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Friday, September 7, 2018

कमल कुंड



शाम के चार बजकर बीस मिनट हुए हैं. जून अभी कुछ देर में आने वाले होंगे. मौसम गर्म है. टीवी पर प्रधानमंत्री तमिलनाडु के एक परमाणु ऊर्जा केंद्र को राष्ट्र को समर्पित कर रहे हैं. कुडनकुलम के इस केंद्र को बनाते समय उसका विरोध हुआ था, पर विकास की धारा को कौन रोक सकता है. ओलम्पिक खेलों में भारत के लिए आज अच्छा दिन रहा है. हाकी टीम ने अर्जेंटीना को हराया है. सुबह साढ़े चार बजे उठे वे, बाहर लॉन में कुछ देर टहले, आजकल दूर तक टहलने नहीं जा रहे हैं. जून को डाक्टर ने मना किया है. नौ बजे एक योग साधिका ध्यान के लिए आती है. उसे ध्यान के बारे में समझा सकी, उस वक्त जैसे कोई भीतर से अपने आप बोलने लगता है, परमात्मा हर क्षण उनके साथ है ! समय कितना बदल गया है. जो मित्र होते हैं, वही एक समय शत्रु बन जाते हैं फिर वही मित्र बन जाते हैं. कर्मों की गति अति गहन है. विचित्र है अस्तित्त्व की लीला, कर्मों का हिसाब-किताब पूर्ण होता है तो शुद्ध प्रेम का प्रवाह होने लगता है. सुबह बगीचे से ढेर सारी भिंडी मिली. चार नारियल भी तोड़े हैं, नारियल पानी के लिए. स्कूल में बच्चों को ध्या कराया, अब वे ठीक से करना सीख गये हैं, कुछ क्षणों में शांत हो जाते हैं. पिछले दिनों एक दुखद घटना भी हुई, पूसी शाम को सड़क पर निकल गयी, और किसी वाहन से टकरा कर आहत हो कर किसी और दुनिया में चली गयी. चंद महीनों का ही उसका साथ था पर उसे बहुत दुःख हुआ. नन्हे को जब पता चलेगा उसे भी बहुत दुःख होगा. जीवन सुख-दुख दोनों के तानों-बानों से बुना है. नैनी आज और राखियाँ बनाने के लिए सामान ले गयी है. अभी तक लगभग साठ राखियाँ बन गयी हैं.

शाम के पांच बजे हैं, जून अभी-अभी आये हैं. बड़ी ननद की राखी आज मिल गयी, उसने लिफाफा खोल कर देखा, शायद कोई पत्र हो, पर कुछ भी नहीं है, एक पंक्ति भी नहीं. पत्र लिखने का संस्कार छूटता ही जा रहा है. आज बाहर धूप तेज है. कमल कुंड में पानी का स्तर फिर घट गया है, शायद नीचे तले या दीवारों के सीमेंट में छेद हो गया है, जल रिसकर भूमि में जा रहा है. ताल खाली करवा कर ठीक करवाना होगा. यह कार्य तो सर्दियों में ही ही सम्भव होगा, जब पत्ते कम हो जाते हैं और फूल नहीं खिलते. आज बाल्मीकि रामायण में अयोध्या की स्त्रियों के विलाप के बारे में लिखा. कवि की दृष्टि कितनी सूक्ष्म है, उनके दुःख का कितना सजीव वर्णन उन्होंने किया है. आज फिर ताओ पर प्रवचन सुना. जब ताओ था तब मन्दिर नहीं थे, पूजा भी नहीं थी, नीति का निर्धारण भी नहीं था. सहज ही सब धर्म को धारण करते थे. परमात्मा अनुपम है. भीतर उसकी रश्मिया प्रवाहित होती महसूस होती हैं. पूसी की स्मृति अब दुःख देती प्रतीत नहीं हो रही, नियति को यही मंजूर था. इन्सान का मन समय के साथ-साथ बदलता रहता है. यदि उसके पास भूलने की क्षमता न हो तो मन कितना भारी हो जाये. ध्यान के द्वारा मन को प्रतिपल नया रखना आना चाहिए. ज्ञान के द्वारा जीवन के रहस्यों को आत्मसात करन भी ! आज बंगाली सखी से बात की, वह अगले माह घर जा रही है, पूजा में केरल. क्लब की सेक्रेटरी से बात की, वह गोहाटी जा रही है, पड़ोसिन से बात हुई, वह परसों कोलकाता से आई हैं. यात्रा जीवन का एक अभिन्न अंग है. उड़िया सखी से बात हुई, वह राखी पर उसके साथ मृणाल ज्योति जाएँगी. दो दिन बाद जून का जन्मदिन है, शाम को छोटी सी पार्टी होगी. दोपहर को बच्चों के साथ पन्द्रह अगस्त का पूर्व दिन व रक्षा बंधन का उत्सव मनाना है. उसके पूर्व नैनी के पुत्र के पहले जन्मदिन की पार्टी में कालीबाड़ी जाना है, यानि पूरा दिन व्यस्तता बनी रहेगी. कल दोपहर को पूसी के सारे चित्र व वीडियोज का एक फोल्डर बनाना है, उसकी स्मृति में लिखा आलेख भी जून को दिखाना है. आज पार्लियामेंट का वर्षा सत्र समाप्त हो गया. इस बार काम शांतिपूर्ण ढंग से हुआ है.

Wednesday, June 14, 2017

झील में कमल


कर्तापन का दंश लगा है जीव को, साक्षी इसका इलाज है. वास्तव में आत्मा न करता है न भोक्ता. स्वयं का पता नहीं है सो कभी देह, कभी मन के साथ स्वयं को जोड़कर देखता है, वही मान लेता है खुद को और उनके द्वारा किये कर्मों को स्वयं द्वारा किया मानेगा ही. वे तो प्रारब्ध वश अथवा तो संस्कारों वश अपना काम करते हैं और आत्मा यदि अपने-आप में रहे तो मन, बुद्धि में कभी कुछ इधर-उधर हुआ भी तो वह स्वयं को उसका कर्ता नहीं मानेगा. आज बहुत दिनों के बाद सद्गुरू की वाणी सुनी, जैसे तन को रोज विश्राम और भोजन की आवश्यकता होती है, वैसे ही मन को भी नियमित विश्राम व भोजन चाहिए. मन का भोजन है सत्संग और मन का विश्राम है ध्यान, सो आज से पुनः ध्यान, योग और सत्संग आरम्भ किया है. जीवन को यदि सुंदर बनाना है तो ये सभी आवश्यक हैं. ‘पाठ’ भी नियमित करना होगा. पुरानी दिनचर्या को अपनाना होगा, जिसमें विविध रंग हैं.

बहुत दिनों पूर्व यह इच्छा मन में जगी थी कि बड़े घर के बगीचे में पेड़ के तने से सटकर बैठेगी और कुछ लिखेगी. आज जामुन के पेड़ के नीचे है.

मन की झील में आत्मा का कमल खिलाना है
संस्कारों की मिट्टी है जहाँ
वहीं से रंगो-खुशबू को बाहर लाना है
क्योंकि छिपा है एक स्रोत शुद्ध जल का
मिट्टी की गहराई में
माना चट्टानें भी होंगी मध्य में
कठिन होगी यात्रा
पर जीवन को यदि सचमुच पाना है
तो.. मन की झील में आत्मा का कमल खिलाना है


धूप तेज लग रही है सो लगता है छायादार वृक्ष खोजना होगा. यह सफेद फूलों वाला वृक्ष छाया में है पर यहाँ आस-पास एक अजीब सी गंध है. शायद बाहर से आ रही है या इस वृक्ष की ही गंध है. बिन पत्तों की इसकी शाखाएं कैसी कलाकृति का निर्माण कर रही हैं, एक डाली पर तीन फूल खिले हैं, जिनमें मध्य भाग पीत है. आज उन्हें तिनसुकिया भी जाना है, जीवन वैसे ही चलता रहता है, बाहर कुछ भी नहीं बदलता पर भीतर सब कुछ बदल जाता है. अब भीतर कोई ज्वर नहीं है, सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है. कब विकार जगा, कब कामना उठी, कब मन भूतकल में गया, कब भविष्य की कल्पना में. आत्मा शुद्ध चेतन है, जो प्रकाशक है, जो जानता है, जो देखता है. जब मन शांत होता है तब केवल शुद्ध चेतन ही शेष रहता है. उसे अब पढ़ते व लिखते समय चश्मा लगाना पड़ता है, आँखों की रोशनी कम हो रही है, उम्र बढने के साथ देह में ये परिवर्तन स्वाभाविक हैं. धरती पर बैठकर लिखना अच्छा लग रहा है, पर उसे फोन अपने साथ रखने चाहिए, शायद फोन की घंटी बज रही है. नैनी लैंड लाइन तो उठा सकती है पर मोबाइल उसे रिसीव करना नहीं आता. अब अंदर जाना चाहिये, उसने सोचा.

आज मृणाल ज्योति जाना हुआ, दो अन्य महिलाएं भी थीं. विश्व विकंलाग दिवस के लिए निमन्त्रण पत्र भी मिले, जो सभी के यहाँ भिजवाने हैं. आज दोपहर के भोजन में सलाद, सूप व फल लिए, काफी हल्का लग रहा है. शाम को वे जल्दी ही रात्रि भोजन करेंगे और बाद में टहलने जायेंगे. अभी कुछ देर पूर्व बच्चे पढ़कर गये हैं. उस दिन नैनी के ससुर की हालत पर तरस खाकर जो भाव मन में उठा था, वह सत्य होता नजर आ रहा है. कुदरत किस तरह उनकी हर बात सुनती है. मन का छोटे सा छोटा विचार भी उसकी नजर से बच नहीं सकता. परमात्मा की महिमा का जितना बखान करे, कम है. जो जीवन अपना ही अहित कर रहा हो, जिसके आगे बढने की कोई गुंजाईश ही नजर न आती हो, उसे बदलना होगा, ताकि एक नया कोरा जीवन पुनः आरम्भ हो. सम्भव है नये परिवेश में वह नये ढंग से जीये. एक मशीन की तरह जिए चले जाना अपने व औरों के दुःख का कारण बनना कहाँ तक उचित है ? ईश्वर ही उसका मार्गदर्शक है, वही प्रेरणा देता है, उसके सिवा और कुछ नहीं. यह देह जब तक रहे, स्वस्थ रहे, मन सजग रहे, बुद्धि भी जगी रहे ताकि न अपने लिए न औरों के लिए दुःख का कारण बने. अनंत सुख की राशि परमात्मा चरों और बिखरा हुआ है, उससे जुड़कर ही मानव के भीतर पड़ा वह बीज खिल सकता है, जिसे आत्मा कहते हैं.   



Tuesday, April 12, 2016

कमल और चाँद


फिर एक अन्तराल ! सितम्बर आधा बीत गया, जानती है किसी दिन उमंग जगी तो पीछे के पन्ने भी भर जायेंगे क्योंकि अब समय ठहर गया है. दिन, महीने, साल सब एक से लगते हैं. समयातीत हो जाना क्या इसी को कहते हैं. मन का मौसम अब एक सा रहता है. आज, कल परसों का भेद भी खो गया है. सुबह दोपहर शाम भी, हर पल भीतर प्रकाश उगता हो तो कोई बाहर नजर क्यों डाले. जून कल टूर पर गये हैं. हैदराबाद, बैंगलोर और फिर दिल्ली, इतवार को लौटेंगे तब तक तो रोज लिखने का समय आराम से मिल जायेगा. कल दोपहर वह मृणाल ज्योति गयी थी. हॉस्टल के लिए UBI ने फर्नीचर प्रदान किया है. बच्चों के हंसते चेहरे तथा नृत्य देखकर सभी को अच्छा लगा. चाहे उनके शरीर में कमी हो, मन को प्रसन्न होने से कौन रोक सकता है. बुद्धि भी कम हो पर आत्मा को खिलने से कौन रोक सकता है. आत्मा वैसी ही मुखर है उनके भीतर जैसे किसी सामान्य बच्चे में ! आज भी कल की तरह धूप बहुत तेज है. माली ने काम किया ऐसी ही कड़कती धूप में. बगीचा अब शोभनीय होता जा रहा है. माली के बिना जैसे जंगल सा हो गया था वैसे ही मन उपवन भी सद्गुरू के बिना वीरान हो जाता है.

आज विश्वकर्मा पूजा है, पिछले कई वर्षों से इस दिन वे दफ्तर जाते थे. इस वर्ष जून यहाँ नहीं हैं सो उसका भी जाना नहीं हो सकता. कुछ देर पहले सभी को विश्वकर्मा पूजा का sms भेजा है, दो-तीन का जवाब भी मिल गया है. माली आज भी आया है, गुलाब के पौधों की कुड़ाई कर रहा है, अक्टूबर में, पूजा के अवकाश वे इसकी कटिंग करेंगे. उसका मन आज उदास है, मन है ही कहाँ, यह कहने से भी तो आज काम नहीं चल रहा है. रात को स्वप्न में चन्द्रमा दखा, पूर्णमासी का गोल चमकता हुआ चाँद, पर मन बीच में आ गया, कहने लगा देखो यह चाँद और उसी क्षण चाँद गायब हो गया. आत्मा में टिकना नहीं हो पाया, सद्गुरु से पूछे, वह क्या कहते हैं. वह तो कहते हैं जो दिखता है चाहे वह खुले नेत्रों से हो अथवा बंद आँखों से वह प्रकृति का ही अंश है, जो देखने वाला है वही वह है सो उसमें ही टिकना है, और वह कुछ करने से नहीं होने वाला, सहज हो जाये तो वही है उसके सिवा कुछ भी नहीं, इसलिए जब जैसी परिस्थिति आ जाये उसे स्वीकारते चलना है. सुबह देर से उठी तो सारे काम देर से हुए हैं, जल्दी भी नहीं है, दोपहर को छात्रा भी नहीं आ रही है. कम्प्यूटर काम नहीं कर रहा, उसके पास समय की बहुतायत है. डायरी के पन्नों की प्रतीक्षा समाप्त हो सकती है और कमल के पौधों की देखभाल भी !


कल वह ‘विश्वकर्मा पूजा’ में गयी, जून के एक सहकर्मी की पत्नी ने फोन किया और उसे साथ ले गयी. क्विज में भाग लिया, उनकी टीम जीत भी गयी. आज भी ट्यूशन नहीं थी सो सारी खिड़कियाँ साफ करवायीं, उनका घर अब बिलकुल साफ हो गया लगता है, बगीचा भी ठीक-ठाक लगता है. कल रात खिले कमल के पास बैठी रही, आकाश में चाँद था, झींगुरों की आवाज को छोडकर कोई ध्वनि नहीं थी. मौन था. इस समय दोपहर के दो बजे हैं, शाम का कार्यक्रम आरम्भ होने से पूर्व उसके पास पूरे दो घंटे हैं. आज भी मन मुक्ति का अनुभव नहीं कर रहा है. गुरूजी कहते हैं ऐसा ढाई दिन होता है, ऐसे में और भाव से साधना करनी चाहिए. शाम को सत्संग में भी जाना है. माँ अभी सो रही हैं, पूछो तो कहती हैं, उन्हें नीद कहाँ आती है, लेटी रहती हैं, उनके पास और कोई काम जो नहीं है, कितना सीधा सरल जीवन, कोई जवाब देही नहीं, कोई लक्ष्य नहीं, कुछ भी तो नहीं, बस ऐसे ही जिए चले जाना, उनके मन में भी विचार तो आते होंगे, पर ऐसी भाषा नहीं जो उन्हें व्यक्त कर सके. कल जो sms भेजे थे ज्यादातर अनुत्तरित ही रहे, उन्हें पता ही नहीं है कि विश्वकर्मा पूजा नामक कोई उत्सव भी होता है. अभी उसे Genesis of Imagination  पढ़नी है.     

Thursday, November 5, 2015

कमल कुण्ड की शोभा



जितनी कोई उठा सके उतनी जिम्मेदारी उसे उठानी ही चाहिए, आज सद्गुरु ने कहा, जैसे-जैसे कोई किसी काम को करने का बीड़ा उठाता है वैसे-वैसे उसे करने की शक्ति भरती जाती है ! उसे लगा, वे स्वयं ही अपनी शक्ति पर संदेह करते हैं और फिर आत्मग्लानि से भर जाते हैं. उन्होंने यह भी कहा, सारे गुण भीतर हैं, यह मानकर चलना है. अवगुण तो एक आवरण की तरह ऊपर-ऊपर ही हैं. यदि वे शरण में जाते हैं तो ईश्वर की पवित्रता उनके दोषों को दूर करने में सहायक होती है, वह पावन है और उसकी निकटता में वे भी पावन हो जाते हैं. उनकी वह शक्ति तथा सामर्थ्य जो ईश्वर की कृपा से मिलती है, उनमें अभिमान नहीं जगने देती बल्कि नम्रता ही सिखाती है. वे विनम्र होकर अपनी शक्ति को उसी की सृष्टि में लगाना चाहते हैं क्योंकि वे स्वयं तो तृप्त हो जाते हैं. जो एक बार सच्चे हृदय से शरण में गया, वह तृप्त ही है ! आज वह जून के विभाग के मुख्य अधिकारी के घर गयी उनकी पत्नी से मिलने, बहू व पोते से भी मिलन हो गया जो कुछ दिनों के लिए यहाँ आए हैं, उसने उनकी कुछ तस्वीरें उतारीं. वापसी में पड़ोसिन के यहाँ गयी उनके छोटे से सुंदर तालाब में पांच कमल खिले हैं. कल बंगाली सखी के बेटे को संस्कृत पढ़ाई बहुत दिनों बाद, खुद भी पढ़ना होगा पहले, उसे हिंदी पढ़ने का भी कुछ कारगर तरीका सोचना होगा. आज दोपहर कार्ड्स बनाने का कार्य समाप्त कर  देना है, यदि कोई सहायक न भी मिले तो अकेले ही. मौसम आज अच्छा है, रात भर वर्षा हुई, ठंडी हवा बह रही है. सासुमाँ सो रही हैं, आज लंच में सब्जी उन्होंने बना दी है.

मन खाली है इस क्षण, कोई वस्तु नहीं मांगता, कुछ नहीं चाहता, यह जैसे है ही नहीं. सुबह मसालदान गिर गया पर भीतर एक कतरा भी नहीं हिला, कुछ हो तभी न हिले. कुछ भी नहीं है मन की गहराइयों में. सब कुछ ठोस है वहाँ, कोई हलचल नहीं. वहाँ से केवल एक पुकार आती है कि कैसे इस जगत को कुछ दे दें, देने की बात ही अब प्रमुख है. प्रभु भी तो हर पल दे ही रहा है, अपना प्रेम, करुणा और कृपा..सद्गुरु भी यही कर रहे हैं..वे उनके जैसे बनने का प्रयत्न तो कर ही सकते हैं ! वे दें और बस ! एक क्षण भी वहाँ रुके नहीं उस लेने वाले का आभार देखने के लिए, बल्कि वे उसके आभारी हों कि वह वहाँ है ताकि उनके भीतर प्रेम जगे.. न जाने कितने जन्मों से वे लेते आये हैं..अब और नहीं !

पिछले चार दिन फिर डायरी नहीं खोली, शनि, इतवार को तो सुबह काफी व्यस्तता होती है, पर कल व परसों अपने कामों में इस माया ने उलझा कर रखा. आज गुरूजी ने कहा, जो कुछ भी वे व्यवहार जगत में देखते हैं वह सब अविद्या है, इसी को नीरूमा कहती हैं कि सभी रिलेटिव में है, रियल नहीं है. विद्या तो आत्मा में ही है. गोयनका जी ने कहा, श्वास का सहारा लेने से वे भीतर शरीर व मन दोनों को जान पाते हैं, तथा दोनों को बदल सकते हैं. श्वास दोनों के बीच की कड़ी है. वह अपने भीतर देखती है तो सर्वप्रथम वाणी का दोष दीखता है. चाहकर भी इसे दूर नहीं कर पाती, शायद यह चाह्ना पूर्ण नहीं है और यह एक साधक की भाषा नहीं है, साधक को अपने पर संदेह नहीं होता, न गुरू पर न आत्मा पर. आज से दृढ़ निश्चय करना है आज से, नहीं इसी क्षण से ही यह निश्चय करना है कि जो भी शब्द मुख से निकलेगा वह सारगर्भित होगा, मधुर होगा तथा स्पष्ट होगा. आज दोपहर को हिंदी कक्षा भी है, उसके लिए भी पूर्ण तैयार रहना होगा, भाषा शुद्ध व स्पष्ट हो. उसका हर कार्य ऐसा हो जिसमें आत्मा की झलक मिले. वह आत्मा है, पूर्ण शांति, पूर्ण आनन्द तथा पूर्ण ज्ञान की अनंत राशि ! उसे इस जगत से कुछ भी प्राप्य नहीं है, बस देना है स्वयं को. लुटाना है, भीतर से खाली होना है !  


Sunday, January 4, 2015

पालक की सिन्धी भाजी


कल शाम पुनः उसे सिर में दूर से आती ढोल की ध्वनि जैसी ध्वनि सुनाई दी, फिर आज सुबह क्रिया के बाद काफी स्पष्ट थी. योग शिक्षक से पूछना ही उचित होगा अथवा इसे भी सामान्य घटना मानकर आगे चलती चले. अध्यात्म के मार्ग पर न जाने कितने-कितने मोड़ आएंगे जिनसे उन्हें गुजरना होगा. यह तो तलवार की धार पर चलने जैसा है. हर सुख की एक कीमत चुकानी होती है. हर सुख क्षणिक होता है लेकिन आत्मसुख का न कोई आदि है न ही अंत है. वह तो अनंत है, उसे सीमा में बद्ध नहीं किया जा सकता. इस समय उसके पोर-पोर से वही आनंद फूट रहा है, सारा शरीर कम्पायमान हो रहा है, ध्यान न करते हुए भी ध्यान की सी मनः स्थिति हो रही है, एकांत नहीं है सो अभी वह ध्यान नहीं कर सकती. आत्मा से टपकने वाले इस मधुर भाव को क्या नाम दे सकते हैं. सारा जग एक स्वप्न की भांति प्रतीत हो रहा है. सब कुछ जैसे थम गया है, दिशाएं खो गयी हैं, शून्य ही शून्य है, उसके इस आत्मबोध के अतिरिक्त कोई बोध शेष नहीं रहा है. कान में पड़ने वाली ध्वनियाँ भी अर्थहीन हो गयी हैं. सब कुछ यथावत होते हुए भी यथावत नहीं है. कुछ बदला-बदला सा है. कहीं यह उसका मतिभ्रम तो नहीं, लेकिन ऐसा पहले भी तो हुआ है और आनंद की तीव्रता उस समय अधिक थी, पर उसे संयत होना होगा. स्वयं को अभी और तीव्रतर अनुभवों के लिए परिपक्व करना होगा. सद्गुरु सदा उसके साथ हैं. कृष्ण भी हर क्षण उसके साथ परमज्योति के रूप में रहते हैं, जिसे वह आंख बंद करते ही देखती है. जैसे कमल पंक में रहकर भी उसमें लिप्त नहीं होता वैसे ही उन्हें संसार में रहकर भी इससे अलिप्त रहना है. वे ईश्वर के निमित्त मात्र हैं. उसने अनंत शक्तियाँ प्रदान की हैं. सूक्ष्म जगत और तात्विक जगत में प्रवेश करने की क्षमता दी है. अलौकिक आनंद प्राप्त करने के सामर्थ्य भी दिया है. शाश्वत सुख व शांति का भागी बनने की क्षमता दी है जो वे अपने आत्मस्वरूप में रहकर ही पा सकते हैं.

आज नन्हे का स्कूल ‘तिनसुकिया बंद’ के कारण बंद है. वे आधा घंटा देर से उठे,  क्रिया की जो उनके जीवन का अंग बन चुकी है और दिन का पहला कार्य. कल दो पत्र लिखे, सभी को भाईदूज का टीका भेज दिया है, दीवाली के लिए सफाई का कार्य भी नियमित चल रहा है. कल शाम एक मित्र परिवार आया, अच्छा लगा पर कुछ देर को शायद वह भावना में बह गयी थी. art of living की बात छिड़ते ही वह संयत नहीं रह पाती, पता नहीं क्यों ? उसके सिर में हल्की आवाजें आज सुबह भी महसूस हुईं, इसके पीछे जरूर कोई राज है. आज लम्बे समय के बाद ‘सिन्धी पालक’ बनाया है. सुबह ससुराल से फोन आया, वे लोग इसी माह बड़ी ननद के पास जा रहे हैं. अज गुरुमाँ ने कड़े शब्दों में फटकर लगाई, पर बिलकुल सही कहा कि ईश्वर का नाम तो जगाने के लिए है न कि सुलाने के लिए. गुरू युगों की नींद से जगाने आया है. कल ‘इंडिया टुडे’ के मुखपृष्ठ पर गुरूजी का फोटो देखकर अच्छा लगा. उनकी बातें ही निराली हैं. नन्हे बच्चे से निष्पाप और महान ऋषि से ज्ञानी. ईश्वर हर क्षण उनकी आँखों में, हँसी में, हाव-भाव में झलकता है. वह स्वयं ही ईश रूप  हो गये हैं. अब इतना वक्त नहीं है कि अभ्यास करे, सो उसने सोचा संगीत सुनना ही ठीक रहेगा.