वह प्रेम को उतना महत्व नहीं देती, जबकि यह हमेशा महत्वपूर्ण होता है.
आज भी मौसम अच्छा है, बदली है, अभी सुबह के साढ़े दस ही बजे है पर अभी से शाम सी लगने लगी है. नन्हे ने कल टीवी पर बच्चों के लिए कहानी सुनी, उसे इतना मजा आया, शाम को उसे चटखारे लेकर सुना रहा था कि कैसे बीरबल ने नाई को उसके ही जाल में फंसा दिया. वह बहुत प्यारा है, मासूम और सच्चा..बच्चों को तभी भगवान का रूप कहते हैं. छोटी-छोटी बातों पर इतना खुश हो जाता है...उसने मन को झटका दिया, कहीं उसे उसकी नजर न लग जाये..उसने मन ही मन कहा वह उसे और उसके पिता को बहुत प्रेम करती है.

आज अचानक उसकी बंगाली सखी का फोन आया, बहुत अच्छा लगा. सबसे अच्छी बात यह कि उसने सुबह ड्राइविंग की, इतना मुश्किल नहीं है कार चलाना जितना वह सोचती थी. कल माँ का पत्र आया वह विस्तार से सभी के समाचार लिखती हैं, छोटी भाभी स्कूल में पढ़ाने लगी है. नन्हा कल रात बहुत परेशान हो गया था..उसकी टीचर ने कल पांच स्पेलिंग याद करने दी थीं और आज डिक्टेशन देने को कहा था..उसको शायद याद करने में इतनी मुश्किल नहीं होती पर डर गया था और यही कह रहा था कि एक दिन में कैसे बच्चे याद कर सकते हैं. बेहद संवेदनशील है और आंसू भी बहुत जल्दी आते हैं उसको. पापा ने कहा है, जीरो नम्बर मिलेंगे, बस यही कहकर रोने लगा. उसका पड़ोस का मित्र आज अस्वस्थ है, वह अकेला ही गया है स्कूल.
कल सुबह वह Cyprus tree पढ़ रही थी. John spain उसे भी अच्छी लगी और उसकी माँ उतनी नहीं पर Laura की Mummy से ज्यादा. नन्हे का टेस्ट आज दुबारा होगा, शायद कल सभी बच्चे अच्छा नहीं कर पाए. कल दोपहर वह सो नहीं पाया, गर्मी बहुत थी, शाम को उसकी तबियत ठीक नहीं लग रही थी, शायद थकान से. उसने सोचा है आज से दिन में भी एसी चलाएगी वह. शाम को उत्तपम बनाया था, रात को खाना खाने का किसी का मन नहीं हुआ. जून बेड पर जाते ही सो गए जो उसे नागवार गुजरता है, रात को उसे कुछ बातें करके ही सोने का ख्याल आता है, बातें जो दिन भर की भाग-दौड़ में वे नहीं कर पाते, कभी सुकून से बैठकर दिल की बातें. सुबह, दोपहर, शाम हर वक्त तो कोई न कोई काम लगा रहता है, फिर मन, मस्तिष्क और चाहत का क्या करे? अधूरापन...शब्द नहीं मिल रहे हैं पर कोई तो वक्त ऐसा हो जब वे दोनों.. जीवनसाथी.. भूतपूर्व प्रेमी और न जाने क्या-क्या एक दूसरे को यह अहसास दिला सकें कि हाँ, उन्हें एक-दूसरे की जरूरत है, कि वे अर्थहीन नहीं है, कि उनका प्यार सम्बल है कि वे साथ-साथ जी रहे हैं सही अर्थों में, कि वे एक-दूसरे के लिए हैं कि वे सिर्फ इसलिए साथ-साथ नहीं रहते कि ऐसा करना ही है क्योकि इसके सिवा कोई रास्ता नहीं, बल्कि इसलिए कि वे एक दूसरे के दोस्त हैं..साथ रहने का सुख मिलता है उन्हें, कि वे अकेले नहीं जी पाएंगे..लेकिन जून को शायद इन सबकी जरूरत नहीं, वह अपनी नींद को ही ज्यादा महत्व देते हैं..दोपहर हो शाम हो या कि रात..खाली वक्त यानि उनकी आँखें बंद...उसकी बात कभी वे समझेंगे..शायद हाँ..शायद नहीं..पर फिर भी उसे उनसे प्रेम है और वह जानती है कि उन्हें भी उससे बहुत ज्यादा.







Wednesday, January 2, 2013

सोवियत संघ - स्वप्न सरीखा


कल जून का जन्मदिन है, वह कार्ड तो पहले ही ले आयी थी, केक कल बनाएगी और उपहार ? उसके पिताजी ने अपने हाथों से बनाकर जन्मदिन का कार्ड भेजा है दामाद के लिए, एक गुलाब का फूल...बिलकुल वास्तविक लगता है. कल बेहद गर्मी थी वे खेलने गए पर टीटी हॉल में खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था, पसीना टपक रहा था, सो वे जल्दी लौट आए. गर्मी के कारण नन्हे का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है, उसे कोई भी अप्रिय गंध उबकाई ला देती है. उसके भी घुटने पर घमौरी से दाना निकल आया है. यहाँ जुलाई-अगस्त में गर्मी पडती है, जब सारे देश में सावन की फुहार बरसती है.
आज वे सभी बहुत प्रसन्न हैं, एक तो जन्मदिन, और दूसरे सुबह उठते ही रिमझिम वर्षा...कल स्वतंत्रता दिवस है. जून ने उनकी आगामी यात्रा के लिए कोलकाता मैसेज भेज दिया है, उनकी हवाई यात्रा के बाद वहाँ ट्रांजिट फ़्लैट में रुकना है, घर जाने का उत्साह तो है पर सफर में होने वाली दिक्कतों को देखते हुए डर भी लगता है. एसी में जाएँ या द्वितीय श्रेणी में, यह भी सोचने की बात है. आजकल वह मन्मथनाथ गुप्त की एक किताब पढ़ रही है, ‘आधी रात के अतिथि’, अच्छी है,

नन्हे ने छोटा सा झंडा बनाया है, उसे लेकर सुबह उत्साहित था, वह प्रधानमंत्री का भाषण सुनने में, अच्छा लगा पर पहले की उनकी स्पीच से कुछ कम...दोपहर बाद उन्होंने कैरम खेला. शाम को दो परिवार आए थे आजादी की सालगिरह की चाय पार्टी के लिए, कुल मिलाकर पन्द्रह अगस्त अच्छा गुजरा.

पिछले तीन दिन वह लिख नहीं पायी, वे घर पर ही रहे, कल खेलने गए, काफी रश था. उसके गले में हल्की खराश लगी तो एक अदरक का टुकड़ा मुँह में रख लिया, उसे इस तरह अदरक खाते देखकर जून को बहुत आश्चर्य होता है, उसे सब्जी में भी अदरक पसंद नहीं है. आज सुबह उठी तो धूप तेज थी पर अब बदली छा गयी है, कितनी जल्दी यहाँ का मौसम रंग बदलता है. आजकल वह सिवाय किताबें पढ़ने के खाली समय में और कुछ नहीं करती है जैसे हाथ का कोई काम..यहाँ तक कि खत लिखने का भी मूड नहीं था. फोन पर बात अब कुछ आसान हो गयी है.
सोवियत संघ में सत्ता परिवर्तन का प्रयास असफल हो गया है. गोर्बाचोव पुनः मास्को लौट आए हैं, और इसी के साथ ही जनशक्ति की महत्ता एक बार फिर स्थापित हो गयी है. आज की जनता जागरूक है उसे बहलाया नहीं जा सकता पहले की बात और थी.. गर्मी पिछले तीन दिनों से जारी है, चेहरे से पसीना सूखता ही नहीं. बेहद गर्मी...एसी होने के कारण ही वे इतने आराम से हैं नहीं तो उन दिनों की तरह बदहवास हो गए होते जिन दिनों एसी नहीं था. मगर एसी कितने लोगों के पास है, दूधवाला कह रहा था कि गांव में पंखा भी नहीं है.

कल शाम ...जून ने उसे सरप्राइज देने के लिए जो बात छुपाई थी उसे सुखद नहीं दुखद सरप्राइज अवश्य दे गयी, पहले उसने कहा था कि एसी के लिए पीएफ से लोन लेना पड़ा है, पर कल कहा नहीं, उतने पैसे पासबुक में ही थे. उसे खुद पर झुंझलाहट हुई, पैसे के मामले में उसे बहुत कम जानकारी है, घर के खर्च से लेकर कोई सामान खरीदना हो तो सारे निर्णय वही करता आया है, सो उसने कभी जानने की भी जरूरत महसूस नहीं की. एक तो यहाँ बाजार जाने का कोई साधन नहीं है, दूसरे सब सामान जब घर बैठे मिल जाता है तो ..
नन्हे की तबियत आज ठीक नहीं थी पर उसके मना करने पर भी वह स्कूल जाने की जिद कर रहा था कि उसका टेस्ट है, अभी इतना छोटा है और टेस्ट की कितनी चिंता है, सचमुच यह नई पीढ़ी उनसे बहुत आगे होगी, पता नहीं स्कूल में कैसे पढाई कर रहा होगा, जून की बायीं कलाई में दर्द है जैसे कुछ माह पहले उसे हुआ था, शायद टीटी खेलने के कारण.. उसने सोचा फोन करके पूछे...
छोटे-छोटे मसलों को वे कितना बड़ा बना लेते हैं...रात भर कैसे सपने आते रहे, क्या हो जाता है ऐसा कि स्नेह की उज्ज्वल धारा कहीं लुप्त हो जाती है. कल बाजार से आते वक्त जून बहुत तेज कार चला रहे थे, नन्हा और वह डर ही गए थे. नन्हा कितना परेशान था घर आकर...उसके कोमल दिमाग पर कितना बुरा असर पहुंचता होगा.








Tuesday, January 1, 2013

पोलियो ड्राप्स - एक बूंद जिंदगी की



Demletza खत्म कर ली है अभी कुछ देर पहले, Ross Poldark  की यह किताब उसे अच्छी लगी. आज दोपहर को सोयी नहीं, किताब का नशा था, किताब के चक्कर में नन्हे को दो कहानियाँ भी नहीं सुनायीं. वह इतना छोटा है और इतना मासूम...कैसे डांट दिया उसने, पर जब वह सोकर उठेगा सब भूल चुका होगा, उसकी सर्दी ठीक हो गयी सी लगती है पर जून अभी ठीक नहीं हुए हैं, साइनस की समस्या है उनको, आज डॉ के पास गए होंगे. परसों दो पत्र मिले उन्हें, एक घर से ननद का, एक सुरभि का, वाराणसी में उनकी गली में गोली चली, कितने तनाव में होंगे वहाँ सभी लोग. सुरभि रक्षाबन्धन तक वहाँ रहेगी, उसने सोचा अगले हफ्ते उसे भी जवाब देगी. इस घर में जब से वे आए हैं वह ज्यादा आराम पसंद हो गयी है, कोई अनुशासन नहीं मानती, जब जैसे मूड हुआ कर लिया. उसे याद आया कल छोटी बहन का जन्मदिन है, उसे कार्ड व पत्र मिल गया होगा, बड़ी बहन का पत्र भी बहुत दिनों से नहीं आया है, वे लोग भारत आए हुए हैं, जरूर माँ-पिता से मिलने गए होंगे. चचेरे भाई, बहन का भी स्मरण हो आया, जिनकी माँ नहीं रही और पिता भी उनका विशेष ख्याल नहीं रखते. उसने सोचा काश ! वह उस बहन के लिए कुछ कर सकती..

आओ कहीं हम चलें
फूल हँसी के खिलें..
रेडियो पर यह गाना आ रहा है
भूल के हर मुश्किलें
आज सजा लो महफिलें..
मौसम आज अच्छा है, बादल और फुहार..अन्यथा इस समय कड़ी धूप निकली होती है. आज बहुत दिनों बाद उसने समुचित व्यायाम किया, पाठ किया, अच्छा लग रहा है, सोचा है अब कुछ पढ़ेगी या लिखेगी. लिखना क्या है यह तो मालूम नहीं, मन एक जगह स्थिर हो तब न कुछ सोचे, मन तो तेज चल रही रेलगाड़ी की तरह दौड़ता चला जाता है...एक पल को भी विश्राम नहीं..फिर विचार रुके कैसें, और उन्हें मथे कैसे. मथे बिना तो सार नहीं निकलेगा. न ही कुछ पायेगी ऐसा, जो सार्थक हो...चलो निरर्थक ही सही...वह भी तभी न जब..पिछले वर्ष की डायरी खोली जब जून से दूर थी, कितना याद करती थी, लम्बे लम्बे खत लिखती थी..और वह भी...अब जब वे पास हैं तो..उनके पास इतने दूसरे काम हैं कि...पर उनके पीछे भी प्यार है न..
कल “असम बंद” था, सो जून और नन्हा घर पर ही थे, दिन भर तीनों ने मस्ती की, खूब कैरम खेला, टीवी देखा, और शाम को एक घंटे के लिए टहलने गए. आकाश पर बदली थी, उनका एसी (एयर कंडीशनर) आज लग जायेगा, जब से उन्होंने खरीदा है, धूप नहीं निकली है.
नन्हा पड़ोस में खेलने गया है, यहाँ उसकी उम्र का एक बच्चा साथ वाले घर में रहता है, दोनों की खूब पटती है. उसकी नैनी अभी तक अस्वस्थ है, जो उनके यहाँ सर्वेंट क्वाटर में रहती है, परसों दोपहर को बताने आई थी कि बुखार हो गया है. उसने पड़ोसिन से कहा है, यदि सम्भव हो तो वह अपनी कामवाली को भेज दे. कल दूधवाला भी नहीं आया, अभी आया तो कहने लगा भूल गया, इतने वर्षों से दे रहा है कल भूल  गया, अजीब लगता है न, लेकिन होता है ऐसा कभी-कभी. नन्हे ने कल पहली बार तिनसुकिया में खिलौने के लिए जिद नहीं की. वे दालें लाए और राखियाँ भी, अगले हफ्ते भेजेगी.

आज सात तारीख है, सुबह-सुबह जून ने उसे शुभकामना दी, लगभग हर सात को वह ऐसा ही करते हैं बशर्ते तिथि याद रहे. उसने घर के बाहर गेट तक के पक्के रास्ते पर ब्लीचिंग पाउडर डलवाया है. नैनी कल से काम पर आ गयी है, जो अव्यवस्था हुई थी सब ठीक हो गयी है, आजकल वे क्लब में टेबल-टेनिस खेलने जाते हैं, बहुत अच्छा लगता है. मौसम फिर बदली भरा है, कल शाम गर्मी कुछ बढ़ गयी थी. रात खूब वर्षा हुई. छोटे भाई का पत्र बहुत दिनों बाद आया है उसके सास-ससुर का एक्सीडेंट हो गया था, लिखा है, अब वे ठीक हैं. नन्हे को पोलियो ड्राप्स देने व डीपीटी का टीका लगवाने अस्पताल ले जाना है, उसे पहले कभी टीके से बुखार हुआ हो याद नहीं, उसने दुआ की इस बार भी नहीं होगा. पर उसके माथे पर गर्मी से तीन दाने निकल आये हैं, उसे दर्द भी होता होगा, पर कुछ कहता नहीं. कल जून ने कम्पनी के हिंदी अनुभाग के पुस्तकालय से हिंदी की पांच-छ पुस्तकें लाकर दीं, लेकिन उसके दफ्तर से आने के बाद वह उन्हें नहीं पढ़ती, वह अगर नन्हे को पढ़ाने में भी व्यस्त रहे तो जून को अच्छा नहीं लगता, सो दोपहर को ही उसका गृहकार्य करा देना चाहती है. “तट की तलाश” उसने कल पढ़ी, एक लड़की की दुःख भरी कहानी. Doctor Sahib  भी लगभग पढ़ चुकी है, Stephen Kerry का अन्तिम तबादला बिहार में हुआ था, उसके बाद तो देश आजाद हो गया था और वह अपने देश चले गए थे. कल दोपहर उसने रवीन्द्रनाथ टैगोर की किताब तीन साथी पढ़ी. शाम को क्लब में एक घंटा खेल कर पसीना बहाया. रात को आतंकवादियों के स्वप्न देखे.