Tuesday, July 17, 2012

भीषण गर्मी शीतल वर्षा


आज सुबह तो नहीं पर दोपहर को समय था लेकिन उसे याद ही नहीं आया कि लिखना है. दिन बेहद गर्म था, बेडरूम में दोपहर को धूप आती है, पर्दे लगाने के बावजूद तपन आती रहती है, सो वे बैठक में सोये, जून ने नीचे कम्बल बिछा दिया था, उसके ऊपर चादर, उसे नन्हें व उसकी भूख, प्यास व नींद का बहुत ध्यान रहता है. शाम को वे किन्ही परिचित से मिलने गए फिर क्लब. दक्षिण भारतीय व्यंजन वहाँ अच्छे मिलते हैं. सोनू वहाँ भी किलोल करता रहा, अपनी अटपटी भाषा में पता नहीं क्या-क्या बोल रहा था. क्लब से आते ही सो गया.

आज दोपहर वह एक चित्र बनाएगी, ऐसा भाव मन में आ रहा है. मौसम कितना सुहाना है, मंद-मंद मधुर पवन और आकाश पर बादल. जून आज बस से दफ्तर गए हैं, सो आने में थोड़ा देर होगी. उसने भोजन बना कर रख दिया है. उसका ध्यान अपनी कमर की तरफ गया, जो आजकल गायब होती जा रही है, नन्हें के होने के बाद ठीक से व्यायाम तो किया नहीं और खुराक ज्यादा. अब नियमित व्यायाम आरम्भ किया है पता नहीं कब फर्क दिखेगा, शायद छह महीनों तक या एक वर्ष बाद, पर कुछ तो करना पड़ेगा ही.
 
आज उसका जन्मदिन है, बहुत दिनों बाद डायरी का स्मरण हुआ है, पर कोशिश रहेगी कि रोज लिखेगी चाहे एक वाक्य ही, जून नेह बरसाते हुए दफ्तर गए हैं. आज उनका हाफ़ डे है. शाम को उन्होंने कुछ जलपान का प्रबंध किया है बस कुछ  ही लोगों के लिये.

कल दिनभर और रात भर की भीषण गर्मी के बाद अब वर्षा की शीतल बौछार कितनी राहत दे रही है. वह कुछ देर पूर्व ही उठकर बाहर आयी है और लगता है जून भी उठ गए हैं, नन्हा सोया है पर दस-पन्द्रह मिनट में ही वह भी उठ जायेगा, कितना प्यारा बच्चा है जब कोई उसे देखकर कहता है तो अच्छा लगता है मन को. कितना हँसाता है वह उन्हें, और कभी-कभी परेशान भी करता है. पर उसका तरह-तरह के चेहरे बनाना और नहीं-नहीं कहते हुए सिर को हिलाना देखते ही बनता है. अभी तक अपने आप चल नहीं पाता है. वर्षा रुक गयी है और दूर से मुर्गे की आवाज सुनाई दे रही है. बंद व घेराव के कारण अब शुक्रवार से पूर्व न तो चिट्ठी मिल सकती है न जा सकती है. माँ-पापा ने खत लिखा तो होगा. नन्हें का जन्मदिन भी निकट आ रहा है. जून शायद अंदर बैठकर कुछ पढ़ रहे हैं या तैयार हो रहे हैं, वह देखने चली गयी.   
 

Monday, July 16, 2012

मार्च में सावन



परसों वे तिनसुकिया गए थे, खूब खरीदारी की. नन्हें के कपड़े, तकिये और भी कुछ वस्तुएं, हैंगर फ्रूट बास्केट आदि. सोनू आजकल उनके साथ ही सुबह उठ जाता है, इस समय सोया है सो उसने डायरी उठाई है, आज फिर बादल हो गए हैं, कल-परसों ही तो धूप निकली थी कई दिनों के बाद. जून कल शाम जोरहाट गए हैं, उन्हें एक सेमिनार में सम्मिलित होना है, देर रात तक लौट आएँगे. पानी अब झमाझम बरसने लगा है, मार्च से ही यहाँ सावन शुरू हो जाता है. जून के न रहने से घर कैसा खाली खाली लग रहा है. कभी-कभी कुछ क्षणों के लिये वे एक दूसरे से रुठ भी जाएँ फिर अपने आप ही मान जाते हैं, क्योंकि अपनी ही हानि नजर आने लगती है.

आज फिर उसे लग रहा है सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया है, तन भी और मन भी. हर बार, हर माह  कहीं कुछ गलत हो जाता है जैसे सिर भारी हो जाता है, आँखें दुखने लगती हैं. कल से नियम से गीता का अध्ययन करेगी तभी फिर से स्थिर हो पायेगी. कल से क्यों, आज से, अभी से क्यों नहीं..यही तो सिखाती है गीता कि हर परिस्थिति में सम रहो, सुख-दुःख, हानि-लाभ, मान-अपमान, यश-अपयश सभी को समान रूप से सहो.

उसने बहुत दिनों तक कुछ नहीं लिखा, अप्रैल का तीसरा हफ्ता है, जैसे-जैसे नन्हा बड़ा हो रहा है उसका सारा वक्त उसकी देखभाल में ही जाता है, कहीं चोट न लगा ले कहीं गिर न जाये यह ख्याल भी हर वक्त मन में रहता है. और कोई काम कुछ दिन न करो तो अभ्यास भी छूट जाता है, कभी वक्त मिला भी तो उसे समझ नहीं आया कि क्या लिखे. नन्हा बहुत प्यारा है पर सोते समय बहुत रोता है कभी-कभी, शायद कुछ दिनों बाद ऐसा न करे, जून आज बैडमिंटन खेलने गए थे, बहुत दिनों बाद खेलने से थकान हो गयी है, वह सोने की तैयारी कर रहे हैं, वह धर्मयुग के पन्ने पलट रही है, पढ़ेगी कल.
 
क्रमशः

Saturday, July 14, 2012

छोटी छोटी बातें



मार्च महीने का आरम्भ हो चुका है. कल इतवार था, उन्होंने कुछ वक्त घर की सफाई में लगाया, कुछ टीवी देखने में और कुछ घूमने में. उनकी प्रिय सड़क जिस पर अमलतास के कई पेड़ हैं, नन्हें के और भी फोटो उतारे. अब रील खत्म हो गयी है, इसी माह बन कर भी आ जायेगी शायद. लंच में वेज पुलाव बनाया और रायता. अभी सुबह ही है, सोनू के लिये अभी दिन नहीं हुआ है, शांत घर में रसोईघर से बूंद-बूंद पानी टपकने की आवाज आ रही है. आज जून को घर से समाचार अवश्य मिलेगा, कितना प्रसन्न होगा वह, और नूना भी उसे प्रसन्न देखकर.
कल रात ही उन्होंने लाउडस्पीकर पर घोषणा सुनी थी पर भाषा समझ में न आने के कारण समझ नहीं पाए थे. सुबह मालूम हुआ कि सुबह सात बजे से शाम सात बजे तक ‘बंद’ है, यानि दफ्तर, बाजार सब बंद. दोपहर के बारह बजे हैं, दोनों सोये हैं, उसे भूख लगी है पर जून के उठने पर ही वे भोजन करेंगे, जो वह अभी बनाने वाली है. आज सुबह से ही तेज हवा चल रही है बाहर.

आखिर चिर प्रतीक्षित पत्र व तार दोनों मिल गए, जून कितना खुश रहता है अब पहले की तरह. कल रात वे बहुत हँसे यूहीं छोटी-छोटी बातों पर, उसके जीवन में कितना रस घुल गया है उसके साथ से, कितना ख्याल रखता है वह उसका और नन्हें का. कल उन्होंने सभी आये हुए खतों के जवाब दे दिए. उसकी एक सखी उसके भाई के शहर जा रही है, उसने उससे कहा है कि वह भैया-भाभी से मिलने जाये वह एक पत्र व छोटा सा उपहार भेजेगी उनके लिये. महीना शुरू हुए चार दिन हो गए हैं पर अभी तक इस माह की तनख्वाह नहीं मिली है, सो दूधवाले, महरी किसी को भी पैसे नहीं दिए हैं.  हिंदी पत्रिका ‘वामा’ में एक प्रश्नावली है लिखना छोड़ वह उसी को पढ़ने व उत्तर देने लगी.

 

Friday, July 13, 2012

कच्चे बेल


कई दिनों से ससुराल के घर से चिट्ठी नहीं आयी है, जून ने तार भेजा है, उम्मीद है सोमवार तक जवाब आ जायेगा. छोटू जैसे-जैसे बड़ा हो रहा है समझ आती जा रही है उसे, ज्यादा ध्यान और समय माँगने लगा है. कल सारी दोपहर और शाम पांच बजे तक वह उसके साथ ही खेलती रही पर वह मान ही नहीं रहा था. इस समय सो रहा है, उसके लिये हरे मटर और फूलगोभी के चंद टुकड़े उबालने हैं. जून तिनसुकिया गया है, घर फोन करने का प्रयत्न किया, पर यह संभव नहीं हो सका, एक टेलीग्राम और भेजा है उसने, वह उदास है इस बात से. इसी हफ्ते पत्र आ जाये तो कितना अच्छा हो. आज सुबह से वर्षा हो रही है, कितना अन्धेरा है उस कमरे में, जहाँ नन्हा सोया है. माँ का पत्र आया है वे लोग यहाँ आएँगे ऐसा लिखा है, शायद मई, जून में या नन्हें के पहले जन्मदिन पर. चाची का पत्र भी आया है बहुत दिनों बाद. आज पहली बार टीवी पर दूरदर्शन में सुबह का नया कार्यक्रम देखा, ‘राजा रामन्ना’ का इंटरव्यू अच्छा था और कन्नड़ गीत भी.

एक नया दिन, सुबह के सात बजे हैं, अभी-अभी जून ऑफिस गया है, रात भर वह कितने सपने देखती रही. वह बैगन के पकौड़े तल रही है पर वे हैं कि खत्म होने को ही नहीं आते. एक बहुत बड़ा सा जुलूस निकल रहा है सड़क पर..कल वह बाजार से दो बेल के फल लायी थी. सोच रही है उसका शर्बत बनाएगी, लेकिन माँ कैसे बनाती थीं उसे याद ही नहीं आ रहा.

वही कल का सा समय है और कल का सा मौसम, कल दोपहर बाद ही बादल एकत्र हो गए और रात भर बहुत बरसे. रात दो बजे बादलों के शोर से नन्हा उठ गया और उसके बाद सोने का नाम ही नहीं, जून ने दूध बनाया वह उसे चुप कराती रही कितनी देर उसे सुलाने का प्रयत्न किया एक बार सोया फिर उठ गया, अब कैसे सो रहा है मस्ती से. पत्र आज भी नहीं आया न ही तार का जवाब, आज हो सकता है जून डाकघर जाकर पता करें. वे बेल तो कच्चे निकले.

 

Thursday, July 12, 2012

जाने भी दो यारों


कल वह आगे नहीं लिख पायी, नन्हा उठ गया फिर सारी शाम उसके साथ ही बीती. आज बापू की पुण्यतिथि है, कभी विचारों में बहुत निकट लगते थे, आत्मीय हों जैसे, आजकल तो याद भी करती है तो सिर्फ दो अक्तूबर और तीस जनवरी को. टीवी पर युवामंच में एक कार्यक्रम हुआ था, ‘युवा पीढ़ी और गाँधी’. अच्छा लगा था उस दिन एक युवा, संजना के विचार सुनकर. गांधीजी की आत्मकथा फिर से पढ़नी चाहिए. आज वह गयी थी अपनी दक्षिण भारतीय सखी के यहाँ, वही कल रखकर गयी थी वह पैकेट, उसने घर पर बनायी थीं दोनों चीजें.
कल माह का अंतिम दिन था, एक माह कैसे बीत गया पता ही नहीं चला, समय तो अपनी चाल से ही चलता है. रात को कुंदन शाह की फिल्म देखी, ‘धुंधले साये’ वही जिनकी “जाने भी दो यारों” देखकर कितना हँसे थे वे. आज से उसने नयी महरी को रखा है, पुरानी का नाम मिनी है, जो थोड़ा गर्म दिमाग की है, देखें कल वह क्या कहती है.
कल जून देर से गए सांध्य भ्रमण को, नन्हा उठ गया सो वह कुछ नहीं लिख पायी. वक्त तो सुबह भी था, दोपहर को भी, धर्मयुग पढ़ती रही, इण्डिया टूडे तो अभी पढ़ना आरम्भ ही नही किया और लाइब्रेरी से भी जून उसके लिये दो किताबें लाए थे. सोनू अब अपने आप वाकर में घूमता है, कभी कभी इतनी तेजी से पूरे कमरे में चक्कर लगाता है और किलकारी भरता है, कि उन्हें डर लगता है, पर वह पल भर में पास से गुजर जाता है.
आज दिन भर धूप आती-जाती रही, ज्यादा समय बादलों की चली. इस समय भी बदली बनी है सो शाम कुछ ठंडी हो गयी है. उसकी आँखों में विशेषतया बायीं आँख में हल्का दर्द है, और दायीं ओर सर में भी थोड़ा, जून कहकर गए हैं कि सो जाये वह चुपचाप, पर वह जानती है नींद कहाँ आयेगी...हाँ यूहीं चुपचाप लेटा जा सकता है, ऐसा मौका कम ही मिलता है शामों को कि अपने आप से मिला जा सके. 
आज तीन पत्र आये, वे हर हफ्ते दोनों घरों पर व हर महीने अन्य सभी को पत्र लिखते आये हैं, हर हफ्ते किसी न किसी का पत्र आता ही है, और सबकी खबर लाता है. कुछ देर पहले वे तीनों घर के बाहर ही कुछ देर टहलते रहे, पश्चिम में आकाश गुलाबी था, और उनके सिर के ऊपर नीला आकाश और रुई के फाहों से सफेद बादल. नन्हा सात माह का हो गया, आज वह देदे, देदे तुतलाकर बार-बार  बोलने की कोशिश करता रहा. उसकी हरकतें देख देख कर वे खूब हँसे.  

क्रमशः

Tuesday, July 10, 2012

कहाँ से आये शक्कर पारे


पिछले तीन दिन वह व्यस्त रही, जून का दफ्तर बंद था, परसों शनिवार था फिर इतवार और सोमवार को गणतन्त्र दिवस. शनि की शाम वे किन्हीं परिचित के यहाँ गए, बहुत सुंदर लगा उनका घर, सजा-सजाया घर था, एक-दो माह बाद वह भी अपने घर के लिये कुछ कलात्मक वस्तुएं खरीदेगी उसने सोचा. इस समय वही पहले की सी शाम है, नन्हा सोया है और जून घूमते हुए लाइब्रेरी गया है. उसी दिन उन्होंने आलू चिप्स बनाये थे, अब तो पूरी तरह सूख गए हैं. सोनू उठकर नीचे कालीन पर बैठ गया है, ठंड कुछ बढ़ गयी सी लगती है, उसको मोज़े पहनाने हैं, टोपी वह पसंद नहीं करता. मुँह से कैसी-कैसी आवाजें निकलता है, बहुत तरह की आवाजें, बच्चे जाने किस मस्ती में रहते हैं. जून ने आज उसे चार बेर लाकर दिए, पहले खट्टे फिर कसैले लगते हैं.

संध्या के सवा पांच बजे हैं, जून रोज की तरह टहलने गए हैं और नन्हा भी किसी स्वप्नलोक में विचरण कर रहा होगा. वह लिखने बैठी है दिन भर की कुछ घटनाएँ. सुबह सामान्य थी, उनके किचन गार्डन में गाजर की फसल बहुत अच्छी हुई है इस बार, पड़ोसन को देने गयी, वह कुकिंग प्रतियोगिता में भाग लेने वाली थी पर देर से पहुंचने के कारण भाग नहीं ले पायी. दोपहर को जून के जाने के बाद उसने कुछ देर स्वेटर बनाया नन्हें के साथ खेला, फिर वह अपना भोजन करके सो गया तो किचन साफ किया, फिर कुछ देर को सो गयी. दोनों उठे तो सवा दो बजे थे, तैयार होकर बाहर घूमने निकले, सोचा टैटिंग का कोई नया डिजाइन लेगी अपनी मित्र से, पर धागा खत्म हो गया था. असमिया मित्र के यहाँ गयी जिसका बेटा नन्हें से मात्र एक माह बड़ा है. वापस आयी तो देखा एक पैकेट पड़ा है, सोचा कोई सब्जी रख गया होगा शायद उनका ही माली. पर आये हैं शक्करपारे और नमकीन, पता नहीं कौन रख गया है. जून और वह अपने सभी परिचितों के नाम गिन चुके हैं. किसी के भी इस तरह का पैकेट रख जाने की सम्भावना नहीं दिखती. 
क्रमशः

नदी तट पर पिकनिक



उसने बहुत दिनों बाद एक पत्र लिखा, उनकी शादी की सालगिरह थी, जून रोज की तरह ऑफिस गए थे. सोचा कुछ तो अलग होना चाहिए, मन में उथल-पुथल मची थी कि ऐसा कुछ लिखे जिससे उसके दिल का हाल वह जान ले. समय कितना जल्दी बीत जाता है, अभी उस दिन की ही तो बात है जब अपने कमरे में बैठकर वह उसका पत्र पढ़ रही थी. और अब तो वह सदा के लिये यहाँ आ गयी है, और उसके बाद आया नन्हा, उनका छोटा सा परिवार बना. उसे लगता है बचपन में वह भी इतना ही प्यारा लगता होगा, गोलमटोल, गोरा-गोरा और गुदगुदा. उसे हँसी आयी कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है मन, उसे याद आये शुरू के दिन उनकी बातें ही खत्म नहीं होती थीं. फिर कुछ दिनों के लिये वे अलग हुए थे वह कितना याद करती थी उसे. उसने सोचा कि वह रोज उसे जल्दी उठने के लिये  कहती है, व्यायाम करने के लिये कहती है, इतवार की सुबह नाश्ते के बाद जब वह फिर से सो जाता है तो टोकती है, साहित्य में रूचि जगाने के लिए कहती है, किताब पढ़ने को कहती है, यह सब पत्र में अच्छी तरह समझा कर लिखा.
आज जून कुछ देर से गया है सांध्य भ्रमण पर, पर माहौल वही है. शाम घिर आयी है, नन्हा सो रहा है, किसी किसी दिन वह खूब सोता है जैसे आज सुबह उठने का नाम ही नहीं ले रहा था, उसे
उठाना पड़ा. पेड़ों की पत्तियाँ देखकर कितना खुश होता है वह. आज सुबह वह कुछ लिखने का प्रयास कर रही थी कुछ लाइनें ही लिख पाई. पंजाब के बारे में रोज वही समाचार सुनते हैं, पढ़ते हैं, हत्या, आतंकवाद ने किस तरह अपने शिकंजे में जकड़ लिया है पंजाब प्रान्त को. क्या सोचते होंगे वहाँ के वासी. उसे अलका की याद हो आयी, उसकी मित्र तथा दीदी की भतीजी जिसकी शादी पंजाब में हुई है. उसने सोचा दीदी से कहकर उसका पता मंगवाएगी पंजाब के कुछ दूसरे समाचार तो जानने को मिलेंगे.
आज नेता जी की ९०वीं जयंती है, कुछ माह पूर्व उसने दो खंडों में एक पुस्तक पढ़ी थी, ‘मैं सुभाष बोल रहा हूँ’, पहली बार मालूम हुआ था कि नेता जी ने वास्तव में कितने साहस के साथ एक महान कार्य का बीड़ा उठाया था. जून आज तिनसुकिया गया है, वह नन्हें के साथ एक सखी के यहाँ गयी थी, वह पूरा एक घंटा चुपचाप खेलता रहा जरा भी परेशान नहीं हुआ. जून ने बताया है कि अगले महीने उसके विभाग के सभी लोग परिवार सहित पिकनिक पर जायेंगे, वे भी जायेंगे किसी नदी तट पर.