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Tuesday, August 11, 2026

मडीवाला झील के किनारे

मडीवाला झील के किनारे

आज वे बहुत दिनों के बाद ‘गुरु पूजा’ में सम्मिलित हुए, बहुत अच्छा लगा। जैसा कि आर्ट ऑफ़ लिविंग में होता है, पहली बार मिलने पर भी सभी अपने परिवार की तरह मिले। एक बंगाली परिवार से मिलकर कुछ बातें कीं, उनका नन्हा पुत्र और सासुमाँ भी आयी थीं। कुछ अन्य बंगाली व हिन्दी भाषी परिवार भी थे।परसों शाम उनके यहाँ पूजा है, नन्हा व सोनू भी आयेंगे। पूजा के लिए आवश्यक सामान की लिस्ट उसे याद हो गई है। पाँच तरह के फल, नारियल, पान, सुपारी, एक नया रूमाल, थोड़े से अक्षत, अगरबत्ती आदि। लेकिन गुरु पूजा का अर्थ केवल गुरु का आभार प्रकट करना ही नहीं है, बल्कि उनकी उपस्थिति को महसूस करना है। प्रार्थना के क्षणों में कई बार उसने मानसिक गुरु पूजा की है, जहाँ कोई सामग्री नहीं होती, किंतु फिर भी सब कुछ होता है। वहाँ चरण भी वास्तविक होते हैं यदि भावना वास्तविक है; अंततः सभी कुछ तो वे मन के माध्यम से ही देखते हैं, जाग्रत हो या स्वप्न, मन ही सब कुछ दिखाता है। ध्यान में भी जो चित्र दिखते हैं, मन ही उनका सृजन करता है। आज भी ब्लॉग्स पर नई पोस्ट प्रकाशित की। पिछले कुछ महीनों में आँख के इलाज के कारण लेखन में जो ढीलापन आ गया था, अब वह दूर हो रहा है। लेखन का अभ्यास बना रहेगा तभी काम आगे बढ़ेगा। ‘बाल्मीकि रामायण’ में अभी तक अयोध्या कांड ही चल रहा है। जीवन रहते उसे इस कार्य को पूरा करना है। शाम को पापाजी से बात हुई, वह कुछ अकेलेपन का अनुभव कर रहे थे, ऐसा उन्होंने कहा, पर बातचीत में सामान्य दिखे। 

आज सुबह उठी तो नूना एक स्वप्न देख रही थी, विचित्र सा स्वप्न, फिर ध्यान किया तो समाधान मिला। आनन्दमय कोष के बारे में सुना, सुनते-सुनते ही मन ध्यानस्थ हो गया था। दोपहर को कुछ देर नवनीत पढ़ा।शाम को  भांजे ने उन्हें भोजन के लिए बुलाया था। वहाँ उसकी नव विवाहिता पत्नी की छोटी बहन व माँ भी आ गयीं; उसके चचेरा भाई भी,  जो इसी शहर में नौकरी करता है। नन्हा व सोनू भी कुछ देर के लिए आये। ढोकला व गोलगप्पे खाकर वे चले गये। सोनू की मौसेरी बहन ने उन्हें डिनर के लिए बुला रखा था। सभी ने अपने अपने कार्य तथा शौक़ के बारे में बताया। चाहे वे कई दिन बाद मिलें पर मिलने पर कोई न कोई पुराना सिरा हाथ में आ जाता है और लगने लगता है, जैसे कल ही मिले थे। बच्चों से मिलकर एक ऊर्जा का अहसास तो होता ही है, उनकी नयी गृहस्थी देखकर उसे अपना अतीत भी एक पल के लिए याद आ गया था। 

आज सुबह से मन भक्ति रस में सराबोर था। नन्हा व सोनू ग्यारह बजे आ गये थे। शाम को घर का वातावरण संगीतमय हो गया था। नन्हे और सोनू ने चने, पूरी व रायता बनाया, एक परिचिता सूजी का हलवा बनाकर लायी थीं। पूजा करने के लिए आश्रम से एक शिक्षक आये थे, उनके साथ एक असमिया सत्संगी भी, जिनकी छोटी सी बेटी ने कई अच्छे-अच्छे भजन गाये। उनका मित्र परिवार भी आया था, पहली बार उनके नाती को देखा। गुरु पूजा के बाद हुए भजन गायन के बाद सभी ने प्रसाद ग्रहण किया। कल दोपहर को फिर एक विला में गुरु पूजा का आयोजन है। वे जाएँगे, कुछ और लोगों से परिचय बढ़ेगा। 

दोपहर को वे उनकी लेन में में एक शिक्षक के यहाँ गुरु पूजा में गये। गुरु पूर्णिमा पर मन-प्राण बहुत प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं। एक युवा साधिका से मिले, जिसने गुरु पूर्णिमा से पूर्व एक निश्चित संख्या में इन पूजाओं के आयोजन की ज़िम्मेदारी उठायी थी। उसी की प्रेरणा से यह काम हुआ है, गुरुजी ने उसे यह काम सौंपा है। शाम को आश्रम में भी गुरु पूजा उत्सव में शामिल होने का अवसर मिला। वर्षा के बावजूद अनेक लोग आये थे। एक सौ आठ शिक्षकों ने एक साथ पूजा में भाग लिया। उसके बाद वहीं प्रसाद ग्रहण किया। अन्नपूर्णा में आज विशेष भोजन बना था। पापाजी से बात हुई, छोटी भाभी लौट आयी है। उन्होंने ओशो द्वारा दिये प्रवचन ‘मौन की महत्ता’ के आधार पर कुछ बातें बतायीं। उनके अनुसार जैसे-जैसे भीतर का मौन बढ़ता जाता है, अहंकार व भय गिरने लगता है। सृजनात्मकता बढ़ती है और नयी संभावनाएँ पता चलती हैं। गुरु के शब्दों का काम भीतर के मौन को जगाना ही तो है। 

आज सुबह वे नन्हे यहाँ गये थे, उसके गेस्ट रूम  के लिए गीज़र पहुँचाना था। नन्हे ने मिलेट दोसा मँगवाया उनके नाश्ते के लिए, उनका रसोइया थोड़ा देर से आता है। वहाँ से वे बीटीएम स्थित मडीवाला झील तक गये, जो बैंगलुरु की बड़ी झीलों में से एक है। हवा ठंडी थी, सुबह की सैर के लिए अनेक लोग आये हुए थे। वे कुछ देर उसके किनारे टहलते रहे, पक्षियों की उड़ान भली लग रही थी, जो झील में स्थित एक द्वीप से उड़ते थे। उसके बाद बैंक का काम करना था। जून का हर कार्य योजना बद्ध तरीक़े से होता है, सुबह जल्दी निकलने के पीछे कारण था, ट्रैफ़िक नहीं मिलेगा, और क्योंकि सुबह टहलना नहीं हो पाया था, सो बैंक खुलने की प्रतीक्षा में वह काम भी हो गया। उन्होंने पड़ोसी की सहायता से, जो सीए हैं, इस बार का टैक्स भी जमा कर दिया है। शाम को फलों वाले बगीचे में कुछ तस्वीरें उतारीं, करौंदे के पेड़ लाल फलों से भर गये हैं, बहुत सुंदर लग रहे थे। दशकों पूर्व बचपन में सीतापुर में इसका पेड़ देखा था, तब के बाद यहीं आकर उसने करौंदे देखे हैं।  

आज दोपहर उसने छोटी बहन को फ़ोन किया तो वह क्लिनिक से घर आकर विश्राम कर रही थी।बड़ी भांजी ने फ़ोन उठाया। उससे बहुत सी बातें हुईं। वह अगले हफ़्ते  आस्ट्रेलिया जा रही है। कुछ महीनों में उसे कनाडा का पासपोर्ट मिल जाएगा। नूना को आश्चर्य होता है, कि कोई भारतीय कैसे अपना देश छोड़कर बाहर की नागरिकता ले लेता है। शायद उनके पास दोनों देशों की नागरिकता होती हो। आज सुबह वह उठी एक स्वप्न की याद बनी हुई थी, नन्हे को लेकर एक स्वप्न देखा था, लगा, जैसे वह कुछ उदास है। पर सब ठीक होगा, मन की तो आदत ही है तिल का ताड़ बनाने की।


Tuesday, July 4, 2017

बोगेनविलिया का पेड़



सदा खुश रहने के लिए बुद्धि को स्वच्छ रखना है. बुद्धि स्वच्छ हो तो उनके कृत्य भी स्वच्छ हो जाते हैं. बुद्धि को स्वच्छ रखने के लिए ‘मेरे’ के भाव का  का त्याग करना है. यहाँ सब कुछ मिला हुआ है, पहले देह फिर परिवार तथा फिर वस्तुएं ! सब कुछ परमात्मा का ही है. जितना-जितना उनका मोह घटेगा, प्रेम बढ़ता जायेगा. वे जब यह स्वीकार करना सीख जाते हैं, तब सारा फ़िक्र परमात्मा को दे देते हैं. आज टीवी पर सुंदर प्रेरणादायक वचन सुने, कोई दक्षिण भारत के संत थे-

Bring powerful completion in yourself and then every day, when you wake up, looks like Shiva is creating new world. When we are complete everything radiates completion, whatever we touch. When one is incomplete inside he or she cannot see the incompletion around him. We can change from karmic life to Avatar life. Move yourself to more and more of completion. Yoga gives us energy and little more we need we should from food. First rest should come from completion and little more from sleep. Prana is the greatest healer and completion is greatest rest.

शाम के सात बजे हैं. नैनी आज बगीचे से हरे प्याज लायी थी, उसी की रोटी बनाने का निश्चय किया है. आज दोपहर को बरामदे के सामने ही लॉन में लगा बोगेविलिया का पेड़ तेज हवा के कारण गिर गया. पहली बार गिरा तो वह घर के अंदर थी. माली को बुलवाकर खड़ा करने को कहा. एक घंटे बाद बाहर गयी तो एक बांस के सहारे खड़ा था. वह अक्सर वहीं बैठकर चाय पीती है. दोपहर को रोज की तरह वहाँ जाकर बैठी तो कुछ ही देर में पेड़ फिर गिर गया. वह उसके नीचे चाय के कप सहित दब गयी. मगर ‘जाको राखे साईंया मार सके न कोई’, न चाय के कप को कुछ हुआ न ही उसे. थोड़े से प्रयास से बाहर निकल आई. बाद में पुनः उसे अच्छी तरह से खड़ा किया गया. बहुत दिनों बाद आज पौधों में पानी भी खुद दिया. शाम को बच्चे भी आये, अब अगले बुधवार को आएंगे.

कल शाम को गुरूपूजा है उनके घर में, उसकी तैयारी शुरू कर दी है. फोन पर सभी को निमन्त्रण दिए. जून ने नये फोन खरीदे हैं उन दोनों के लिए, उन्हें जल्दी हो रही है कि नया सिम एक्टिवेट हो जाये. जिसे एक काम में जल्दी हो उसे हर काम में जल्दी होती है. उन्होंने दो दिनों से भगवद्गीता सुनना शुरू किया है. गुरूजी का छह सीडी का सेट है. जून भी सुन रहे हैं, पर उन्हें अभी संसार से मोहभंग नहीं हुआ है, सो बहुत दिल उसमें नहीं लगाते हैं. हरेक को अपनी गति से ही यात्रा करनी होती है. हरेक का मार्ग भी अलग होता है. आज टीवी पर गुरूजी को कहते सुना था, हरेक को शीघ्र विकास के लिए अपने जीवन में एक दिन पागलखाने में, एक दिन स्कूल में, एक दिन कोर्ट में तथा एक दिन अस्पताल में बिताना चाहिए. वह स्कूल तथा अस्पताल तो जा सकती है पर बाकी दो में जाना मुश्किल है. कल बहुत दिनों या कहें वर्षों बाद मामीजी से फोन पर बात की. परसों होली है, पर उन्हें इस वर्ष होली नहीं मनानी है. जैसे राखी मनाने का उत्साह नहीं था वैसे ही होली मनाने का भी भी मन ही नहीं है. पिताजी के बिना जैसे सब त्योहार अपनी आभा खो चुके हैं.