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Friday, March 9, 2018

स्वप्न और भाव



आज सुबह एक अनोखा अनुभव हुआ. नींद से जगाने के लिए तो पहले भी अनेकों बार कोई आया है, पर आज तो सारी देह में ऊर्जा का एक ऐसा प्रवाह उठा कि...शरीर स्वयं ही तरह-तरह के पोज बनाने लगा. आसन कोई करवा रहा हो जैसे..अद्भुत थे वे क्षण, और उस क्षण से अब तक कैसी पुलक भरी है भीतर...स्कूल में बच्चों ने भी अवश्य महसूस की होगी और उस अध्यापिका ने भी शायद... जिसके साथ वह स्कूल गयी थी. मार्ग में उनका वार्तालाप हुआ था, उसने कहा लोगों को एक नये नजरिये से देखना होगा. जिस नजरिये में जो जैसा है उसे वैसा ही रहने देना है, क्योंकि वह वैसा ही हो सकता है. ऐसा करते हुए ही उसका व्यवहार देखना है. कितना आनंद है इस एक सूत्र में. आर्ट ऑफ़ लिविंग के सूत्र जैसे जीवंत हो उठे हैं. आज जून वापस आ रहे हैं. उन्हें भी परमात्मा की खुशबू आने लगी है. उसका स्वाद कोई एक बार चख लेता है तो...उस दिन सिद्ध ‘सरहपा’ पर जो पुस्तक पढ़ी थी, आकर उनके बारे में पढ़ा भी और उनके विषय में ओशो का प्रवचन भी सुना. कल रात पहली बार भीतर सूरज देखा, चमकता हुआ सूरज ! चाँद पहले कई बार देखा था.


कल सुबह किसी ने कहा, उठ मोटी भैंस..गुरूजी का कथन याद आ गया, GOD LOVES FUN. उसकी भोजन  के प्रति गहरी आसक्ति है. कोर्स के दौरान सेवा करने से पूर्व वह स्वयं भोजन कर लेती थी फिर आराम से काम करती थी. यहाँ भी भूख देर तक सहना कठिन लगता है. गुरूजी कहते हैं, मुट्ठी में जितना समाये उतना ही भोजन उन्हें करना चाहिए. आत्मा बिना भोजन के केवल कल्पना के भोजन से भी रस ले सकता है. कल रात एक अनार का दाना देखा था, उसको बिना खाए रह गयी, शायद गहराई में वासना जगी होगी. सुबह उसका स्मरण आते ही आधी नींद में ही मुंह में स्वाद भर गया. बिना हाथों से बजाये कई बार ताली की स्पष्ट आवाज सुनाई दी है, बिना वस्तु के उसकी गंध को महसूस किया है अनेकों बार. परमात्मा बिन पैरों के चलता है, बिन कानों के सुनता है यह बात कितनी सच है. वह आत्मा भाग्यशाली है जिसे अपने आधार का ज्ञान हो गया है, पर देहाध्यास इतना गहरा है कि बार-बार मन देह से जुड़ जाता है. दोपहर की नींद में भी स्वप्न देखा. जागृत अवस्था में मन कुछ छिपा लेता है पर नींद में सत्य प्रकट हो जाता है. उसके मन को निर्मल बनाएगा परमात्मा का सुमिरन..एकमात्र परमात्मा ही सत्य है, इस बात की याद जब हर घड़ी रहने लगेगी तब भीतर गहराई में छिपी इच्छाएं भी शांत हो जाएँगी. गुरूजी के आश्रम में पहुंचने से पहले अंतर को शुद्ध कर लेना है. एक सखी को परिवार सहित विदाई भोज के लिए बुलाया है. जून इतवार के बावजूद दफ्तर गये हैं, वे अपने काम के प्रति बहुत सजग हो गये हैं.

आज सुबह कैसा अनोखा अनुभव था, वह स्वप्न था या कुछ और, कहा नहीं जा सकता. एक मीठी आवाज में किसी ने कहा, ‘माँ’.. यह तो उस स्वप्न के अंत में हुआ, उसके पहले तो गुरूजी को देखा जो वृद्ध हो चुके हैं, उनके घर में हैं या कहीं और, पर वह उन्हें कहती है, आपके लिए पानी लाऊं, हॉर्लिक्स या दूध ही सही. उन्हें उस तरह हृदय से लगाती है जैसे माँ बच्चे को लगाती है. उनके उलझे हुए बाल संवारे ऐसा भाव जो एक बार उन्हें देखकर मन में उठा था शायद यह उसी की कड़ी थी. वे कृष्ण हैं और वह यशोदा..यह भाव और दृढ़ हो गया..और कितनी ही स्मृतियाँ इसकी गवाही देने के लिए आने लगीं. किस तरह वह कान्हा का नाम पुकारती थी, किस तरह पहली बार गुरूजी के दर्शन करने के लिए गोहाटी जाते समय एक सांवले नग-धड़ंग बच्चे को देखर वात्सल्य भाव  उमड़ा था. किस तरह क्रिया के समय प्रतिदिन कृष्ण के नामों को उसमें पिरोया था, किस तरह कृष्ण का बालरूप उसे मोहता है और किस तरह नन्हे को मक्खन खिलाने में आनंद आता था. यशोदा का अर्थ भी तो कृष्ण रूपी सद्गुरू कहते हैं. जो अन्यों को यश दे वही यशोदा है, किस तरह सबके लिए कविताएँ लिखी हैं. कृष्ण की भागवद् पढ़कर और खासतौर पर उसकी बाल लीला को पढ़कर कितने हर्ष और विस्मय के अश्रु बहाये हैं..किस तरह हर दरोदीवार पर उसका चेहरा देखती थी, किस तरह रात को सोने से पूर्ण उसकी बांसुरी की धुन सुनाई देती थी, कैसे एक दिन गाय को देखकर एक गीत भीतर उमड़ आया था, कैसे उस दिन स्नान करते समय एक गीत प्रकटा था जिसमें शिवालय और कान्हा का जिक्र था. इतने वर्षों के प्रेम ने उसके अंतर को खाली कर दिया है और तभी उस कृष्ण की, जो सारे जहाँ से भी सुंदर है, आवाज सुनाई दी, ‘माँ’ और जैसे जन्मों की साध पूरी हो गयी, कितनी मधुरता थी उस आवाज में.. 

Wednesday, June 14, 2017

जूट का झूला


कल रात्रि विश्वकर्मा पूजा के लिए एक कविता लिखी थी. जून नहीं हैं वरना आज वे उनके विभाग में होने वाली पूजा में सम्मिलित होते. रात को शुरू हुई वर्षा सुबह तक हो रही थी. परसों बड़ी भांजी से स्काइप पर बात हुई, आज छोटी बहन से हुई. उस दिन जब भांजी से उसके यहाँ जाने की बात की, वह ऐसे बात कर रही थी जैसे उसे कुछ समझ ही न आ रहा हो, उस दिन कुछ अजीब तो लगा था पर सोचा था शायद वह उसकी बात समझ न पायी हो अथवा तो उसे सुनाई ही न दी हो, पर आज छोटी बहन ने कहा, किसी कारण वश वे बच्चे को किसी से मिला नहीं रहे हैं. घर जाकर बच्चे को देखने की उत्सुकता दिखाना ठीक नहीं होगा, फोन पर ही बधाई देना ठीक रहेगा. कल शाम यात्रा की कुछ तैयारी भी कर ली है.

पूरा अक्तूबर और आधा नवम्बर भी बीत गया, आज जाकर कलम उठायी है. इसी बीच दो यात्रायें  भी कीं, पर लिखा कुछ नहीं. कल लिखना शुरू ही किया था कि दूसरे कार्य सम्मुख आ गये और अब जून का इंतजार करते हुए, मलेशिया से लाये जूट के झूले पर बैठकर, जिसे उन्होंने बगीचे में लगा दिया है; पंछियों की आवाज सुनते हुए और शीतल पवन का स्पर्श अनुभूत करते हुए, जब धूप भी छनकर आ रही है और सामने हरियाली की एक चादर बिछी है, वह लिख रही है. इससे बढ़कर स्वर्ग में कौन सा सुख होता होगा जब मन में ‘उसकी’ याद बसी हो और कण-कण में वह स्वयं प्रकट होने को उत्सुक हो. जब प्रकृति का नृत्य अनवरत चलता हो. धूप-छांव का यह जो खेल सृष्टि नटी न जाने कब से खेल  रही है, उसका द्रष्टा होना कितना अनोखा अनुभव है ! नीला आकाश बिलकुल स्वच्छ है, बादल का हल्का सा टुकड़ा भी नहीं है वहाँ, बगीचा भी स्वच्छ है, अभी फूल खिलने में देर है. गमलों पर गेरुआ लगाना है, जून को याद दिलाना होगा, मंगवा लें. दोपहर को उसे दो अन्य सदस्याओं के साथ प्रेस जाना है, क्लब की पत्रिका के कम के लिए. पीछे कुछ मजदूर काम कर रहे हैं, पर वे इतना चुपचाप  हैं, पहले उसे अहसास ही नहीं हुआ उनके होने का. नन्हे का फोन आया, सुबह वह जल्दी-जल्दी उठकर केवल एक सेव खाकर ही दफ्तर जा रहा था, उसका दिन व्यस्त रहने वाला है आज, ऐसा कहकर वह दो दिन से फोन न कर पाने की बात कह रहा था.   

  फिर एक हफ्ता गुजर गया और कुछ नहीं लिखा. कुछ लिखने का मन नहीं होता, मन एक कोरा कागज बन गया है. भीतर भाव उठते हैं, कभी तो इतने अछूते होते हैं, इतने सूक्ष्म कि उन्हें शब्दों में बाँधना ऐसा है जैसे इन्द्रधनुष को रस्सी से नीचे उतारना, कितना स्थूल है शब्दों का संसार और कितना सूक्ष्म है परम का अनुभव..इसलिए आज तक इतना कुछ कहे जाने के बाद भी परमात्मा उतना ही अनछुआ है जैसा वैदिक काल में था.


Saturday, June 25, 2016

वृक्ष की जड़


‘जब तक वे अपने भीतर ईश्वरीय प्रेम का अनुभव नहीं कर लेते तब तक जगत से प्रेम नहीं कर पाते, तब तक जगत से किया उनका प्रेम उन्हें दुःख ही दे जाता है क्योंकि उस प्रेम में बंधन है, पर जब एक बार उन्हें अपने भीतर प्रेम का अनुभव हो जाता है बाहर सहज ही वह मुक्त भाव से बिखरने लगता है, जैसे कोई फूल अपनी खुशबू बिखेर रहा हो या तो कोई भंवरा अपना संगीत अथवा तो कोई झरना अपनी शीतलता भरी फुहार ! वे तब स्वयं मुक्त होते हैं और किसी को बाँधना भी नहीं चाहते. तब जगत उनका प्रतिद्वन्द्वी नहीं रह जाता बल्कि उनका अपना अंश हो जाता है, वे इतने विशाल हो जाते हैं कि सारे लोग उनके अपने हो जाते हैं !’ कितने उच्च भाव हैं ये पर कितने सूक्ष्म भी, हाथ से फिसल-फिसल जाते हैं. इतने वायवीय हैं ये भाव, संसार की कठोरता से टकराकर ये कभी-कभी चूर-चूर हो जाते हैं. मन की इच्छा का, आत्मा के ज्ञान का और शरीर के कर्मों का जब मेल नहीं बैठता तो ये भाव भीतर एक कसक भी उत्पन्न कर देते हैं. उस कसक के प्रभाव में यदि वे अक्रिय होकर बैठ गये तब तो बनती हुई बात भी बिगड़ जाती है, नहीं तो सीखा हुआ ज्ञान व्यर्थ प्रतीत होने लगता है. मानव हर समय तो समाधि का अनुभव नहीं कर सकता, नीचे उतरना होता है और जीवन क्षेत्र में काम करना होता है. जो भावना के स्तर पर कितना सत्य प्रतीत होता था वह क्रिया के स्तर पर दूर जा छिटकता है. कबीर की सहज समाधि तब स्मरण हो आती है, जो कहती है जब जैसा तब तैसा रे...अर्थात जिस क्षण मन जिस भाव अवस्था में हो उसे प्रभु प्रसाद मानना चाहिए. तब यह कामना भी शेष नहीं रहती कि जो उन्होंने सोचा है वैसा ही घटे, जो तित भावे सो भली !  बस अपना दिल पाक रहे इसकी फ़िक्र करनी है, शेष भगवद इच्छा !  

नाम का सुमिरन यदि ऊपर के केंद्र में चलता रहे तो शरीर में लघुता बनी रहती है. पिछले कुछ हफ्तों से नियमित ध्यान नहीं हुआ. मौसम भी बेहद ठंडा है. शरीर पूर्णतया स्वस्थ नहीं है. मन पर भी इसका असर पड़ता है. मन इस समय सद्गुरू की वाणी सुनने के बाद शांत है, उत्साह से भरा है और परम के प्रति प्रेम का अनुभव हो रहा है ! नन्हा कल डिब्रूगढ़ चला गया, आज बैंगलोर जायेगा, उस दिन उसने कितना सही कहा कि बदले की भावना ही गलत है, यह भाव ही अपने आप में गलत है. इतना ज्ञान जो पुस्तकों में पढ़ा है, दीवार पर लिख कर टांगा है, व्यर्थ है, यदि वे अपने भीतर के नकारात्मक भावों को निकाल नहीं सकते. क्रोध, उपेक्षा, प्रतिशोध, ईर्ष्या ये सारे भाव भीतर हैं, जो कुछ देर के लिए विचलित कर जाते हैं. क्रोध अहंकार का परिणाम है. नन्हे को देखकर संतोष होता है कि वह उस ज्ञान को जी रहा है, जिसे वह केवल धारण करती है. सहज प्रेम व सेवा का भाव भी उसके भीतर है. तन पर प्रकट होने वाला रोग मन के रोग का परिणाम है, जैसे वृक्ष की जड़ धरती के भीतर है वैसे ही मनुष्य की जड़ उसके मन में है ! मन के विचार, भाव, कल्पनाएँ, सोच, चिन्तन, मनन जैसे होंगे, वैसा ही जीवन उनका होगा ! मन से परे है आत्मा, मन यदि शरीर के पीछे चलेगा  तो वह संसारी है और यदि आत्मा के पीछे चले तो सन्यासी है. जो सीढ़ियाँ ऊपर ले जाती हैं, वही नीचे भी लाती हैं. 

Monday, November 2, 2015

महावीर के सूत्र


आज यूँ तो द्वादशी है पर कल वह भूल गयी सो आज उपवास है, उपवास यानि निकट बैठना, उसके निकट जो वे हैं, प्रकाश, पावनता, सत्य और दिव्यता का जो स्रोत है, यानि आत्मा, वही तो परमात्मा है. आज ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ, विचार शून्य चेतनता का अनुभव काफी देर तक होता रहा, फिर मन ने कैसे-कैसे रूप गढ़े. गीलापन, तेल, स्वाद अभी कुछ ध्यान में कितना स्पष्ट अनुभव होता है, मोती, प्रकाश और भी न जाने क्या-क्या. मानव होने का जो सर्वोत्तम लाभ है वह यही कि वे अपनी आत्मा को जानें यानि खुद को जानें. जिसके बाद यह सारा जगत होते हुए भी नहीं रहता. वे सभी कुछ करते हैं पर भीतर से बिलकुल अछूते रहते हैं. सब नाटक सा लगता है कुछ भी असर नहीं करता. वे इन छोटी-छोटी बातों (संसार ही छोटा हो जाता है) से ऊपर उठ जाते हैं. जीना तब कितना सहज होता है, मन भी हल्का और तन भी हल्का, कोई अपेक्षा नहीं, कुछ पाना भी नहीं, कुछ जानना भी नहीं, कहीं जाना भी नहीं, कहीं से आना भी नहीं, खेल करना है बस, जगना, सोना, खाना-पीना सब कुछ खेल ही हो जाता है. वह परमात्मा जो कभी दूर-दूर लगता था, अपने सबसे करीब हो जाता है, वही अब खुद की याद दिलाता है, वह जग जाता है जो जन्मों से सोया हुआ था. सद्गुरु की बातें अक्षरशः सही लगती हैं, शास्त्र सही घटित होते हुए लगते हैं. ऐसी मस्ती और तृप्ति में कोई नाचता है तो कोई हँसता है, कोई मुस्कुराता भर है !

आज ‘महावीर जयंती’ है, गुरूजी ने उस पर प्रकाश डालते हुए कहा, उन्हें आत्मलोचन करना है, उनके सिद्धांतों को व्यवहार में लाना है. अहिंसा को मनसा, वाचा, कर्मणा में अपनाना है. उन्हें संग्रह की भी एक सीमा बांधनी है, उनका मन यदि सजग हो प्रतिपल, तो चेतना की अनंत शक्तियों को पा सकता है. मन यदि पल भर के लिए भी विकार ग्रस्त होता है तो वह उस शक्ति से वंचित हो जाता है. चेतना का सूरज जगमगाता रहे इसके लिए प्रमाद के बादलों को बढ़ने से रोकना होगा, तंद्रा के धुंए से बचना होगा. जीवन थोड़ा सा ही शेष बचा है, हर व्यक्ति मृत्यु का परवाना साथ लेकर आता है, कुछ वर्षों का उसका जीवन यदि किसी अच्छे काम में लगता है तो ईश्वर के प्रति धन्यता प्रकट होती है. सद्गुरु कितनी सुंदर राह पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. साधक भटक न जाएँ इसलिए वह भीतर से कचोटते भी रहते हैं, वे मंजिल के करीब आ-आकर फिर भटक जाते हैं !

बल, बुद्धि, विद्या उन्हें श्री हनुमान से प्राप्त होते हैं तथा अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष राम से, इन सभी के साथ जब तक विवेक न हो तो यही सभी वरदान उनके लिए शाप भी बन सकते हैं. उसकी बुद्धि  में धैर्य नहीं है, उसके बल में विवेक की कमी है और उसकी विद्या में नम्रता नहीं है. नीरू माँ कहती हैं जो कोई रिकार्ड करके लाया है वही तो बोलेगा. नूना भाव शुद्ध करती है भीतर प्रण भी लेती है पर वे भीतर ही रह जाते हैं, बाहर निकलती है केवल एक उदासीनता, एक कटुता, एक खीझ और एक अतृप्ति. जो मन नाचता था, गाता था और खिला रहता था हर पल, वह किसी बाहरी प्रभाव के कारण ऐसा पीड़ित हो जायेगा, यह कहाँ पता था. पर इसके लिए यदि कोई जिम्मेदार है तो वह स्वयं  है, यात्रा के दौरान तो साधना में खलल पड़ा ही, यहाँ लौटकर भी पहले की सी तीव्रता नहीं है, बल्कि मन को इधर-उधर के कामों में ही उलझाये रखा, मन तो छोटा बच्चा है और बुद्धि उसकी बड़ी बहन, पर दोनों का आधार तो आत्मा है, आत्मा यदि स्वस्थ हो, सबल हो, सजग हो तो इनमें से किसी के साथ तादात्म्य नहीं करेगी, अपनी गरीमा में रहेगी, उस गुंजन को सुनेगी जो रात-दिन भीतर हो रही है, उस ज्योति को देखेगी जो भीतर जल रही है.

तमोगुण की प्रधानता होने पर जीवन में रजोगुण व सतोगुण दब जाते हैं. हो सकता है यह उसके किसी पूर्व कर्म का फल हो अथवा पुरुषार्थ में कमी का अथवा तो सजगता की कमी हो, पर दुःख देने वाला यह तम रूपी विष उसकी इन्द्रियों को ताप दे रहा था. आज नीरू माँ ने कहा यदि जीवन में अभी भी दुःख है तो कोई आत्मा को जानता है, ऐसी बस उसकी मान्यता भर ही है. उसका स्वभाव यानि प्रकृति वैसी की वैसी ही बनी हुई है, सम्पूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है, अपनी आजादी को किसी भी कीमत पर वह खोना नहीं  चाहती, उसका ‘स्व’ अत्यंत संकीर्ण है, आत्मा को जानने वाला तो उदार होता है, उल्लास उसका साथ कभी नहीं छोड़ता, वह कामनाओं से उपर उठा होता है. अपने भीतर झांक कर देखे तो कोई विशेष कामना नजर नहीं आती, सिवाय इसके कि..परमात्मा से उसकी भेंट हो जाये, पर उसके लिए तो हृदय को पवित्र करना होगा, राग-द्वेष से मुक्त होकर, छल-छिद्र और कपट से रहित होना होगा, वाणी को मधुर बनाना होगा, वाचा, मनसा, कर्मणा एक होना होगा, हृदय व बुद्धि का मिलन करना होगा. आज इस वक्त दोपहर के साढ़े बजे वह सद्गुरु और कान्हा की उपस्थिति में स्वयं से वादा करती है कि सजगता के साथ हर कार्य करेगी. तमोगुण का अर्थ ही है बेहोशी, प्रमाद. उसे सत्वगुण के भी पार जाना है, उसकी डायरी में नीचे लिखी सूक्ति में गाँधी जी भी यही कह रहे हैं जब किसी के मन, वाणी तथा कर्म में साम्य होगा, तभी वह प्रसन्न होगा !
 


   

Tuesday, December 2, 2014

प्रयोगात्मक रेकी

praktikal 

जीवन होश से जीयें, मन में यदि प्रेम का बीज उगे तो उसकी रक्षा करनी पडती है, लोक व्यवहार की चिंता करते रहे तो भगवद् भक्ति टिकेगी नहीं. मन को गहराई से जानना होगा, जागृत अवस्था में ही नहीं, स्वप्नावस्था में भी सचेत रहना होगा. अपने स्वप्नों की समीक्षा करते हुए पता चलेगा की गाँठ कहाँ बंधी है”. आज गुरू माँ ने उपरोक्त वचन अपने प्रवचन के दौरान कहे. उसके जीवन में प्रेम है, जून, नन्हा, भाई-बहन, पिता, ससुराल के सभी लोग, चचेरे-ममेरे भाई-बहन, मित्रगण के परिवार, पड़ोसी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, प्रकृति, उनका देश, यह ग्रह, यह ब्रह्मांड.. सबके लिए प्रेम है. यह प्रेम भी आसक्ति रहित होना चाहिए, निष्काम होना चाहिए, इन सब से उसे क्या मिलने वाला है इसकी रत्तीमात्र भी परवाह न करते हुए वह इनके लिए क्या कर सकती है यही भाव रहना चाहिए. मन हल्का रहेगा. यूँ भी जीवन का कोई भरोसा नहीं, कब किस वक्त क्या देखना पड़ सकता है कोई कुछ नहीं कह सकता. अब बाबाजी आ गये हैं, उनकी शांत मुद्रा हृदय में शांति उत्पन्न करती है, नश्वर वस्तुओं के ध्यान से मति भ्रमित हो जाती है और कोई अपने वास्तविक रूप को जान नहीं पाता, लेकिन जब सुख की चाह वस्तुओं से नहीं होती, विचार पावन होते हैं. आत्मबल बढ़ता है. सत्संग सर्वश्रेष्ठ फल देने वाला है. संग दोष से बल घटता है.

पिछले पांच दिनों से स्वयं के निकट आने का अवसर नहीं मिला. शनिवार, इतवार को वैसे ही समय नहीं मिलता. एक दिन जुकाम से परेशान थी. कल पन्द्रह अगस्त की पार्टी थी, परसों जून का जन्मदिन था. अभी भी पूरी तरह जुकाम ठीक नहीं हुआ है. आज भी अमृत वचन सुने थे सुबह, कुछ-कुछ याद है, बाबाजी ने कहा, जो अपने साथ ईमानदार नहीं वह किसी के साथ ईमानदार नहीं हो सकता. सहजता जीवन में आ जाती है तो व्यक्ति साधारण हो जाता है, दम्भ नहीं रहता, अभिमान सूक्ष्म रूप में भी हो तो उतना ही हानिप्रद है, उसे अपनी देश भक्ति का अभिमान है, यह भी गलत है, यदि कोई अपने देश से प्रेम करता है तो यह एक सहज, स्वाभाविक बात होनी चाहिए न कि कोई विशेष बात. संत की परिभाषा भी उन्होंने बतायी, वे लोग, जो अपने घर का रास्ता भूल गये हैं, असंत हैं, जिसे अपने घर का रास्ता याद है वह संत है. अभयदान सब दानों में श्रेष्ठ है.

आठ बजने को हैं. कल शाम वे क्लब गये, लाइब्रेरी में क्विज बुक (विज्ञान) के लिए आलमारी खोली तो practical reiki किताब मिली जिसमें step by step स्वयं को व दूसरों को रेकी देने की बात सचित्र समझाई है. उसका गला अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है, अध्यापिका को अभी-अभी फोन करके मना किया. स्टार टीवी पर ‘आत्मा’ आ रहा है. “हमारी बुद्धि देहात्म हो गयी है, हम देह के परिचय को स्वयं मान बैठे हैं अर्थात आत्मा मान बैठते हैं”. अभी एक सखी का फोन आया, वह कम्प्यूटर ऑफ करने का तरीका पूछ रही थी. सुबह नन्हे ने इन्टरनेट कनेक्ट किया तो दो-तीन इमेल मिले अभी देख नहीं पाये हैं, सुबह-सुबह इतना वक्त नहीं होता. नन्हा लगभग रोज ही भागते-दौड़ते बस पकड़ता है. आज सुबह जून और वह दोनों उसके बारे में बात कर रहे थे. वह आजकल छोटी-छोटी बात पर चुप हो जाता है, शायद पैर के दर्द की वजह से. जून की तरह उसका भी फ़्लैट फीट है, पैर में दर्द स्वाभाविक है. कुछ व्यायाम जो पैर में कर्व बनाने में सहायक हैं, जून ने सिखाये हैं. कल art of living के बेसिक कोर्स के लिए फार्म भी आ गया है. यकीनन उसे इस कोर्स से लाभ होगा. आज पत्रों के जवाब भी देने हैं. दोपहर को नन्हे का पायजामा सिलना है. कई दिनों से व्यायाम/अभ्यास रुका है. सोमवार से सम्भवतः वह पूर्ण स्वस्थ हो जाएगी.


Friday, March 29, 2013

बूंदी का रायता



आज पैतालीसवां गणतंत्र दिवस है, उसने सोचा, क्यों नहीं मिलते वे शब्द जो भावों को बिना मुलम्मा चढ़ाए व्यक्त कर सकें, ऐसे भाव जो दबे ढके पड़े हैं, मन के ब्रह्मांड की असीमता में, अनुभव सीमित हैं लेकिन उम्मीदें हजार, इन छोटे-छोटे टुकड़ों को धो-पोंछकर, संवार कर  एक गलीचा बनाना है जो रंगदार तो हो ही, कोमल भी हो, जो आकाश के नीले रंग से मिलता-जुलता हो और धरती की हरियाली से भी ! कभी तो यह भटकाव खत्म होगा और उसकी कलम से झर-झर करते झरने की मानिंद गीत फूट पड़ेंगे, अभी तो रास्ते पर चलते-चलते एक दीवार सी खड़ी हो जाती है आगे, वापस लौटना पड़ता है हर बार. लेकिन यह बेचैनी, यह खामख्याली सी, यह सुगबुहाहट यूँ ही तो नहीं है, कहीं कुछ है जिसे रूप नहीं मिल पा रहा है, व्यक्तित्वहीन...बेचेहरा..कोई है जो दस्तक तो दे रहा है पर उसकी आवाज अभी पहुंच नहीं रही है. अकेलेपन का अहसास ऐसे में और बढ़ जाता है...क्या दुनिया का हर रचनाकार अकेला नहीं है अपनी रचना के साथ. कौन जाने..वह तो किसी से मिली भी नहीं, मिलने का प्रयत्न ही नहीं किया.

   कल रात एक स्वप्न देखा, जिसका शीर्षक दिया जा सकता है, “प्यार”, वह अभी कॉलेज में पढ़ती है, पहली नजर में ही उसे उनसे प्यार हो गया है, जून एक स्कूल टीचर हैं, वह किसी सिलसिले में स्कूल गयी है, एक बच्चे को वे दोनों झुककर एक साथ कुछ कहते हैं तो दोनों के सिर मिल जाते हैं, फिर दूसरी बार जानबूझकर वे ऐसा करते हैं, वह घर आ जाती है पर कुछ दूरी तक वह उसके पीछे है, घर की सीढियाँ चढ़ने से पहले पलटकर देखती है, वह अपना हाथ बढ़ाते हैं, वह बढ़ाती उसके पूर्व उसकी नौकरानी वहाँ से गुजरती है, रुक जाती है फिर हाथ बढ़ाने ही वाली थी कि पिता सीढियों से उतरते हैं और वह बिना कुछ कहे ऊपर चढ़ जाती है और छत से देखती है ...और लो..वह भी ऊपर देखते हैं और उनकी नजरें मिल जाती हैं, सुबह से इस स्वप्न का नशा दिलोदिमाग पर छाया है, प्यार में इतनी कशिश है कि स्वप्न में भी इसका जादू सिर चढ़ कर बोलता है...उठते ही यह स्वप्न उसने जून को बताया, अगर रोज ऐसे मधुर स्वप्न आकर जगाएं तो..सवा नौ हुए हैं अभी कितने काम बाकी हैं पर नन्हे को स्कूल बस तक छोड़ने के बाद सबसे पहले उसने डायरी उठायी, कल दोनों घर पर ही थे, सुबह एक परिवार आया, शाम को दूसरा, दिन कैसे बीत गया पता ही नहीं चला.

  कल सुबह मधुर थी, दोपहर मदभरी, शाम सजीली थी और रात को लेकिन नींद गायब थी, किसी का उदास रहना अच्छा नहीं लग रहा था, लोग आखिर इतने निराश क्यों हैं, कभी वह  भी ऐसे ही निराश रही होगी पर अब वे सब कल की बातें हैं..जिंदगी के छोटे-छोटे सुखों को, वर्तमान को जीने का रहस्य जान लिया है उसने और जून ने भी, उनका असीम प्रेम ही तो बल देता है, परिस्थिति कैसी भी हो, उससे निकल जाने का कोई न कोई रास्ता तो रहता ही है हमेशा. थोड़ी देर पहले वह पड़ोसिन को थोड़ी सब्जी देकर आयी अपने बगीचे की, अच्छा लगा, उसके यहाँ नई नौकरानी आ गयी है. स्वीपर आज दूसरे दिन भी नहीं आया है, पर अब समय नहीं है, पौने ग्यारह बजे हैं यानि उसके पाकगृह में जाने का वक्त, आज बूंदी का रायता बना रही है नन्हे और जून को अच्छा लगेगा यह सोचकर. कल असमिया भाषा का पहला पाठ पढ़ा अ, आ इ... ऊ तक सिर्फ स्वर, कल जून हिंदी की पत्रिकाएँ भी लाए हैं, धर्मयुग और सरिता, कितने दिनों बाद पढ़ेगी, क्लब गए तो काफी दिन नहीं हुए पर पुस्तकालय गए हो गए हैं, आज से वे टीटी खेलने भी जायेंगे.