कल नन्हे का जन्मदिन था। दोपहर को साढ़े बजे वे लोग आये। सामूहिक लंच लाजवाब था। सोनू की मौसी भी आयी थीं।आज जीजा जी का पचहत्तरवाँ जन्मदिन है।दीदी व सभी बच्चों ने मिलकर शानदार उत्सव मनाया, कुछ देर पहले उनके वीडियो देखे। उन्हें जून के भेजे गुलाब मिल गये हैं। ईश्वर उन्हें दीर्घायु प्रदान करे।आज उसने गुरु पूर्णिमा पर लिखे एक लेख का हिन्दी में अनुवाद किया।पहली बार भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सलाहकार सुधांशु त्रिवेदी को सुना। भारतीय संस्कृति के बारे में बहुत जानकारी है उन्हें।
आज गुरु पूर्णिमा है। गुरुजी द्वारा ‘स्पंद कारिका’ पर दी जाने वाली प्रवचन माला आज से शुरू हो रही है।उन्होंने बताया, स्पंदन एक दिव्य चेतन ऊर्जा है। यह ऊर्जा महसूस कर सकती है।ईश्वर उन्हें उनसे अधिक जानता है। जो इस सृष्टि का आधार है, उस शिव को महसूस किया जा सकता है। आत्मा बिना इंद्रियों के देख सकती है, सुन सकती है, छू सकती है। ये सभी शक्तियाँ निर्विशेष आत्मा में हैं।मन के भीतर जो विचार आते हैं, वे वहीं से आते हैं। जब विशेष ऊर्जा उस निर्विशेष ऊर्जा में समा जाती है, तो केवल वही शेष रहती है।यह चेतना सभी शक्तियों को धारण करती है। विषयों की स्मृति से इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। इच्छाएँ भविष्य की ओर ले जाती हैं।जब कोई वर्तमान में होता है, तब अपने सच्चे स्वभाव के निकट होता है। जब जाग्रत व स्वप्न अवस्था में इच्छायें जगती हैं, तो व्यक्ति चेतना से दूर चला जाता है। हर इच्छा पूर्ण होने के बाद उसे वहीं लाकर छोड़ देती है। इच्छा सीमित की हो सकती है।
‘स्पंद कारिका’ का अगला सत्र आरंभ हो गया है। गुरु जी कह रहे हैं, स्वभाव में टिकना ही साधना का लक्ष्य है। नम्रता व सरलता आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं।साधक को सबके साथ एकत्व का अनुभव करना है। जैसे तेल के साथ पानी नहीं मिलता, पर दूध के साथ पानी मिल जाता है; बच्चों के साथ सरलता से जुड़ा जा सकता है पर बड़े अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर लेते हैं।जब कोई ध्यान की गहराई में जाता है, उसे रिक्तता का अनुभव होता है। जब इच्छा का त्याग करता है तब क्षणिक शून्यता का अनुभव होता है, लेकिन उसके बाद आनंद मिलता है। जब कोई सामान्य चेतना के साथ एक हो जाता है, भीतर आनंद का अनुभव होता है। इस अवस्था में कोई अभाव नहीं रहता। समाधि कोई नीरस अवस्था नहीं है। वहाँ जाकर ज्ञात होता है अज्ञान जैसा कुछ भी नहीं है। शून्य से पहले ध्वनि का निर्माण हुआ फिर सृष्टि का।अंतिम स्वतंत्रता का अनुभव तभी होता है, जब कोई ज्ञान का सम्मान करता है, तब वह सजग और सरल हो जाता है।निर्दोष चेतना ही शिव है।
आज शाम को वे कुछ ही दूरी पर स्थित ‘प्रकृति फार्म’ देखने गये। प्राकृतिक खेती के साथ यह की एक विशेषता है पालतू जानवरों को रखने की सुविधा, हरियाली से भरा हुआ यहाँ का वातावरण लोगों को सप्ताहांत बिताने के लिए आकर्षित करता है।दोपहर को नूना ने एओएल का अनुवाद कार्य किया। इस समय गुरुजी ‘स्पंद कारिका’ पर आगे बोल रहे हैं। प्रकृति प्रेममयी है।सर्दी का अनुभव तभी होता है, जब गर्मी का अनुभव कर चुके हैं। सर्दियों में वृक्ष पत्ते गिरा देते हैं, ताकि धूप का आनंद ले सकें, गर्मियों में धर लेते हैं ताकि तेज धूप से बचे रहें।विरोधी भावनाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। एक ही चेतना अनेक रूपों में प्रकट हो रही है।
आज नन्हा व सोनू अकेले ही आये थे। इतवार की सुबह माली से बगीचे में काम कराते हुए बीती।दोपहर को लंच नन्हे और सोनू ने मिलकर बनाया। शाम की चाय के बाद वे चले गये। आज के सत्र में ध्यान करवाने के साथ गुरुजी ने नाड़ी विज्ञान, स्थान शुद्धि और ग्रहों के प्रभाव के बारे में भी कुछ जानकारी दी। यह भी कहा कि यदि कोई किसी पूजा स्थल के पास जाये तो उसकी दोनों नाड़ियाँ चलने लगती हैं। उनके अनुसार किसी के मन के भाव उसकी श्वास में परिलक्षित होते हैं, इसी का आश्रय लेकर कुछ लोग दूसरों के मन के विचार पढ़ लेते हैं। सूर्य गेहूं से जुड़ा है और ह्रदय से, चंद्रमा मन से जुड़ा है और चावल से, मंगल मसूर दाल व रक्त से, बुध हरी मूँग और त्वचा से, बृहस्पति चना दाल और यकृत से, शुक्र चावल और किडनी से, शनि तिल, काली उड़द और दाँतों से, राहु सिर और तिल से, केतु निचले अंगों व जड़ वाली सब्ज़ियों से जुड़ा है।
गुरुजी ने आज कहा, पंछी हर दिन नया गीत नहीं गाते पर वे कभी ऊबते नहीं, उनके लिए हर दिन ही नहीं, हर पल नया है। आत्मा के बारे में बौद्धिक रूप से जानना पर्याप्त नहीं, अस्तित्त्वगत रूप से उसमें टिकना ध्यान है। अनुभव और अनुभवकर्ता जब एक हो जाते हैं, तभी ध्यान घटता है।द्रष्टा ही जब दृश्य बन जाये, तब जगत जैसा भी हो, भाता है। इस जगत में जो कुछ हो रहा है, वह परमात्मा की एक क्रीड़ा है।ज्ञानी ऐसे जीता है जैसे हो ही नहीं, जैसे सारी प्रकृति है, वह वैसे ही हो जाता है। जब किसी को पूर्ण तृप्ति का अनुभव होता है, तभी जीवनमुक्ति का अनुभव कर सकता है। प्रतिदिन की तरह आज भी गुरुजी ने ध्यान कराया।
आज इस प्रवचन माला का अंतिम सत्र है। स्पंद का अर्थ है तरंग, यह सारा ब्रह्मांड तरंगों से भरा है। कुछ सामान्य तरंगें हैं, कुछ विशेष तरंगें हैं। वस्तुएँ और व्यक्ति विशेष तरंगें हैं। विशेष तरंगें, सामान्य तरंगों से उत्पन्न होती हैं। अनंत जब सीमित होता है तब जीव बन जाता है। हरेक के भीतर सामान्य स्पंदन है, जो छिपा है।सामान्य स्पंदन न मुक्त है न बंधा है। प्रेम जीवन का स्रोत है।जब शिव अपना नेत्र खोलते हैं, तब सृष्टि का जन्म होता है। जब कोई सार्वभौम को सिर झुकाता है तो वह शिव से जुड़ता है। शिव और उसके मध्य कोई बाधा नहीं है। जो उसे अनुभव कर लेता है, वह समता को प्राप्त करता है। जगत में भिन्नता है पर सभी के भीतर जीवन शक्ति एक है, जो शिव है। पाँच इंद्रियों के द्वारा जीवन शक्ति ही जगत का अनुभव करती है। शिव एक होकर भी, सबका कारण होकर भी सबसे पृथक है। इसका अनुभव होते ही जीव स्थितप्रज्ञ हो जाता है।उस स्थिति में दो नहीं हैं, एक ही सत्ता है। जगत उस पर आरोपित अध्यास मात्र प्रतीत होता है।