Wednesday, January 4, 2017

गुरू पूर्णिमा


कल शाम को मुम्बई में तीन बम विस्फोट हुए. वर्षों पहले लिखी कविता का स्मरण हो आया. आज उसे ब्लॉग पर पोस्ट किया है. कितनी दुखद मौत होती होगी, शोलों और दुर्गन्ध के मध्य. अचानक घटी यह मृत्यु झकझोर देती होगी. कैसा विचित्र है यह संसार, यहाँ एक तरफ प्रेम की ऊंचाइयाँ हैं और दूसरी तरफ नीचता की खाईयाँ हैं. एक तरफ सद्गुरू हैं जो साक्षात् परमात्मा का ही रूप हैं जो आतंकियों में भी कुछ भला देख लेते हैं, उसी एक चेतना को देख लेते हैं और दूसरी तरफ ऐसे बेहोश राक्षस हैं जिन्हें भले-बुरे का कोई ज्ञान नहीं. आज सुबह क्रिया के बाद अनोखा अनुभव हुआ. सद्गुरू उससे बात करते प्रतीत हुए और यह भी कहा, वह तो हर क्षण उसके साथ हैं. एक ही चेतना से यह सारा जगत बना है, ऊर्जा और पदार्थ दो दीखते हैं पर मूलतः हैं नहीं. जड़ के भीतर भी वही चेतन छिपा है. आज सुबह से ही वर्षा हो रही है, जून कल कोलकाता गये हैं. सम्भवतः आज मायापुरी गये होंगे. ईश्वर उनके साथ है. आज पिताजी ने दाल बनाई है, उनकी बहुत दिनों की इच्छा पूरी हो गयी.

आज गुरूपूर्णिमा है. सुबह से ही मन किसी और लोक में विचर रहा है. सद्गुरू का संदेश कई बार सूक्ष्म रूप से सुन चुकी है. शाम को आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर भी जाना है. एक सखी ले जाएगी. जून कल आयेंगे. कल शाम वह मन्दिर गये थे. सद्गुरू का सबसे बड़ा चमत्कार तो यही है. वह पहले उसके साथ मन्दिर जाकर भी बाहर ही खड़े रहते थे. अब सुबह-शाम अगरबत्ती जलाते हैं. संतों की वाणी को सुनते हैं. सद्गुरू की कृपा का कोई अंत नहीं. उसके खुद के जीवन में इतना परिवर्तन आया है कि...इसको कहा नहीं जा सकता. आज सुबह उन्हें टीवी पर देखा. वह कनाडा में हैं आज. कभी ऐसा वक्त अवश्य आएगा जब वह भी उनके निकट रह पायेगी आश्रम में, जब वे बैंगलोर  में रहेंगे !

सद्गुरू ने गुरूपूर्णिमा का तोहफा भेजा है. आज सुबह ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ. प्रकृति-पुरुष, देह-देही, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ सभी का संबंध स्पष्ट हुआ. देवी तत्व समझ में आया. शिव तत्व व कृष्ण तत्व भी और लीला का क्या अर्थ है यह भी. सारे शास्त्र जैसे भीतर स्वयं खुल रहे थे और साथ ही अपूर्व आनन्द की धारा बरस रही थी. सद्गुरू ने जो उस दिन कृपा की थी यह उसी का फल है. वह जानते हैं, वह सब जानते हैं. वह उस दिन भी जानते थे जब पहली बार मिले थे. उसके भीतर जब पहली बार ज्ञान की किरण फूटी थी. आज नये तरह का गीत लिखा है, अभी तक उस ऊंचाई पर जाने का प्रयास कर रही थी, सो उसी के गीत लिख रही थी. अब वहाँ पहुँच कर नीचे का सब दिखाई दे रहा है. संसार दिखाई दे रहा है, जलता हुआ अपनी आग में !


कल की जो भावदशा थी, वह आज ध्यान में नहीं घटी. सद्गुरू ठीक ही कहते हैं, 'सदा' निकाल दें तो आनंद ही आनंद है. आज कल वाली कविता पोस्ट की है, कुछ को आनन्द दे जाएगी !    

Tuesday, January 3, 2017

आकाश का गीत


आज ध्यान कम टीवी पर सद्गुरू को श्रवण ज्यादा किया. आश्रम में उनसे जो प्रश्नोत्तर हो रहा था, बहुत अच्छा लगा. उन्हें नींद आ रही थी, लेकिन लोग थे कि प्रश्न पूछे ही जा रहे थे.
श्रवण दुःख पाप का नाशक, श्रवण करे जो बनता श्रावक
सुनने की महिमा है अनुपम, मिल जाता है जिससे प्रियतम
निज भाषा में सुनने का फल, मन की धारा बनती निर्मल !
पढ़ना वृत्ति, सुनना भक्ति, होगी इससे कुशल प्रवृत्ति
कल-कल नदिया की भी सुनना, पंछी की बोली को गुनना
बादल का तुम सुनना गर्जन, सागर की लहरों का तर्जन
पिऊ पपीहा केकी मोर की, गूंज मौन की सुने सही
सुनना भी एक विज्ञान, बढ़ता है जिससे प्रज्ञान
राग सुनो, आलाप सुनो, कोकिल की तुम तान सुनो
यहाँ हवाएं भी गा रही हैं, आकाश गा रहा है. संगीत से भरा है जगत !

आज सात परिचित महिलाओं को फोन किये, मृणाल ज्योति के कार्य में सहयोग के लिए, एक ने उठाया ही नहीं. लोगों से बातचीत चलती रहे तो अच्छा है. गुरूजी ने कहा, अपने में जो दोष हैं, उन्हें निकालने का प्रयास करने जायेंगे तो कोई लाभ नहीं होगा. अपना दायरा बढ़ाकर, स्वयं को व्यस्त रखकर अपनी ऊर्जा का सही उपयोग करके वे स्वयं को शुद्ध कर सकते हैं. सेवा से बढ़कर शुद्धि का कोई साधन नहीं और स्वार्थ से बढ़कर अशुद्धि का कोई साधन नहीं. सेवा में कितना आनंद भी है. परमात्मा भी तो यही कर रहा है, ‘स: इव’ जो वह कर रहा है वे उसकी नकल करते हैं, वही तो उनके द्वारा प्रतिबिम्बित हो रहा है !

आज का ध्यान और भी अनोखा था. सद्गुरू होते ही हैं अनोखे, सारी दुनिया से निराले, प्रभु के घर वाले..दिल में रहने का ध्यान था, दिल के भीतर, दिल के ऊपर और दिल के नीचे..रहना था ध्यान से, अहंकार को भूलकर, विचारों को छोड़ते जाना था और केवल महसूस करना था. बच्चे महसूस करते  हैं, वे सोचते नहीं..तभी एकदम ताजे रहते हैं, फूल की तरह कोमल और सुबह की ओस की तरह निर्मल...

कल मृणाल ज्योति गयी थी. सो कुछ नहीं लिखा. वह परमात्मा कितने-कितने उपाय करके कितने खेल रचके उन्हें अपनी ओर खींचता है. वे अनजान से बने उसकी कृपा को अनुभव कर ही नहीं पाते, बार-बार अहंकार का शिकार होते हैं और दुःख पाते हैं, पर अपने सच्चे स्वरूप को देखते ही नहीं जहाँ केवल प्रेम है, जहाँ दो हैं ही नहीं, जो उनका अपमान(तथाकथित) कर रहा है, वह भी वे ही हैं. सम्मान करने वाले भी वही हैं. जब वे किसी का सम्मान करते हैं तो पुण्य बढ़ता है क्योंकि वे अपना ही सम्मान कर रहे हैं और जब किसी का अपमान कर रहे हैं, तो उनका पुण्य घटता है क्योंकि वे स्वयं का ही अपमान कर रहे हैं. इसका अर्थ हुआ कोई जब उनका सम्मान करता है तो अपना पुण्य बढ़ाता है उनका घटाता है, और अपमान करता है तो अपना पुण्य घटाता है, उनका बढ़ाता है. अद्वैत का अनुभव किये बिना कोई इस जगत में सुख से रह ही नहीं सकता. आज का ध्यान भी अनोखा था. अपने पोर-पोर को परमात्मा से ओत-प्रोत मानना था, एक-एक कण को..आज सुबह प्राणायाम करते समय भी उसे अपने घर में टिकने का अनुभव हुआ. वे व्यर्थ ही बाहर भटकते हैं. कभी धूल फांकते हैं तो कभी दामन फड़वाते हैं. उनका अपना मन ही मूर्खता भरे विचार उन्हें सिखाता है और वे उसकी बातों में आ जाते हैं. यहाँ करने को कुछ भी नहीं है सिवाय मस्ती में झूमने के..पर वे वही छोड़कर सारे काम करते हैं !        



Monday, January 2, 2017

तरह-तरह के ध्यान


कल कुछ नहीं लिखा, शाम को क्लब गयी थी. लेडीज क्लब की मीटिंग थी. एक सदस्या का विदाई समारोह था, उसने उनके लिए लिखी कविता पढ़ी, उन्हें शायद उम्मीद नहीं थी. लौटकर पद्म साधना की, जैसे आजकल वे रोज करते हैं. आज भी बदली है आकाश में. पिताजी बाहर बरामदे में बैठकर अखबार पढ़ रहे हैं, माँ कमरे में अपनी चिर-परिचित मुद्रा में कुर्सी पर बैठी हैं. कल वे उनका जन्मदिन मनाने वाले हैं, उसने उनके लिए एक कविता लिखी. शाम को नन्हे के बचपन के फोटो चुनने हैं, वे उसके जन्मदिन पर उसे एक कोलाज बनाकर भेजेंगे. आज का ध्यान भी अच्छा था, जब कोई विचार नहीं है और इच्छा नहीं है तब क्या कोई कह सकता है कि ‘वह है’ ? दो श्वासों के बीच जो अन्तराल है, वे वहाँ भी नहीं होते, दो विचारों के बीच भी वे नहीं होते. आकाश में बादलों की तरह विचार आते और चले जाते हैं, उन पर कोई वश भी नहीं है. आत्मा में कोई क्रिया ही नहीं है, क्रिया करने की शक्ति है, जानने की शक्ति है और मानने की शक्ति है, लेकिन वे शक्तिमान हैं, शक्ति नहीं..अपने शुद्ध रूप का एक बार ज्ञान हो जाये तो चाहे वे शक्ति का कितना ही उपयोग करें..गलती तब होती है जब वे स्वयं को शक्ति ही मान लेते हैं और चुक जाते हैं...

दीदी को माँ के लिए लिखी कविता भेजी थी, उनकी यह अच्छी आदत है, फौरन जवाब देती हैं. आज का ध्यान भी अच्छा था. शरीर से बाहर वे कहाँ हैं और देह के भीतर वे कहाँ हैं, इसका अनुभव करना था. वे सब जगह हैं और कहीं भी नहीं है. देह से जब तक तादात्म्य रहता है, वे बंधन महसूस करते हैं, शरीर से जब तादात्म्य टूट जाता है तब वे पहली बार मुक्ति का अनुभव करते हैं..और मुक्ति ही आनंद है. उस आनन्द में किसी को अपना भागीदार बनाने के लिए फिर वे परमात्मा की भक्ति करते हैं, प्रेम बांटते हैं और सारा जगत उन्हें अपना ही रूप नजर आता है. आज छोटी बुआ पर संस्मरण लिखा.

कल जो कविता उसने ब्लॉग पर डाली थी. ध्यान के अनुभव के बाद लिखी थी और जो ध्यान नहीं करते, साधना पथ पर नहीं हैं, उन्हें समझ में नहीं आएगी. आज का ध्यान भी अनूठा था. सभी कुछ ब्रह्म है, इसका अनुभव करना था, पदार्थ का विश्लेषण करते जाएँ तो ऊर्जा मिलती है और ऊर्जा के भी पार चेतना है, जड़ अथवा चेतन सभी के मूल में एक ही तत्व है ! आज सुबह से वर्षा की झड़ी लगी है. शनिवार है सो भोजन में बेसन की कढ़ी बन रही है.

आज ध्यान में विचार शून्यता की अनुभव किया. विचार ही सीमा है. विचार से परे जहाँ केवल चैतन्य है, वहाँ सब एक है. सच्चा संवाद मौन में ही होता है. जब दो मौन मिलते हैं तब एकात्मकता का अनुभव होता है. विचारों में एकता कभी सम्भव नहीं है. मन में जो दिन-रात चटर-पटर चलती रहती है वह ऊर्जा को व्यर्थ नष्ट करती है. वे कभी भी मौन का अनुभव नहीं करते. नींद में लगातार भीतर चलता रहता है एक प्रवाह..उसे जो प्रतीक्षा थी कि विचारों वाली कविता पर कुछ लोग कुछ कहेंगे वह कितनी मूर्खता थी. उस कविता पर टिप्पणी तो मौन रहकर ही की जा सकती है. उनके भीतर मान पाने की इच्छा भी एक विचार ही है और पाकर भीतर जो प्रसन्नता होती है वह भी एक विचार ही है अथवा तो एक संवेदना है जो उन्हें सुखद मालूम पडती है. सुखद संवेदना के प्रति वे राग जगाते हैं, फिर उन्हें बार-बार उस संवेदना की ललक उठती है, जब वह नहीं मिलती तो भीतर दुखद संवेदना जगती है. जिसके प्रति वे द्वेष जगाते हैं, वह भी उन्हें नहीं भाता तो और द्वेष जगाते हैं और इस चक्र में फंस जाते हैं. सारा खेल संवेदनाओं का है. इनका एक नशा होता है. यदि किसी संवेदना को साक्षी भाव से देखें तो कुछ ही देर में नष्ट हो जाती है, वे पुनः पहले की तरह हो जाते हैं.   


Friday, December 30, 2016

जीव और ब्रह्म -आदि शन्कराचार्य


कल शाम और आज पुनः बाबा को सुना. वे नई ऊर्जा से भर गये हैं. अपने अभियान को चलाये रखने का उन्होंने व्रत दोहराया और जोशीले भाषण से अपने विरोधियों के सवालों का जवाब दिया. आज वर्षा की झड़ी लगी है, वे प्रातःभ्रमण के लिए भी नहीं जा सके. कल नन्हे ने कहा उसे कविता अच्छी लगी, एकाध बात समझ में नहीं आयी. आज से नैनी काम पर आ गयी है, अभी पिताजी ने उसके बारे में कुछ कहा, उन्हें घर-गृहस्थी के मामलों में अपनी राय देने में बहुत आनंद आता है, तो नूना ने उन्हें तुरंत जिस तरह तेजी से जवाब दिया, उसे खुद पर आश्चर्य हुआ, उसने सोचा भी नहीं था, उसके अचेतन से ही यह कृत्य हुआ, उसने किया भी नहीं. इसी तरह हर कोई जो भी व्यवहार कर रहा है, वह संस्कारों के वशीभूत होकर ही कर रहा है. एक अर्थ में कर्ता वह है ही नहीं, यह केवल मानने की बात नहीं है, ऐसा ही है. यदि वह सचेत होकर, कुछ बनाकर उन्हें जवाब देती तो कर्ता होने का दावा कर सकती थी, न ही वे पुण्यकर्मों के कर्ता हैं न पाप कर्मों के, स्वभाव के अनुसार कृत्य होते हैं. स्वभाव वश यदि कोई असत्य भाषण कर देता है तो भी उसका फल उसे मिलेगा ही, उस दंड को भोगते समय भी उसे साक्षी बना रहना होगा.

आज सुबह बाबा के गुरूजी द्वारा शन्कराचार्य के वेदांत सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया. उनके अनुसार ब्रह्म अनादि व अनंत है. अविद्या व अज्ञान अनादि तो हैं पर सांत हैं. ब्रह्म जब अविद्या अर्थात माया में बंधता है तो ईश्वर कहाता है जिसकी शक्ति व ज्ञान अनंत है पर वही ब्रह्म जब अज्ञान से बंधता है तब जीव कहाता है. ईश्वर सृष्टि रचना, पालना व प्रलय का कारण है. जीव कर्मों को करता है व उनके फलों को भोगता है. जीव अपने शुद्ध स्वरूप में ब्रह्म के समान ही है. आज का ध्यान भी अच्छा था. वास्तव में देखा जाये तो इस जगत में न कुछ अच्छा है न बुरा, दृष्टिकोण पर ही निर्भर करता है. गुरूजी भी कहते हैं विपरीत मूल्य एक दूसरे के पूरक हैं. एक ही चेतन तत्व से यह जगत बना है. जब तक द्वंद्व रहेगा, समाधान हो ही नहीं हो सकता. भीतर एकत्व तभी होगा जब कोई बाहर बांटना छोड़ देगा. वे जो बाहर वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों पर ठप्पा लगते हैं, बांटते हैं तो भीतर दरार पड़ने ही वाली है.


आज का ध्यान अनोखा था. विचारों को महसूस करना था, वे कहाँ से आते हैं ? क्या वे उनके हैं ? आत्मा के अनंत सागर से विचार आते हैं और जिन्हें वे अपना मानते हैं दरअसल वे सब उधार के होते हैं. उनके विचार जैसा कुछ भी नहीं है इस जगत में. केवल मौन ही उनका है. उनके संकल्प वातावरण की, शिक्षा की, उन पुस्तकों की देन होते हैं और जो कुछ उनके बावजूद भीतर से आता है वह संस्कारों के कारण हो सकता है. ‘वे’ हैं ही नहीं तो उनका कुछ भी हो कैसे सकता है. ‘वे हैं’ यह भी एक विचार ही है. ध्यान के बाद कैसी मुक्ति का अहसास हो रहा है. विचारों से ही तो वे राग-द्वेष में बंधते हैं, अहंकार के शिकार होते हैं. दुःख उन्हें पकड़ता है. विचार न हों तो एक गहरा मौन और सन्नाटा भीतर छाया रहता है !        

Wednesday, December 28, 2016

बैलगाड़ी से यात्रा


आज दसवें दिन बाबा ने अपना अनशन तोड़ दिया. गुरूजी और बापू के कहने पर ही यह सम्भव हुआ. उसके मन से भी जैसे कोई बोझ उतर गया है. चार जून को राजधानी में जो हुआ वह अप्रत्याशित था. उसके बाद की घटनाएँ भी कम दुखद नहीं थीं. आज वह अस्पताल से छूट जायेंगे. शायद कल से वे उन्हें पुनः आस्था पर देख पायें. कल दिन भर गर्मी बहुत रही पर आज बदली छायी है. नन्हे के लिए जो कविता उसने लिखी थी वह जून को भेजी है, पत्र से अच्छा है उसे ही भेज दे. समझदार को इशारा ही काफी है. आजकल नेट पर उसकी कविताएँ ज्यादा लोगों द्वारा पढ़ी जा रही हैं. परमात्मा की कृपा है, बल्कि कहना चाहिए उसीका गुणगान हो रहा है. भगवद्गीता का पांचवा अध्याय लिखना आरम्भ करना है. मन में अब भी विकार नजर आते हैं, संस्कार पुराने हैं लेकिन ध्यान में उनकी स्मृति भी नहीं रहती. तब केवल प्रकाश ही शेष रहता है. वाणी की कठोरता जाते-जाते भी नहीं जाती, शायद यह उसका प्रारब्ध है, लेकिन इससे नये कर्म तो संचित नहीं हो रहे, सद्गुरू हँस रहे होंगे उसकी इस बात पर. जिसने अपना-आप परमात्मा के साथ एक करके देख लिया वह अभी तक कर्मों के फेर में पड़ा है. यदि कोई यह मान ही बैठा है कि उसकी वाणी कठोर है और इसमें कभी कोई परिवर्तन हो ही नहीं सकता तो नहीं हो सकता. मान्यता ही संस्कारों को दृढ करती है !

कल दोपहर हिंदी पढ़ने उसकी दोनों छात्राएं आयीं और बैठी रहीं, उसे बुलाया नही और वह दूसरे कमरे में नई कविता टाइप करती रही यह सोचकर कि आज गुरूवार है. असजगता ही इसका कारण है. आज सुबह माली को डांटा, बाद में लगा क्रोध उचित नहीं था. वे किस तरह जीते हैं, रोबोट की नाईं  ही तो. आज नैनी का आपरेशन है, पिताजी को उसकी चिंता हो रही है. उनका हृदय बहुत कोमल है, उसकी बेटी से भी उन्हें मोह हो गया है.

आज फिर उसके सिर में हल्का दर्द है कारण वही पेट से सम्बन्धित होना चाहिए. उस दिन सुना था कि देह में मैल तभी जमता है जब मन में बात जम जाती है. उसके मन में एक ही नहीं अनेक बातें जम गयी हैं. भगवद्गीता पढ़ रही है तो पता चल रहा है, मन कितना चंचल है, कुछ पल भी इसे टिकाना कितना कठिन है और मक्खी की तरह यह जाता भी बार-बार कीचड़ की तरफ ही है. काम, क्रोध व लोभ को नर्क के द्वार बताया है. कितना सही है. रोग से बढ़कर और कौन सा नर्क होगा. अचेतन मन एक अथाह सागर है. कितने जन्मों की वासनाएं छिपी हैं उसमें. साधना की गति बैलगाड़ी की चाल से बढ़ रही है फिर भी भीतर एक आनन्द छाया रहता है. सद्गुरू के निकट रहकर जो साधना कर पाते हैं वे शीघ्र पहुँच जाते हैं, ऐसा भी कोई नियम नहीं है. आज बड़े भाई को दो कहानियाँ भेजी हैं, देखे, उनकी बिटिया को स्कूल में काम आती हैं या नहीं.


आजकल कितने अजीब-अजीब स्वप्न आते हैं. देखते समय यह भी पता चलता है, यह स्वप्न है. उस दिन स्वप्न में एक जैन मुनि को प्रवचन देते सुना और बाद में एक गोल-गोल घूमने का, ध्यान का अनुभव हुआ. परसों एक यात्रा की, मोटरबाइक पर लम्बी यात्रा. मन की क्या कहे कोई, कहाँ-कहाँ घूमने चला जाता है. कल रात स्वप्न में साईं बाबा को देखा. विशाल प्रांगण था. वह दूसरी मंजिल की बालकनी में थी. एक गार्ड बारी-बारी से उनसे मिलाने ले जा रहा था. एक वृद्ध व्यक्ति उनके चरणों को छू रहा था पर वह नाखूनों को एक-एक कर पकड़ रहा था. उनका चेहरा नहीं दिखा पर उनके गाउन का केसरिया रंग झलक रहा था. वह एक डायरी पर कुछ लिख रही थी, शायद वे प्रश्न जो उसे पूछने थे. पर जब उसकी बारी आयी तो गार्ड ने कहा, आप पढ़-पढ़ के उनसे बात करेंगी तो उसने  डायरी और पेन रख दिए और कहा, नहीं वह ऐसे ही जाएगी. तब वह एक ऐसे कमरे में पहुंची जहाँ जमीन पर काले रंग का बिछावन बिछा था. कई लोग साधना कर रहे थे. वह बैठ गयी तो साईं बाबा प्रवचन देने वाले थे पर एक महिला वहाँ खड़ी होकर उनकी जगह बोलने लगी और उसकी नींद खुल गयी अथवा तो स्वप्न टूट गया. यह स्वप्न कहीं उसके मन का मायाजाल तो नहीं अथवा..लेकिन आज सुबह ध्यान में कृष्ण के दर्शन हुए तथा भीतर चलने वाले यज्ञ का आभास हुआ जिसमें श्वासों की समिधा निरंतर पड़ रही है. उसने एक कविता लिखी थी ‘यज्ञ भीतर चल रहा है’  पर आज उसका अर्थ स्पष्ट हुआ. कृपा निरंतर बरस रही है..वे ही अपना पात्र उल्टा करके बैठे रहते हैं. देह को ही सब कुछ मानकर उस अनुपम खजाने से वंचित रह जाते हैं. परम ही चारों ओर खेल कर रहा है. उनका मन एक रोबोट की नाईं है, बटन दबाया और उसका काम शुरू हो जाता है. वे खुद तो सोये रहते हैं तो जीवन का हाल तो बेहाल होना ही है...सद्गुरू के बिना कौन बतायेगा यह सब ? आज विश्व संगीत दिवस है.     

Tuesday, December 27, 2016

रामलीला मैदान में रामदेव


आज बाबा रामदेव ने हजारों सत्याग्रहियों के साथ मिलकर दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन आरम्भ किया है. वह पिछले कई वर्षों से कालाधन वापस लाने की बात कह रहे हैं, लेकिन सरकार के कानों पर जून तक नहीं रेंगी. इस बार सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ ठोस कदम उठाने ही पड़ेंगे. कल रात को निष्काम कर्म की व्याख्या सुनते-सुनते सोयी थी. मन उल्लास से भरा था. एक अद्भुत स्वप्न देखा. किसी ने उसे ऊपर उठाया, देह नीचे पड़ी थी और स्वयं की आवाज सुनाई दी, वह ...( नाम) नहीं है, वह है..कई बार यह वाक्य गूँजा और उसे नीचे छोड़ दिया गया, बाद में भी मन में यही विचार आता रहा..स्थिरता की सी मन: स्थिति बनी है सुबह से..

कल सुबह टीवी पर जब सुना, बाबा रामदेव को गिरफ्तार कर लिया गया है, उन्हें वस्त्र बदल कर छुपना पड़ा, जब वह भाग रहे थे तो पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और मैदान में सोये हजारों लोगों को वहाँ से निकाल दिया गया है तो मन विषाद से भर गया. कल दिन भर समाचार ही सुनते बीता. लोगों के मनों में दर्द है, उनके कार्यकर्ताओं को खदेड़ा गया, पीटा गया और कइयों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. शासन में रहने वाले लोग स्वयं को खुदा मानने लगते हैं. लोकतंत्र में ऐसी अमानवीय घटना का होना कितना दुखद है. सरकार को इसका परिणाम भुगतना ही पड़ेगा. देश में जो माहौल बन रहा है वह कुछ परिवर्तन लाकर ही रहेगा. लोकतान्त्रिक व्यवस्था में इसकी अति आवश्यकता है. इतिहास बन रहा है, पीड़ादायक क्षणों से गुजरना होगा, तभी तो नये राष्ट्र का जन्म होगा.

आज सुबह उन्होंने फूलों से भरे वृक्षों की कुछ तस्वीरें उतारीं. यह जगत कितना सुंदर है कोई ध्यान से देखे तो..जून को उसने कहा वह एक ब्लॉग की शुरुआत करें, जिसमें हर दिन कोई सूक्ति लिखी जाये. दीदी ने लिखा है, वह भगवद्गीता को ब्लॉग में लिखकर एक शुभ कार्य कर रही है, पर उसे लगता है वही करवा रहा है जिसकी यह गीता है. बाबा का अनशन जारी है, उन्होंने शेष सभी को तोड़ने के लिए कह दिया है. उनका जज्बा और जोश बरकरार है. अपनी तरफ से उन्होंने सबको क्षमादान भी दे दिया, सन्यासी का दिल कितना कोमल होता है. सरकार उन्हें राष्ट्रभक्त की जगह राष्ट्रद्रोही मान रही है. आज उनका उद्बोधन सुनते-सुनते उसका मन भी द्रवित हो गया.
आज सम्भवतः बाबा अपना अनशन तोड़ देंगे. श्री श्री और मुरारी बापू उनसे मिलने जाने वाले हैं.  उनके गुरूजी ने कहा, “शब्दों की शक्ति को पहचानना है, कुछ भी बोलने से पहले सोचना चाहिए कि श्रोता उसे किस रूप में ग्रहण करता है. आत्मा में मन लगे तो पुण्य और पदार्थ में लगे तो पाप होता है.” पाप और पुण्य की यह परिभाषा बहुत अच्छी है.


Monday, December 26, 2016

चटकीले फूलों वाले पेड़

पूर्ण जगत को ब्रह्ममय देखने की विधि मुरारीबापू ‘तुलसी’ के माध्यम से बता रहे हैं. उनकी कथा अद्भुत भावों से भर देती है. अहंकार, गर्व, दर्प, अभिमान या अविश्वास जब जीवन में हों तो दुःख आने ही वाला है, रावण को उसका अहंकार ही ले डूबा. बापू कह रहे हैं, अहंकार मोह के कारण है और  मोह रूपी वृक्ष की जड़ें हैं, अज्ञान, मूढ़ता, अभाव, कमी तथा अनादर. इसका तना है जड़ता अर्थात अपनी मूढ़ता से टस से मस न होना. भ्रांतियां ही उसकी शाखाएं हैं, संशय, कुतर्क, भ्रमित चित्तवृत्ति ही डालियाँ हैं, चंचलता ही पत्ते हैं. दुःख ही इस वृक्ष का फूल है. सद्गुरू की कृपा से ही यह सम्भव है कि कोई अहंकार शून्य हो सके. भीतर जो रजोगुण है, वह संतों की चरणरज से ही मिटता है. कल रात ऐसा लगा सोई और जग गयी. जून और नन्हा कल आश्रम गये थे, गुरूजी भी वहाँ थे, भेंट भी हो गयी. उन्होंने जून से पूछा, हैप्पी ? जून का विश्वास दृढ़तर होता जा रहा है. नन्हे का विश्वास भी समय आने पर दृढ होगा, उसे परमात्मा स्वरूप सद्गुरू के दर्शन हुए, इतने पुण्य तो जगे हैं, अब सब उन्हीं पर छोड़ देना होगा. उसने नये दफ्तर में शिफ्ट कर लिया है, आजकल वह बहुत व्यस्त है. रजोगुण शेष दोनों गुणों को दकर प्रमुख हो रहा है. यही उचित है, ऊर्जा को निकास के लिए कोई तो मार्ग चाहिए..


आज ध्यान में अद्भुत अनुभव हुआ. सम्भवतः पिछले जन्मों की झलक थी, कुछ दृश्य इतने स्पष्ट दिखे. पहले एक स्त्री फिर मार्जारी तथा फिर एक राजस्थानी भाषा बोलती एक आकृति, महिला या पुरुष कुछ समझ में नहीं आया, केवल भाषा मारवाड़ी सुनाई दे रही थी. कितने रहस्य भरे हैं उनके अचेतन में. आज उसका जन्मदिन है, बिलकुल अनोखा और अलग सा..जब भीतर का सब कुछ बदल गया हो तो बाहर सब कुछ अपने आप बदलने लगता है.

जून का प्रथम दिन ! वर्षा बदस्तूर जारी है. सुबह वे टहलने गये तो फुहार पड़ने लगी. सडकों पर कई जगह पीले अमलतास, लाल गुलमोहर, गहरे पीले रस्ट वुड तथा बैंगनी रंग के फूल बिछे थे, रूद्र पलाश भी अनेक जगह बिखरे हुए थे. प्रकृति में रंगों की भरमार है, अनूठे, चटख रंगों के फूल वर्षा  पूर्व पेड़ों को मनमोहक बना देते हैं. इस तेल नगरी की ये सैरें उन्हें बाद में याद आयेंगी. लेकिन उन्होंने तो वर्तमान में रहने का अनोखा गुर अपना लिया है. परसों उसका जन्मदिन था, सुबह अनोखी थी, दोपहर को अहंकार आड़े आ गया, जिससे शाम का कार्यक्रम भी प्रभावित हुआ. मन ही सारे दुखों की जड़ है, आत्मा सारे सुखों की खान है. आत्मा में रहो तो कितने हल्के-हल्के रहते हैं तन-मन दोनों ! दीदी को जन्मदिन की कविता भेजी है. ब्लॉग पर कथा से प्रेरित होकर भक्ति भाव से लिखी कविता पोस्ट की है. आज बरामदे में व बाहर बगीचे में दो सर्प दिखे, उसने फोटो भी लिए और वीडियो भी.