Monday, March 30, 2015

चित्रों की प्रदर्शनी


आज बाबाजी अपने विट्ठल को याद करते-करते भाव समाधि में प्रविष्ट हो गये हैं, और उन्हें इस तरह परम आनंद में मगन देखकर हजारों की भीड़ भी भाव विभोर हो गयी है. परम भाग्य होता है तभी संत या सद्गुरु मिलते हैं और उनकी कद्र हृदय जानता है. वास्तव में सद्गुरु क्या है ? कौन है ? कोई नहीं जान पाता. उनकी कृपा का एक अंश ही मिल जाये तो कल्याण हो जाता है लेकिन उसे पाने के लिए अहम् को पूरी तरह नष्ट करना होगा. जहाँ प्रेम होता है वहाँ परमात्मा तत्क्षण जवाब देते हैं, हृदय के सच्चे प्रेम को वह अस्वीकार नहीं कर पाते और धीरे-धीरे भक्त के हृदय से अहंकार नष्ट होने लगता है. कल शाम वह सत्संग में गयी, बाद में भोजन का भी इंतजाम था, पर चना-पूरी खाने की जरा भी इच्छा नहीं थी सो वह लौट आयी. कल सुबह दोनों ननदों को पत्र लिखे, अब यह प्रतीक्षा नहीं करनी है कि उनका जवाब भी आये और ऊपर से यह भी कि वह उसके अनुकूल हो, यह तो अहंकार को पोषने वाली बात होगी. आज सुबह वे उठे तो देखा नन्हा रात को कम्प्यूटर चलाकर बिना मच्छरदानी लगाये, बत्ती जलाये ही सो रहा था. दूध भी ऐसे ही पड़ा था. शायद वह सोने नहीं गया था नींद ने उसे घेरे में ले लिया. कल उसकी किताबें भी दिल्ली से आ गयीं. इस वर्ष कोचिंग के कारण उसे नूना से पढ़ने की जरूरत नहीं है, यानि उसे साधना के लिए समय मिलेगा. आत्मिक बल बढ़ेगा, सहनशीलता बढ़ेगी, उपेक्षा जगेगी, अपेक्षा कमेगी !

आज सुबह चार बजे उठी, वातावरण में निस्तब्धता छायी थी. ढेर सारे अमरूद गिरे हुए थे. पका हुआ फल स्वयं ही झर जाता है ऐसे ही परिपक्व मन स्वयं ही झुक जाता है, अपरिपक्व मन हठी होता है. आज नन्हा स्कूल नहीं गया है. कल बड़ी ननद की राखी मिली, पत्र भी नहीं है और जल्दी में भेजी गयी लगती है. ईश्वर ही सबका रखवाला है और वही तो अपनों के माध्यम से सबकी सहायता करवाता है. कल एक सखी के यहाँ गये वे, उसके पतिदेव का जन्मदिन था. उसकी सासूजी से बातें किन. वह इस उमर में भी काफी संयत लगती हैं. एक सुसंस्कृत महिला..वह भी वृद्धावस्था में ऐसी ही रहेगी. सजग अपने स्वास्थ्य के प्रति था अपने व्यवहार, अपनी बातों के प्रति भी.

मन पुनः उद्ग्विन हुआ. कारण वही है इच्छा’. कल शाम वे कला प्रदर्शनी देखने गये. मन ललक उठा कि इनमें से एक तो उनके घर की शोभा बढ़ाए. जून को येन, केन, प्रकारेण मनाया कि वे एक पेंटिंग खरीदेंगे. लेकिन आज सुबह विचार आया कि अभी तक वस्तुओं के प्रति आकर्षण कम तो नहीं ही हुआ है सो मुक्त कैसे होगा मन ? जून को जैसे ही कहा कि इतना जरूरी नहीं है कि पेंटिंग ली ही जाये लेकिन जैसे ही ये शब्द कहे, मन ने फिर एक दांव फेंका कि छोटी ही ले ली जाये. यानि आकर्षण इतना प्रबल था कि..मन को समझना बहुत मुश्किल है. पर उसे उस पर नजर रखनी ही है. जून ने जब ऐसा कुछ कहा जो उसे पसंद नहीं था तो उसे भी समझाने लगी. नैनी देर से आयी तो उस पर भी झुंझलाई. अर्थात मन पर नियन्त्रण नहीं था. प्रेय और श्रेय दो प्रकार के कर्म होते हैं. जो कार्य तत्पल सुख दें वे प्रेय है लेकिन भक्त को, साधक को तो श्रेय का मार्ग अपनाना होगा. पहले तो उसे यह निर्णय कर लेना चाहिए कि वह एक सांसारिक व्यक्ति है अथवा एक साधिका, यदि साधिका है तो उसे सजग रहना ही होगा. किसी के दोष देखना बंद करना होगा औरों को सुधारने से पूर्व अपने अंदर की हजारों कमियों को दूर करना होगा. व्यर्थ का चिन्तन, व्यर्थ की वाणी और व्यर्थ के कार्यों से भी स्वयं को दूर करना होगा, और ऐसा करना ही अंतत सुख का कारण होगा. क्षणिक सुख का नहीं ऐसा सुख जो बाद में पछतावे का कारण बने. श्रेयस कार्यों को करने के बाद पछताना नहीं पड़ता. परम लक्ष्य को प्राप्त करना ही उसका ध्येय होना चाहिए. सदा उसके सम्मुख आदर्श रहे, क्योंकि मन को तृप्त करना वैसा ही है जैसे अग्नि को ईंधन देना, मन को तृप्त करते करते वे चुक जायेंगे पर इसे तृप्त नहीं कर सकते जबकि ईश्वर को पाने की इच्छा ही अपने आप में शांतिदायक है. यह प्रारम्भ में, मध्य में और अंत में भी सुखद है ! यह मुक्त करती है जैसे वह परमात्मा मुक्त है, हर तरफ व्याप्त  ऐसे ही वह उन्हें बनाना चाहता है पर वे हैं कि देह के घेरे से बाहर आना ही नहीं चाहते !     



Friday, March 27, 2015

दिल का ताला




ईश्वर उनका अन्तरंग है, उसकी उपासना करने के लिए विधि विधान की नहीं भाव भरे हृदय की आवश्यकता है. सहज रूप से जब अंतर में उसके प्रति प्रेम की हिलोर उठे तो उसी वक्त पूजा हो गयी, फिर धीरे-धीरे यह प्रेम उसकी सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के प्रति उत्पन्न होने लगता है, सभी में उसी के दर्शन होते हैं. कल शाम को उसे सड़क पर साइकिल पर जाते एक हॉकर को देखकर उसे बुलाकर कुछ देने का मन हुआ, शुद्ध प्रेम के कारण, पर उसने स्वयं को रोका क्योंकि बिना कुछ काम कराए वह शायद कुछ लेना पसंद भी नहीं करता और जून को उसकी इस बात के पीछे की भावना भी समझ में नहीं आती. ...और आज सुबह एक दिवास्वप्न देखा कि उसे ईश्वर प्राप्ति हो गयी है और..खैर, दिवास्वप्नों की बात यहीं छोड़ दे. अभी बहुत सफर तय करना है. एकांत में रहे तो ज्ञान सदा साथ रहता है. मन प्रसन्न व मस्तिष्क उद्वेग रहित, स्पष्ट..लेकिन जब इस ज्ञान को व्यवहार में लाने का समय आता है तो मन पुराने संस्कारों के कारण विक्षेपित हो जाता है. सारा ज्ञान कुछ पल के लिए तो धरा ही रह जाता है, इतना अवश्य है कि शीघ्र ही कोई सचेत करता है पर तब तक वह क्षण गुजर चुका होता है. यह भी सही है कि पहले की तरह बाद में मन शीघ्र संयत हो जाता है, रेत पर पड़ी लकीर की तरह..पर उसे तो अपने मन को पानी की धार सा बनाना है जिस पर कोई लकीर पड़े ही न. अपने मन के विश्वास को, सरलता को बचाकर रखना है. आज भी वर्षा बदस्तूर जारी है. ‘जागरण’ में नारद भक्ति सूत्र पर चर्चा हो रही है. उसका भी अनुभव है कि जब कोई ईश्वर को याद करता है उसी क्षण वह जवाब देता है. पर जब कोई अभिमान वश या अन्य किसी कारण से उसे भुला देता है और दुःख में होता है तो वह नहीं आता अर्थात मन उसे ग्रहण नहीं करता. इसका अर्थ हुआ कि यदि लगातार उसका सान्निध्य चाहिए तो ध्यान भी अनवरत चलना चाहिए. एक पल का भी विस्मरण पुनः उसी स्थिति में ला देता है.

आज सुबह छोटी बहन को फोन किया उसका जन्मदिन है, बड़ी बिटिया को स्कूल छोड़ने जा रही थी सो थोड़ी देर ही बात हो सकी. दोनों ननदों से भी बात हुई, छोटी का स्वास्थय ठीक नहीं है. बड़ी ने बताया ननदोई जी मुम्बई में रहने लगे हैं, शनिवार को घर आते हैं. घर-बाहर के सारे कार्य उसे खुद ही करने होते हैं. सासु माँ आजकल आयी हुई हैं, इस वक्त टहलने गयी हैं. कल क्लब में लेडीज क्लब की चेयर परसन से मिलना हुआ, उनकी बातें सुनीं, आत्म विश्वास से परिपूर्ण ! कल उसने पत्र लिखने शुरू किये थे, अभी कुछ शेष हैं, कुल नौ पत्र लिखने हैं. आज सुबह ‘जागरण’ में दिल का ताला खोलने की चर्चा हुई, ताला जो ममता का है और जिसे खोलना वैराग्य से है. उसने प्रार्थना की, कृष्ण सदा उसकी स्मृति में रहें, वह उसे न भूले और साधना के पथ पर आगे बढ़े, ऐसा संकल्प करे. संकल्प उसका और बल परमात्मा का. उसी की कृपा होती है तो साधना का सामर्थ्य जगता है !


Thursday, March 26, 2015

गुरू पूर्णिमा का चाँद


‘गुरू पूर्णिमा’ में कुछ ही दिन शेष हैं. उस दिन वह उपवास व मौन व्रत भी रखने का विचार रखती है. गुरू से उसका मानसिक सम्पर्क बना हुआ है इसका आभास कल दोपहर को हुआ जब हृदय में से उसके नाम का उच्चारण स्पष्ट सुनाई पड़ा. वह दर्द में थी उस पीड़ा में गुरू की आवाज जैसे मरहम लगाती हुई आयी. बहुत अच्छा लगा. वासनाएं मिटती जा रही हैं, क्रोध आने से पूर्व ही शांत होने लगा है. जाने कौन आकर समझा जाता है, जो कहने वाली थी वह न कहकर कुछ ऐसा कहती है जो प्रेम को दर्शाता है, अर्थात प्रेम की पकड़ क्रोध से ज्यादा हो गयी है. सभी के प्रति बस एक ही भाव उसे अपने हृदय में दिखायी पड़ता है, प्रेम और स्नेह का भाव. सभी उस परमात्मा के ही तो हैं जिसे वह इतना चाहती है. कभी-कभी दोनों आँखें भर जाती हैं. आँसू बहते हैं पर इनमें भी कैसी प्रसन्नता है. वह कृष्ण भी जैसे उसका साथ पसंद करने लगा है. वह उसे छोड़कर कहीं नहीं जाता. उस कृष्ण के नाम के साथ भाव की हिलोरें उठती हैं. समझ नहीं आता कौन ज्यादा प्रिय है सद्गुरु या कान्हा. कभी लगता है दोनों एक ही हैं और वह अपना मन उन्हें अर्पित कर देती है. her ordinary mind merges with their wisdom mind.

आज जागरण में ‘श्रद्धा’  के बारे में सुना. श्रद्धा जितनी दृढ होगी सात्विक भाव भी उतना ही दृढ़ होगा. आज सुबह वे उठे तो उमस बहुत थी, इस वक्त भी धूप न होते हुए भी उमस युक्त गर्मी है, पर उनकी सुबह ‘योग’ से होती है, ऐसे में मौसम की प्रतिकूलता या अनुकूलता का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता. ईश्वर ने, उसके कान्हा ने भी तो कहा है कि शीत-उष्ण, सुख-दुःख सभी में समान भाव से रहते हुए अपने कर्त्तव्यों का पालन करते रहना होगा. सुख बाहरी परिस्थितयों पर नहीं बल्कि उनके सच्चे स्वरूप पर निर्भर करता है जो सदा एक सा है, आकाश के समान मुक्त, विक्षेप रहित !

आज गुरू पूर्णिमा है. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठी. स्नान-ध्यान किया फिर नन्हे और उसके मित्र के लिए नाश्ता बनाया. आजकल वह लाइब्रेरी से लायी The Gospel of Buddha पढ़ रही है. शाम को aol के फॉलो अप में जाना है. कल शाम को मन उद्ग्विन था, ध्यान किया सोने से पूर्व. काफी समय बाद लगा कि अब सो जाना चाहिए. मन एक छोटे बालक की तरह व्यवहार करता है उसे उसी तरह मनाना, पुचकारना और कभी-कभी फटकारना भी पड़ता है. गुरुमाँ कहती हैं जिसके विचारों की श्रंखला टूट गयी है वही मुक्त है, सो वह हर क्षण मन पर नजर रखती है कि कहीं कोई बिन बुलाये मेहमान सा अनचाहा विचार तो प्रवेश नहीं कर रहा. उसे क्षण भर देखें तो जैसे समुन्दर में लहर स्वयं शांत हो जाती है वह विचार स्वयं समाप्त हो जाता है. पर देखना पड़ेगा अन्यथा पता ही नहीं चलता और एक से दूसरा शुरू होते होते श्रंखला सी बन जाती है. आज सुबह पिताजी व छोटी बहन से बात की, जो आजकल मुम्बई में है. पिता ने कहा राखियाँ अच्छी बनी होंगी. उसके लिए तो वह अध्याय समाप्त हो गया है. सिर्फ यह क्षण यानि वर्तमान का क्षण जीवित है. जो छूट गया वह चला गया और अब मृत प्रायः है. उन्हें हर क्षण को अंतिम क्षण मानकर जीना आ जाये तो मन क्यों अतीत व भविष्य के चक्कर लगाए. यही बुद्ध कहते हैं, यही योग वसिष्ठ में कहा गया है यही श्री श्री कहते हैं.




Wednesday, March 25, 2015

तरबूज की ठंडक


आज बाबाजी ने बताया, ‘अहंता’ और ‘ममता’ ही दुखों का कारण है. उन्होंने एक सरल साधन भी बताया जिससे भीतर विश्रांति का जन्म होता है. शनिवार को जून उसे ऑफिस ले गये. eSatsang से श्री श्री की एक छोटी सी टॉक डाउनलोड की Ultimate relationship पर बोल रहे थे. वह इतने प्यार से इतनी अच्छी बातें बताते हैं, उनका ज्ञान अनंत है. कल शाम को एक परिचिता आयीं, उनकी सास icu में हैं, वह उनके दुःख को अनुभव कर पा रही थी. अंतर में प्रेम हो तभी यह सम्भव हो सकता है अन्यथा तो दूसरों की पीड़ा ऊपर से छूकर ही निकल जाती है. स्वयं को यदि ज्ञान में स्थिर करना है तो उसका लक्ष्य प्रेम ही रखना होगा, अन्यथा यहाँ भी स्वार्थ ही है. अपनी आत्मा का विकास मात्र स्वयं के लिए, अपने सुख के लिए... नहीं, अपने ‘स्व’ का विस्तार करते जाना है, सबको अपना सा देखना है. तभी मुक्ति सम्भव है. जितने-जितने उदार वे होते जायेंगे, जितनी देने की प्रवृत्ति बढ़ती जाएगी, लेने की, संग्रह की प्रवृत्ति घटती जाएगी उतने ही स्वाधीन वे होते जायेंगे.     

आज नन्हे का जन्मदिन है. सुबह ससुराल से फोन आया. बड़ों का आशीर्वाद मिले तो जीवन का पथ सरल हो जाता है. भाई-भाभी व पिताजी का फोन भी आया. सभी परिवार जन आपस में प्रेम के धागों से ही तो जुड़े हैं. यह सूक्ष्म भावना बहुत प्रबल है. यही प्रेम उन्हें बार-बार इस जगत में खीँच लाता है, लेकिन जब इस प्रेम की धारा ईश्वर की ओर मुड़ जाती है तो मुक्त कर देती है, क्योंकि उसके सान्निध्य में रहने के लिए उन्हें इस तन में आने की क्या आवश्यकता, वे जहाँ कहीं भी हों उसे चाह सकते हैं. आज अमावस्या है, ईश्वर का स्मरण करते हुए दिन का आरम्भ हुआ. उसे लगता है जिससे उन्हें ममता है उन्हें सुखी वे इसलिए करते हैं कि वे स्वयं सुखी हों. अपनी ख़ुशी के लिए ही वे दूसरों को कुछ देते हैं. ममता में स्वार्थ है पर प्रेम निस्वार्थ है. प्रकृति के गुणों के वशीभूत होकर ही ममता में बंधते हैं. ईश्वर को प्रेम करने में वे स्वतंत्र हैं. ईश्वर के नाते ही सारे सम्बन्ध हों तभी मुक्ति है.

आज सुबह बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ कि वह ‘क्रिया’ नहीं कर पायी. नन्हे के एक मित्र के लिए भी टिफिन बनाना था सो जून ज्यादा सचेत थे. कल शाम को बड़ी बुआ का फोन आया, उनकी बेटी के बड़े पुत्र का चुनाव एयर फ़ोर्स में हो गया है. वह सत्संग में गयी थी, जून ने बताया. वहाँ शुरू में उसका मन स्थिर नहीं रह पा रहा था पर धीरे धीरे गुरूजी से मानसिक प्रार्थना करने के बाद अच्छा लगा. कुछ देर पहले दीदी से बात हुई, जीजाजी के जन्मदिन पर उन्होंने घर पर उगाया हुआ तरबूज काटा. बड़ी भांजी CA बन गयी है, उसकी पांच साल की पढ़ाई पूरी हो गयी. कल छोटे भांजे को लेकर वे दिल्ली जा रहे हैं. परसों उसे हास्टल ज्वाइन करना है. पूजा की छुट्टियों में फिर घर आयेगा. नन्हा भी एक दिन ऐसे हॉस्टल जायेगा. दीदी खुश थीं, वह भी ईशप्रेम में सदा खुश रहती आयी हैं.

कल रात सिर दर्द के कारण उसकी नींद खुली, कुछ देर बैठी रही फिर धीरे-धीरे शवासन में लेटे हुए कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला. आज छोटी ननद का फोन आया, ननदोई जी ने aol के एडवांस कोर्स का फार्म भरा है, उन्हें अभी इसके लिए काफी लम्बा इंतजार करना होगा. ‘क्रिया’ वे नियमित करते हैं और जून को लगता है यह बहुत है.



Tuesday, March 24, 2015

राखी का उत्सव


पांच शरीर हैं उनके, पाँचों के पार वह चिदाकाश है जहाँ पहुंचना है. ईश्वर की स्मृति सदा बनी रहे तभी वे अपने पद से नीचे नहीं गिरेंगे अन्यथा मन के पुराने संस्कार सदा मोहित करते रहेंगे. ईश्वर जो इस सृष्टि का रचेता है, जिसका सभी के प्रति सहज स्वाभाविक प्रेम है, जो आत्मा का हितैषी है, प्रेम वश जो सदा सन्मार्ग पर ले जाने की व्यवस्था करता है. वह उन्हें सुख-दुःख के द्वन्द्वों से अतीत देखना चाहता है. जब वे उसकी निकटता में रहते हैं, उसके सामीप्य का अनुभव करते हैं तभी आकाश की भांति पूर्ण मुक्त, स्वच्छ, अलिप्त रहेंगे, यही उनका सच्चा स्वभाव है. उसकी उपस्थिति का अहसास सुबह ध्यान में हुआ, हर रोज ही होता है और यही उसकी आंतरिक प्रसन्नता का कारण है. मन कितना शांत है आज ! कल उन्होंने राखियाँ बनायीं, वह सखी आयी थी. अभी कुछ काम शेष है.

आज सुबह वे पौने चार बजे उठे, नन्हा उसके पूर्व ही उठ चुका था. उन्होंने ‘क्रिया’ की, योगासन आदि किया. ब्रह्म मुहूर्त में साधना करने का सुयोग भी ईश्वर ने ही बनाया है, वह जो भी करता है उनकी भलाई के लिए ही करता है. वे जो भी करते हैं वह ईश्वर प्राप्ति हेतु ही तो. शरीर स्वस्थ रखने का प्रयास, मन स्वस्थ रखने का प्रयास, सभी तो आत्म साक्षात्कार हेतु ही न. भक्ति के अनुकूल जो भी कार्य हों वही उन्हें अपनाने हैं और जो प्रतिकूल हों उन्हें छोड़ देना होगा. अज गुरू माँ ने बताया, जिनकी आज्ञा चक्र तक की यात्रा पूरी हो जाती है, वह ‘आत्म साक्षात्कार’ की ओर कदम बढ़ा चुके हैं अर्थात निकट आ चुके हैं. आज शाम को क्लब में मीटिंग है, उसे कविता पाठ  करना है. कल ऑयल-किरण के लिए लेख लिखकर दे दिया है.  

जीते जी अगर परमात्म सुख का अनुभव करना हो तो औदार्य सुख का अनुभव करना चाहिए, उदार बनना चाहिए. जो उदार होता है, वह प्रेमी भी होता है, वह सामर्थ्य भी रखता है. आज बाबाजी अपने गुरू की स्मृति आ जाने से भावुक हो रहे हैं. गुरू की याद ऐसी ही होती है. वह भी कितनी भाग्यशाली है कि एक बार ही सही उसने निकट से सद्गुरु के दर्शन किये हैं. भौतिक दूरी अथवा निकटता का उनके लिए कोई महत्व नहीं. श्रद्धा से उन्हें याद करो तो तत्क्षण वे उपस्थित हो जाते हैं. ईश्वर के प्रति प्रेम वही हृदय में उत्पन्न करते हैं. ईश्वर के प्रति हृदय में सहज और स्वाभाविक प्रेम होना चाहिए पर वे अपनी सहजता तो स्वार्थ के कारण पहले ही खो चुके होते हैं, सहज स्वभाव हो तो भक्ति को उदय होते देर नहीं लगती. सहज स्वभाव ही उनका शुद्ध रूप है जटिल तो उनका मन उसे बना देता है. व्यर्थ की कल्पनाओं, विचारों और भावनाओं में डूब कर जो अपने आपको बड़ा ज्ञानी समझता है पर होता नहीं है, अरे, उसे तो यह भी नहीं पता कि कब क्या सोचना है, कब कौन सा विचार कहाँ से आने वाला है, वह अपने को ही नहीं जान पाता तो संसार की समस्याओं का निदान कैसे सोच सकता है, तो मन को ठीक करना होगा !


ज्ञान का अंत भक्ति है, भक्ति रसमय, आभामय, मकरंद मय बनाती है. प्रेम हो जाता है जब गुरू से, ईश्वर से तो प्रेम तारने वाला बन जाता है. देर-सबेर ईश्वर का साक्षात्कार हो जाता है. मोहनिद्रा से सदा के लिए जागृति हो जाती है. सद्गुरु की कृपा मिले बिना ज्ञान टिकता नहीं ! ...और आज सुबह क्रिया के दौरान व उसके बाद उसने गुरुवाणी सुनी, “लगा रह” उस दिन सुना था ‘अभिमानी मत बन’, अर्थात उसे अपने प्रयासों को त्यागना नहीं चाहिए बल्कि पूरे विश्वास के साथ उसमें लगा रहना होगा. कल शाम को यह अनुभव हुआ कि only now is eternal ! वर्तमान का साक्षात् अनुभव हुआ, हर क्षण जैसे शाश्वत हो गया था. वर्तमान में रहने के लिए सबसे अच्छा उपाय है कि वे क्षण-क्षण में जीना सीखें अन्यथा मन कब भूत या भविष्य के झकोरे में झूलना शुरू कर देता है पता ही नहीं चलता. कल दोपहर राखियाँ बन गयीं पचास से कुछ अधिक ही बन गयी हैं. अब २१ जुलाई को होने वाले उत्सव में इन्हें रखना है. सेवा के इस कार्य में कितना सुख मिला है यह सात्विक सुख है पर इससे भी उसे बंधना नहीं है. अब उसके सामने एक स्पष्ट लक्ष्य है और जिस रास्ते से उस पर जाना है वह रास्ता भी पूरी तरह स्पष्ट है. अब चलने की देर है. आत्म साक्षात्कार के उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सद्गुरु का आशीर्वाद भी उसके साथ है और कान्हा का प्रेम भी !         

Tuesday, March 17, 2015

टिंडे की सब्जी


अभी बहुत दूर जाना है, सहिष्णुता की बहुत कमी है. आसक्ति अभी बनी हुई है, लोभ भी बरकरार है और वाणी पर संयम भी नहीं है. ऐसे में ध्यान का क्या लाभ मिलने वाला है. सुबह-सवेरे ही गुरू माँ ने कहा, गलती करो मगर होश से, तो थोड़ी सांत्वना मिली है क्योंकि पूरे वक्त उसे यह पता था कि जो हो रहा है वह ठीक नहीं है यानि होश तो था, अब आगे ऐसी भूल नहीं होगी. कल शाम भजन संध्या में गयी अच्छा अनुभव था. नाम संकीर्तन के द्वारा भी उससे जुड़ा जा सकता है, कृष्ण हृदयों से राग-द्वेष निकाल देते हैं, जब उसका नाम जिह्वा पर नृत्य करता है. असत संग का त्याग करना है, जो भी लक्ष्य से दूर ले जाये वही असत है. कल दोपहर को एक नया अनुभव हुआ बाथरूम में कपड़ों का ढेर उसके देखते-देखते एक निर्मल आभा से युक्त हो गया और एक बार तो हिलता हुआ भी प्रतीत हुआ. उसकी आँखों से कुछ अन्य तरंगें भी निकलने लगी हैं शायद. गुरूजी कहते हैं अनुभवों के पीछे नहीं जाना चाहिए.

आज ‘मृणाल ज्योति’ जाना है, बच्चों को योग सिखाने. मौसम सुहावना है, संगीत की कक्षा हुई. पिछले हफ्ते अभ्यास ठीक से नहीं कर पायी थी, ध्यान में ज्यादा वक्त चला गया, कई बार पुस्तक पढ़ते-पढ़ते ही भाव ध्यान घटने लगता था. ‘ध्यान’ अब एक स्वाभाविक कार्य लगता है जैसे यह उतना ही सामान्य हो जितना भोजन करना. अभी दोपहर के भोजन की थोड़ी सी भी तैयारी नहीं हुई है, नैनी टिंडे काटकर रख गयी है, जो जून कल लाये थे. कल ही वह ढेर सारे आम भी लाये थे. नन्हे को रात को देर तक पढने की आदत है. कई बार लाइट जलाकर ही सो जाता है सो जून ने उसके नॉवल वापस करने के लिए अपने आपस रख लिए थे, पर उसे यह बात नहीं भायी, बहुत नाराज हुआ और सुबह बिना बात किये ही स्कूल चला गया. वे भी कभी माँ से ऐसे ही नाराज हो जाते होंगे. स्कूल से वापस आने तक सब भूल चूका होगा. उन्होंने उसकी किताबें वापस भी रख दी हैं. जून अपने लिए एक तकिया लाये पर वह भी उन्हें अधिक माफिक नहीं आया. पिछले दिनों तकिये की वजह से उनकी गर्दन में दर्द हो गया था. परसों विभाग में उनका एक प्रेजेंटेशन था, अच्छा रहा. कल से वह रह-रह कर सिर के दायें भाग में कुछ सुरसुरी सी अनुभव कर रही है शायद ‘ध्यान’ की वजह से. ईश्वर उसके साथ है जो भी होगा या हो रहा है उनकी देख-रेख में ही हो रहा है !

जुलाई का प्रारम्भ ! मौसम बरसात का है, वर्ष रात को हो चुकी है, सभी कुछ साफ और धुला-धुला सा है. मन भी ईश्वर की भक्ति रूपी जल से धुलकर इस वक्त तो स्वच्छ  प्रतीत हो रहा है लेकिन कब, कैसे और क्यों और कहाँ इस पर मैल का छींटा लग जाता है, पता नहीं चलता, कब सिलवटें पड़ जाती हैं, पड़ने  के बाद तो लेकिन फौरन पता चल जाता है. एक पल भी नहीं लगता इसे निस्तेज होते हुए. .०००१ % भी यदि स्वच्छता घटे तो अहसास फौरन दिलाता है भीतर स्थित परमात्मा रूपी मित्र, वह तो हर क्षण सजग है न. बहुत बचा-बचा कर रखना पड़ता है, व्यर्थ की बातचीत नहीं, व्यर्थ का कुछ भी नहीं. आज सुबह दीदी का फोन आया, वे भांजियों के ब्याह की बात बता रही थीं. अगले डेढ़-दो वर्षों में दोनों की अथवा एक की तो शादी करने का वे इरादा रखते हैं. छोटे भांजे का दाखिला दिल्ली के एक कालेज में हो गया है. पर अभी वह चंडीगढ़ में बीटेक के दाखिले का इंतजार भी कर रहा है. कल शाम को सासु माँ व छोटी ननद की अस्वस्थता की खबर भी मिली. छोटी बहन इसी माह पूना जाने की उम्मीद रखती है. उस दिन चचेरे भाई का खत आया था, उसकी भाषा अच्छी है, विचार भी सधे हुए हैं पता नहीं क्यों उसने अपने शारीरिक रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया, गरीबी को इसलिए अभिशाप कहते हैं. नन्हे की फिजिक्स की कोचिंग कल समाप्त हो गयी, अगले टीचर गणित आएंगे. वह अपने मन की करता है, आजाद ख्याल किशोर है. जून और वह दोनों ही उसे बहुत प्यार करते हैं और दो वर्ष वह उनके साथ रहेगा फिर तो पढ़ाई  के लिए उसे बाहर जाना है, हो सकता है तब उसे उनका टोकना याद आए कि वे उसके सुधार के लिए ही उसे सन्मार्ग पर लाने के लिए ही टोकते हैं ! आज दोपहर एक सखी और उसका पुत्र आ रहे हैं राखी बनवाने.     


Monday, March 16, 2015

मूंग का हलुआ


आज पूर्णिमा है. उसके हृदय गगन में भी परमात्मा रूपी चन्द्रमा का आगमन होगा ऐसी सूचना मिल रही है. मन शांत है, ध्यानस्थ है, सद्गुरु की छवि हटती नहीं. सुमिरन अपने आप चलता है. ईश्वर को छोड़कर कोई विचार मन में नहीं टिकता. एक उसी की याद हर वक्त बनी हुई है और कैसी अद्भुत गहराई का अनुभव हो रहा है. जैसे सब कुछ ठहर गया हो. सारा जगत स्थिर हो मन की तरह, कहीं कोई उहापोह नहीं, विक्षेप नहीं, अद्भुत है यह क्षण ! कल दोपहर स्वामी योगानन्द जी की आत्मकथा पढ़ी. साधना के अनगिनत सूत्र उनकी इस पुस्तक से हाथ लगते हैं. पढ़ते-पढ़ते मन ध्यान में टिक जाता है. परसों ध्यान में आवाज सुनी थी “निरभिमानी बन” उसके और प्रभु के मध्य अहंकार का पर्दा ही तो है, इसे चूर-चूर करना होगा. मन के सूक्ष्म अहंकार को निर्दयता से उखाड़ फेंकना होगा. कठोर बनना पड़ेगा मन के प्रति, कड़ी नजर रखनी होगी कि कहीं कोई भाव ऐसा तो नहीं आ रहा जो अहंकार को पोषित करे. पूर्ण समर्पण तभी सम्भव है. सद्गुरु इतनी दूर रहकर भी उसे सचेत कर रहे हैं. सुबह स्वप्न देखा जो उसकी एक और कमजोरी की ओर ध्यान दिला रहा था. मिथ्याभाषण अथवा तो आवश्यकता से अधिक भाषण, एक बात को बार-बार कहने की बुरी आदत, नन्हे और जून को कई बार इसका शिकार होना पड़ा है. ज्यादा बोलने से बातें अतिरंजित भी हो जाती हैं और निर्दोष असत्य भी मुख से निकल जाता है. कल शाम को सत्य का सामना वह ठीक से नहीं कर पायी. हर क्षण सजग रहना होगा तभी पाषाण हृदय चमक उठेगा और उसमें परमात्मा की छवि प्रकट होगी. कृष्ण की गीता पढ़े या सद्गुरु के वचन सुने सभी मन की शुद्धि चाहते हैं !   

उसका हृदय परमात्म सुख से परिपूर्ण है, कोई होश में रहे तो विकार पास नहीं फटकते और यदि कोई भाव ऐसा उठा भी तो होश में उसे देखा जा सकता है. सुबह उठी तो एक स्वप्न देख रही थी. उसके हाथ में स्वादिष्ट हलुआ है, शायद मूंग की दाल का, शुद्ध घी और मेवों से युक्त, मीठा और स्वादपूर्ण पर दो छोटी बच्चियों के कारण बहुत सा व्यर्थ जमीन पर गिर जाता है. सपना सचेत करता है कि परमात्मा का जो आनंद उसे मिला है उसे छोटे-छोटे सुखों के पीछे कहीं व्यर्थ न गंवा दे. सुबह क्रिया के बाद किसी के होने का, किसी अशरीरी के होने का अहसास हुआ, एक लय में जैसे किसी के साँस लेने की आवाज आ रही थी. बहुत पहले भी उसे ऐसा अनुभव हुआ था. सद्गुरु की स्मृति भी हर क्षण रहती है, ऐसा लगता है जैसे उनसे मानसिक सम्पर्क बन रहा है. वह उसकी प्रार्थना ईश्वर तक पहुँचा देते हैं क्योंकि वह हर क्षण उनसे जुड़े रहते हैं. ऐसा लगता है सारे संशय मिट गये हैं और अंततः एक ऐसा प्रकाश मिला है जो उसे कभी छोड़ नहीं सकता. कृष्ण की अनुकम्पा है. यह सारा विश्व उसी का विस्तार है. उस एक की शक्ति ही हर ओर बिखरी है. जिसके मूल में प्रेम है अहैतुक प्रेम ! यह संसार प्रेम से ही बना है, प्रेम पर ही टिका है और प्रेम में ही स्थित है ! 

कल शाम वे एक विवाह भोज में गये. कल रात स्वप्न में माँ को देखा, वह ठीक नहीं लग रही थीं, अस्त-व्यस्त सी कहीं जा रही थीं. दीदी की सास को भी कल बहुत सालों के बाद स्वप्न में देखा, कहीं ऐसा तो नहीं उनकी आत्माएं ही उसे दिख रही हों. आत्मा का अस्तित्त्व शरीर छूटने के बाद भी रहता है. वह इतनी सूक्ष्म होती है कि दिखती नहीं, तरंग का सा रूप होता है, एक ऊर्जा ! वास्तव में प्राणी सारा जीवन उस मृत्यु की ओर पल-पल बढ़ते रहते हैं जो अवश्यम्भावी है, फिर भी वे उसके लिए कोई तैयारी नहीं करता. मृत्यु से पूर्व ही उन्हें यह जानने का प्रयास करना है कि वे कहाँ से आये हैं, क्योंकि वहीं लौटना होगा..