Saturday, May 2, 2026

इचिगो इची

इचिगो इची

आज भी नूना ने गुरु स्टोरीज़ सुनीं। जितना सुनो, उनके प्रति श्रद्धा बढ़ती जाती है, उनके शिष्यों के प्रति भी; जो उनके प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। गुरुजी एक माँ की तरह उनका ध्यान रखते हैं। उसका मन भी उनके प्रति भक्ति से भर गया है। अहंकार गल रहा है, निःस्वार्थ होने का, अपने से अधिक औरों को महत्व देने का भाव जग रहा है। मानव होने का अर्थ यही है कि वे अपने स्वरूप को जानें और एक बार जान लेंगे तो औरों को भी उस आनंद के मार्ग पर लायें। परमात्मा उनके लिए इतना आयोजन कर रहा है, नाना प्रकार के फल, फूल, सूरज, चाँद, हवा, जीवन, श्वासें उसने दी हैं। उसके प्रति कृतज्ञता का भाव जगाते हुए उन्हें पूर्ण आनंद का अनुभव करना है। पूर्ण आनंद में होने पर वे नम्र हो जाते हैं। इस दुनिया में उनके छोटे मन के सिवा सभी तो परमात्मा का रूप हैं, जब  वे किसी का ध्यान रखते हैं तो एक तरह से अपनी आत्मा का ही विस्तार करते हैं। वे स्वयं का ही फैलाव तो इस जगत में देखते हैं। वे जो स्वयं ही हैं, उसका ध्यान क्या रखना, क्योंकि जिस विशाल मन से वे अन्यों का ध्यान रखते हैं, वही उनकी भी देख-रेख करता है। 


अभी कुछ देर पहले नन्हा वापस गया है।आज सुबह उन्होंने नयी मिक्सी लगायी थी। बॉश की मिक्सी वह ले गया है। नन्हे की मिक्सी उसका कुक ले जायेगा, जैसे उनकी पुरानी मिक्सी नैनी ले गई थी।जून ने छोटी बहन का किट तैयार करने में मदद की, जो वह आश्रम ले जाएगी। आजकल गुरु स्टोरीज़ सुनते रहने से मन कैसा हल्का-हल्का सा बना रहता है। संसार का मालिक जब उनका अपना है तो कैसी चिंता और कैसा भय ! गुरुजी के साथ रहने वाले लोग कितने समर्पित हैं। शाम को पाँच बजे पापाजी जून के फ़ोन की प्रतीक्षा करते हैं, आज भी उनसे ‘शांडिल्य भक्ति सूत्रों’ पर चर्चा हुई।  


आज एक वरिष्ठ ब्लॉगर ने उसके ब्लॉग के बारे में उससे कुछ जानकारी माँगी है। ब्लॉग का लिंक, कब बना, उद्देश्य क्या है, विधा और किसी एक पोस्ट का लिंक भेजने को कहा है। उसे लगता है, ब्लॉग बनाने का उद्देश्य रचनाओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करना व अनुभवों को सबके साथ बाँटना है। ब्लॉग का नाम “मन पाये विश्राम जहाँ” ही इसकी गवाही देता है। उसकी आध्यात्मिक यात्रा ही उसके लेखन की कहानी है। शेष तीनों ब्लॉग्स में भी वही है और ‘कुछ रिश्ते मीठे से में’ जो कविताएँ हैं, वे प्रेम का प्रस्फुटन ही तो हैं ! इसलिए उद्देश्य तो यही हुआ, भीतर जो आनंद पाया है, जो उल्लास, उमंग है, उसे फैलाना है। कविता इसका सशक्त माध्यम है। जब गुरु जीवन में आते हैं, जीवन को एक दिशा मिलती है। वर्षों पहले नन्हे ने ही उसका ब्लॉग से परिचय कराया, उसने ही ब्लॉग बना दिया था। धीरे-धीरे पाठक मिले, अन्य रचनाकारों से परिचय हुआ। कल सुबह सात बजे उसे सुदर्शन क्रिया के लिए जाना है। 


उसने ये सारी बातें लिखकर भेज दी हैं। आर्ट ऑफ़ लिविंग के शिक्षकों की कहानी सुनकर ही यह प्रेरणा मन में जगी कि उन अनुभवों को कागज पर लिख ले। ‘काव्यालय’ के संपादक को गुरुजी के दो वीडियो भेजे हैं, अवश्य ही उन्हें पसंद आयेंगे। मृणाल ज्योति की एक शिक्षिका से बात हुई, उसने कहा, संस्था के साथ अपने संबंध को याद करते हुए उसे लेख लिखना चाहिए।स्कूल का फ़ेसबुक पेज देखा, अच्छ लगा की वहाँ बहुत सी नई गतिविधियाँ चल रही हैं। आज मँझले भाई ने मेस में सभी को विदाई भोज में बुलाया, दो दिन बाद वह सेवा निवृत्त हो रहा है।   


सुबह वे टहलने गये तो हवा शीतल थी, आभामय भोर का तारा दूर से दिखाई दे रहा था। नौ बजे नन्हा व सोनू आ गये, समधी-समधिन भी आये थे। उसे आई-पैड व दो किताबें जन्मदिन के लिए उपहार स्वरूप मिलीं। दोनों प्रसिद्ध जापानी किताबों का हिंदी में अनुवाद है। दो घंटे ड्राइव करके नन्हा सभी को ‘मुरूगन इडली’ की एक शाखा में ले गया।यह तमिलनाडु के एक प्रसिद्ध रेस्तराँ का नाम है, जहाँ स्वादिष्ट दक्षिण भारतीय भोजन मिलता है। 


आज सुबह वे पैदल ही निकट स्थित एक गाँव की झील देखने गये। गाँव की भोर की एक झलक मिल गई। मुर्ग़े, बत्तख़ें, कुत्ते, गायें तो देखी हीं, एक ऊँघती हुई महिला घर से निकली। झील में तैरती हुई मुर्ग़ाबियाँ और कई अन्य पक्षी थे।उसके बाद वे आगे बढ़ते गये, झील के साफ़ पानी की तस्वीरें उतारीं। घर लौटे तो एक-एक कर सभी के, जन्मदिन की बधाई के फ़ोन आने शुरू हुए। नाश्ते के बाद मिठाई देने वृद्धाश्रम गये। वहाँ के संचालक व एक निवासी से कुछ देर बात की।उसके बाद आश्रम में राधा कुंज, झील व शिव मंदिर के दर्शन किए। अन्नपूर्णा में बहुत दिनों बाद प्रसाद ग्रहण किया। झील के निकट एक मंडप में दोपहर का ध्यान किया। शाम को पड़ोसी परिवार को बुलाया था। 


कल मई का अंतिम दिन था। आज शाम वे आम के बगीचे में टहलने गये। हरे-भरे वृक्षों पर कई आकारों व रंगों के आम लगे हैं। प्रकृति में कितनी जातियाँ, प्रजातियाँ हैं, सभी साथ रहती हैं। जापानी पुस्तक ‘इचिगो इगी’ का हिंदी अनुवाद अच्छा लग रहा है। इसका अर्थ है, “एक बार-एक मुलाक़ात’, अर्थात हर किसी से हम एक तरह से एक ही बार मिलते हैं। किसी भी पल को जीने का अवसर जीवन में एक बार ही मिलता है, इसलिए वर्तमान में जीना चाहिए। पापाजी को भी इन जापानी किताबों के बारे में बताया। 


आज दीदी का जन्मदिन है, उनके लिए कविता भेजी, सदा की तरह तरबूज़ काट कर मनाया उन्होंने।शाम से ही बादल बनाने शुरू हो गये थे, वे रात्रि भ्रमण के लिए जायें, उससे पहले ही बरसने भी शुरू हो गये। आज “रेत समाधि” किताब आ गई। 


शाम को एओएल का अनुवाद कार्य किया। नन्हा कल बाहर खाने के लिए कह रहा है, पर उसने उन्हें घर आने के लिए कहा है। मीनू भी लिखा है, रेत समाधि से प्रेरित होकर, बहुत ही रोचक पुस्तक है, अपने आप में अनोखी !कल सुबह सात बजे उनके यहाँ पहली बार आर्ट ऑफ़ लिविंग का फ़ॉलो अप होने वाला है। गुरुजी की कृपा का एक और प्रसाद ! वह अभी भी अमेरिका में हैं, जुलाई में आयेंगे। तब वह एक कोर्स करेगी उनके साथ पार्ट २ कोर्स। आज सुबह कुछ देर के लिए मन कैसा तो उखड़ गया था, शायद वर्षों बाद ऐसा अनुभव हुआ, फिर दीदी से बात की और मन बदल गया।कल क्लब में एओएल की तरफ़ से नेचुरोपैथी कैंप लग रहा है।    


आज पूरा दिन व्यस्तता बनी रही। सुबह सवा चार बजे नींद खुली। टहल कर आये तो छह बज चुके थे। पौने सात बजे आर्ट ऑफ़ लिविंग की शिक्षिका आ गयीं।दो और लोग आये। क्रिया के बाद मन अपूर्व शांति का अनुभव कर रहा था, जिससे बाहर आने का जरा भी मन नहीं था। नाश्ते के बाद लंच की तैयारी की। नन्हा-सोनू और समधी-समधिन बारह बजे तक आ गये थे। उससे पहले वह प्राकृतिक चिकित्सा शिविर में गई। पैर के तलुओं में रिफलेक्सोलॉजी करवायी। कान में कुछ बीज लगाये हैं, उनका क्या असर होगा, पता नहीं। शेष चिकित्सा अस्पताल जाकर होगी। नन्हा आज आई पैड के लिए की बोर्ड और पेंसिल भी ले आया है। उसने ‘प्रोक्रिएट’ पर चित्र बनाना सिखाया, अभ्यास तो उसे ही करना है। शाम को छह बजे वे आश्रम पहुँचे। सात बजे छोटी बहन पहुँची। उसे जो कमरा मिला है उसमें तीन अन्य महिलाएँ भी रहेंगी। आश्रम में उसके साथ रात्रि भोजन करके नौ बजे वे वापस आये। 


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