Friday, July 17, 2015

मुरारी बापू की कथा


ध्यान में अपने बारे में सच्चाई प्रकट होती है. चित्त ही काया बनता जाता है, जैसे ही चित्त पर कोई तरंग उठती है वैसे ही काया पर भी तरंगें उठती हैं. जब मन मन में समा जाता है, कोई विचार नहीं रहत, अनुभूति ही अनुभूति है तो विकारों कि शक्ति खत्म होती जाती है. ध्यान में ही यह सम्भव है. दोपहर के तीन बजने वाले हैं, उसके सिर में, नहीं इस शरीर के सिर में हल्का दर्द है. जून जब गये तो दवा ली थी, पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ. गुरूजी की बात याद आती है कृपा होने के बाद यदि तीर से सिर कटना हो वह मात्र टोपी ही उड़ा कर ले जाता है. वैसे ही उसे दो दिन से लग रहा था कि शरीर अस्वस्थ होगा पर सिर में हल्के दर्द के सिवा अभी तक तो सब ठीक है. दो सखियों को देखने गयी थी, उन्हें बुखार था, अब वे भी स्वस्थ हो रही हैं. कल पता चला छोटे भाई, छोटी भांजी तथा दीदी को भी बुखार हुआ है. शरीर कमजोर होता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है तभी रोग धर दबोचते हैं. जून के दाहिने वक्ष में जब से वह आये हैं दर्द रहता है जो यात्रा में शुरू हुआ था, सम्भवतः भारी सामान उठाने के कारण ही उन्हें यह दर्द हुआ है. ईश्वर की चर्चा तभी हो सकती है जब तन व मन दोनों पूरी तरह स्वस्थ हों. आज सद्गुरु को सुना, उन्होंने कहा, यदि ध्यान करने से पूर्व कोई चिंता मन में हो तो उसी विचार को तोड़ते-तोड़ते उसके मूल तक पहुँचना चाहिए. मन ध्यानस्थ होता जाता है. उसे आजकल ध्यानस्थ होने में जरा भी कठिनाई नहीं होती. कृपा उस पर बरस रही है.
उसकी लिखाई को देखकर लगता है कि मन भीतर ही भीतर अशांत था पिछले दिनों. कितने बड़े-बड़े व टेढ़े-मेढ़े अक्षर हैं एक कारण यह भी हो सकता है कि जल्दी में लिखा गया है. पहले की तरह सुबह आराम से बैठकर आजकल नहीं लिख पाती, कोई समय नियत नहीं रह गया है. जबकि होना यह चाहिए था कि समय के साथ-साथ लेख अच्छा होता जाये. आत्मा के स्तर पर जीने का अर्थ है पूर्ण मुक्त होना, सभी तरह के बन्धनों से मुक्त लेकिन मन मुक्त होने नहीं देता, बीच में आ जाता है. जिसकी सत्ता ही नहीं है वह इतना बलवान हो उठता है. ध्यान में भी मनोराज्य चलने लगता है यह कैसी मनोस्थिति है ? प्रारब्ध वश कोई पाप सिर उठा रहा है शायद. उसका यह क्षण एक न मालूम सी उदासी से भरा है. यह पीड़ा अनबूझ है जो कभी-कभी अपने आप ही आ जाती है फिर अपने आप ही चली भी जाती है. वह साक्षी की तरह इसे देखती है, साक्षी होकर जीना कितना कठिन है. साधना का पथ सरल है ऐसा तो सद्गुरु ने नहीं कहा था. सद्गुरु के लिए सभी कुछ कितना सहज है. उसे उन्हीं की शरण में जाना चाहिए. उनके निकट जाते ही परमात्मा की अनुभूति होती है. शांति और सुख के भंडार परमात्मा को याद करने से राहत मिलती है. जो है नहीं पर महसूस होती है वह माया है जो है पर नजर नहीं आता वह भगवान है !
अगस्त मास का प्रथम दिन ! सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठी. ‘क्रिया’ आदि की संगीत का अभ्यास और ध्यान भी. आज ध्यान में एक बार पूरा शरीर गर्म हो गया और अत्यंत तीव्रगति से कम्पन का अनुभव हुआ. देह ठोस नहीं है तरंगे ही तरंगे हैं इसका अनुभव इतना स्पष्ट रूप से कभी नहीं हुआ था. दो घंटे संत मुरारी बापू की कथा सुनी, जो वे नैरोबी में कह रहे हैं, अफ्रीका महाद्वीप में केन्या देश में गुजराती भारतीयों के लिए. कथा गुजराती में कह रहे थे पर समझ में आ रही थी. तुलसी की चौपाइयां तो वैसे भी अवधी में ही थीं. संतश्री कथा इतनी मधुरता से कहते हैं कि कितना भी सुनो मन नहीं भरता है. अद्भुत वक्ता हैं वे और अद्भुत कवि हैं तुलसी, पर सबसे अद्भुत है वह परमात्मा जो सबके भीतर छिपा है और प्रेम का ऐसा जाल बिछाता है कि कोमल हृदय उसमें बंध जाता है. ईश्वर का प्रेम अमूल्य है, अनुपम है, अद्भुत है, उसी के कारण तुलसी अमर काव्य की रचना करते हैं, संत कथावाचक बनते हैं तथा उस जैसे श्रोता जो सुनते-सुनते आसुंओं की गंगा बहाते जाते हैं. उसका हृदय ईश्वर और सद्गुरु के प्रति अगाध प्रेम से भरा है और गद्गद् हो रहा है. ईश्वर की कृपा से ही उसका प्रेम मिलता है, संत कृपा से ईश्वर मिलते हैं सद्गुरु के ज्ञान से संतों के प्रति आदर जगता है.   


3 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ४ का चक्कर - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. सच बापू की मीठी वाणी में प्रभु श्रीराम का वास हैं धन्य हो जाते हैं वह लोग
    जो बापू के द्वारा श्री रामकथा का रसास्वादन करते हैं ...
    ।।जय श्रीराम।।
    मोरारी बापू जी के 30 अनमोल विचार

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