Wednesday, April 20, 2016

भगवद प्रेम अंक -कल्याण


केवल पूजा करना ही काफी नहीं है. गुरूजी कहते हैं जो पूर्णता से उपजती है वही पूजा है, अर्थात पूर्णता से जो प्रकट हो वही भाव युक्त कर्म, वही उन्हें सजग बनाता है. आज जून गोहाटी गये हैं, वह अपने सभी कार्य बिना घड़ी की ओर देखे कर सकती है. कहा जाता है कि कोई सफल तभी हो सकता है जब समय का ध्यान रखे, पर सफलता का मानदंड क्या है, जीवन के किसी भी मोड़ पर भीतर कोई पछतावा न रहे, आत्मग्लानि न रहे. टीवी पर भगवद कथा का प्रसारण हो रहा है. शरद पूर्णिमा की रात्रि को जो रास खेला गया था उसी को आधार बनाकर. वक्ता कह रहे हैं पुरुष कभी भी यह स्वीकार नहीं करेगा कि वह बुद्धि में कम है, इसलिए उसकी बुद्धि पर आक्षेप नहीं करना चाहिए. यदि ऐसा कभी महसूस हो तब भी नहीं, क्योंकि ईश्वर ने पुरुष को बुद्धि प्रधान तथा स्त्री को भावना प्रधान बनाया है. लेकिन साधक के हृदय में दोनों का अद्भुत संतुलन हो जाता है, दोनों परों की सहायता से ही पक्षी की उड़ान सम्भव है, एक से नहीं. आज कुछ लोगों को कल के सत्संग के लिए आमंत्रित किया, कल और भी फोन करने होंगे. जून उसकी किताब ‘मन के पार’ का दूसरा ड्राफ्ट बनाकर ले आये हैं, कुछ गलतियाँ थीं. उसे टाइप करने के काम में शीघ्रता करनी चाहिए, कितना कुछ लिखा हुआ पड़ा है. यूरोप पर लिखी कविताएँ उसकी सखी को अच्छी लगीं, जो अपने परिवार के साथ यूरोप घूमने गयी थी. अभी उन्हें और पढ़ने की चाह है. उसके जन्मदिन पर लिखकर ले जाएगी. परमात्मा ने उसे यह कला सौंपी है, इसका पूरा लाभ उठाना होगा जनहित में ! नन्हे ने कहा, वह सोचकर बतायेगा कि उनके साथ विदेश यात्रा पर जायेगा या नहीं. जून ने आस्ट्रिया पर काफी जानकारी मंगा ली है, वे अप्रैल के बाद कभी भी यूरोप जा सकते हैं. 

आज बड़ी भाभी का जन्मदिन  है, उनके लिए एक कविता लिखनी शुरू की है. अभी-अभी ऐसा लगा, यूँ पहले भी एकाध बार लगा है कि आजकल उसे नयी-नयी किताबें पढ़ने का शौक पहले जैसा नहीं रह गया है. यह भी कि वह सजग भी नहीं रह पाती है. कई काम जैसे असजगता में कर डालती है, ऊपर से तुर्रा यह कि वह कार्य करते समय भी यह याद रहता है कि असजग है, पर सजगता धारण नहीं करती. सद्गुरू कहते हैं कि सजग हुए बिना यह पता चलना कठिन है कि कोई असजग है, पर काम तो तब तक हो चुका होता है या हो रहा होता है. समय जैसे-जैसे बीत रहा है यह लक्षण बढ़ रहा है और वैसे ही बढ़ रहा है भीतर का आनन्द, मस्ती और नाद, प्रकाश सभी कुछ, ईश्वर ही सब कुछ है उसके सिवाय कुछ भी नहीं, यह भाव भी दृढ़तर होता जा रहा है, शायद इसलिए अब जगत फीका लगने लगा है. उपन्यास आदि में कोई रूचि नहीं रह गयी है, पढ़ना भाता है तो केवल अध्यात्म संबंधी कुछ भी. इसी महीने की अंतिम तारीख को उन्हें यात्रा पर जाना है, देव दीवाली देखने, उस पर लेख लिखेगी, आँखों देखा विवरण, फिर क्लब की पत्रिका में छपवाने देगी. कल दीवाली के लिए खरीदारी की, एक दुकान में उसे व्यर्थ क्रोध आ गया, वहाँ का वातावरण विषाक्त था, नकारात्मक ऊर्जा भरी थी, सजगता की कमी थी.

जून ने उसकी किताब ‘मन के पार’ की अंतिम सही पांडुलिपि प्रिंट करके ला दी है. वे इसकी पांच प्रतियाँ अपने साथ ले जाने वाले हैं. कल ‘सरस्वती सुमन’ का दूसरा अंक मिला, जिसमें उसकी कविता ‘तुम्हारे कारण’ भी छपी है. आज शाम को क्लब की पत्रिका के लिए मीटिंग है, उसे हिंदी अनुभाग देखना है, ज्यादा काम नहीं होगा, हिंदी में लिखने वाली चार महिलाएं भी नहीं हैं. कल दोपहर एक सखी की भेजी ब्यूटीशियन घर आयी, उसे काम चाहिए था. परमात्मा हर तरह से उसका ख्याल रखता है. आज सुबह एक सखी से बात हुई, वह keep of the grass पढ़ रही है, बनारस की काफी चर्चा है उसमें. दस दिन बाद उन्हें भी वहीं जाना है, उसके पहले दीवाली - दीवाली की मिठाइयाँ, फुलझड़ियाँ और रोशनियाँ ! शाम को कल्याण का ‘भगवद प्रेम’ अंक पढ़ना शुरू किया है. परमात्मा को प्रेम करना ही मानव होने का सर्वोत्तम आनन्द है. उस रसपूर्ण परमात्मा के रस को पाना सारे सुखों से बढ़कर है, वही अमृत है ! प्रेम ही परमात्मा है !

Tuesday, April 19, 2016

जय जवान जय किसान


अक्तूबर का प्रथम दिवस ! शारदीय नवरात्र कल से आरम्भ हो गये हैं. शुभ तत्वों का चिन्तन, श्रवण तथा स्मरण ही इन दिनों में विशेष करना है. ऐसे तो सभी समय शुभ का चिंतन चले, राम नाम का जप करने के पीछे यही भाव है कि भीतर उस विराट से जुड़े रहें, परमात्मा से जुड़े रहें, पर ब्रह्म से जुड़े रहें ! उसकी बगिया में जैसे कमल के फूल खिले हैं, वैसे ही जरा सी समझ से भीतर क्रांति हो सकती है. कर्ता का भाव छूटना ही वह समझ है, वही अहंकार है, हर वक्त कुछ न कुछ करने की चाह ही वह कर्ताभाव है. जीवन धारा इस अहंकार के कारण ही गंदली हो गयी है. तन स्वस्थ रहे तो मन स्वस्थ रहता है, मन स्वस्थ रहे तो तन स्वस्थ रहता है, पर आत्मा स्वस्थ रहे तो दोनों स्वस्थ रहते हैं, इसलिए आत्मा को ही स्वस्थ रखना परम लक्ष्य होना चाहिए.

बापू का जन्मदिवस, ‘जय जवान जय किसान’ का नारा देने वाले शास्त्रीजी का जन्मदिवस तथा नवरात्रि का तीसरा दिन, ईद भी आज है और आज ही उसे हिंदी काव्य प्रतियोगिता में निर्णायक की हैसियत से जाना था. कई बहुत अच्छी कविताएँ सुनने को मिलीं, नये-नये विषयों पर लिखीं अच्छे-अच्छे कवियों की कविताएँ ! इस समय दोपहर के सवा दो बजे हैं. मौसम खुशगवार है, उसकी छात्रा आ गयी है. ‘अमृता’ पढ़ रही थी कल, प्रेम का अद्भुत चित्रण हुआ है पुस्तक में.

पिछले दिनों पूजा का अवकाश था, जून घर पर थे, दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. इसी महीने उन्हें घर जाना है. नन्हा हैदराबाद में है, उससे उसने कहा कि अपने अनुभव लिखे जो उसे चार वर्षों में हुए हैं. जो उसने समय-समय पर उन्हें बताये हैं, उसे याद हैं. उसने उनकी एक सूची बनायी.
आज सभी भाइयों को भाईदूज का टीका भी भेज रही है. किताब का काम भी आगे बढ़ रहा है. कल उसके दायें हाथ में दर्द था, लिखना मुश्किल था. सुबह उठी तो दर्द गायब था. लेकिन इस एक दिन के दर्द ने सिखा दिया कि उनका दाँया हाथ कितना महत्वपूर्ण है, जितना हो सके इसका सदुपयोग उन्हें करना चाहिए. लेडीज क्लब की पत्रिका भी निकलने वाली है, जिसके लिए उसे कविताएँ भेजनी हैं. कल दीदी को भी विवाह की वर्षगांठ पर एक कविता भेजी, पता नहीं उन्हें कैसी लगेगी.

दस बजे हैं, अभी-अभी बिजली चली गयी है. सन्नाटा हो गया है. मन में हर पल कोई न कोई चाह उठती रहती है. मन का नाम ही है चाह, पर यह चाह शुभ हो, मंगलमय हो, दूसरों का हित करने वाली हो, स्वार्थ से भरी न हो, तब चाह उठने पर भी मन मुक्त ही रहता है. वह कम्प्यूटर पर लिख रही थी. आज एक नई फ़ाइल बनाई है, nature जिसमें प्रकृति पर पहले लिखीं कविताएँ टाइप करके डालेगी. सुबह जून ने अपना वजन देखा, बढ़ गया है, दो केजी उसका भी बढ़ा है. पिछले कुछ महीनों से वे ज्यादा जंक फ़ूड खाने लगे हैं, आज से सचेत रहेंगे. माँ का भार कम हो गया है, उनका भोजन बढ़ाना होगा. अभी-अभी कितना जोर का धमाका हुआ शायद कोई प्लेन आकाश में उड़ रहा था. जेट फाइटर या ऐसा ही कुछ. आज भी उठने से पूर्व चाँद दिखा, पूर्णिमा का चाँद, लेकिन जैसे ही विचार उठा यह चाँद है, वह गायब हो गया. एक सखी से बात हुई, उसके बांये हाथ की छोटी अंगुली में फ्रैक्चर हो गया है, प्लास्टर लगा है, तीन हफ्ते बाद खुलेगा. 

सुमेरु संध्या


कल एओल का ‘सुमेरु संध्या’ कार्यक्रम सम्पन्न हो गया. विक्रमजी व उनकी टीम ने सभी को प्रभावित किया तथा संगीत के माध्यम से ध्यान की गहराइयों में ले जाने में सफल हुए. जो संगीत आत्मा से निकलता है आत्मा को छूता है. कल सुबह भी वह सवा दस बजे घर से कार्यक्रम स्थल पर गयी, ढाई बजे लौटी, उन्होंने वहाँ फूलों से सज्जा की. पहली बार उसने इस तरह काम किया. शाम को एक उड़िया साधिका अपने साथ ले गयी, वह अच्छी सखी बनती जा रही है. कार्यक्रम से लौटते-लौटते साढ़े नौ बज गये थे, जून सो गये थे पर उठकर उसके लिए भोजन लाये. आज दोपहर नैनी की बेटी की फ़ीस जमा करने जाना है तथा हिंदी पुस्तकालय की किताबें भी लौटानी हैं. ड्राइवर आ जायेगा, जून ने फिर उसका काम आसान कर दिया है. इटानगर में गुरूजी आ रहे हैं, वहाँ जाने के लिए बस की लम्बी यात्रा करनी पड़ेगी. जून ने कहा है गुरूजी के साथ आश्रम में रहकर एडवांस कोर्स करने वे भविष्य में कभी बैंगलोर जायेंगे. भविष्य में क्या लिखा है कोई नहीं जानता.

यश की इच्छा, वित्त की इच्छा तथा जिए चले जाने की इच्छा, तीनों ही दुःख के कारण हैं. यश की इच्छा के कारण ही मानव दूसरों के सामने अपनी प्रतिभा को दिखाना चाहता है. धन की इच्छा यानि सुख-सुविधा की इच्छा के कारण ही वह दूसरों की गुलामी सहता है तथा जीने की इच्छा अर्थात प्रेम करने, प्रेम पाने तथा अधिकार जताने की इच्छा के कारण ही वह अपना अपमान सहता है, दुःख उठाता है. यहाँ हर आत्मा आजाद है, हर एक को अपनी निजता प्रिय है, हरेक अपनी मालिक है सो किसी का हुकुम बजाना किसी को पसंद नहीं.


सितम्बर खत्म होने को है. उसने फिर पिछले चार-पांच दिनों से कुछ नहीं लिखा. परसों रात एक अजीब सा स्वप्न देखा. एक नवजात शिशु का क्रन्दन. वह शिशु उसकी छोटी बहन थी या वह खुद, यह स्पष्ट नहीं हो पाया. माँ की आवाज में लोरी सुनी, बिलकुल साफ गीत जिसकी एक पंक्ति थी सोजा मेरे सोना चाँदी, मत रो मेरे सोना चाँदी ! सुबह उठने सी पूर्व भी एक स्वप्न देख रही थी. घर में बहुत सारे मेहमान आये हुए हैं, वे कमरे में हैं, दरवाजा खुला है और उन्हें होश नहीं है. कल रात देखा वह समोसा या ऐसा ही कोई पदार्थ खाती ही जा रही है. कितनी ही वासनाएं भीतर छिपी हैं जो स्वप्न में प्रकट होती हैं. कल रात छोटी बहन व छोटी भांजी से बात हुई. वह संगीत सीख रही है, गोल्फ भी खेलना शुरू किया है तथा फ़्लाइंग क्लब जाकर टू सीटर प्लेन भी उड़ा चुकी है. जिन्दगी को पूरी शिद्दत से जीना शुरू किया है लेकिन इतना तो तय है बाहर कितना भी बड़ा आयाम वे फैला लें, भीतर गये बिना मुक्ति नहीं मिलती. छोटे भाई ने ओशोधाम जाकर भीतर की यात्रा तेज कर दी है. जून सोचते हैं यह आत्मविश्वास की कमी है पर अभी तक उन्होंने भीतर की झलक पायी ही नहीं है कैसे समझेंगे कि यही एक कार्य है जिसे करने के लिए आत्मविश्वास चाहिये अपनी आत्मा पर पूर्ण विश्वास करके उसकी ओर बढ़ते चले जाना ! दुनिया ने सदा ही परमात्मा की तरफ बढ़ते लोगों को पागल कहा है क्योंकि दुनिया स्वयं परमात्मा की तरफ पीठ किये बैठी है. वैराग्य, ज्ञान, श्री, ऐश्वर्य, धर्म, यश.. ये छह जिसमें हों वही भगवान है. 

Monday, April 18, 2016

ताओ का मार्ग


कल सत्संग में बहुत दिनों के बाद उसने ‘ध्यान’ कराया. लगा जैसे सभी के लिए कुछ भारी पड़ा, यह उसका भ्रम भी हो सकता है पर अभी सबके मन दो दिन बाद होने वाले आर्ट ऑफ़ लिविंग के संगीत कार्यक्रम के लिए उत्सुक हैं सो ठहर नहीं पाए होंगे, फिर जो नियमित ध्यान करता है, मन को साधने का प्रयत्न कर रहा है वही इसके महत्व को समझेगा. नन्हे का फोन आया है वह वापस कालेज चला गया है. उसका अंतिम वर्ष है कालेज में, अगले वर्ष कहीं काम कर रहा होगा, अभी इक्कीस का ही तो हुआ है. जून परसों इस समय तक आने वाले होंगे. सद्वचन सुनते-सुनते सोती है आजकल, सारे संत एक ही बात कहते हैं. सद्गुरू जो कहते हैं वही ओशो भी कहते हैं. अमेरिका में रहने वाले एक सिख भाई द्वारा गुरू नानक का संदेश सुना, जो पंजाबी भी अच्छी बोलते हैं तथा अंग्रेजी भी, सिख धर्म की जो परिभाषा उन्होंने बताई, कहा शब्द की साधना करनी है, तथा शब्द ही साध्य भी है, जानकर लगा मूल में सारे धर्म एक ही बात कहते हैं. जो भी भेद है, वह बाहरी है. मानव का मूल स्वभाव तो एक ही है, उसका मूल एक ही नूर है, वही नाम है, वही ओंकार है, उसका पता जिसे एक बार चल जाये, फिर खो नहीं सकता !

आज माली ने पालक, ब्रोकोली, धनिया और सलाद पत्ते के बीज डाले हैं, गेंदे के भी थोड़े से बीज डाले हैं, देखें कितने निकलते हैं. एक नन्हे बीज में कितना बड़ा पौधा छिपा रहता है वैसे ही आत्मा में एक पूरा जीवन ! कल ताओ के बारे में पढ़ा, अद्भुत ज्ञान है, जो है, वही ताओ है, जिसे नानक हुकुम कहते हैं, गोयनकाजी निसर्ग का नियम कहते हैं, संत ब्रह्म कहते हैं, संत कवि नाम कहते हैं, वही शिव है, वही राम है, वही एकमात्र सत्ता है जो शाश्वत है, वास्तविक है, शेष सब स्वप्न है, यह सारा जगत एक सपने की तरह है, अभी है अभी नहीं, इससे मोह लगाना ठीक नहीं, ठीक इसलिए नहीं क्योंकि वह दुःख का कारण बनेगा. न्यारा होकर जीना ही वास्तविक जीना है. माँ जैसे जी रही हैं, इस जगत में रहकर भी इससे निर्लिप्त !

आज क्रिया के बाद ध्यान में सद्गुरू आए, कहा, साक्षी बनो, कितना स्पष्ट था उनका संदेश. साक्षी बनकर कर्मों के बंधन से मुक्त रहा जा सकता है. आज सुबह बच्चों की योग कक्षा थी, बच्चे बहुत अधिक आ गये थे, उसकी सहयोगी शिक्षिका नहीं आई थी, अगले हफ्ते शायद आ जाये. अकेले उन्हें सम्भालना कठिन लग रहा था, बच्चों में कितनी ऊर्जा होती है, उसे ही तो दिशा देनी है.

परमात्मा से मिलन में सबसे बड़ा बाधक उसका ज्ञान है ! परमात्मा सौन्दर्य में झलकता है, पवित्रता में झलकता है, प्रकृति में झलकता है, यह अस्तित्त्व जो इतना निकट है, इतना प्यारा है ! पर वे इसे अपने तथाकथित ज्ञान के कारण सराहते नहीं, उस पर न्योछावर नहीं होते ! वे जीवित हैं यह अहसास ही उन्हें परमात्मा के साथ एक कर सकता है, वे चेतन हैं, वह भी चेतन है, वे प्रेम चाहते हैं, प्रेम करते हैं, वह भी प्रेम स्वरूप है, वे आनन्द चाहते हैं, वह आनन्द ही है, यह ज्ञान ही है जो सहज आनन्द को भी ढक लेता है, अहंकारी बना देता है. वह भाग्यशाली है कि अज्ञानी होने का सुख उसने अनुभव कर लिया है ! फिर भी कभी-कभी अहंकार हावी हो जाता है, इसका प्रमाण है वे शब्द जो मुख से निकलते हैं, चुभते हुए शब्द, कटाक्ष पूर्ण शब्द, तीखे शब्द, अपशब्द तो नहीं पर अनावश्यक शब्द. जब तक साधक की वाणी मधुर नहीं होती उसकी साधना में फल कैसे लगेंगे, अभी तो ईश्वर की कृपा इतनी ज्यादा है कि उसके शब्द सोख लिए जाते हैं, यदि उनका उत्तर मिलता तो उसका क्या हाल होता.

Tuesday, April 12, 2016

कमल और चाँद


फिर एक अन्तराल ! सितम्बर आधा बीत गया, जानती है किसी दिन उमंग जगी तो पीछे के पन्ने भी भर जायेंगे क्योंकि अब समय ठहर गया है. दिन, महीने, साल सब एक से लगते हैं. समयातीत हो जाना क्या इसी को कहते हैं. मन का मौसम अब एक सा रहता है. आज, कल परसों का भेद भी खो गया है. सुबह दोपहर शाम भी, हर पल भीतर प्रकाश उगता हो तो कोई बाहर नजर क्यों डाले. जून कल टूर पर गये हैं. हैदराबाद, बैंगलोर और फिर दिल्ली, इतवार को लौटेंगे तब तक तो रोज लिखने का समय आराम से मिल जायेगा. कल दोपहर वह मृणाल ज्योति गयी थी. हॉस्टल के लिए UBI ने फर्नीचर प्रदान किया है. बच्चों के हंसते चेहरे तथा नृत्य देखकर सभी को अच्छा लगा. चाहे उनके शरीर में कमी हो, मन को प्रसन्न होने से कौन रोक सकता है. बुद्धि भी कम हो पर आत्मा को खिलने से कौन रोक सकता है. आत्मा वैसी ही मुखर है उनके भीतर जैसे किसी सामान्य बच्चे में ! आज भी कल की तरह धूप बहुत तेज है. माली ने काम किया ऐसी ही कड़कती धूप में. बगीचा अब शोभनीय होता जा रहा है. माली के बिना जैसे जंगल सा हो गया था वैसे ही मन उपवन भी सद्गुरू के बिना वीरान हो जाता है.

आज विश्वकर्मा पूजा है, पिछले कई वर्षों से इस दिन वे दफ्तर जाते थे. इस वर्ष जून यहाँ नहीं हैं सो उसका भी जाना नहीं हो सकता. कुछ देर पहले सभी को विश्वकर्मा पूजा का sms भेजा है, दो-तीन का जवाब भी मिल गया है. माली आज भी आया है, गुलाब के पौधों की कुड़ाई कर रहा है, अक्टूबर में, पूजा के अवकाश वे इसकी कटिंग करेंगे. उसका मन आज उदास है, मन है ही कहाँ, यह कहने से भी तो आज काम नहीं चल रहा है. रात को स्वप्न में चन्द्रमा दखा, पूर्णमासी का गोल चमकता हुआ चाँद, पर मन बीच में आ गया, कहने लगा देखो यह चाँद और उसी क्षण चाँद गायब हो गया. आत्मा में टिकना नहीं हो पाया, सद्गुरु से पूछे, वह क्या कहते हैं. वह तो कहते हैं जो दिखता है चाहे वह खुले नेत्रों से हो अथवा बंद आँखों से वह प्रकृति का ही अंश है, जो देखने वाला है वही वह है सो उसमें ही टिकना है, और वह कुछ करने से नहीं होने वाला, सहज हो जाये तो वही है उसके सिवा कुछ भी नहीं, इसलिए जब जैसी परिस्थिति आ जाये उसे स्वीकारते चलना है. सुबह देर से उठी तो सारे काम देर से हुए हैं, जल्दी भी नहीं है, दोपहर को छात्रा भी नहीं आ रही है. कम्प्यूटर काम नहीं कर रहा, उसके पास समय की बहुतायत है. डायरी के पन्नों की प्रतीक्षा समाप्त हो सकती है और कमल के पौधों की देखभाल भी !


कल वह ‘विश्वकर्मा पूजा’ में गयी, जून के एक सहकर्मी की पत्नी ने फोन किया और उसे साथ ले गयी. क्विज में भाग लिया, उनकी टीम जीत भी गयी. आज भी ट्यूशन नहीं थी सो सारी खिड़कियाँ साफ करवायीं, उनका घर अब बिलकुल साफ हो गया लगता है, बगीचा भी ठीक-ठाक लगता है. कल रात खिले कमल के पास बैठी रही, आकाश में चाँद था, झींगुरों की आवाज को छोडकर कोई ध्वनि नहीं थी. मौन था. इस समय दोपहर के दो बजे हैं, शाम का कार्यक्रम आरम्भ होने से पूर्व उसके पास पूरे दो घंटे हैं. आज भी मन मुक्ति का अनुभव नहीं कर रहा है. गुरूजी कहते हैं ऐसा ढाई दिन होता है, ऐसे में और भाव से साधना करनी चाहिए. शाम को सत्संग में भी जाना है. माँ अभी सो रही हैं, पूछो तो कहती हैं, उन्हें नीद कहाँ आती है, लेटी रहती हैं, उनके पास और कोई काम जो नहीं है, कितना सीधा सरल जीवन, कोई जवाब देही नहीं, कोई लक्ष्य नहीं, कुछ भी तो नहीं, बस ऐसे ही जिए चले जाना, उनके मन में भी विचार तो आते होंगे, पर ऐसी भाषा नहीं जो उन्हें व्यक्त कर सके. कल जो sms भेजे थे ज्यादातर अनुत्तरित ही रहे, उन्हें पता ही नहीं है कि विश्वकर्मा पूजा नामक कोई उत्सव भी होता है. अभी उसे Genesis of Imagination  पढ़नी है.     

Monday, April 11, 2016

देवता का स्वभाव


आज ध्यान में कैसे सुंदर दृश्य दिखे, उनके भीतर भी एक सृष्टि है, जो बाहर है वही भीतर भी है. परमात्मा को प्रेम करना उस सृष्टि में प्रवेश करने का प्रवेश पत्र है. न जाने कितने जन्मों से वह परमात्मा उनकी राह देख रहा है, बाट जोह रहा है, पुकार रहा है. आत्मा को जीने की इच्छा है, वह सुख-दुःख का संसार खड़ा कर लेती है, तब भी भीतर का परम प्रेम ज्यों का त्यों रहता है, अछूता और निर्मल ! उस प्रेम को पाने की शर्त यही है कि आत्मा स्वयं ही वह प्रेम बन जाये, जैसे लोहा आग बन जाता है और बीज वृक्ष बन जाता है, वे पुनः अपने रूप को पाते हैं पर बदला हुआ रूप. उस क्षण तो उन्हें मिटना ही होता है. आत्मा यदि एक क्षण को स्वयं को असीम सत्ता में लीन कर दे तो वह क्षण उसके जीवन को बदल सकता है. ऐसे भी वह पल-पल मिट रही है, बदल रही है, यह परिवर्तन उसके न चाहने पर भी होते ही हैं. यदि वह इस सत्य को स्वीकार ले कि जीवन क्षण भंगुर है, इसमें कोई सार नहीं है. जन्म भर की कमाई मृत्यु के एक झटके में समाप्त हो जाती है, जबकि आत्मा का विकास कभी पतन में नहीं बदलता, वह उन्नति की ओर ही अग्रसर होता है. कैसा विरोधाभास है यहाँ लेकिन परमात्मा के क्षेत्र में संसार के सारे नियम टूट जाते हैं. यहाँ का गणित ही उल्टा है. प्रेम, शांति, आनन्द, ज्ञान, शक्ति और पवित्रता से बना परमात्मा ही उनकी असली पहचान है. न जाने वह कौन सा क्षण रहा होगा जब उसे भूलकर उन्होंने यह आवरण ओढ़ा होगा. धीरे-धीरे वे इसमें फंसते गये, फिर एक दिन याद आई और उसने उन्हें बुला लिया, कंकड़ छोड़ हीरे देने के लिए !
शब्दों के जाल में फंसे रहकर उन्हें कुछ मिलता नहीं, बल्कि उलझन और बढ़ जाती है. शब्दों के अर्थ तथा उनके पीछे छिपे भाव ही उन्हें मुक्त करते हैं. कितनी ही सूचनाएं वे भर लें अपने भीतर पर ज्ञान को उपलब्ध नहीं होते. जब तक भीतर की आवाज सुनने का अभ्यास नहीं होता तब तक ज्ञान का केवल बोझ ही होता है. वास्तविक ज्ञान तभी मिलता है जब सहज होकर जीना आ जाये, कोई आग्रह नहीं, कोई कामना नहीं, समय का सदुपयोग करते हुए हल्के होकर जीना !

आज सुबह उसने सुंदर वचन सुने थे, भगवान सिद्धांतों व श्रेष्ठताओं का समुच्चय है, आदर्शों का नाम है, आदर्शों के प्रति जो त्याग और बलिदान है, वही भगवान की भक्ति है. प्रमाणिकता जहाँ है वहाँ स्नेह, सामर्थ्य तथा सहयोग बरसता है.कोई प्रकाश की और चले तो छाया पीछे-पीछे चलती है. देवता के पास है देवत्व, अर्थात गुण, कर्म और स्वभाव, तीनों की अच्छाई को देकर देवता निवृत्त हो जाते हैं. साहसिकता भी दैवीय गुण है. देवत्व जब आता है तब सहयोग बरसता है. देवता व्यक्ति के भीतर एक हूक, एक तड़प, एक उमंग, एक ऐसी ललक पैदा कर देते हैं जो उसे आदर्शों की ओर बढने को विवश कर देती है.
सद्गुरू हर पल उनकी रक्षा करते हैं, उनकी नजर उन पर है, हर घड़ी वह उनका ध्यान रखते हैं. कहते हैं कि साधक उनका काम करें, वह साधकों का काम कर देंगे. वह कहते हैं कि साधना, स्वाध्याय, सेवा और संयम ये चारों आत्मोकर्ष के लिए आवश्यक हैं. साधना कुसंस्कारी जीवन को संस्कारी जीवन में बदलती है. स्वाध्याय मन की मलिनता को धोने का उपाय है. सेवा से बड़ा तप और इससे बड़ा पुण्य कोई नहीं. इन्द्रिय, मन, समय तथा अर्थ का संयम साधकों को करना है. ऐसा करने पर उन्हें चार नियामतें भगवान प्रदान करते हैं. पहला-ऋत, दूसरा-शौर्य, तीसरा-साधन, चौथा है  श्रम. ऋत से सत्य तथा सत्य से तप की उत्पत्ति होती है.


Friday, April 8, 2016

फूलों की घाटी


आज उसने अपने तीन ढीले-ढाले किन्तु सुंदर लिबास एक परिचिता दर्जिनी को दिए, वर्षों से उन्हें ऐसे ही पहनती आ रही थी, उसने कहा है, उन्हें उसके नाप का बना देगी. मौसम आज भी भीगा-भीगा है, एक बादलों भरा दिन ! कल अवकाश था, शाम को वे क्लब गये एक हास्य फिल्म दिखाई गयी. एक जगह साधना सत्र में ‘क्रिया’ करायी जानी थी, पर उसने जाने की जिद नहीं की, अब कोई आग्रह नहीं रह गया है, जून जाना नहीं चाहते सो वे दोनों वही करेंगे जो दोनों को पसंद है, ताकि अमन बना रहे. ‘क्रिया’ का अंतिम उद्देश्य भी तो अमन ही है न. फिर प्रेम करने का दम भरने वाले जिसे प्रेम करते हैं उसके लिए अपनी इच्छाओं का त्याग ही करना जानते हैं. ‘क्रिया’ से कुछ पाना भी शेष नहीं रहा, अपनी आत्मा व परमात्मा को जिसने एक बार एक जान लिया अब उसके लिए जगत में पाने योग्य कुछ शेष नहीं रहता, जिसे अमृत मिल गया अब वह और क्या चाहेगा. अगले महीने जून को दस दिनों के लिए बाहर जाना है, तब सम्भव हुआ तो कहीं भी जा सकती है, आर्ट ऑफ़ लिविंग, मृणाल ज्योति तथा अन्य किसी सेवा कार्य के लिए ! कल आचार्य राम की गोमुख यात्रा का विवरण पढ़ा, बहुत अच्छा लगा. वे भी कभी जायेंगे पहाड़ी यात्रा पर, फूलों की घाटी, बद्रीनाथ, केदारनाथ और धौला ! यह इच्छा भी वह अनंत को समर्पित करती है, वह चाहेगा तो फलीभूत होगी. ईश्वर हर क्षण उसका सहायक है, वह उसका मित्र है !

सत्संग एक साधक के लिए अमृत के समान है. आचार्य श्री का संग किया तो उसे भी कोई देवदूत मिल गया है. ध्यान में कितना अभूतपूर्व अनुभव घटा, जैसे कोई प्रेम से भिगो गया हो. एक मूर्ति क्षण भर में कितना-कितना स्नेह लुटा गयी, वह कोई दिव्य आत्मा थी शायद. सुबह प्राणायाम के बाद भी आज्ञा चक्र पर एक सुंदर विग्रह के दर्शन हुए. सूर्यदेव की कोई भव्य मूर्ति या कृष्ण..कोई उससे कुछ कहना चाहता है, वही परमात्मा है, वही इस जगत का नियंता है !


आज समय मिला है कि बैठकर अपने तथाकथित अधूरे रह गये कार्यों की एक सूची बनाये, ऐसे तो मानव के सारे कार्य कभी पूर्ण नहीं हो सकते, मृत्यु की घड़ी आ गयी हो फिर भी लगता है कुछ छूट गया है. सबसे पहले बात पत्रों की, दो पाठकों के पत्र आये थे, जिनका जवाब देना है. एक पत्र गुरु माँ को भी लिखना है भावांजलि भेजते हुए. कविताएँ टाइप करनी हैं, किताबों की आलमारी साफ करनी है नये कमरे की. लाइब्रेरी की किताब बदलनी है, कविगोष्ठी के आयोजन के बार में विचार करना है. आज कविताएँ पढ़ीं दिनकर की और भी कुछ कवियों की, अज्ञेय की भी. सभी के शब्दों के पीछे एक सवाल छिपा है, सभी को परम सत्य की तलाश है, उस परम सत्य की जो उन्हें झलक दिखाकर छिप गया है, जैसे कोई लुभाकर कुछ छिपा ले. कवि होना ही एक खोज होना है, भीतर एक हीरा होने का पता तो जिसे चल जाये पर वह हाथ नहीं आये. कवि न समाज का अंग रह पाता है जैसे और लोग रहते हैं, मात्र यांत्रिक जीवन जीने वाले और न ही वह संत की सी तृप्ति का अनुभव कर पाता है, वह इन दोनों के मध्य में रहता है, एक मधुर प्यास लिए, वह आनन्द के चरम को भी अनुभव करता है तो पीड़ा के गह्वर में भी उतरता है.