Monday, May 11, 2015

गुलदाउदी के फूल


कल जून का प्रजेंटेशन था, सभी डायरेक्टर आये थे और सीएमडी भी. वह काफी दिनों से इस पर कार्य कर रहे थे. अच्छा रहा, पूरा दिन वहीं लग गया पर शाम को जब वह घर आये तो चेहरा सफलता की चमक से दमक रहा था. पिछले कई महीनों से वह अपनी टीम के साथ इस कार्य में व्यस्त थे. आज वह फील्ड गये हैं. उन्हें अपने कार्य में इस तरह लगे देखकर बहुत अच्छा लगता है. जबसे उन्होंने कोर्स किया है, जीवन नियमित हो गया है. तन-मन स्फूर्ति से भरा रहता है और अब वह सुबह-सुबह सत्संग भी सुनते हैं. कहीं गहरे छिपी भक्ति की भावना भी उभर रही है. वह पहले से शांत हो गये हैं. योग करने से मन को एकाग्र कर पाते हैं. सद्गुरु की उन सभी पर असीम कृपा है. उसे ध्यान में अब अधिक रूचि हो गयी है, ध्यान उसके लिए स्नान जैसा आवश्यक कार्य हो गया है. जिसमें आत्मा को स्नान कराते हैं ताकि जो भी धूल-धब्बे उस पर लग गये हैं वह धुलें और कबीर की तरह वह भी कह सके “ ...जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया” जीवन में जो कुछ भी मिलता जाये या छूटता जाये सहज भाव से उसे स्वीकार करते हुए अपने एकमात्र लक्ष्य की ओर बढना है. कृष्ण का हाथ थामा है, अब वही रास्ता दिखायेगा, वह अपना वचन भूल नहीं सकता ! आज इस समय ग्यारह बजे हैं, उसे अकेले ही भोजन करना है. जून के आने में अभी देर है. आज शाम को उन्होंने एक मित्र परिवार को भोजन के लिए बुलाया है.  

ठंड अब शुरू हुई है, दिसम्बर का मध्य आने वाला है. सुबह सवेरे एक परिचिता ने फोन करके कुछ फूल मांगे, थोड़ी देर के लिए मन संशय में पड़ गया, उसे फूल तोड़ना अच्छा नहीं लगता पर बाद में लगा यह भी तो मोह है, तत्क्षण कहा, वह ले सकती है, सम्भवतः वह आएगी अथवा उसके रवैये से यह समझेगी कि वह उसे देना नहीं चाहती, खैर अब जो होगा उसे देखना है, भूत को तो बदल नहीं सकते. शायद वह सजग नहीं थी, तभी मन मोहित हो गया, और चित्त में कुछ देर को विक्षोभ हुआ. फूल भी तो परमात्मा के हैं, सहज ही देने की प्रेरणा मन में जगे इसके लिए उसे स्वयं को भरपूर मानना होगा. ताकि भविष्य में दोनों हाथों से देने की कला विकसित हो. मनुष्य अपनी इच्छा से ही धनी या निर्धन बनता है.


आज क्रिया के उपरांत अद्भुत अनुभव हुआ, जैसे वह अनंत है, निस्सीम, भीतर के खजाने जैसे खुल रहे हैं. क्रिया करने से पूर्व सद्गुरु और कृष्ण से प्रार्थना की थी. सच्चे दिल से की प्रार्थना कभी व्यर्थ जा ही नहीं सकती, उसे तो पल-पल अपनी प्रार्थना का जवाब मिलता है. वह कृष्ण उसकी बात सुनता है बल्कि वह स्वयं को उसे जनाता है. घर में पिछले दो दिनों से सफाई, रंग-रोगन का कार्य चल रहा है. जून ने छुट्टी ली है दो दिनों की. नन्हा स्कूल गया है, कल उसकी पिकनिक अच्छी रही. पानी में सभी बच्चे बहुत देर तक रहे. कल रात काफी वर्षा हुई, गुलदाउदी के पौधे जो फूलों से भरे थे, पानी की बौछार से झुक गये थे, सुबह उन्हें ठीक किया तो ऐसा लग रहा था जैसे वे उसके स्पर्श को महसूस कर रहे हों. जीवन कितना अद्भुत है न, हर वस्तु में चेतना है, एक ही चेतना, सभी में स्पंदन है, वे वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में देखें तो सभी कुछ कितना सुंदर है. एक नंग-धडंग काला-कलूटा बच्चा भी अपने भीतर वही चेतना छिपाए है, असीम सम्भावनाओं का भंडार.. उनके शरीर, मन, बुद्धि भले ही सीमा में बंधे हों, पर उनकी आत्मा यानि वे जो वास्तव में हैं, वह असीमित है, उसके सान्निध्य में वे भी असीम हैं, जीवन मुक्त, चिन्मय और शाश्वत !  

Thursday, May 7, 2015

ईसा की वाणी


ईसा ने जगत के लिए अपने प्रेम का प्रदर्शन स्वयं मरकर किया. वह कहना चाहते हैं कि यदि कोई उससे प्रेम करता है तो उसे भी मरना होगा, ध्यान में जो हर दिन मरता है वह आत्मा में जीता है. ईसा भी जी उठे थे इसका अर्थ उसे यही लगता है कि देह की सुख-सुविधाओं को ताक पर रखकर उसे परहित में लगाना है. देह जितना-जितना सधेगी आत्मा उतनी-उतनी जगेगी. ज्यादा सुख भी दुःख का कारण बन जाता है, सुविधा भोगी की आत्मा कभी जागृत नहीं होती. सेवा से ही जीवन का विकास होता है. जीवन में प्रमाद न हो, तंद्रा, निद्रा कम से कम हो, आलस्य न हो, इन्द्रियों की न सुने बल्कि उस चैतन्य की सुने जो भीतर निरंतर देख रहा है, साक्षी है, जो उन्हें चमकाना चाहता है ताकि वे अपना सच्चा स्वरूप देख सकें, जो अनंत है अविनाशी है. ईश्वर से प्रेम है यह सिर्फ होठों से नहीं जीवन से दिखाई पड़ना चाहिए. जीवन तो वैसा ही रहा जैसे पहले था तो सारा प्रेम मात्र मनोधर्म बन कर रह जायेगा !

अभी-अभी पिछले कुछ पन्नों पर लिखे अपने मन के विचार-भाव उसने पढ़े. एक और वर्ष खत्म होने को है. वर्ष के अंतिम माह का दूसरा दिन है. पिछले दो दिन व्यस्त रही, सो कुछ नहीं लिखा. आज भी सुबह ढेर सारे कपड़े प्रेस करने थे, और इस समय यानि दोपहर के एक बजे का कार्य भी तय था, फिर डायरी का ध्यान आया. अध्यात्मिक पथ पर ले जाने वाले अपने सद्गुरु की शिक्षाएं वह इसमें लिखती आ रही है. अपने अनुभव भी और अपने मन के भाव भी. अटूट सम्पत्ति जो इस पथ के राही को मिलती है वह है ज्ञान, धैर्य, संतोष और आनंद. सद्गुरु ने उन्हें आनंद और प्रेम से ओतप्रोत कर दिया है. हृदय न जाने किस लोक में रहता है कि भौतिक बातें अब किसी और ही दुनिया की लगती हैं. ईश्वर को कोई यदि अपने जीवन से जोड़ता है तो व्यर्थ के कार्य-कलाप अपने आप ही छूटते चले जाते हैं. सार को सम्भालने की आदत रहती है तब संसार छूटने लगता है. व्यर्थ का शब्द मुँह से निकले तो मन स्वयं को कचोटता है. कोई गलत कार्य न हो, किसी प्राणी की हिंसा न हो, ये सारी बातें मन सचेत होकर देखता है. आते-जाते, खाते-पीते वह मनमोहन याद आता रहता है, आता ही रहता है, उसे अर्पित करके भोजन किया जाता है, उससे इतनी निकटता का अनुभव होता है कि हर कार्य में उसे शामिल किया जाये ऐसे प्रेरणा होती है. संतों के प्रति कृतज्ञता, सम्मान की भावना और शास्त्रों के स्वाध्याय की प्रेरणा जगती है. ध्यान करना नहीं पड़ता होने लगता है. तन हल्का-हल्का सा रहता है, मन खिला-खिला से, वह कान्हा अगर किसी का मीत बनता है तो वह निर्भार होकर रहता है. उसके संकल्प अपने-आप ही पूर्ण होने लगते हैं, कहीं कोई अभाव नहीं रहता !      



Wednesday, May 6, 2015

अवतारों की कथाएं


आज सुबह सुबह बाइबिल की घटनाओं से जुड़ा एक स्वप्न देखा, वह प्रभु को पुकार रही है, जैसे प्रेरित पुकारते थे और वह सारे कष्टों को हर लेता है. कैसा अद्भुत आनंद है ईश्वर में जो निरंतर झरता ही रहता है. उसके कानों में एक झींगुर के गीत सी एक ध्वनि हमेशा गूँजती रहती है. कभी-कभी चिड़ियों के कूजने की आवाज भी और यह हर पल उसे उसकी याद दिलाती है. आज टीवी पर श्रीश्री को भी देखा, सुना. अवतारों की जो कथा उन्होंने उस दिन आरम्भ की थी, आज पूर्ण कर दी. राम अवतार में ईश्वर ने मर्यादा का पालन करना सिखाया तो कृष्ण अवतार में उत्सव मनाना. फिर बुद्ध अवतार में मौन रहकर प्रज्ञा की खोज. कल्कि अवतार यानि वर्तमान में रहते हुए हृदय से परायेपन की भावना का नाश करना. साधना के द्वारा जब हृदय में इतना प्रेम जग जाये कि कोई दूसरा लगे ही नहीं, सभी अपने ही लगें तो समझना चाहिए कि हृदय में कल्कि अवतार हुआ है. सारे अवतार मानव के भीतर भी होते हैं. उन्होंने कितने सरल शब्दों में बताया, कृष्ण संतों के हृदय रूपी नवनीत को चुराते हैं. बाबाजी ने आज बहुत हँसाया, वह इतनी अच्छी राजस्थानी भाषा बोलते हैं. मस्ती से छलकती हुई उनकी वाणी सुनकर ईश्वर की निकटता का अहसास होता है. देहभाव से मुक्त कर वह आत्मभाव में स्थित कर देते हैं. संतों के गुणों का बखान नहीं किया जा सकता, वे सोये हुए ज्ञान को जागृत करते हैं, सत्संग प्रदान करते हैं, जो बहुमूल्य है !

आज भी सद्गुरु के वचन सुने. मन जो इधर-उधर बिखरा हुआ है उसे युक्तिपूर्वक हटाकर एक केंद्र पर लाना ही ध्यान है. ईश्वर की कृपा सहज, स्वाभाविक रूप से सदा प्राप्त होती ही रहती है जैसे सूरज की धूप, तो उसके लिए मन को सहज रूप से ध्यान में लगाना है. इसमें कोई जोर जबरदस्ती नहीं चलती. मन वर्तमान में रहे तो यह अपने आप होता है. आज का वर्तमान ही कल का भूत बनने वाला है और भविष्य तो वर्तमान पर निर्भर है ही. भक्ति पूजा, आराधना और समर्पण सहज कार्य हो जाएँ तो समझना चाहिए की ज्ञान फलित हो रहा है. मन में क्या चल रहा है इस पर नजर रखना भी सहज होना चाहिए.  

आज साधना के तीसरे और चौथे सोपानों – षट सम्पत्ति तथा मुमुक्षत्व के बारे में सुना. मन बेचैन न हो प्रसन्न रहे तो शम की सम्पत्ति पास है. दम अर्थात इन्द्रियों का निग्रह. कुछ मनचाहा हो या अनचाहा, उसे सहन करने की क्षमता का नाम ही श्रद्धा है. ज्ञान को पाने की इच्छा, पाने की सम्भावना ही श्रद्धा है. देह से दिन-रात तरंगें उठती रहती हैं. यह समता में हों तो समाधान है. तरंगे ग्रहण भी की जाती हैं, यह आदान-प्रदान समता में हो तो तृप्ति का अनुभव होता है. किसी भी कार्य में खुश रहने की क्षमता ही उपरति है. उपरति होने से कोई संवेदनशील होता है. वह समष्टि का प्रिय है, और यह समष्टि चाहती है कि वह प्रसन्न रहे. जीवन का अंतिम ध्येय क्या है, इसे जानना ही, जानने की इच्छा ही मुमुक्षत्व है. जब सब कुछ बंधन लगता है, तभी मुक्ति की चाह होती है. आजादी की प्यास ही मुमुक्षत्व है. पूर्ण तृप्ति की प्यास ही मुमुक्षत्व है. नित्य की तृप्ति अनित्य से कैसे हो सकती है !  


क्लब में ग्रीन फेयर


आज सुबह वह चार बजे ही उठ गयी, नन्हे का ट्यूशन नहीं था सो उसे उठाया साढ़े पांच बजे, क्रिया आदि करने के बाद. वह बहुत नाराज हुआ, पिछली रात उसने कहा था, चार बजे उठाने के लिए, पर नूना ने कहा, वह रात को जल्दी सोता तो है नहीं, इसलिए नहीं उठाया, वैसे उसे याद भी नहीं रहा था. नाराज होकर गया था, सो सारी सुबह वह उसी के बारे में सोचती रही, पर स्कूल से लौटा तो सामान्य था. कल शाम वह उसे सत्संग से सखी की जन्मदिन की पार्टी में ले गया था. जून का फोन आया, उन्होंने अपनी शापिंग लिस्ट सुनाई, कल सुबह वे बहन के घर जाने वाले हैं. कभी-कभी नन्हा और उसे उनकी कमी बहुत खलती है. आज एक परिचिता का फोन बहुत दिनों के बाद आया. एक और दुखद समाचार मिला, असमिया सखी की माँ का स्वर्गवास हो गया है, वह घर चली गयी है, अगले हफ्ते के अंत में आएगी. दोपहर को एक सखी आई, आधा घंटा बैठी रही. शाम को एक सखी के साथ टहलने गयी. आजकल वह बाइबिल पढ़ रही है, अच्छा लग रहा है. ईसा एक दिव्य पुरुष थे, उसे वह एक सद्गुरु लगते हैं जिन्हें लोग समझ नहीं सके. उसे वह उतने ही प्रिय लगते हैं जैसे कृष्ण. बाइबिल की कहानियाँ कितनी अद्भुत हैं, और कैसे होंगे वे लोग जो जीसस के प्रचारक बने, उनके निकट के शिष्य. उसने सोचा, अन्य धर्मों के बारे में जाने बिना ही उनके बारे में धारणा बना लेना कितना गलत है. सभी धर्म उसी एक की तरफ ले जाते हैं. ईश्वर एक है, जो सभी का है, जो प्रेममय है. नन्हे शिशुओं की तरह निष्पाप आत्मा उसने सौंपी थी, पर वे उस पर लोभ, क्रोध, बैर, वैमनस्य, पाप के धब्बे लगाते ही जाते हैं और फिर वह इतनी बदरंग हो जाती है कि वे उससे बचना चाहते हैं. दूने जोश से स्वयं को प्रकृति में, जो मृण्मय है, जोतते हैं, लेकिन चिन्मय आत्मा भीतर भीतर सजग तो रहती है. फिर ज्ञान के जल से उसे धोकर, भक्ति के वस्त्र से उसे पोंछ कर गुरू की शरण में जाकर उससे पुनः परिचित हुआ जा सकता है. उस आनंद का अनुभव होता है जिसे वस्तुओं के बोझ तले दबा दिया था. वह आत्मिक ज्ञान उन्हें चारों ओर से घेर लेता है क्योंकि वही उनका वास्तविक परिचय है.

सुबह जून को फोन किया, वह नींद में थे, सो बात ज्यादा नहीं हुई. फिर ससुराल में माँ  से बात हुई. कह रही थीं, यहाँ की बहुत याद आती है. नन्हे ने उस मित्र को दोपहर लंच पर बुलाया था, जिसकी माँ घर गयी हुई हैं. शाम को उसके पिता लेने आयेंगे. आज शाम को एक सखी उसे चाय के लिए क्लब ले जाएगी, जहाँ ग्रीन फेयर है. कल शाम एक मित्र परिवार आया, उनके पिताजी भी साथ थे, अंकल के साथ भक्ति और वेदांत पर थोड़ी चर्चा हुई, अच्छा लगा. ईश्वर है यह मानना ही तो पर्याप्त नहीं, उन्हें उसका अनुभव करना है. उसके लिए पहले खुद को जानना है. स्वयं को जानकर ही हृदय में कृतज्ञता का भाव जगता है फिर यही कृतज्ञता प्रेम में बदल जाती है और फिर भक्ति का. भक्ति ज्ञान के बिना टिकती नहीं और ज्ञान भक्ति के बिना अधूरा है. जब वह उनसे बात कर रही थी भीतर उसे लग रहा था की ईश्वर से प्रेम करना उसके लिए कितना सहज है, स्वाभाविक है क्योंकि एक वही है जो प्रेम किये जाने के योग्य है. अब उसकी चाहना है कि उसकी सृष्टि के प्रति भी वैसा ही सहज प्रेम जगे, वही प्रेम हृदय को पूर्ण मुक्त करेगा, जब कहीं कोई दुराव नहीं रहेगा, कोई अपेक्षा भी नहीं, जीवन एक उपहार बन कर हर दिन सम्मुख आएगा. पुकार-पुकार कर सुख की गुहार नहीं लगानी होगी, वह स्वभाव ही बन जायेगा. ऐसा अखंड सुख जो पीड़ा को भी एक खेल बना देता है. ईश्वर कितना महान है, उसका सामीप्य कितनी शक्ति से भर देता है, निर्भार कर देता है, उसकी बात ही निराली है, वह सभी आत्माओं का आत्मा उसका कान्हा है !


Monday, May 4, 2015

बरामदे में गमले


जून कल दोपहर दो बजे मुम्बई के लिए रवाना हुए, वह दिल्ली होते हुए रात्रि साढ़े दस बजे वहाँ पहुंचें. उनकी याद कल दिन में कई बार आयी. शाम को वह टहलने गयी, दिन में आलमारी सहेजी. सर्दियों के वस्त्र निकले, गर्मियों के रखे. बरामदे के गमले बाहर रखवाए थे, आज माली ने निराई की. अभी कुछ देर पूर्व जून का फोन आया. उन्होंने भी ‘क्रिया’ की, उसने भी सुबह पौने पांच बज उठकर वे सभी कार्य किये जो वे रोज करते हैं. सद्गुरु का ज्ञान उसके साथ है. उसे लगता है यह देह कृष्ण का मन्दिर है, इसे स्वस्थ-सुंदर रखना उसका कर्त्तव्य है, स्वस्थ रखना तो और भी आवश्यक है, मन में उसकी मूरत जो बसी है. वह उसके इतने निकट है कि कभी-कभी उसका स्पर्श भी महसूस होता है, सारा जगत जैसे अदृश्य हो जाता है, सिवाय एक उसकी स्मृति के वह अन्य किसी छोटी-बड़ी बात को स्थान देना नहीं चाहती. वह नितांत अपने लगते हैं, पूर्व हितैषी, पुराने मित्र, जाने पहचान से और बेहद प्रिय ! कृपा उसपर अवश्य हुई है अन्यथा इतने सारे सालों में पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ.

आज सुबह चार बजे से पहले ही नींद खुल गयी थी, वर्षा हो रही थी. स्नान-ध्यान आदि किया, समय की यदि कोई कद्र करे तो समय भी संभालता है. आज ‘जागरण’ में ध्यान के सूत्र सुने. सरल शब्दों में धीरे-धीरे बड़े प्यार से सद्गुरु ने कुछ बातें बतायीं, कि ध्यान करते समय यदि शरीर में कहीं दर्द हो तो उसे गहराई से महसूस करना है, उसके भीतर जाना है. शरीर का वह अंग उस बच्चे की तरह है जो माँ का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता है. ध्यान धारणा पर आधारित होना चाहिए, कल्पना पर नहीं. अपने शरीर के अंग-प्रत्यंग की भाषा को सुनते हुए, श्वास-प्रश्वास पर अपना ध्यान टिकाते हुए जब मन एकाग्र हो जाये तो वही ध्यान है. उसके बचपन से किये कितने ही छोटे-बड़े अपराध आजकल याद आते हैं और तब लगता है इतना कलुषित था तब मन फिर भी ईश्वर की निकटता का अनुभव वह कर सकी, अर्थात उसका आश्रय लो तो सारे कलुष धुल जाते हैं. वह स्वच्छ कर देता है. भीतर से भी बाहर से भी. अपने सारे अपराधों की क्षमा मांगते हुए उसने कुछ आँसूं बहाये तो मन हल्का हो गया और आश्चर्य तो इस बात का कि ज्यादातर ऐसे में सिर भारी लगता है. सदगुरुओं की कही सारी बातें सच प्रतीत होती लगती हैं. उसके अंतर में लगा भक्ति का बीज अंकुरित हो रहा है और यह बेल बढ़ती ही जाएगी. आज एक सखी का जन्मदिन है, शाम को उन्हें जाना है.

आज फिर तमस ने अपना प्रभाव दिखाया. सुबह नींद नहीं खुली. नन्हे के मित्र ने फिजिक्स ट्यूशन पर जाने के लिए पांच बजे फोन करके उठाया. नन्हा अब समझदार हो गया है, फौरन उठकर चला गया. कार ले गया था, वापस आया तो स्कूल के लिए तैयार हुआ और दौड़ते हुए बस स्टैंड तक पहुंचा. नूना की गलती की सजा उसे उठानी पड़ी, खैर अंत भला तो सब भला ! जून से फोन पर बात भी की, आज वे वहाँ किसी संबंधी से मिलने वाले हैं.






Saturday, May 2, 2015

जयंत विष्णु नार्लीकर का भाषण


पिछले तीन दिन डायरी नहीं खोली. शुक्रवार को सद्गुरु की पावन वाणी सुनी. ‘नारद भक्ति सूत्र’ पर उनकी चर्चा aol के टीचर ने सुनवाई, वे तीन घंटे बैठे रहे और भगवद चर्चा सुनते रहे. अगले दिन दोपहर से किचन व स्टोर की सफाई सफेदी आदि हो रही थी, उसी दिन शाम को वैज्ञानिक जयंत विष्णु नार्लीकर का भाषण भी था क्लब में, अच्छा लगा. वे एक भौतिकीय वैज्ञानिक हैं, और विज्ञान कथाएं लिखते हैं. उन्होंने कहा, भारतीयों को अपना दृष्टिकोण अधिक वैज्ञानिक बनाना चाहिए, अंधविश्वासों के चंगुल से निकल कर नई सोच को अपनाना चाहिए. ब्रह्मांड के बनने की बिग बैंग थ्योरी में उनका विश्वास नहीं है. इतवार को भी दिन भर रंग-रोगन का कार्य चलता रहा. सोमवार यानि कल सुबह थोडा देर से उठे, सो सारी सुबह सभी आवश्यक कार्यों में ही निकल गयी. आज सुबह  अपने सही समय पर शुरू हुई, सो अभी पौने आठ ही बजे हैं. जून आज शिवसागर जाने वाले हैं, शाम को सात बजे तक आएंगे.

आज सुबह से ही झड़ी लगी है वर्षा की, सर्दियों में जब बरसात होती है तो उसका अलग ही रूप होता है. सभी कुछ शीतल है, फर्श, हवा, दीवारें और..टमाटर के पौधे लुढ़क गये हैं, उनमें लकड़ी लगाकर सहारा दिया. कल माली ने गमलों के लिए नई मिट्टी तैयार की थी, उसे भी ढका. अब बरसात रुकने पर ही दो-तीन दिन धूप लगेगी तभी वह मिट्टी भरने लायक होगी. मिट्टी में कितनी उर्वरता छुपी होती है, सारे फूल जो उन्हें मिलते हैं उसी में तो छुपे होते हैं. नन्हे को आज स्कूल नहीं जाना था सो सुबह आरामदेह थी. उसके स्कूल में आजकल पढ़ाई कम और रिहर्सल ज्यादा हो रही है. दो दिन बाद इंटर हाउस मीट है. कल उसका फिजिक्स प्रैक्टिकल है और परसों साइबर ओलम्पियाड है. जून इस इतवार को मुम्बई जा रहे हैं. ईश्वर उन सभी के साथ हर क्षण है, वह है तो वे हैं !

आज सद्गुरु ने आठ लक्ष्मियों का वर्णन किया, विद्या, धन, धैर्य, धन्य, राज, साहस, संकल्प और भाग्य लक्ष्मियों का. सभी के पास उन सभी का कुछ न कुछ अंश रहता ही है. लक्ष्मी नारायण तक पहुंचने का साधन है. धर्म का पालन करने के लिए भी धन, धैर्य और विद्या की आवश्यकता होती है. धर्म कहें या सत्य वही तो नारायण है, और वह पूर्ण है, पूर्ण की पूजा पूर्ण हुए बिना नहीं हो सकती, अर्थात सहज स्वरूप में स्थित हुए बिना पूजा नहीं हो सकती. इसका अर्थ हुआ की जो कुछ प्राप्त करना है आत्मा के पास ही है, वह उसका ही प्रकाश है.

आज जागरण में अवतारों पर सुना. पहला है मत्स्यावतार, मछली एक ऐसा प्राणी है जो कभी आंख बंद नहीं करता. अर्थात सदा जाग्रत, उन्हें भी ज्ञान रूपी जागरण में स्थित रहना है. निद्रा अज्ञान का प्रतीक है. दूसरा है कूर्मावतार, जो स्थिरता का प्रतीक है. ज्ञान को स्थिर करना है तभी उसका लाभ मिलेगा. ज्ञान में स्थिर होकर ही मन में चलने वाले सुरों और असुरों के मध्य होने वाले मंथन को सह सकते हैं. तीसरा है वराहवतार, जो स्वच्छता फैलाता है. चित्त की शुद्धि के लिए इसकी आवश्यकता है. नरसिंह अवतार जोश और संवेदनशीलता का समन्वय है, विकारों से लड़ने के लिए कठोर होने की भी जरूरत है और साथ ही संवेदनशील होने की भी. इसके बाद ही जीवन में आह्लाद की उत्पत्ति होगी. सद्गुरु की बातें अनोखी हैं, उनका कहने का अंदाज अनोखा है. नारायण ॐ का उनका उच्चारण भी अनोखे नृत्य की भाव-भंगिमाओं से पूर्ण था. उन्हें देखते व सुनते समय उसके भीतर-बाहर एक अनोखा उल्लास छा जाता है. ईश्वर उसके बिलकुल निकट आ जाता है. वह कहते हैं ईश्वर को देखना या पाना नहीं है बल्कि उसमें होना है...उसे अपने भीतर-बाहर समोना है !     



Friday, May 1, 2015

पुस्तक मेला


आज दीपावली का अवकाश है. जून डिब्रूगढ़ गये हैं. एक मित्र की नई कार आ रही है सेंट्रो. नन्हा सुबह कोचिंग गया वापसी में ‘बुक फेयर’ भी गया, दो बजे लौटा, उसे किताबें बहुत पसंद हैं. उन्हें देखते-देखते वह भोजन भी भूल गया. नूना का आज अमावस के कारण फलाहार था, तन और मन दोनों हल्के-हल्के हैं. सुबह छह बजे से थोड़ा पहले वे उठे. क्रिया के बाद ध्यान में आज कृष्ण की झलक दिखाई दी..नीला तन...और... जैसे कोई पर्दे के पीछे से झांककर लुप्त हो जाये. उसकी आत्मा पर पड़ा आवरण झीना होता जा रहा है. प्रकाश स्पष्ट दिखाई देता है, आँखें बंद करते ही और कभी तो आँखें खुली रखकर भी. वस्तुएं अपना ठोसपना खोने लगती हैं यदि उन्हें एकटक कुछ क्षण के लिए देखे. पहले जिस पर क्रोध आता था अब वैसी ही घटना होने पर मन शांत रहता है. तेजपुर से aol की साधिका का कार्ड आया है, वह भी उन्हें नये वर्ष पर भेजेगी. कल सभी से बात हुई सिवाय छोटी बहन के, आज रात वे उसे फोन करेंगे. इस वर्ष नन्हे ने बिजली की चार नई लड़ियाँ घर को जगमगाने के लिए दीवाली पर लगाई हैं. कल उन्होंने दीपकों व प्रकाश की कई तस्वीरें भी उतारीं.

रस के बिना हृदय की तृष्णा नहीं मिटती, भक्ति स्वाभाविक गुण है, उससे च्युत होकर वे निस्सार संसार में आसक्त होते हैं. जैसे धरती में सभी फल-फूल व वनस्पतियों का रस, गंध व रूप छिपा है, वैसे ही उस परमात्मा में सभी सद्गुण ! महापुरुषों की महानता, माधुरी, ओज और ज्ञान सब उसी में है. संसार में जो कुछ भी शुभ है वह उसमें है, तो यदि कोई उससे अपना संबंध जोड़े तो वह उसे मालामाल कर देता है. विकार स्वयं ही दूर भागते हैं, मन स्थिर होता है. धीरे-धीरे हृदय समाधिस्थ होता है. उसके रहते संसार का कोई दुःख उन्हें छू भी नहीं सकता. जब इस जगत से कुछ लेना ही नहीं हो, जो भी चाहिए भीतर मिलता हो तो व्यवहार रखने हेतु ही जगत के साथ संबंध रहता है. उसमें फंसने का भय नहीं होता..वहाँ तो बच के निकल जाने की कला आ जाती है. एक बार उसकी ओर यात्रा शुरू कर दी हो तो पीछे लौटना नहीं होता..दिव्य आनंद साथ होता है और तब यह जीवन एक सुखद अनुभव बन जाता है.

टीवी पर ‘रामायण धारावाहिक’ में हनुमान ने जब राम से कहा कि आपके हाथ से पानी में छोड़े गये पत्थर डूब गये तो क्या हुआ, आप जिसे त्याग देंगे वह तो डूबने ही वाला है न ! ..और उसका मन भर आया, ईश्वर को वे भुला दें या ईश्वर उन्हें भुला दें दोनों ही स्थितियों में उनका कोई आश्रय नहीं. कल वह बहुत देर तक निराकार का ध्यान करने का असफल प्रयास करती रही पर मन कहीं का कहीं पहुंच जाता था, फिर कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान किया तो जैसे सब स्थिर हो गया. उसकी स्मृति ही मन को उल्लास से भर देती है, सिर्फ एक शांति बच रहती है या फिर एक पुलक, जो नृत्य करने के जैसी है, ‘नारद भक्ति सूत्र’ पढ़ते समय भी अच्छा अनुभव होता है. संतों, महात्माओं का अनुभव कितना सच्चा लगता है तब...मानव प्रेम किये बिना नहीं रह सकता और भौतिक जगत में ऐसा कुछ भी नहीं जो उसके प्रेम का प्रतिदान दे सके. उसका प्रेम अनंत है. उन्हें सीमित नहीं अपरिमित प्रेम चाहिए और उन्हें ऐसा प्रतिदान ईश्वर के सिवाय और कोई नहीं दे सकता. वह कितना स्पष्ट हो उठता है कभी-कभी कि विश्वास ही नहीं होता. लगता है जैसे कोई स्वप्न है...पर वह सदा उसके साथ है...सद्गुरु का ज्ञान रंग ला रहा है ! जय गुरुदेव !