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Thursday, August 11, 2016

श्याम श्वेत चिड़िया


कल बुद्ध पूर्णिमा थी, एक सखी के साथ उसने भजन गाये, फिर माँ-पिताजी के साथ सबने ध्यान किया. फुलमून मैडिटेशन ! ध्यान में एकत्व का अनुभव हो तो भीतर कैसी शांति का अनुभव होता है. अब यह स्वभाव ही हो गया है. व्यर्थ के विचार अब भी आते हैं लेकिन तत्क्षण ही कोई भीतर से सचेत कर देता है. आज ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ टीचर का फोन आया, जो यहाँ आई थीं, उन्होंने मेल ही नहीं देखा सो गुरूजी के जन्मदिन पर लिखी कविता भी नहीं पढ़ी. एक पुरानी परिचिता से फोन पर बात हुई जिनके पति का देहांत कुछ वर्ष पहले हो गया था और जो मृणाल ज्योति में स्वेच्छा से काम कर रही थीं. वह कल बेटी की शादी के बाद लौट आई हैं, स्कूल के पास ही एक कमरा लेकर रहना चाहती हैं. जून कोर्स में गये हैं, वह मानसिक रूप से ज्यादा सबल हुए हैं. सत्य को स्वीकारने लगे हैं. वह आज फिर वह बगीचे में झूले पर बैठी है. परसों कविता लिखी थी, देखे, आज क्या लिखाता है वह ! अभी सूर्यास्त में समय है. पिताजी ने पानी दिया है पौधों को. आज मौसम गर्म है, घास में एक काली सफेद चिड़िया अपनी पूंछ को ऊपर-नीचे करती एक अनोखे अंदाज में कीट खोज रही है. आज सुबह उन्होंने कितने पंछियों की आवाजें सुनीं. कल वे वीडियो कैमरा लेकर जायेंगे, फिल्माएँगे एक सुबह.. आज पड़ोसी  कुछ खेल रहे हैं, शायद बैडमिंटन या ऐसा ही कुछ..बगीचे में कितने रंगों के फूल खिले हैं, जीनिया, कॉसमॉस, जरबेरा, गुलाब, फॉरगेट मी नॉट, पेशेंस तथा अन्य दो-तीन तरह के, जिनके नाम वह नहीं जानती. कुछ वर्षों के बाद जब इस जगह से नाता छूट जायेगा तब कोई और बगीचा होगा लेकिन फूल तो हर कहीं एक से ही होते हैं, अभी-अभी एक ज्योति की झलक मिली, कई बार लगता है जैसे एक क्षण के लिए प्रकाश झलका हो...परमात्मा की कृपा उस पर हर पल बरस रही है..सद्गुरु के लिए एक और कविता लिखनी है गुरु पूर्णिमा के लिए.....भीतर के शून्य को दिखाने वाले..जीवन के सारे सवालों के हल पल में हाजिर कर देने वाले सद्गुरू के लिए जितना लिखे कम है..

आज दीदी की बहू का जन्मदिन है, अभी-अभी फेसबुक पर पढ़ा तो शुभकामना दी और उसे फोन भी किया. आज सुबह तीन बजे अचानक बिजली चली गयी, वे जल्दी उठे फिर प्रातःभ्रमण के लिए गये, फोटोग्राफी की. दोपहर भर गर्मी से त्रस्त रहे, इस समय मौसम अच्छा हो गया है, हवा में ठंडक है जिसका स्पर्श सुकून से भर रहा है.


आज से नया महीना आरम्भ हो गया है. परसों उसका जन्मदिन आया और चला गया. दिन भर व्यस्तता में गुजरा. दोपहर को बच्चों के लिए मिठाई लेकर गयी. शाम को मैंगो शेक के साथ छोटी सी पार्टी. कल सुबह-सुबह श्री श्री के आश्रम में गोली चलने की बात सुनी, दिन भर एक अजीब सी उदासी छायी रही. उनका एक इंटरव्यू सुना. वह कह रहे थे कि उन्हें यह सोचना चाहिए कि आस-पास के लोगों के प्रति वे कैसे अधिक प्रेम से भरे कैसे हो सकते हैं, उनके काम कैसे आ सकते हैं. कल सबके साथ उनके लिए प्रार्थना की, सुबह से जो अवसाद भीतर था अश्रुओं में बह गया. आज भी सुबह से मन एक गम्भीर शांति में डूबा है. कल दीदी की कविता भेज दी. जून आज व्यस्त हैं, देर से आने वाले हैं, आज ब्लॉग पर उस दिन झूले पर बैठ कर लिखी कविता डाली है. नन्हे का एक मित्र अपने घर आया है, उससे बात करनी है और बात करनी है एक सखी से. सुबह थोड़ा बहुत सफाई का काम किया, कुछ बाकी है पर फ़िलहाल तो इस शीतल मौसम में हरी घास पर बैठकर ‘पट्टमोहिनी शांतला’ को पढ़ना है. 

Friday, August 16, 2013

बुद्ध पूर्णिमा


आज उनके यहाँ फोन लग गया, पीएंडटी फोन. अब जब चाहें जिससे चाहे बातें कर सकते हैं. कल शाम उसकी एक परिचिता ने फोन करके पूछा, क्या वह उनके स्कूल में एक महीने के लिए हिंदी पढ़ाने के लिए तैयार है, वह खुद एक महीने के लिए घर जा रही हैं और कोई टीचर नहीं है उनकी कक्षा लेने के लिए. पर उसे सम्भव नहीं लगता, सुबह सात बजे से दोपहर एक बजे तक उसे घर से बाहर रहना होगा, जून के लिए खाना सुबह से बना कर रख जाना होगा, फिर घर की सफाई और सारे काम... वह कभी राजी नहीं होंगे.

कल दोपहर बाद वह कुछ परेशान थी, उसकी एक सखी ने शाम को आने के लिए कहा था, उसने सारी तैयारी कर ली थी पर अचानक उसका फोन आया वे नहीं आ पायेंगे, तो उसके सब्र का बांध टूट गया और वह जानती है यह सिर्फ उसी घटना के कारण नहीं था बल्कि पिछले दिनों का मन में एकत्र गुबार था. उसे यह अहसास हो रहा था कि वह कुछ भी ऐसा नहीं कर पा रही है जो उसकी दृष्टि में सार्थक हो. एक अजीब से खालीपन का अहसास और एक ऐसी भावना जो तब उत्पन्न होती है जब अपने कुछ भी न होने का अहसास होता है. उस दिन उसकी इतनी इच्छा होते हुए भी जून उसके साथ वोट डालने नहीं गये, उनका नाम थो था ही, पर कहने पर नाराज हो गये. उसे लगता है उनके बीच एक रिश्ता भय का है जो और सारे रिश्तों पर हावी हो जाता है. वह उसे कभी उदास या कमजोर नहीं देख पाते, उनके सामने उसे सदा ही खुश और बहादुर नजर आना है. उन्हें किसी को परेशान देखकर सांत्वना देना या समझाना नहीं आता, बल्कि खुद भी परेशान हो जाते हैं, शायद यही फर्क है स्त्री और पुरुष में, लेकिन वह उसे और नन्हे को बहुत चाहते हैं, जैसे वे दोनों उन्हें.

आज सुबह दादा वासवानी ने बहुत विनम्रता पूर्वक बहुत सुंदर ज्ञान दिया. उनकी मुस्कान अप्रतिम है और शब्द उनके मुख से ऐसे झरते हैं जैसे बहुमूल्य मोती. उन्होंने कहा, अगर कोई स्वस्थ और प्रसन्न रहना चाहता है तो उसे अपना दृष्टिकोण सकारात्मक रखना होगा, नकारात्मक भावनाएं जीवन को अभिशाप बना देती हैं. उस दिन जून ने भले ही उसे नाराज होकर समझाया पर उसे उस भाव दशा से बाहर निकल लाये, उसने मन ही मन उन्हें धन्यवाद दिया. इस बार की यात्रा से वापस आते समय पिता ने उसे कुछ कापियां तथा नोटबुक्स दी थीं, उनमें से एक उसने आज पढ़ी, उसमें विचारों और सुझावों का एक खजाना है. विभिन्न विषयों पर छोटे-छोटे अनुच्छेद लिखे हैं. मनुष्य विचारों का एक पुतला ही तो है, जैसा कोई सोचता है वैसा ही वह हो जाता है. स्वस्थ रहने के लिये स्वस्थ विचार होने चाहिए. यह शत-प्रतिशत सही है क जिस दिन उसके मन में द्वेष के विचार पनपते हैं तो मन उखड़ा-उखड़ा सा रहता है और जब कभी प्रकृति की सुन्दरता को देखकर कोई अच्छा सा विचार, चाहे एक क्षण के लिए ही क्यों न हो, आता है, तो मन कैसे खिल जाता है

आज बुद्ध पूर्णिमा है, नन्हा अभी तक सो रहा है, जून टीवी पर गुड मोर्निंग इंडिया दख रहे हैं, विनोद दुआ ने यह कार्यक्रम शुरू किया है कुछ दिनों से. सुबह जागरण में ‘गिरी महाराज’ से सुना, जीवन में संयम होना चाहिए. पूरे वक्त उसे अपनी वाचालता का स्मरण होता रहा, पता नहीं क्यों उसे लगता है जब वे किसी के यहाँ गये हों या कोई उनके यहाँ आया हो तो चुप बैठना अच्छा नहीं है, और वह माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए अपनी तरफ से किसी विषय या व्यक्ति  पर बातचीत शुरू कर देती है. पर हर बार पछतावा होता है, किसी व्यक्ति के पीछे उसके बारे में बात नहीं करनी चाहिए या फिर अपनी निजी बातें भी हरेक को बताने की क्या आवश्यकता है. सिर्फ बोलने के लिए बोलना तो असंयमित होना ही कहा जायेगा. वह वादे क्योंकि निभाती नहीं इसलिए वादा नहीं करेगी पर यह प्रयास अवश्य करेगी कि भविष्य में सोच-समझ कर ही बोले.