Friday, February 15, 2019

पर्वतों की रानी



बचपन से लेकर आज तक कई बार इस घर में आना हुआ है और हर बार दीदी ने प्रेम से स्वागत किया है. मेज पर ढेर सारे व्यंजन और आग्रह करके खिलाना. जीजाजी भी उतना ही ध्यान रखते हैं. बड़ी भांजी भी अपनी बेटी के साथ आई हुई थी. आज दोपहर बारह बजे वे उत्तराखंड की राजधानी के लिए चले, ट्रैफिक जाम के कारण दो बजे की बजाय साढ़े तीन बजे यहाँ पहुँचे. भोजन के पश्चात बड़ी बुआ से मिलने गये. चचेरी बहन व उसकी बिटिया भी मिली, पुत्र बड़ा हो गया है, सो नहीं आया. मौसम यहाँ ठंडा है पर घर बंद है सो भीतर ठंड का अहसास नहीं हो रहा है. छोटे भाई के कई रूप आज देखने को मिले, सहज और आनंदी भी, परेशान और शिकायती भी. परमात्मा सारे विरोधों को स्वीकार करता है. पिताजी ने सुबह अपने हाथों से चाय बनाकर दी, कल रात को बिस्तर लगाया. उनकी उम्र में इतना ऊर्जावान और प्रेम से भरे रहना आश्चर्य की बात है !


होटल के इस शांत कमरे में बैठकर लिखना एक सुखद अनुभव है. एयर कंडीशनर की आवाज के अलावा कोई ध्वनि नहीं है. कमरे का तापमान न ज्यादा है न कम. बाहर लॉन में अब धूप चली गयी है, ठंडी हवा है और पहाड़ों पर सफेद कोहरे का आवरण छा गया है. आज सुबह साढ़े दस बजे वे दीदी के घर से रवाना हुए और पौने दो बजे मसूरी के इस सुंदर स्थल पर पहुँच गये. लम्बी गैलरी से चलते हुए कमरे तक, फिर सामान रखकर टैरेस पर, जहाँ धूप में बैठकर भोजन का आनंद लिया. उसके बाद दूर तक फैले सुंदर बगीचे और बच्चों के पार्क में घूमते हुए सुंदर दृश्यों की तस्वीरें उतारीं. जून को रजिस्ट्रेशन के लिए जाना था, वह यहाँ एक कांफ्रेस में भाग लेने आये हैं. वह कमरे से बाहर बने लॉन में कुछ देर बैठकर आशापूर्णा देवी की पुस्तक ‘चैत की दोपहर में’ पढ़ती रही, एक छोटा सा नंग-धड़ंग बच्चा जिसकी माँ को मसूरी में मोच आने से व्हील चेयर पर आना पड़ा था, खेल रहा था और पौधे उखाड़ रहा था. बाद में उसे डांटने पर जोर-जोर से रोने लगा. बाहर ठंड बढ़ जाने पर वह कमरे में आ गयी, केतली में पानी गर्म किया एक कप काफी बनाई. पिताजी से फोन पर बात की. दीदी का व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल आया. और अब उसके पास समय ही समय है. चाहे जो लिखे या पढ़े. चाहे तो बाहर घूमने भी जा सकती है, पर ठंड अवश्य ही बढ़ गयी होगी. ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों पर बने मकान तथा नीचे गहरी घाटियों में घने जंगल, बहर का दृश्य बहुत सुंदर है. उसने दीदी-जीजाजी, जून, छोटे भाई-भाभी, पिताजी, बड़े भाई, मंझले भाई-भाभी सभी के लिए उपजे मन के भावों को छोटी-छोटी कविताओं में पिरोया. सबसे मिलकर जो ख़ुशी भीतर उपजी थी उसी को शब्दों में ढाल दिया तो ख़ुशी कम होने के बजाय और भी बढ़ गयी. ख़ुशी का गणित ही कितना अलग है, यह बांटने से बढती है. ऐसे ही दुःख भी बांटने से बढ़ता ही है, उसे तो चुपचाप हृदय में रख लेना होगा. 

Tuesday, February 12, 2019

काले और हरे अंगूर



सुबह के साढ़े नौ बजे हैं. दिल्ली आये दूसरा दिन है. कल दोपहर साढ़े ग्यारह वे घर से निकले, फ्लाईट समय पर थी. जून रास्ते में ही उतर गये यानि गोहाटी में. वह शाम को दिल्ली पहुंची, बड़े भाई लेने आये थे. कार पार्क जोन में वह मिले, उन्हें उसकी वजह से कार छोड़कर आना पड़ा, थोड़ी सी परेशानी हुई पर जल्दी ही वे घर पहुंच गये. रात्रि भोजन मंझली भाभी के यहाँ किया, वापस आते-आते देर हो गयी थी. भतीजी ने अपने विवाह की तस्वीरें दिखाईं एक वीडियो भी. भाई सोसाइटी के दफ्तर में काम करते हैं, उन्होंने बताया लोगों के बिल बनाने के लिए उन्होंने एक तकनीक बनाई है, जिसमें वर्ड में बनाये फॉर्म में एक्सेल से डाटा अपने आप ट्रान्सफर हो जाता है. हो सकता है यह विधि मृणाल ज्योति में वे काम में ला सकें. रात को सांख्य शास्त्र सुना और सुबह ओशो को. ज्ञान के बिना मन तूफान में डोलती नैया की तरह डांवाडोल ही रहता है. ज्ञान जैसे एक लंगर का काम करता है जिसके सहारे नाव स्थिर हो जाती है. सुबह वे दूर तक घूमने भी गये, तापमान १०-१२ डिग्री रहा होगा, लेकिन अनेक लोग पार्कों में निकले हुए थे. वापस आकर चाय पी, भीगे हुए बादाम, खजूर और बिस्किट के साथ. कुछ देर धूप में बैठकर इधर-उधर की बातें कीं तत्पश्चात नहाधोकर नाश्ता. भाई द्वारा बनाया अंकुरित मूंग व मोठ का नाश्ता, फिर वह सब्जी लेने नीचे चले गये. सफाई करने व खाना बनाने दो सहायिकाएं अपना काम कर रही थीं. सामने बालकनी में धूप आ रही थी, उसने सोचा कुछ देर धूप में बैठने का आनंद लिया जा सकता है.

धूप तेज है, ऊपर छत पर धूप में बैठकर उन्होंने फलों का आनंद लिया. घर में गमले में उगा अमरूद, पपीता, काले व हरे अंगूर तथा केला. सभी फल मीठे व रसीले. आज सुबह वह दिल्ली से पिताजी से मिलने आ गयी है. ट्रेन समय पर थी, छोटा भाई डिब्बे में ही आ गया था. सामान लेकर प्लेटफार्म से सीढ़ी चढकर वे बाहर निकले. अकेले आने पर भाइयों का सहयोग मिलता है निस्वार्थ और स्नेह भरा. स्टेशन से घर आते समय भाई ने मिठाई व फल खरीदे.

रात्रि के दस बजे हैं. भाई-भाभी एक विवाह समारोह में शामिल होने गये हैं, पिताजी अपने कमरे में सोने चले गये हैं. घर में शांति है आज, कल रात पिताजी का ट्रांजिस्टर भी चल रहा था और नीचे तेज आवाज में टीवी. शाम को पुरानी तस्वीरें देखीं, उससे पूर्व नाद-ब्रह्म ध्यान किया. दोपहर को चचेरा भाई आया था, अकेला रहता है और अपना ध्यान जरा भी नहीं रखता. पैरों-हाथों पर मैल जमा था, उसे गर्म पानी व साबुन दिया. पिताजी ने कहा, सेवा का मौका दिया है उसने, करनी चाहिए. उसे हर बार यानि हर महीने आने के लिए कहा. सुबह पिताजी के साथ टहलने गयी बॉस थोड़ी सी दूर. उनमें जरा भी आलस्य नहीं है. हर समय काम करने को तत्पर हैं, चलने में दिक्कत होती है पर खुद के लिए बॉर्नविटा लेने खुद जाते हैं. कल भी उनके साथ टहलने जायेगी. उसके बाद छोटी भाभी के साथ बाजार गयी. दो छोटी लडकियों के लिए उपहार खरीदने थे. भाभी के माँ-पिता के विवाह की स्वर्ण जयंती पर लिखी कविता का प्रिंट लिया. जून ने इसमें दूर से ही सहायता की. दोपहर को ओशो की पुस्तक पढ़ी. छोटा भाई ओशो के प्रवचन सुनता है और बैठे-बैठे कहीं खो जाता है, वह भाव समाधि में रहता है, सदा होश्पूर्ण विश्राम की स्थिति में !  

Sunday, February 10, 2019

वसंत पंचमी



पिछले चार दिन डायरी नहीं खोली. अद्भुत थे ये चार दिन ! शनिवार को नन्हा अपने मित्रों के साथ आया. इतवार की सुबह सभी पिकनिक पर गये, शाम को भावी वधू के माता-पिता भी आ गये. सोमवार को सभी कोर्ट गये. शाम को घर पर छोटा सा आयोजन किया. सभी कुछ भली प्रकार हो गया. मंगलवार को सब वापस चले गये. कल बुध को सरस्वती पूजा थी, दोनों स्कूलों में होने वाली पूजा में शामिल हुई. इसके बाद दो वर्ष ही और हैं जब वह यहाँ वसंत पंचमी के उत्सव में शामिल हो सकती है. बंगाल और असम के अतिरिक्त भारत के अन्य भागों में पूजा के पंडाल लगाने की प्रथा नहीं है. आज भतीजी का विवाह है और भांजी का जन्मदिन भी ! उसके लिए कविता लिखी. अगले हफ्ते यात्रा पर निकलना है. उसने मन ही मन उपहारों की सूची बनाई, बड़े व छोटे भाई के लिए डायरी व पेन, भतीजी के लिए साड़ी, छोटी भाभी के लिए स्टोल, बड़ी बुआ व चाची जी के लिए शाल, बच्चों के लिए चाकलेट्स, किताबें व पेन, चचेरी बहन के लिए सलवार सूट. अभी कोऑपरेटिव जाना है, एक सखी की बिटिया का कल जन्मदिन है, उसके लिए भी उपहार लेना है.

शाम के सात बजे हैं. अभी कुछ देर पूर्व योग कक्षा समाप्त हुई. जून ‘रईस’ देखने गये थे, पर थोड़ी ही देर में लौट आये. दोपहर बाद उस सखी के घर गयी जिसकी बिटिया का दसवां जन्मदिन है, घर में सजावट चल रही थी. सुबह मृणाल ज्योति में बच्चों को योग कराया, उसके बाद तन-मन बेहद हल्का लग रहा था. कल सुबह एक पल में मन के विचलन को देखा फिर परिवर्तन किया, जादू जैसा लगा. कल रात्रि पल में जीने का सूत्र नींद में भी याद आ रहा था. चेतना कितनी शक्तिशाली है कि एक क्षण में इतने बड़े ब्रह्मांड को एक साथ महसूस कर सकती है. हर क्षण अपने भीतर एक अनंत को छिपाए है. भीतर अनंत शांति है. आजकल साधना का समय घट गया है, पर मन में स्थायी शांति का वास है, जो हर समय एक रस ही लगता है. भतीजी का विवाह व रिसेप्शन कल दोनों हो गये. तस्वीरें देखीं. मार्च में कुछ दिनों के लिये वह विदेश जाएगी.

रात्रि के आठ बजे हैं. मौसम अब ठंडा नहीं रह गया है. कमरे में बिना स्वेटर पहने रहा जा सकता है. टीवी पर उत्तर प्रदेश के चुनावों के समाचार आ रहे हैं. शामली में रेत के अवैधानिक खनन के समाचार बताये जा रहे हैं. आज जया एकादशी है. जून दोपहर को डिब्रूगढ़ गये थे, नन्हे के विवाह का सर्टिफिकेट मिल गया है. समधियों को फोन किया. जून अगले हफ्ते गोहाटी में उनसे मिलने वाले हैं. दोपहर को ब्लॉग पर एक पोस्ट प्रकाशित की, आजकल लेखन बहुत कम हो गया है. यात्रा के दौरान छूट ही जायेगा. परसों वे पड़ोसी के यहाँ गये थे, उनकी बिटिया का विवाह होने वाला है, उनके न रहने पर वे मेहमानों को उनके घर में ठहरा सकते हैं, ऐसा प्रस्ताव भी दिया. कल वह उन्हें बुलाकर मेहमानों का कमरा दिखा देगी, जिससे उन्हें बाद में आसानी हो. परसों उसे यात्रा पर निकलना है. पैकिंग हो गयी है.  


Saturday, February 9, 2019

गार्डन अम्ब्रेला



आज नेता जी का जन्मदिन है. बंगाली सखी की बिटिया का जन्मदिन भी है, सुबह उससे बात हुई. कल शाम को एक भोज में गयी थी. कुछ परिचित महिलाओं से बात हुई, यूँ ही इधर-उधर की बातें. एक पुरानी परिचिता जो अब यहाँ नहीं रहतीं, उनका फोन नम्बर भी लिया. सामने बगीचे में तरह-तरह के फूल खिले हैं व पंछियों की आवाजें आ रही हैं. अगले महीने पिताजी से मिलने घर जाना है दिल्ली होते हुए.

शाम हो गयी है, यानि एक और दिन बीतने में कुछ ही घंटे शेष हैं. आज सुबह कितनी देर से उठे वे, कारण, रात को देर तक नींद का न आना.. उसका कारण कल शाम को तीन-साढ़े तीन घंटे व्यर्थ ही बातों में बिता देना. जीवन को इतना भी हल्के में नहीं लेना चाहिए कि जीवन से रस ही चला जाए. मन को भी विश्राम चाहिए और जैसे कोई गायक रोज रियाज करता है, वैसे ही साधक को रोज ही साधना करनी होती है. थोड़ी सी भी लापरवाही मन को मूल से दूर ले जाती है और वह बिन जल की मछली की तरह तड़पता है. परमात्मा से एक क्षण की भी विलगता अब सहन नहीं होती. जब दरिया भीतर बहता ही है तो क्यों कोई प्यासा रहे. कल शाम को मंझली भाभी ने भतीजी के रिश्ते की बात बतायी. पंजाब का परिवार है, लड़का विदेश में रहकर नौकरी करता है. ईश्वर चाहेगा तो इसी वर्ष उसका भी विवाह हो जायेगा. नैनी की सास ने चार संतरे लाकर दिए हैं जो उसका बड़ा बेटा अरुणाचल प्रदेश के संतरे के बगीचे से लाया है. आज बड़े भाई से बात की, वह खुश लग रहे थे.

रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. शाम को लेडीज क्लब की मीटिंग में गयी, एक सदस्या के लिए कविता पढ़ी. एक सखी की माँ अस्वस्थ है, अस्पताल में है, वह उससे मिलने गयी है. जून अभी तक आये नहीं है. ऑडिट चल रहा है उनके दफ्तर में. शाम को योग कक्षा हुई, अगले हफ्ते दो दिनों के लिए एक साधिका को कहा है, अपने घर में करवा लें. कल शाम से पहले ही नन्हा अपने मित्रों के साथ आ जायेगा. घर में चहल-पहल हो जाएगी. शाम को बगीचे की सफाई करवाई. दोपहर को कुर्सियां और बगीचे के छाते भी आ गये हैं. जून घर का सामान भी ले आये हैं, यानि तैयारी पूरी है और उसने नन्हे और उसकी भावी पत्नी के लिए कविता भी लिख दी है जिसे जून ने प्रिंट कर दिया है. आज चारों ब्लॉग्स पर पोस्ट प्रकाशित भी कीं. दोपहर को दूध गैस पर रखकर सो गयी, उबल कर गिर गया, विश्राम की कीमत !

साढ़े दस बजने को हैं, मौसम आज बादलों भरा है. नन्हा और उसके मित्र कोलकाता पहुँच चुके हैं. दो घंटे बाद अगली फ्लाईट है. भोजन बन चुका है, जून आज देर से आने वाले हैं, उनका मन लेकिन इधर ही लगा हुआ है. वर्षा होने से पूर्व ही फोन करके कहा, सूखी लकड़ियाँ गैराज में रखवा दे, जो मेहमानों के आने पर एक रात्रि उन्हें जलानी हैं. सुबह-सुबह एक सखी आई थी, खुश थी, चाहती है नन्हे को स्वयं जाकर बंगाली सखी को बुलाना चाहिए, पर उसे लगता है इसकी कोई जरूरत नहीं है. उसने जो ठान लिया वह करके ही रहेगी, इसलिए जो होता है सब ठीक है. वर्षा होकर रुक गयी है, पूरे लॉन में पत्ते बिखर गए हैं. उन्होंने कल ही अच्छी तरह सफाई करवाई थी. Really God Loves Fun!

Wednesday, February 6, 2019

लकड़ी के गिलास



चार दिनों बाद परसों वे यात्रा से लौट आये. सोचा था कि रसोईघर व स्टोर में सफेदी का कार्य पूरा हो चुका होगा पर अभी भी एक दो-दिन का कार्य शेष था. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी नये वर्ष में पहली बार. जून ने कुछ डायरी दी थीं उन्हें देने के लिए और एक पुराना लैप टॉप. उसने बच्चों को योग कराया और बिस्किट बांटे. वापसी में बाजार में लाल गाजरें मिल गयीं, यहाँ कम ही मिलती हैं, ज्यादातर नारंगी रंग की चिकनी गाजरें होती हैं. दोपहर को स्टोर में सब सामान लगाया. गाजर का हलवा बनाया. शाम को क्लब में मीटिंग हैं, योग कक्षा में आने वाली महिलाओं में से जो वहाँ जाएँगी, उन्हें अपने शाम के कार्य पहले निपटाने होंगे. योग तो छोड़ा जा सकता है पर दूसरे कार्य कहाँ ? तभी तो जीवन में योग फलीभूत नहीं होता. आज जून को गोहाटी जाना था, घर से साढ़े बारह बजे से पहले ही चले थे, पर अभी तक एअरपोर्ट पर ही बैठे हैं सभी यात्रीगण, फ्लाईट अब सात बजे जाएगी.

आज निकट के एक गाँव में मृणाल ज्योति की एक कर्मी के विवाह का निमत्रंण था, लगभग ढाई घंटे वहाँ रुकी. पहली बार असमिया शादी के ‘जुरून’ रस्म को इतने निकट से देखा. अच्छा लगा. उन्हें भी यह रस्म निभानी होगी. जून से बात हुई वह गोहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी पर बने पुल पर ट्रैफिक में अटके हुए थे, कहने लगे एक-डेढ़ घंटा ज्यादा लग जायेगा गंतव्य तक पहुँचने में. सुबह एक सखी का फोन आया, शाम को आग जलाकर उसी में सिकी रोटी खाने के लिए, उसे इस कार्य में दक्षता हो गयी है.

सुबह उठते ही ध्यान में बैठी. भीतर जैसे कोई फिल्म चलने लगी हो. पुराने जन्म के सिलसिले जो इस जन्म तक चले आये हैं, दिखे, साक्षी भाव से सबको देखते रहो तो कुछ भी नहीं होता. दोपहर को नैनी के घर से लड़ने की आवाजें आ रही थीं, पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई भीतर. आत्मा में रहो तो कितना चैन है, कुछ नहीं छूता. मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा सहज ही घटते हैं. जो कर्म प्रारब्ध के रूप में फल देने के लिए प्रस्तुत हो चुके हैं, वे क्षीण हो जाते हैं, जब कोई साधना करता है. जून गोहाटी से लौट आये हैं, बांस के बने दो कलात्मक मूढ़े लाये हैं और भी कुछ कलापूर्ण वस्तुएं, जैसे लकड़ी के गिलास, एक गैंडा, बेंत की टोकरी आदि, आने वाले मेहमानों के लिए सुंदर उपहार ! टाटा स्काई पर गुरूजी को सुन पाती है आजकल, अच्छा लगता है, वे ध्यान भी करवाते हैं. जिसे सुनते-करते वे प्राणायाम भी कर लेते हैं. कल शाम उस सखी के यहाँ आग में शकरकंदी भी भूनी, अच्छा रहा सारा कार्यक्रम, उस सखी में बहुत ऊर्जा है.

आज ठंड बहुत अधिक है. दोपहर के एक बजे हैं, वह लॉन में धूप में बैठी है. पीठ पर तपन महसूस हो रही है. एक योगाचार्य से सुना कि शरीर को जितना विटामिन डी चाहिए, उसके लिए कम से कम पौन घंटा धूप में रहना चाहिए. आज सुबह स्कूल गयी तो रास्ते में सह शिक्षिका ने जो बात बताई, उससे मन बेचैन है. कल अख़बार में भी ऐसी ही एक खबर पढ़ी. मानव के भीतर के पशुत्व को बताती बात, छोटे-छोटे बच्चों को उस पशुत्व का शिकार होने की बात. हर मानव के भीतर पशु भी छिपा है और देव भी, कोई किसे जगाना क्घहता है यह उस पर निर्भर करता है. उस शिक्षिका ने उसे बताया की वह परेशान है और अब उसने अपनी परेशानी उसे दे दी है. मालिन से पूछताछ करने के बाद ही जून को बताना होगा. यदि यह बात सच हुई तो आगे की कार्यवाही भी करनी होगी.   


Monday, February 4, 2019

छऊ नृत्य का प्रदेश



आज सुबह वे चार बजे से भी पहले उठ गये और पांच बजे से पहले तैयार भी हो गये. हल्का सा नाश्ता किया और जून ने ड्राइवर को फोन किया. वह लगभग बीस किमी दूर एक गाँव में रहता है, गोरखा बंद के कारण उसे एक सुरक्षा कर्मी भी अपने साथ लेते हुए आना था, किन्तु उसने बताया आधे रास्ते में ही धरना देने वाले लडकों ने उसकी कार को रोकर चाबी उससे ले ली है और अब उसके पास आने के लिए कोई साधन नहीं है. कुछ पलों के लिए वे परेशान हुए फिर उसे समझाया, वह घर चला जाये और उन लडकों का नम्बर ले ले. उन्होंने सुरक्षा अधिकारी को इस वारदात की खबर भी कर दी, जिसने सहायता का वादा किया. जून ने एक दूसरे ड्राइवर को फोन किया वह अपने स्कूटर से आया और उनकी कार में लगभग पचास किमी दूर हवाई अड्डे ले गया. गनीमत है रास्ते में और किसी ने नहीं रोका. एक बात और अच्छी हुई, जून बिजनेस क्लास में थे, उसका टिकट भी किसी स्कीम के कारण अपग्रेड हो गया और आरामदायक यात्रा के बाद वे ग्यारह बजे कोलकाता पहुंच गये. गेस्टहाउस जाकर सामान रखा और विवाह के लिए कुछ आवश्यक खरीदारी करने निकल पड़े, लौटकर सदा की तरह स्वादिष्ट भोजन और फिर रेलवे स्टेशन के लिए निकल पड़े. रेल यात्रा भी सुखद थी. शाम की चाय शताब्दी ट्रेन में भारतीय रेल के सौजन्य से मिली. रात्रि आठ बजे वे धनबाद पहुंच गये. होटल का नाम है १७ डिग्री, पारंपरिक साज-सज्जा से सुशोभित यह होटल सुविधाजनक है. रात्रि भोजन के बाद कुछ देर टहलने के लिए गये. हवा ठंडी थी और भली लग रही थी. अब निद्रा का समय है.

रात्रि के दस बजे हैं, अभी-अभी वे आईएसएम धनबाद के यूनियन क्लब के बैंकेट हॉल से लौटे हैं. शाम सात बजे पहुँचे थे. लोहे की बड़ी-बड़ी पिंजरेनुमा अंगीठियों में कोयले के लाल अंगारे दहक रहे थे. कोयले की नगरी में आकर कोयले का ऐसा रूप देखना तो स्वाभाविक ही है. कार्यक्रम आरम्भ भी नहीं हुआ था कि चायनीज बेबी कॉर्न व सूप परोसा गया, पहली बार छऊ नृत्य देखने का सौभाग्य मिला. बेहद आकर्षक नृत्य था जिसमें सभी कलाकार पुरुष थे. जो पौराणिक कथाओं पर आधारित था, पारंपरिक वाद्य यंत्र थे जिन्हें कई अधेड़ व वृद्ध उम्र के कलाकार बजा रहे थे, एक मुख्य गायक था. उन्होंने वीडियो भी बनाया और तस्वीरें उतारीं. उसके बाद टीवी कलाकार तान्या मुखर्जी का कार्यक्रम था, जो सुरीले गीत गा रही थीं. वे थक गये थे सो जल्दी ही भोजन करके होटल लौट आये. ठंड काफी थी, तापमान १४ डिग्री था जो अग्नि के पास बैठने पर महसूस नहीं हो रहा था. शाम को वे विरसा-मुंडा पार्क देखने गये थे, जो काफी विशाल था पर वे थोड़ा सा भाग ही देख पाए. सुबह नौ बजे आईएसएम, जो अब आईआईटी बन गया है, पहुंच गये थे, कार्यक्रम लगभग दस बजे आरम्भ हुआ. दोपहर बाद जून को पेपर प्रस्तुत करना था. कार्यक्रम अच्छा था, काफी लोगों को सुना. कल पुनः सुबह साढ़े नौ बजे ‘शक्ति मन्दिर’ होते हुए उन्हें यहाँ आना है. दोपहर ढाई बजे तक कार्यक्रम है.

रात्रि के नौ बजे हैं, वे होटल लौट आये हैं, आज यहाँ  तीसरी और अंतिम रात्रि है. पैकिंग कर ली है और पालक व हरी सब्जियों का भोजन भी. शाम को बाजार से भावी वधू के लिए आभूषण खरीदे. सुबह शक्ति मन्दिर के दर्शन किये. मन्दिर अत्यंत विशाल व स्वच्छ था, पर द्वार के बाहर भिखारियों की लंबी कतार थी, जैसे पूरे के परिवार वहाँ थे, हर उम्र की औरतें, बच्चे और पुरुष. मानव होने की गरिमा से अनभिज्ञ कितने अभागे. सम्मान का जीवन क्या होता है, उन्हें पता ही नहीं. वहाँ से वे कैंपस गये, उसे कैंपस दिखाने के लिए एक विद्यार्थी को कह दिया गया था, जिसने पहले प्रयोगशाला दिखाई, फिर अन्य दो विद्यार्थियों ने पूरा क्षेत्र दिखाया. यह संस्था १९२६ की बनी हुई है तथा उस जमाने की विशाल इमारतें अभी तक सुरक्षित हैं और शानदार हैं. उसके बाद वह पुस्तकालय में बैठी रही. हिन्दी की पुस्तकें पढ़ीं. नरेंद्र कोहली की स्वामी विवेकानन्द पर आधारित पुस्तक, राहुल सांस्कृतायन के पत्र तथा अशोक वाजपेयी की एक पुस्तक जिसमें कई निबन्ध थे, अधिकतर कविता से जुड़े. तन्मय तथा राजेन्द्र ने स्टूडेंट एक्टिविटी सेंटर दिखाया, जो काफी बड़ा था तथा जिसमें अनेक कक्ष थे. लगभग हर क्षेत्र में रूचि रखने वाले छात्रों के लिए कोई न कोई क्लब था. योग, नृत्य, खेल, रेडियो, साहित्य, कला तथा अन्य कई. उन छात्रों ने कालेज के बारे में कई रोचक बातें बतायीं. जैसे, धनीराम चाय वाला जिसकी तीन पीढ़ियाँ उसकी दुकान को चला रही हैं. दोपहर का भोजन वहीं किया. धनबाद कोयले की राजधानी है, वे झरिया भी गये जहाँ दूर-दूर तक कोयले का क्षेत्र था, जहाँ आग लगी हुई थी तथा जगह-जगह धुआं भी निकल रहा था. ड्राइवर सुदर्शन उन्हें कोलकाता ले जायेगा. भोजन के बाद कैंपस में बगीचा देखा, जहाँ फूलों की बहार थी. विभिन्न प्रकार के फूल वहाँ की शोभा को बढ़ा रहे थे. माली काम में लगे थे, उनके इस सुंदर कार्य की प्रशंसा की, तस्वीरें उतारीं.

रात्रि के नौ बजे हैं, वे कोलकाता गेस्टहाउस लौट आये हैं, लकड़ी के फर्श और ऊंची-ऊंची दीवारों वाला यह सुंदर गेस्टहाउस उन्हें अपने घर जैसा ही लगता है. अभी-अभी भोजन किया, मेथी-आलू, भिंडी और मूंग की दाल के साथ छोटी फूली हुई रोटी, यहाँ का भोजन भी घर जैसा होता है. आज दिन में भी कुछ खरीदारी की. सब सामान पैक हो गया है और कल सुबह वापस घर जाना है.

Monday, January 28, 2019

ग्रेनाईट की स्लैब



पौने ग्यारह बजे हैं सुबह के, घर में सफेदी आदि का काम शुरू हो गया है. मौसम अच्छा है, खिली हुई धूप बगीचे को और भी सुंदर बना रही है. लेकिन कमरे में भीतर तक महसूस होने वाली ठंड भी है. आज डहेलिया में पहला लाल पुष्प खिला है. किचन में ग्रेनाईट की स्लैब लगाने का काम हो रहा है. कितना शोर करती है यह मशीन और काटते हुए जो धूल उड़ती है उससे दीवारों व फर्श के साथ-साथ मजदूरों के वस्त्र तथा चेहरों पर धूल की कितनी मोटी परत चिपक गयी है. आज वे किचन का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. कल सुबह धनबाद की यात्रा पर निकलना है. कल रात एक पुराना मित्र परिवार अपने मेहमानों के साथ भोजन पर आया था, उन्हें दो कविताएँ भी सुनायीं. जून ने बहुत ठहाके भी लगाये, वह कल बेहद खुश थे. कालेज के जमाने की बातें हुईं. सखी की मेहमान के लिए उसने एक कविता लिखी, अभी टाइप करनी है, छोटी बहन की फरमाइश वाली कविता भी लिखनी है. कल उसके विवाह की पच्चीसवीं वर्षगांठ है, वह चाहती है उसके जीवन के मुख्य पड़ावों का जिक्र करती हुई एक कविता हो. शाम को क्लब जाना है, मुख्य अधिकारी का विदाई समारोह है.

तीन बजे हैं दोपहर के, अभी कुछ देर पहले ही सलीम ने कहा, जो मुस्लिम है और मजदूरों का मुखिया है, पंडाल भी वही लगाएगा और खाना भी वही बनाएगा. उस का अर्थ था कि घर में जो विवाह होने जा रहा है उसके लिए. सुबह कम्पनी से आये चेनमैन ने पूछा था, शादी कब है, उसने कहा, अभी देर है. उन्हें कैसे बताये कि अभी तो विवाह केवल कोर्ट में होगा बाद में ही रीतिरिवाज वाली शादी होगी और वह भी बंगलूरू में. यहाँ पर एक पार्टी ही होगी. छोटे भाई के यहाँ भी लड़के वाले आ रहे हैं, बड़ी भतीजी के रिश्ते की बात तय हो चुकी है, विवाह की तारीख आदि तय होगी. जून आज दिगबोई गये थे, दोपहर भोजन पर नहीं आये. उसने इस मौसम में पहली बार गाँठ गोभी वाले चावल बनाये थे, उनके लिए रखे थे पर मजदूरों ने जब कहा, वे ठेकेदार से पैसे न मिलने के कारण भोजन करने ही नहीं गये तो उन्हें दे दिए. उसे आश्चर्य हुआ ठेकेदार आखिर ऐसे किस काम में उलझ गया कि उसे मजदूरों के भोजन का भी ध्यान नहीं रहा. आज जून के एक सहकर्मी के पिताजी द्वारा भेजी पत्रिका ज्ञानोदय पढ़ती रही, अब उस तरह का साहित्य उसे ज्यादा आकर्षित नहीं करता. अध्यात्म से जुड़े विषय ही मन को भाते हैं. आज मृणाल ज्योति जाना था पर कुछ अव्यवस्था के चलते गाड़ी नहीं मिली. पिछले दिनों कम्पनी में कुछ अकुशल मजदूरों की भर्ती की गयी, जिन्हें काम नहीं मिला वे विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, तथा तोड़-फोड़ पर उतर आये हैं. कल क्लब के वार्षिक सम्मेलन भी हो गया. जून उसे अपने साथ धनबाद ले जा रहे हैं, जहाँ उन्हें एक सेमिनार में भाग लेना है, और यही नहीं, वह चाहते हैं कि वह कार्यक्रम में भी उनके साथ सम्मिलित हो. वह अलग ही मिट्टी के बने हैं, दृढ़ और कर्मशील ! वे दोनों एकदूसरे के मित्र बन गये हैं अब. कल रात को कई बार भीतर के शोर और सन्नाटे को अनुभव किया, बिजली के बटन को जैसे कोई ऑन-ऑफ करे, वैसे ही भीतर संसार व भगवान दिखते हैं.