Wednesday, December 11, 2013

माउन्ट आबू - एक सुंदर पहाड़ी स्थल


सुबह के नौ बजे हैं, नाश्ता लेकर वह होटल के अपने कमरे में आ गयी है., जून नन्हे को लेकर ‘हेयर कट’ कराने गये हैं, आज दोपहर को उन्हें माउंट आबू के लिए प्रस्थान करना है. बस की यात्रा है और जोधपुर में बस बदलनी भी होगी जो कल सुबह चार बजे गन्तव्य पर पहुंचा भी देगी. कल शाम उन्होंने स्वेटर्स भी खरीदे, नन्हे की स्कूल ड्रेस के, माउन्ट आबू में ठंड भी होगी. रात्रि ने सारी थका न को समेट कर मन को ताजा कर दिया है, जो उत्साह से भरा है यह सोचकर कि माउन्ट आबू में क्या-क्या देखने को मिलेगा.

माउन्ट आबू-होटल राणा प्रताप सुबह के ११.४० हुये हैं. – आज उसे घर की बहुत याद आ रही है, कल दोपहर दो बजे उनकी बस जैसलमेर से जोधपुर के लिए चली थी, मार्ग में कई सुंदर मोर देखे जो सड़क के किनारे तक आ जाते थे. किन्तु RTDC की बस में सफर करने के बाद प्राइवेट बस का अनुभव अच्छा नहीं रहा. पहली बस से उतर कर प्रदूषण भरी सडकों पर चलकर वे काफी हाउस गये, दोपहर को उसने केवल ककड़ी खायी थी, खाली पेट काफी पी ली, शायद उसी का असर रहा हो, रात दो बजे जोधपुर से माउन्ट आबू आने वाली बस में उसकी तबियत बहुत बिगड़ गयी थी, अभी तक उसका असर बाकी है, बाहर का खाना, आराम की कमी, धूल-धुआं और बस के यात्रियों की हुड़दंग बाजी सभी का मिला-जुला असर रहा होगा. खैर, जो भी कारण रहा हो, असुविधा सभी को हुई है. जून उसे बाहर ले गये और कुछ देर बाद तबियत संभल गयी. सुबह बस स्टैंड के पास ही में एक होटल मिल गया और आते ही वे सब सो गये. सारी रात शोर के कारण वह एक मिनट भी नहीं सो पायी थी. उसने सोचा, बस की यात्रा में स्वस्थ रहे ऐसा प्रयास करना है, स्वस्थ मन भी स्वस्थ तन में निवास करता है, इतने सारे मन्दिरों को देखने के बाद मन में पवित्र भाव जागृत होने चाहिए, ईश्वर उसकी सहायता करेंगे जैसे कल रात की और उनकी यात्रा यूँ ही जारी रहेगी.

विश्राम करने के बाद कल दोपहर वे नक्की ताल व सूर्यास्त देखने निकले. झील बहुत बड़ी है और चारों ओर से चट्टानों से घिरी है, बीच-बीच में चट्टानें थीं जिनपर पेड़ उगे थे, एक किनारे पर टोड की शक्ल की एक चट्टान उभरी हुई थी. उन्होंने नौका यात्रा भी की, पर तन व मन दोनों स्वस्थ न हों तो दृश्य कितने भी सुन्दर क्यों न हों मन पर वह असर नहीं छोड़ पाते. वहाँ से वे जीप द्वारा हनीमून पॉइंट गये, घाटी के दृश्य ऐसे लग रहे थे जैसे हवाई जहाज से देख रहे हों. एक टेलिस्कोप से नन्हे ने दूर नीचे एक मन्दिर व एक गाँव देखा. sunset point पर बहुत से लोगों के बैठने की जगह थी, एक घंटा इंतजार करने के बाद जब सूर्यास्त का समय आया तो बादलों के पीछे छिप गया वह, और तीसरी बार भी वे सूर्यास्त नहीं देख पाए. वापस आकर होटल में खाना मंगाया पर खाना बेहद मिर्च-मसाले वाला था. नन्हे की भी उसे फ़िक्र है, घर पर सादा भोजन खाने का उसे अभ्यास है.

आज माउन्ट आबू में उनका अंतिम व दूसरा दिन है, कल से बसों की हड़ताल शुरू होने वाली है इसलिए उन्हें आज ही निकलना है. शाम आठ बजे तक वे उदयपुर पहुंच जायेंगे.

उदयपुर – अप्रैल महीने का प्रथम दिन, यहाँ मौसम काफी गर्म है. माउन्ट आबू में कल सुबह वे प्रजापति ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय देखने गये, वहाँ दस मिनट का एक लेजर शो देखा तथा दस मिनट का एक सम्भाषण भी सुना. उसने एक पुस्तक भी खरीदी. उनके संग्रहालय में सुंदर विशाल मूर्तियाँ थीं, और केंद्र में एक विशाल हॉल था जिसमें ३५०० व्यक्तियों के बैठने की सुविधा थी, पर जिसमें एक भी स्तम्भ नहीं था. पूरा वातावरण स्वच्छ, पवित्र व सुंदर था, गमले फूलों से भरे हुए थे. यहाँ एक शांति पार्क भी है जो बाहर से देखा. उसके स्वास्थ्य पर भी इन सभी का अच्छा असर पड़ा. इसके बाद वे अर्बुदा देवी का मन्दिर देखने गये जहाँ ३३८ सीढ़ियाँ चढनी थीं, मन्दिर एक गुफा में था, दोनों तरफ विशाल चट्टानें और बीच में मार्बल का फर्श, यह अन्य मन्दिरों से अलग लगा. तत्पश्चात वे गुरु शिखर देखने गये जहाँ १८० सीढ़ियाँ  चढनी पड़ीं, आधे रस्ते में वे सब थक चुके थे सो वापस लौट आये. लौटकर अचलगढ़ गये गये जहाँ भगवान शिव के दाहिने पैर के अंगूठे के नाख़ून की पूजा की जाती है. मन्दिर के बाहर नंदी की विशाल प्रतिमा थी, जिसमें अन्य धातुओं के आलावा ८०० किलो स्वर्ण का प्रयोग भी हुआ है. उनका अंतिम पड़ाव था देलवाड़ा के पांच मन्दिर, जो पत्थर पर महीन काम के लिए विश्व विख्यात हैं. मुख्य मन्दिर वस्तुपाल और तेजपाल नामक दो भाइयों ने बनवाया है, पाँचों मन्दिर बहुत सुंदर हैं. फोटो खींचना वर्जित है, उन्होंने एक गाइड खरीदी जिसमें सजीव मूर्तियों के चित्र हैं. मन्दिर देखने के बाद वे बस स्टैंड आ गये जहाँ से उदयपुर आने के लिए बस पकड़ी और रात सवा आठ बजे यहाँ पहुंच गये.  






Monday, December 9, 2013

जैसलमेर का किला


जैसलमेर, सरोज पैलेस – कल सुबह दस बजे वे दर्शनीय स्थान देखने निकले थे. सर्वप्रथम जोधपुर का किला देखने गये, जो लगभग ५०० वर्ष पुराना है, शानदार किले की दीवारों, छतों और बड़े-बड़े दालानों में सुंदर काम किया गया है. तोपें, गुम्बद और छतरियां दर्शनीय हैं, किले की विशालता का अनुमान उसका पूरे शहर से दिखाई दे सकने से लगाया जा सकता है. किले की छत से पुराना जोधपुर शहर नीले सफेद मकानों से बहुत सुंदर लग रहा था. संग्रहालय में घोड़े, पालकियां और हथियार थे, पगड़ियाँ, संगीत यंत्र, अनूठी पेंटिग्स, और पुराने ताले सभी कुछ देखने योग्य था. बाद में वे जसवंत तड़ा देखने गये जो सफेद संगमरमर का बना है, उमेद पैलस में १९४३ में बना संग्रहालय है, जिसमें घड़ियों व तस्वीरों का विशाल संग्रह है. आधे हिस्से को पांच सितारा होटल में बदल दिया गया है. जोधपुर के राजा की ३८वीं पीढ़ी अब भी वहाँ रहती है. शाम को वे नेहरु उद्यान देखने गये और रात ११ बजे की ट्रेन से चलकर वे सुबह सवा छह बजे जैसलमर  पहुंच गये, कल जोधपुर में गर्मी बहुत थी. आज यहाँ मौसम अच्छा है, बदली बनी हुई है, सो गर्मी कम है. आज वे रेतीले मैदान देखने जायेंगे.

आज दिन भर मौसम मेहरबान रहा, सो वे राजस्थान की उस गर्मी से बच गये जिसका जिक्र कई बार सुना था. होटल हवादार है और स्वच्छ भी. शाम चार बजे वे सैम सैंड ड्युन्स देखने जीप में रवाना हुए. रास्ते में लौद्रवा मन्दिर देखा जो एक हजार साल पुराने मन्दिर का जीर्णोद्धार करके बनाया गया है. रानी मूमल की कथा यहाँ से जुडी है. उससे पहले अमर सागर में एक जैन मन्दिर देखा जिसका जाली का काम अनोखा है. आज भी हमारे देश में ऐसे अद्भुत कारीगर हैं जो पत्थर में जान डाल सकते हैं. आगे जाकर एक उजड़ा हुआ गाँव मिला जहाँ के निवासी पालीवाल राजा के डर से सदियों पूर्व रातों-रात गाँव छोड़कर पलायन कर गये थे. यहाँ से ४५ किमी दूर रेतीले मैदान शुरू हो गये, जहाँ उन्होंने ऊंट की सवारी भी की. रेत के सुंदर ऊँचे-नीचे पहाड़ों पर जो हवा से बनते बिगड़ते थे ऊंट पर सवार होकर जाना एक अनोखा अनुभव था. हवा से रेत पर लहरें पैदा हो रही थीं, और नदियों के किनारे देखी चांदी सी रेत के बजाय यहाँ सुनहरी रेत थी. तभी इस स्थान को ( पूरे जैसलमेर में पीले पत्थर के मकान बने हैं ) गोल्डेन लैंड कहते हैं. रास्ते में विदेशी यात्री भी दिखे जो ऊंट पर सवारी करते हैं और तम्बुओं में रहते हैं.


जैसलमेर में आज उनकी दूसरी शाम है. कुछ देर पूर्व ही वे sunset point से आये हैं. बादलों के कारण सूर्यास्त तो नहीं देख सके पर उस जगह से किले का दृश्य बहुत भव्य प्रतीत हो रहा था. वे गजरूप सागर नामक एक स्थान देखने गये जहाँ देवी का एक मन्दिर है. बड़ा बाग़ में कई छतरियां देखीं जो अब टूटने के कगार पर हैं. सुबह किला देखने गये थे, जो यहाँ से निकट ही है. किले के प्रथम द्वार पर एक गाइड मिल गया जिसने १२वीं शताब्दी में बने राजा जैसल के, भारत के दूसरे सबसे बड़े किले के बारे में कई जानकारियां दीं. मन्दिर में बने सात जैन मन्दिरों में पत्थर पर बनी मूर्तियाँ तथा अन्य कलाकृतियाँ दर्शनीय हैं. किले में लगभग ४००० हजार लोग रहते हैं. काफी बड़ा भाग टूट गया है किन्तु जो भी शेष है, भव्य है. वहाँ से निकल कर वे गदीसर झील देखने गये, जहाँ एक कृत्रिम झील में राजा के निवास के लिए एक छोटा सा कमरा है. आस-पास कई बुर्ज हैं और द्वार पर सत्य नारायण का एक मन्दिर है, एक संग्रहालय भी था पर वे बहुत थक गये थे सो नहीं देखा. आटोरिक्शा करके पटवां हवेली गये जो एक सेठ ने अपने पांच बेटों के लिए बनवाई थी. हवेली के बाहर एक साढ़े चार फीट लम्बी मूंछ वाले आदमी के साथ बच्चों ने तस्वीर खिंचवायीं. नथमल हवेली बाहर से देखी और बाजार होते हुए वापस आ गये. कुछ और खरीदारी भी की. उसने नीले हरे रंग का एक गाउन खरीदा और बड़ी बहन के लिए एक वाल हैंगिंग . सामान बढ़ता ही जा रहा है और जून की झुंझलाहट भी. अभी उन्हें दो हफ्ते और सफर में रहना है. 

Sunday, December 8, 2013

उमेद पैलेस - जोधपुर की शान


आज होली है और उनकी यात्रा में आराम का दिन, कल सुबह नौ बजे वे होटल से निकले, आटो ड्राइवर एक खुशदिल आदमी था, वह समय पर दर्शनीय स्थलों पर जाने के लिए आ गया. सबसे पहले एक कैफे में ले गया, कॉफी के एक बढ़िया कप के बाद तन व मन दोनों  यात्रा के लिए तैयार थे. फिर वे ‘राज मन्दिर’ पिक्चर हॉल गये जो एशिया का दूसरा सबसे अच्छा हॉल है जहाँ वे एक फिल्म भी देखने वाले हैं. इसके बाद पिंक सिटी में प्रवेश किया और सर्वप्रथम ‘हवा महल’ की अद्भुत वास्तुकला का अनुभव लिया. वहाँ दुनिया की विशालतम धूप घड़ी भी देखी. अगला पड़ाव था, सिटी पैलेस जहाँ वस्त्रालय, शस्त्रालय तथा कला दीर्घा दखने योग्य हैं. हाथी द्वार तथा मयूर द्वार बेहद आकर्षक हैं. भोजन के लिए ड्राइवर उन्हें खंडेलवाल होटल ले गया, स्वादिष्ट भोजन मिला वह भी बिना मिर्च का.

आम्बेर महल के रास्ते में जल महल देखा जो चारों ओर से पहाड़ों से घिरी झील में स्थित है., अब वहाँ जाना मना है. यह महल जमीन से ५०० फीट की ऊँचाई पर एक पहाड़ पर स्थित है, वहाँ शीशमहल देखा जहाँ दिन में भी तारे दिखाई दिए. महल कला का अनूठा नमूना है, छतों पर सुंदर नक्काशी की गयी है. राजस्थान पर्यटक विभाग के हस्त कला केंद्र में ब्लॉक प्रिंटिंग देखी. वापसी में राजस्थान कॉटेज उद्योग भी गये जहाँ से कानों के बुँदे तथा दो ऊंट लिए जो पंच धातु के बने हुए हैं. वहाँ जाने से पूर्व गोविन्द मन्दिर तथा नटवर मन्दिर देखने गये जहाँ एक सुंदर कनक उद्यान देखा, कनक उद्यान में अनेकों फौवारे तथा छतरियां थीं, वहाँ कई फिल्मों की शूटिंग हुई है. किसी ने कहा, जूही चावला और आमिर खान का गीत घूँघट की ओट से.... वहीं फिल्माया गया था. जयपुर चिड़ियाघर तथा केन्द्रीय अजायबघर भी देखा. चिड़ियाघर में घुसते ही बाघ दिखा, तथा अनेकों मगरमच्छ एक साथ देखे. जयपुर एक साफ-सुथरी अच्छी जगह है. यहाँ के लोग भी काफी अच्छे हैं, शांत व सहयोग करने वाले, उन्हें वहाँ घूमते समय कोई परेशानी नहीं हुई. कल सुबह उन्हें जोधपुर के लिए निकलना है.  

जोधपुर गेस्ट हाउस - कल सुबह वे जयपुर से साढ़े सात बजे की डीलक्स बस से रवाना हुए और यहाँ दोपहर सवा तीन बजे पहुंच गये. रास्ते में कैक्टस के बड़े-बड़े वृक्षों पर लाल रंग के फूल खिले थे, चारों ओर थी धूल और सूखे पहाड़ व चट्टानें, जोधपुर शहर किन्तु स्वच्छ, आकर्षक और हरा-भरा भी है. यात्रा आरामदेह थी पर Midway का भोजन उतना अच्छा नहीं था. मार्ग में एक वैन-ट्रक दुर्घटना देखी, गाड़ी की हालत बहुत बुरी थी पर वह गैराज में जाकर ठीक कराई जा सकती है पर दुनिया में कोई ऐसा गैराज नहीं जो उस व्यक्ति को ठीक कर सके जो सड़क किनारे अपनों से दूर धूल में लिटाया हुआ था.

यहाँ इस गेस्ट हाउस में जो लोग इन कमरों में रह रहे थे वे बाहर गये हैं सो एक रात्रि  के लिए उन्हें यहाँ स्थान मिल गया है. शाम को वे बाजार भी गये, जहाँ से राजस्थानी चादरें, रजाई व एक सूती साड़ी भी ली, जिन पर अनेक रंगों से कलात्मक चित्र बने हुए हैं. वापस आकर वे टीवी पर ‘सैलाब’ देख रहे थे कि एक पुराने परिचित मिलने आ गये, बातचीत से जाहिर हुआ, उनकी शिकायतें करने की आदत अभी तक वैसी ही है. दुनिया जहाँ से उनको शिकायते हैं, मगर बहुत अनुग्रह से उन्होंने अपने घर बुलाया है, आज वे जायेंगे. आज दस बजे उन्हें भ्रमण के लिए निकलना है, उमेद पैलेस, मन्दौर गार्डन और जोधपुर किला आदि देखने हैं. आज ही रात्रि ग्यारह बजे की ट्रेन से वे जैसलमेर जा रहे हैं, जब तक वे वहाँ पहुंचेगे प्रातः की लालिमा आकाश में बिखर चुकी होगी.



Saturday, December 7, 2013

जयपुर- गुलाबी शहर


कल रात फिर पानी बरसता रहा पर  इस वक्त थमा हुआ है. सुबह ही फोन करके माँ-पिता को अपनी यात्रा के बारे में बता दिया, वे प्रसन्न हुए. कल शाम क्लब से वापस आकर वे अपने पड़ोसी के यहाँ गये उन्होंने नया फर्नीचर लिया था, मेज बहुत सुंदर और भारी थी. वह ट्रेन में पढ़ने के लिए अपने साथ जेन ऑस्टेन की कोई किताब ले जाना चाहती थी पर नहीं मिली, एम. आर. आनन्द की The Big Heart लायी है कल. seven summers अब खत्म होने वाली है.

उसकी सखी ने पहले कल सुबह के नाश्ते के लिए फिर रात के खाने के लिए आमंत्रित किया, उसने मना कर दिया फिर उसके जोर देने पर आज रात भोजन साथ-साथ खाने के लिए राजी हो गयी. वह सब्जियां बनाकर लाएगी उसे रोटियां बनानी हैं. अब जून को पता नहीं कैसा लगे क्योंकि वे लोग आठ बजे के बाद ही आएंगे. खैर, दोस्ती की खातिर थोड़ी असुविधा तो सहनी ही पड़ेगी दोनों परिवारों को ही. सुबह जल्दी ही आँख खुल गयी और उठने से पहले ही जून से थोड़ी चर्चा भी हो गयी, वह उन्हें अपनी बात समझा नहीं पायी और वह अपने पुराने ख्यालात वाले मन को लिए रहे कि यात्रा में पति-पत्नी को एक दूरी बनाये रखनी चाहिए. वे एक अन्य परिवार के साथ राजस्थान घूमने जा रहे हैं, साथ-साथ यह यात्रा उन तीनों को एक-दूसरे के करीब भी तो लाएगी. इंसानी रिश्ते सही माहौल, सही अपनाइयत पाकर ही पनपते हैं, वे एक समूह में होंगे फिर भी एक इकाई तो रहेंगे. उन लोगों को यानि उस परिवार को जानने का मौका भी मिलेगा जरा और करीब से. नन्हा आजकल कहानी की किताबों में व्यस्त रहता है, वह घर में रहते हुए भी इतना शांत रहता है कि उसकी उपस्थिति का पता नहीं चलता.

राजमहल होटल गुवाहाटी- आज सुबह सात बजकर दस मिनट पर उनकी बस चली और ठीक बारह घंटे बाद गोहाटी पहुंच गयी. यात्रा अच्छी रही सिवाय रास्ते में देख तीन दुर्घटनाओं के दृश्यों के तथा अंतिम एक-दो घंटों के जब बस शहर में प्रवेश कर रही थी. हवा में इतना प्रदूषण था कि साँस लेने में दिक्कत होने लगी थी, घर की साफ-सुथरी हवा तब याद आ रही थी. दोपहर का खाना उन्होंने रास्ते में पड़ने वाले होटल wild grass में खाया. नन्हा बहुत खुश है बस में वह बोर हो रहा था. उसे थकन का जरा भी अनुभव नहीं हो रहा है, जबकि वह थक गयी है. जून भी बहुत उत्साहित नहीं लग रहे हैं. सुबह साढ़े चार बजे उन्हें उठना है और छह बजे की ट्रेन से दिल्ली जाना है.  

नीलम होटल जयपुर-सुबह चार बजे ही वे उठ गये और छह बजे राजधानी ने प्लेटफार्म छोड़ दिया. वे चार परिवार थे सो यात्रा आराम से गुजरी. समय समय पर चाय नाश्ता व खाना खाते तथा बातें करते-करते. अगले दिन सुबह दस बजे दिल्ली पहुंच गये, स्टेशन पर उतरते ही ठंड लगी, स्वेटर्स तो जून ने गोहाटी से ही वापस भिजवा दिए थे, लेकिन थोड़ी ही देर में तन उस ठंड का अभ्यस्त होगया. पहले वे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन गये पर जयपुर के लिये ट्रेन शाम पांच बजे से पहले नहीं थी सो वापस बीकानेर हाउस गये जहाँ से बस मिल गयी रास्ते में Midway में लंच लिया. जो बहरोड़ में एक बहुत अच्छा स्टॉप था, उन्होंने वहाँ  कुछ ज्यादा ही समय लगा दिया, बस के ड्राइवर को उनके लिए देर तक बस रोकनी पड़ी. दिल्ली से जयपुर का रास्ता सुंदर था. बस स्टैंड से कुछ दूरी पर उनका यह होटल है. नहा धोकर रात के खाने के लिए निकले तो एक मारवाड़ी भोजनालय में चले गये वहाँ बेहद मिर्च-मसाले वाला खाना मिला, कोई भी ढंग से नहीं खा सका, स्वाद ठीक करने के लिए दही चीनी माँगनी पड़ी. सोने में बहुत देर होग यी, वे थके हुए भी थे, सो बहुत अच्छी नींद आई.







Thursday, December 5, 2013

यंग आर्किटेक्ट - बिल्डिंग ब्लॉक्स


सुबह के सवा दस हुए हैं. आज आकाश पर सूरज की बादशाहत है कल की तरह बादलों की नहीं. कल नन्हे की गर्दन में हल्का खिंचाव था आज वह ठीक है, वही है कि छोटी-छोटी बातों पर झुंझला रही थी. वह उठ तो जल्दी गया था पर आदत के अनुसार धीरे-धीरे सब काम कर रहा था. जून ने  फोन पर नन्हे के बारे पूछा, जैसा वह लगभग रोज ही करते हैं. आज उसे एक अनपेक्षित फोन आया, एक परिचित अपने बेटे के लिए हिंदी में एक पत्र लिखवाना चाहते थे, उसकी एक सखी का फोन भी आया, उसे मेडिकल गाइड से बच्चों की कान की समस्या के बारे में जानकारी चाहिए थी. कल रात उन्होंने रजाई को विदा दे दी, अब कम्बल से ही काम चल जायेगा. कल जून और वह दोनों ही उत्साह में कुछ कमी महसूस कर रहे थे, आज वह ठीक है, इसका अर्थ हुआ मौसम का असर मिजाज पर पड़ता ही है.

अचानक बिजली चली गयी है, वह करी पत्ता लेने बगीचे में गयी तो देखा बिजली विभाग के कर्मचारी घर के सामने वाली स्ट्रीट लाइट ठीक कर रहे हैं, उसे याद आया कल ही जून ने शिकायत दर्ज करवाई थी. आज फिर बादल हैं, रात को आंधी-तूफान भी आया, जिसका अंदाजा हर तरफ बिखरे पत्तों से लगाया जा सकता है. आज नन्हे का विज्ञान का इम्तहान है और कल अंतिम संस्कृत का, उसके बाद वे यात्रा की तयारी में लग जायेंगे. कल दोपहर अख़बार पढ़ने में व्यतीत हुई, टूथ ब्रश और हेयर डाई के साइड इफ़ेक्ट पर दो लेख पढ़े, दोनों ही सीमा में इस्तेमाल करने चाहिए. आजकल बंधी बंधाई दिनचर्या है, बीच-बीच में कुछ समय seven summers के लिए भी निकाल लेती है. बिजली की गाड़ी चली गयी है पर लाइट आयी नहीं है.

दस बजने वाले हैं, मन कुछ उखड़ा सा है, सुबह नन्हे पर फिर झुंझलाई, ज्यादा तो नहीं पर थोड़ा सा भी क्रोध करना नन्हे पर या किसी पर भी उसे स्वयं अपनी हार लगता है, अपनी तौहीन भी, मन देर तक परेशान रहता है. शैतान हर रूप में उन्हें लुभाता है और इसके चंगुल में वे फंस ही जाते हैं. आज नन्हे का आखिरी इम्तहान है और उसे ख़ुशी है कि आज से उसे डांटने की कोई जरूरत नहीं रहेगी. आज धूप निकली है पर पिछली वर्षा के कारण सारे फूल कुम्हला गये हैं, धूप पाकर वे फिर खिल उठेंगे. काश ऐसी कोई धूप उसके लिए भी हो जिसे पाकर...अच्छी सी एक गजल या seven summers के कुछ पेज ! आज वह टोमेटो सॉस बना रही है, बगीचे के लाल रस भरे टमाटरों से !

बारिश लगतार हो रही है, सर्दियां जाते-जाते फिर लौट आई हैं. पता नहीं बादलों में इतना पानी कहाँ से आया है. कल भी दिन भर बदली बनी रही और आज तो दिन में भी रात का अहसास हो रहा है. नन्हा young architect से नये घर का मॉडल बना रहा है. दो दिन बाद उन्हें जाना है, मौसम तब तक ठीक हो जायेगा ऐसी प्रार्थना भगवान से करनी चाहिए. आज उसे खत भी लिखने हैं और दोपहर को हिंदी कक्षा लेने भी जाना है. शाम को क्लब जाना है एक सखी से किया हुआ वादा निभाने के लिए. कल शाम थोड़ी पैकिंग की, खर्चे का हिसाब भी लगाया लगभग तीस हजार का बजट है. इतनी महंगाई के जमाने में एक महीना घूमने में इतना खर्च तो होगा ही, लेकिन राजस्थान के सुंदर किलों और रेतीले मैदानों की कल्पना करता हुआ मन रूपये-पैसे के बारे में सोचना ही नहीं चाहता.  



Wednesday, December 4, 2013

सेवेन समर्स- मुल्क राज आनन्द


पल में बदली पल में सूरज
पल-पल मौसम रूप बदलता
हवा उड़ा ले जाती बादल
आंचल ज्यों माथे से सरकता

सूर्य रश्मियाँ प्राण फूँकती
मेघा नमी पवन को देता  
हवा बिखेरे मादक सौरभ
धरती भर देती मोहकता

खिड़की से झांकता बसंत
महक उठे हैं दिग दिगंत
ज्यों करवट ली कलियों ने
फूलों ने ली अंगडाई
कोंपल कोंपल में हरीतिमा
नव पल्लव धर मुस्काई

कल महीनों बाद मन में कविता उगी, बसंत के आगमन से कोई दिल अछूता रह भी कैसे सकता है, गेट पर खड़ा वह श्वेत फूलों से भरा वृक्ष इतना सुंदर दखता है. हवा में आम के बौर की खट्टी-मीठी खुशबू, सब कुछ इतना मोहक हो जाता है इस मौसम में और इसी मौसम में तो आता है रंगों का त्योहार होली ! वे इस बार होली पर जयपुर में होंगे. आज नन्हा समय पर तैयार हो गया था, उसका भी काम हो गया है, अभी दस ही बजे हैं, एक बार सोचा किसी सखी से फोन पर बात कर ले, पर अगले ही पल रुक गयी, क्या बात करेगी, सिवाय हाल-चाल पूछने के, यूँ मौसम पर भी बात हो सकती है और कुछ अन्य भी, पर उसे लगता है दिन भर में वे गम्भीर बातें मुश्किल से पांच प्रतिशत ही करते होंगे, ज्यादातर इधर-उधर की बातें ही तो करते हैं, तो क्यों न फोन पर एक सार्थक, थोड़ा गम्भीर किस्म का वार्तालाप किया जय, लेकिन विषय क्या हो? आज पड़ोसिन से थोड़ी देर बागवानी पर बात की, फूलों और पौधों पर, उसने सोचा अगले हफ्ते उनकी यात्रा से पहले के अंतिम पत्र लिखेगी, बहुत महीनों से बल्कि वर्षों से छोटी बुआ का कोई पत्र नहीं आया है, वापस आकर उन्हें भी लिखेगी. मौसम आज भी भीगा-भीगा है, आकाश पर सलेटी रंग के बादल एकसार फैले हैं, सूरज का कोई अता-पता नहीं है.

मुल्कराज आनन्द की बचपन की यादें रोचक हैं, seven summers कल से पढ़ना शुरू किया है, कई ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ उसे नहीं पता, लेकिन डिक्शनरी खोल कर पढ़ने से वह आनन्द कहाँ जो बिना रुके पढ़े जाने में है. अपने बचपन की कई यादें मन में कौंध गयीं. बस्ती में बड़ी बहन की सहेली शैला के साथ गुड़ की चाय बनाना, नल में उसके दायें हाथ की अंगुली कटना, मकान मालिक के लड़के का अपनी सांवली बहन की गुड़िया पेड़ पर टांग देना, उनके यहाँ भोजन करने जाना, उस दाल-चावल की खुशबू आज तक उसे नहीं भूली. मकान मालिक के लडके की खिलौनों से सजी आलमारी, पेड़ के नीचे चारपाई पर लेट कर आंवले खाना और मकान मालकिन की बेटियों, गौरी व मुन्नी की मोटी-मोटी चोटियाँ, बड़ा सा बगीचा, मंझले भाई का पांच रूपये का नोट लेकर चना मुरमुरा खरीदने आना, उसे नंगा बाबा कहकर चिढ़ाया जाना और तेज वर्षा में छोटे भाई का बादलों से आना, रोने पर भूत और हौआ से डराया जाना. घोड़े के मुख वाले भिखारी का भीख मांगने आना, ऐसी न जाने कितनी और छोटी-छोटी यादें होंगी जो मन के किसी कोने में पिछले इतने बरसों से दबी पड़ी होंगी. शाहजहाँपुर की यादें और स्कूल की यादें, उसे भी इन यादों को कहानी की शक्ल में ढालने का काम करना चाहिए. बचपन की उस रात को बिल्लियों की आवाजें, भूत के पैरों की छम छम, अमराई में लोगों को उलटे पैरों वाली डायन का दिखना, कितनी अजीब और रोचक यादें हैं न !     






लाल टमाटर- शिमला मिर्च


“जो कुछ नहीं करते वे कमाल करते हैं” ! और

“जिसको देखो वह मुस्कुराता है,
कौन बेकस पे रहम खाता है “

बहुत दिनों के बाद पीटीवी पर रोशन पाकिस्तान में यह शेर सुना. नन्हे ने उसे टीवी का स्विच ऑन करते देखा तो मुस्कुराते हुए पूछा, पी और उसे ख्याल आया की वाकई कभी पी उसकी पहली पसंद हुआ करती थी. उसकी एक सखी किसी परिचिता के एक रिश्तेदार के लिए जो किसी भयानक रोग से ग्रसित है, चंदा इकट्ठा कर रही है, उसका फोन आया तो उसने कहा वह यकीनन एक अच्छा काम कर रही है, मुसीबत में पड़े लोगों की उन्हें मदद करनी ही चाहिए, यानि की सिद्धांतत वह इस बात से सहमत है, पर न तो जून और न ही उसकी पड़ोसिन ने सकारात्मक जवाब दिया, वह खुद भी उसकी विशेष सहायता नहीं कर पायेगी पर कम से कम नैतिक समर्थन तो दे ही सकती है. कल उसने फोन नहीं उठाया तो पूर्वाग्रह से ग्रसित उसके मन ने इसका गलत अर्थ लगाया, उसे भास होने लगा है कि कथनी और करनी में कितना बड़ा भेद है और कितने पूर्वाग्रहों से मन ग्रसित है.

अभी सुबह के नौ भी नहीं बजे हैं और धूप इतनी तेज हो गयी है, गर्मियां बस चार कदम की दूरी पर खड़ी हैं. कल रात फिर सपने देखती रही, कल सुबह टीवी पर सुना था सपने हमारे चरित्र को दर्शाते हैं, इस तरह देखें तो उसके सपने कुछ विशेष नहीं दर्शाते, अजीबोगरीब से सपने मन की आधी-अधूरी इच्छाओं को जरुर दर्शाते हैं. कल रात एक के बाद एक तीन बार घंटी बजी फोन की, नींद टूटी, फिर आई, फिर टूटी. नींद भी ऐसी शै है जो अगले दिन तक असर रखती है. सुबह उठी तो अचानक ख्याल आया कि सुबह की शुरुआत संगीत से होनी चाहिए, शास्त्रीय संगीत का कैसेट बजाय, फिर बाहर से टमाटर तोड़े, शिमला मिर्च के पौधों को सहलाया, फूलों से गुफ्तगू की. जून के लिए नाश्ता बनाया जो बाद में नन्हे और उसने भी खाया. कामवाली को आने में आधे घंटे की देर क्या हो गयी, संशयी मन धड़कने लगा. कल एक भंगेड़ी का फोन क्या आया, आने वाले हर फोन से पहले आशंका होने लगी मन को संयत रखना बहुत टेढ़ा काम है.


आज सुबह वह उठी तो फिर यही लगा कि स्फूर्ति नहीं है, कल रात नन्हा भी ठीक से सो नहीं पा रहा था. आज से शुरू होने वाली परीक्षा के कारण वह थोड़ा घबरा रहा था और उसे देखकर नूना भी परेशान हो गयी. सुबह वह उठा तो कहने लगा रात भर सपने देखता रहा बस छूटने के और पेपर न कर पाने के, और वाकई बस छूट गयी पर उन दोनों के मददगार ever present, ever helpful जून हैं जो उसे स्कूल ले गये. ताजा महसूस करने के लिए उसने किताब उठा ली जो शनिवार को पढ़ती रही थी. सुबह-सुबह सारे काम छोडकर किताब पढने का यह पहला अवसर नहीं था, खैर सारे काम भी हो गये व्यायाम को छोडकर, जो यूँ तो किताब से ज्यादा जरूरी है पर शारीरिक न सही मानसिक व्यायाम तो हो ही गया. नायिका आखिर अपनी मंजिल पा ही लेती है. अब अगली किताब नन्हे की परीक्षाओं के बाद शुरू करेगी. आज बहुत दिनों बाद असमिया सखी का फोन आया, उसकी आवाज से लगा वह इस बात से थोड़ा उदास थी. कल रात फिर वर्षा हुई और मौसम सुहाना हो गया. कल एक परिवार मिलने आया उनका छोटा सा बेटा बहुत जिद करता है, उसे लगा वह माता-पिता दोनों के बस से बाहर हो गया है. उसने घड़ी की ओर देखा जून के आने का वक्त हो रहा था.